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इण नै देखण नै वै कोनी…..

श्री कन्हैयालाल भाटी (४ जुलाई, १९४२ – १४ जनवरी २०१२)
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untitled“……इचरज तौ इण बात रौ है कै सितर बरसां री उमर रै अड़ै-गड़ै आय लेखक कन्हैयालाल भाटी कहाणियां री पैली पोथी छपाई है जद कै वां री कहाणियां केई बरसां सूं न्यारी न्यारी पत्रिकावां में छपती रैयी है। …… कहाणियां में कठैई जीवण रा राग-रंग है तो कठैई दुख रा दरसाव, कठैई दोगाचींती है तो कठैई आपै रा अंतर विरोध। केई दूजी-चीजां ई है जिंया उदासी, अवसाद अर अणबूझ सपन, मरजादा में पजियोड़ी नारी री अंतस-पीड़ा, चौफेर पसरियोड़ो सरणाटो, अबखायां सूं जूझता मिनखां रो हौसलो, एकलखोरी आदत रो सूगलवाड़ो अर मांयलै घमसाण नै बारै लावण री खेचळ। इण सगळै तांणै-बांणै नैं अंगेजता थका लेखक उण नै अरथावण सारू एक ओपती असरदार, रंजक अर रळकवीं भासा ई काम में ली है। एक इसी भासा जिकी अंतर दीठ री आफळ नै साकार रूप देय सकै।…”
शिक्षा विभाग राजस्थान री मासिक पत्रिका “शिविरा” रा पूर्व-संपादक अर ख्यातनांव कवि श्री भवानीशंकर व्यास “विनोद” आ बात राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर री मासिक पत्रिका “जागती जोत” रै दिसम्बर, 2011 अंक मांय लिखी। ऐ ओळ्यां “कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां” पोथी री परख लिखतां वां लिखी ही, परख नै बांच’र म्हैं मानजोग कन्हैयालाल भाटी नै सीरांथै बैठ’र सुणाई। वै कैंसर सूं जूझ रैया हा अर वां री हालत ठीक कोनी ही। “जागती जोत” रै इणी अंक में वां री छेहली कहाणी अटकळ छपी। वां रो माननो हो कै हरेक कहाणी बांचणियै रै काळजै उतरै जिसी लिखणी चाइजै अर कहाणी-पोथीपरख पेटै घणा राजी हा।
अठै ओ खुलासो करणो लाजमी है कै वां री तकलीफ अणमाप ही पण वै उपन्यास “अणसार” अर “जोगाजोग” रै अनुवाद नै लेय’र चिंता करै हा कै ओ काम किंया पार पड़सी। साहित्य अकादेमी कानी सूं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर रै “जोगजोग” उपन्यास रै अनुवाद नै वै पूरो करियो ही हो अर आ ई बात गुजराती उपन्यासकार वर्षा अडाजला रै “अणसार” बाबत ही। अणसार एक मोटो उपन्यास हो अर उण री प्रेस कॉपी तैयार हुया पछै कन्हैयालालजी भाटी चावतां हा कै ओ उपन्यास राजस्थानी रा लूंठा अनुवाद श्री सत्यनारायण स्वामी नै समरपित करियो जावणो है। आं दोनूं कामां खातर कीं बगत री दरकार ही पण म्हे घर-परिवार रा सगळा मन ही मन में डरै हा कांई ठाह भाग मांय कांई लिख्योड़ो है। वै जीवण अर मरण रै बिचाळै हुयां उपरांत ई घणा ऊरमावान अर जोस सूं पूरमपूर हा। म्हैं वां री तकलीफ मांय इण जूण मांय खुद रो मरण जैड़ी पीड़ सैन करी है। वां री पाटी-पोळी रै बगत दोय बार वां रै कैयै मुजब वां रै पाखती रैय’र जाणियो कै वै बिरला मिनख हा जिण अणथाग दरद रै समंदर में तिरै हा, म्हैं म्हारै जीव रै ऊपरिया कर वा पीड़ परतख देखी अर वो देखणो ई खरोखरो कैवूं कै खुद रै मरण दांई हो। उण सगतीवान लेखक-अनुवादक नै निवण करूं कै अखूट ताकत रै पाण मौत सूं वां घणी जूझ मांडी।
श्री कन्हैयालालजी भाटी म्हारै पिता श्री सांवर दइया रा सगळा सूं गैरा भायला हा। पिताश्री जद संसार छोड़ग्या तद म्हनै घणी हिम्मत देवणियां मांय आदरजोग भाटीजी बाबोसा नै म्हैं म्हारै मन रै घणो नजीक आवतां देख्यो। माइत रै रूप मांय बरसां वां आपरो हाथ राख्यो। म्हनै नौकरी रै सिलसिलै में बारै रैवणो पड़ियो अर वां सूं मेळ-मुलाकात कमती हुयगी। बरस 2011 रै दिसम्बर महीनै रै एक दिन वां रो बुलायो आयो अर म्हैं वां रै घरै पूग्यो तो म्हारै पगां हेठली जमीन जाणै खिसकती लागी। म्हैं ओळमो ई दियो कै म्हनै बीमारी री खबर क्यूं कोनी करी तद वां घणी हिम्मत सूं कैय तो दियो बुढापो है हारी-बेमारी चालती ई रैवै पण उणी दिन जद म्हैं दोनूं घरै एकला बैठा तद वै रोवण लागग्या कै बेटा नीरज बीस दिन होयग्या रोटी कोनी खाई। म्हैं हिम्मत बंधाई कै सब ठीक हो जासी… म्हैं आयग्यो हूं नीं, पण कांई ठीक कोनी होयो। उण बगत पूरी विगत जाण’र भाटी बाबोसा नै म्हैं कैयो कै आं अनुवाद रै कामां सूं तो बेसी जरूरी आपरी कहाणियां री पोथी राजस्थानी में आवणी समझूं… हरख है वां री मंजूरी सूं वो काम बगतसर होयो। उण पोथी रै लोकार्पण री जबरी जुगत बैठी कै “मुक्ति” संस्थान रा भाई श्री राजेंद्र जोशी अर श्री बुलाकी शर्मा कन्हैयालाल भाटी रो सम्मान करण री सोचै हा अर म्हारी बात पछै 27 दिसम्बर, 2011 नै ओ काम होयो। महीनो मळ रो अर वां रो कैवणो नीरज अबार ठीक रैसी कांई? म्हैं कैयो मळ पछै “अणसार” अर “जोगाजोग”। वै “कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां” पोथी नै देख’र जित्ती आसीस दी वां म्हारै अंतस मांय हाल जीवै। उण लोकार्पण अर सम्मान समारोह री जाणै वां रै जीवण मांय कसर बाकी ही कै मळ उतरण रै साथै ही 14 जनवरी 2012 नै साहित्य पेटै पूरी जूण अरपण करणिया लेखक अनुवादक श्री कन्हैयालाल भाटी रामसरण होयग्या। वां रो जलम 4 जुलाई 1942 नै होयो अर “शिविरा”, “नया शिक्षक” मांय बरस 1967 सूं 1996 तांई सहायक संपादक रै रूप मांय उल्लेखजोग काम करियो अर बरस 2000 में सेवानिवृति पछै कैंसर री बीमारी सूं जूझता थकां भी सिरजणरत रैया। वां रै जीवण मांय हिंदी में केई पोथ्यां छपी अर मान सम्मान मिल्या। राजस्थानी पोथी कहाणियां री वै देख सक्या अर आज जद “अणसार” पोथी आपां साम्हीं आई है तो इण नै देखण नै वै कोनी। वां रै नीं रैयां म्हारी बडिया श्रीमती पुष्पादेवी भाटी अर तीन भाई योगेंद्र, प्रदीप अर संदीप भेळै दोय बैनां सुमन, अंजु नैं लखदाद कै बाबोसा श्री कन्हैयालाल भाटी रै काम नैं साम्हीं लावण रा जतन में सैयोग दियो। म्हैं पूरै राजस्थानी साहित्य-परिवार कानी सूं आं रो गुण मानूं। इण पोथी रै भाग में कोनी हो कै आ वां रै रैंवता राजस्थानी में छपै अर वै इण टाणै आपरी बात लिखै सो म्हैं वां कानी सूं “अणसार” री मूळ लेखिका बैन वर्षा अडाजला रो जस मानू कै वां इण री मंजूरी दी अर आप बांचणियां नै अरज करूं कै पोथी बाबत आपरी टीप जरूर लिखजो।
-डॉ. नीरज दइया
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समाजिक-चेतना रै संजोरा सुरां री कहाणियां

manoj kumar swamiराजस्थानी साहित्य मांय मनोज कुमार स्वामी एक ओळखीजतौ नांव है। “काचो सूत” कहाणी-संग्रै रै अलावा आपरी बाल-कहाणियां री पोथी- “तातड़ै रा आंसू”, कविता संग्रै- “बेटी” अर लघुनाटक री पोथी- “रि-चार्ज” छप्योड़ी। आप री ओळखाण रा दोय बीजा महतावू पख भळै है कै आप घणै बरसां सूं“सूरतगढ़ टाईम्स” पखवाड़ियै छापै रै मारफत राजस्थानी रौ डंकौ बजावता रैया है, अर भासा री मान्यता खातर ई दीवानगी री हद तांई भावुकता राखै। जन-चेतना खातर लांबी जातरावां करी, अर पत्रकारिता रै लांठै अनुभव रै पाण काळजौ हिलावै जैड़ा सांच सूं सैंध नित सवाई हुवै। स्यात ऐ ई कारण रैया है कै आपरी रचनावां मांय किणी गोड़ै घड़ियै सांच री ठौड़ खरोखरी देख्यै-भोग्यै अर परखियौ सांच सामीं आवै।
कोई एक लेखक जद न्यारी न्यारी विधावां मांय रचनावां लिखै तद ई उण रचानकार री पण एक विधा मूळ हुया करै। अठै फगत इत्तौ कैयां सरै कोनी कै लेखक मनोज कुमार स्वामी मूल मांय कहाणीकार है। सो बांरै इण कहाणी संग्रै “किंया” रै मारफत आ पड़ताळ जरूरी लखावै।
रचनाकार जद किणी रचना नै लिखै तद उण री रचना रै मूळ मांय कोई न कोई कारण जरूर हुवै। बिना किणी कारण रै जिकौ कीं रचीजै बा रचना कोनी हुवै। मनोज कुमार स्वामी पत्रकार है सो बां नै नित लिखणौ पड़ै, पण बो लिखणौ अर ओ लिखणौ घणौ दोनूं एक कोनी। तौ कांई पत्रकारिता मांय जिकौ कीं नीं लिखज सकै का जिकौ बठै लिखण मांय छूट जावै…लिखज नीं सकै बो सिरजणा रौ बीज बणै। जिकै नै लिख्यां बिना निरायती नीं मिलै, बो ई कीं किणी रचना री जलमभौम हुय सकै। कोई खबर कहाणी कोनी हुवै पण कहाणी मांय कोई खबर हुय सकै अर असल मांय रचना रै मूळ मकसद मांय एक मकसद आपां नै खबरदार करणौ ई हुया करै। खबरदार करण नै ई दूजै सबदां मांय कैया करां कै- रचना समय अर समाज नै संस्कारित करै।
आपां रै आखती-पाखती रा केई-केई चितराम दीठावां रै रूप “किंया” कहाणी-संग्रै री कहाणियां मांय ढाळिया है। मनोज कुमार स्वामी री कहाणी-कला री सब सूं मोटी अर उल्लेखजोग खासियत आ है कै बै आपरै आसै-पासै री घटनावां नै कहाणियां मांय ढाळाती बगत खुद एक खास सामाजिक चेतना रै आगीवाण लेखक री इमेज मांय ढळता जावै। इण बात रौ खुलासौ इण ढाळै समझ सकां कै फिल्मां मांय जिंया अभिनेता मनोज कुमार री छवि भारत नांव अर देस-भगत रै रूप मांय चावी-ठावी हुयगी, ठीक बिंया ई कहाणीकार मनोज कुमार स्वामी ई समाजिक-चेतना रा चावा-ठावा कथाकार हुयग्या है। गांव अर नगरीय जीवण रौ जिकौ रूप बांरी लगैटगै सगळी कहाणियां सामीं आवै, उण मांय मूळ चिंता आधुनिकता अर बदळाव री आंधी सूं लोप हुवतां आपां रा संस्कार दीसै। आं संस्कारां री संभाळ सारू कहाणीकार बारम्बार इण लोक मानस रै सामीं केई कहाणियां मांय ऊभौ हुवतौ दीसै।
“छोर्‌यां” कहाणी मांय कहाणीकार आपरै सामीं हुयै एक छोटै-सै घटना-प्रसंग नै काहाणी मांय ढाळ देवै। सजीव चित्रात्मक भासा रै पाण इण कहाणी मांय केई केई संकेत कहाणीकार करै, जिंया- विस्थापन रो दरद, आधुनिक हुवतै समाज रा संस्कार, लोक री भासा मांय बदळाव, कामुक दीठ, बाल श्रम, अशिक्षा, नारी असमानता, देस विकास आद। केई सवालां सूं बाथेड़ौ करतौ कहाणीकार जद कळभळीजतौ छेकड़ मांय सवाल करण ढूकै तद आपां रा कान खूसर हाथां मांय आय जावै। इत्तै रसीलै कथा-प्रसंगां पछै इण ढाळै री फंफेड़ी राजस्थानी कहाणी मांय साव नूंवी कही जाय सकै। जे नेठाव सूं विचारां तौ अठै लखावै कै ओ पत्रकार मनोज कुमार स्वामी रौ सामाजिक-चेतना रौ संजोरो सुर है जिण नै उगेरियां बांनै निरायती मिलै।
समाज मांय हुवण आळा छळ-छंदां नै एक पत्रकार किणी रचनाकार सूं बेसी जाणै-समझै-पिछाणै, कारण साफ है कै उण री सदीव भेंटा बां सूं ई’ज हुवै। आं छळ-छंदां मांय सूं खबर रै असवाड़ै-पसवाड़ै रौ जिकौ सांच खबर मांय ढळणौ चाइजै हौ, पण नीं ढाळीज सकै तद मनोजजी कहाणीकार बण’र कहाणी रचै। अर इण रचाव मांय कमती सूं कमती सबदां मांय एक सांच राखणौ ई बां रौ मूळ मकसद लखावतौ रैवै। बै कठैई सबदां नै खेलण कोनी देवै, ना ई सबदां सूं खेलै। कहाणी चालू करतां ई परिवेस अर घटना-संवाद मांय थोड़ै सबदां सूं तुरत किणी साच सामीं पाठक नै ऊभौ कर’र उण जातरा खातर टोर लेवै।
“अट्टो-सट्टो” का “ठाकर” कहाणी री बात करां तौ आं मांय कमती सबदां सूं जिण नागै सांच नै कहाणीकार रचै, बो सांच चुभतौ हुय सकै पण बो एक जरूरी सांच है। अठै बाल-विवाह अर जोर-जबरदस्ती जैड़ी सामाजिक कुरीत साथै बो सांच है जिण सूं समाज छिपला खावै, लुकतौ फिरै। ऐड़ै मांय कहाणीकार जाणै कोई आरसी लिया फगत चिलको ई नीं न्हाखै, पण बांचणियां नै दीठाव रै ऐन सामीं ऊभौ कर देवै। कहाणीकार रौ मकसद आपां री आंख्यां खोलण रौ है। पण ओ फैसलौ आपां रौ है कै आपां इण दीठाव सामीं जाय’र आंख्यां मींच लेवां का आंख्यां खोल सावचेत होय जावां। अठै फगत सावचेत करणौ ई कहाणीकार रौ मकसद कोनी, कहाणीकार री चावना है कै सामाजिक चेतना रै इण सुर नै आपां सुणा अर बगतसर कीं करां।
आंख्यां खोलण अर कीं करण पेटै दोय कहाणियां माथै भळै बात करां। संग्रै री “चान्दा” अर“किंया” कहाणी री कथा-वस्तु मांय जिण ढाळै री बोल्डनेस देखण नै मिलै, बा आधुनिक कहाणी री एक खास धारा कही जाय सकै। चान्दा री नायिका रै मारफत कहाणीकार बाल-ब्यांव रौ संकेत करै, पण असल मांय आ कहाणी समाजिक-चेतना मांय मूल्यां रै पतन रौ परचम लहरावै। कहाणीकार री आ दुविधा कैय सकां है कै बौ किणी अनीत नै स्वीकार करै का नीं करै रै सोच भेळै आपां नै सरीक तौ करै ई करै अर छेकड़ मांय उण नै मनचायौ मोड़ देवै। “चान्दा”  कहाणी बांचता थकां ओळी-ओळी लखावै कै नायिका नै बचण खातर कोई घर कोनी लाधैला। पण नायिका रौ आतमधात नाटकीय अंत सौ लखावै। इणी ढाळै “किंया” रौ कथा-नायक जिण मनगत अर सोच नै सामीं लावै बौ उत्तर आधुनिक तौ है ई’ज साथै ई साथै सामाजिक पतन अर अमूल्यन कानीं सागीड़ौ संकेत पण है।
आपांरा ख्यातनांव कथाकार श्रीलाल नथमल जोशी बरसां पैली जिण सामाजिक चेतना खातर बिगुल बजायौ उणी परंपरा आं कहाणियां नै राख सकां। “पारटी”, “जागण”, “बिरजौ” आद कहाणियां इणी परंपरा नै पोखै। कहाणीकार उणी बुणगट मांय कहाणी मांडै पण आपरी भासा अर मौलिक सोच रै पाण आधुनिक कहाणी सूं जुड़ै। अठै कहाणीकार समाज री अबखायां सूं मूंड़ौ लुक’र किणी फैसनाऊ का चलताऊ बातां नै कहाणी मांय कोनी परोटै। लोग जद जागण का पारटी रै नांव माथै दिखावौ करण लागै तद कहाणीकर आपां नै चेतावै। ओ जागण भगती रै सुख री ठौड़ दुख उपजावण रौ जरियौ बणै का हियै सूं हुवण आळै हेत-मनवार री ठौड़ पारटी मांय दिखावै अर पईसा रौ खोगाळ करीजै तद कहाणी लिखीजै। बिरजौ जद सुख री उडीक मांय तर-तर दुख मांय डूबतौ जावै तद उण री कहाणी मनोजजी नै मांडै पड़ै। आ कहाणीकार री मजबूरी है कै बो जिण घटना-प्रसंगां अर सांच सूं बाथेड़ौ करै तद खुद री निरायती खातर काहणी रै आंगणै बारंबार ढूकै।
मनोज कुमार स्वामी

मनोज कुमार स्वामी

सरल-सीधी अर सारआळी बात तौ आ है कै आं कहाणियां री सरलता-सहजता ई सगळा सूं मोटी खासियत बण’र सामीं आवै। बिना किणी लाग-लपेट रै कहाणीकार आपां री लौकिक कथा-परंपरा नै परोटतौ थकौ किणी बातेरी दांई जद कहाणी रचण लागै तद बौ आपरी भासा, संवादां रै पाण चरित्र-चित्रण करतौ-करतौ बिना किणी उळझाव रै पाठकां रै हियै तांई मरम आळी बात पूगावण मांय सफल रैवै।

“किंया” री इण पड़ताळ पछै आ बात पुखता हुवै कै मनोज कुमार स्वामी रै लेखन री केंद्रीय विधा कहाणी है। बां री दूजी विधावां- कविता, नाटक आद रै लेखन मांय आपां देख सकां कै कथात्मता रौ पलड़ौ भारी रैवै। इण कहाणी-संग्रै री केई कहाणियां सूं राजस्थानी कहाणी जातरा मांय बधापौ हुवैला अर बरसां तांई बै पढेसरियां नै याद रैवैला। उम्मीद करूं कै “किंया” रौ कोई उथळौ कहाणियां बांच कहाणीकार नै आप ई लिखोला।
नीरज दइया
20 नवम्बर, 2011
टीपू सुल्तान रौ जलमदिन

मेरा “मोम का घोड़ा” नहीं रहा…..

MahesgChandr Joshi

किसी भी रचनाकार की लेखन-यात्रा का एक आरंभिक बिंदु होता है, किंतु उसे सरल-सहज रूप में खोजना अथवा स्पष्ट कर पाना बेहद कठिन कार्य है। मेरा तो यहां तक मानना है कि उस बिंदु को ठीक-ठीक ढूंढ पाना लगभग असंभव-सा ही होता है। लेखन-यात्रा के उस आरंभिक बिंदु की तलाश में कुछ बातें की जा सकती हैं। यह स्मृति-आलेख उस बिंदु की तलाश में ऐसा एक प्रयास है कि मैं मेरे साहित्यिक संस्कारों की आरंभिक पुस्तकों में से कथाकार श्री महेशचंद्र जोशी के बाल उपन्यास “मोम का घोड़ा” का स्मरण कर रहा हूं। कुछ किताबें और कुछ लेखक ही होते हैं, जो हम में साहित्यिक संस्कारों का कोई बीजारोपण करते हैं। अगर लेखन जन्मजात प्रवृति है तो निश्चय ही कुछ परिस्थतियां उसके उत्स का कारण बनती हैं।

मेरा सौभाग्य रहा कि मेरा जन्म एक लेखक के घर में हुआ। मेरे पिता स्व. सांवर दइया के जिन अंतरंग मित्रों को मेरा बाल-मन अब तक स्मृति में बसाए हैं उनमें सर्वश्री हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी और गणेश मोदी प्रमुख हैं। उन दिनों की स्मृतियों में मुझे अनादिष्ट कला के पेंटर श्री के. राज द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन चित्रकला शिविरों का स्मरण है। जहां लेखकीय झोला लटकाए मैंने अपने पिता को देखा, उनके साथ के मित्रों में श्री महेशचंद्र जोशी थे जिनकी पुस्तक “मोम का घोड़ा” मुझे उपहार स्वरूप मिली।

मैं कथाकर महेशचंद्र जोशी से अनेक बार मिला और सदैव उनके स्नेह का स्पर्श भीतर तक किया। कुछ लेखकों के विषय में यह सत्य है कि उनको उनके कद के हिसाब से साहित्य की पंक्ति में खड़ा नहीं किया जाता। जोशी जी जैसे कुछ लेखक अपने संकोच के चलते अथवा स्वांत-सुखाय के आस्वाद के रहते भी इस पंक्ति में खड़े हुए होने के बावजूद हिंदी आलोचना द्वारा देखे नहीं गए हैं। जोशी जी की बीस के लगभग कथा-साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है और अनेक पुस्तकें अप्रकशित हैं। उनके चर्चित कहानी संग्रहों में प्रमुख है- ‘मेरा घर कहां है’, ‘मुझे भूल जाओ’, ‘तलाश जारी है’ आदि। उपन्यासों में “नशा” उपन्यास की चर्चा हुई है, किंतु बाल उपन्यास “मोम का घोड़ा” पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है।

वरिष्ठ कथाकार श्री महेशचंद्र जोशी 24 मई, 2012 रविवार की रात्री इस संसार को अलविदा कह गए। जोशी जी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे, किंतु वे हमेशा शब्दों की दुनिया में डूबे रहेते थे। उन्होने कहानियां लिखते-पढते हुए कभी अपनी बीमारी को इतनी गंभीरता से नहीं लिया। किसी को क्या पता था कि वे असमय इस तरह अलविदा कह जाएंगे। मैं नौकरी के सिलसिले में बीकानेर से लगातार बाहर रहा और जब अपने घर बीकानेर वापस लौटा हूं तो उनकी कमी भीतर कहीं अखर रही है। मेरा मोम का घोड़ा नहीं रहा। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आते हैं जब जोशी जी हमारे पैतृक आवास जेल रोड साईकिल से आते थे और पापा की बजाय जब भी मुझ से मुलाकात होती तो कहा करते थे- “पापा को कहना कि मोम का घोड़ा आया था।” यह वह दौर रहा होगा जब उनको शक था कि मैं महेशचंद्र जोशी नाम याद नहीं रख सकूंगा अथवा यह उनका अत्यधिक स्नेह रहा होगा जिसके रहते खुद उन्होने अपना नाम मोम का घोड़ा निकाल लिया था।

महाकवि तुलसीदास जी की भांति वैसे तो मैं अपने उस पाठकीय आस्वाद के विषय में यही कहूंगा कि बिना मोम का घोड़ा उपन्यास पढ़े आप उस आस्वाद का अनुभव कर ही नहीं सकते जो वास्तव में है। रचना का पाठ और उस पाठ का काल विशेष भी उस पाठ के आस्वाद को प्रभावित करते हैं। बाल्यकाल में पढ़ी उस कृति का रोमांचक प्रभाव आज अगर पुनर्पाठ करूं तो संभव है नहीं हो सकेगा। जैसे किसी एक नदी में हम दूसरी बार स्नान नहीं कर सकते उसी प्रकार हर पाठ का आस्बाद समान नहीं होता।

मोम का घोड़ा का कथानक आज तो मुझे किसी लोक आख्यान सा प्रतीत होता है। इसमें राजा-रानी की सीधी सरल बाल मनोवैज्ञानिक आधार लिए रोचक कहाणी चलती है। राजा का पुत्र मोम का घोड़ा लेकर उड़ा और लौट कर नहीं आया, वह विध्न बाधाओं को पार करता एक नई कहानी रचता कथा के अंत में प्रगट होकर सब कुछ सुखांत कर देता है।

मुझे लगता है कि किसी रचना में आलोचना अपने मानकों के आधार पर रचना के साथ अक्सर शुष्क व्यवहार ही करती है, किंतु रचना का मर्म और प्रभाव पाठक ही पकड़ पाता है। मैं मेरे उस बाल्यावस्था के पाठक को कहीं भीतर अब भी संजोए सहेजे हूं कि बाल उपन्यास मोम का घोड़ा का स्मरण अब भी ताजा और स्नेह से सराबोर निजता लिए हुए है। क्या यह किसी कृति की सफलता नहीं है कि उस का स्मरण हमें लंबे समय तक रहे? हिंदी बाल उपन्यास यात्रा की जिन कृतियों को मैं आस्वाद कर सका हूं उन में अब तक मुझे सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में बयान देना का अवसर मिले तो मैं श्री महेशचंद्र जोशी के मोम का घोड़ा को ही याद करना चाहूंगा। इस उपन्यास की सरल सहज भाषा और कथानक में कौतूहल का घटक अब प्रभावशाली प्रतीत होता है। उपन्यास की संवेदना में बालमन डूब सा जाता है। उपन्यास को एक बैठक में पढ़ने का कीर्तिमान तो बनाया ही था साथ ही साथ इसे अनेक बार पढ़ने का आनंद भी मैंने लिया था। राजस्थान के बाल उपन्यासों में निश्चय ही मोम का घोड़ा कालजयी कृति है जो वर्षों तक याद की जाती रहेगी।

MaheshChanndr Joshiकिसी लेखक की निधि उसका परिवार और परिजन होते हैं। यह हर्ष की बात है कि उनकी पुत्री रंगकर्मी मंदाकिनी जोशी निश्चय ही इस शब्द-यात्रा को सहेजने का कार्य करेंगी। मेरी कामना है कि जोशी जी की  अप्रकाशित रचनाएं शीघ्र साहित्य-जगत के समक्ष आए और “मोम का घोड़ा” बाल उपन्यास का पुनर्मुद्रण कोई प्रकाशक कर इसे इक्कीसवीं शताब्दी के बाल पाठकों को सहज सुलभ कराए ।

डॉ. नीरज  दइया

Cover-Mahesh Chandra Joshi

कविता रै आभै मंडाण

mandanयुवा कवियां री कवितावां बाबत बात करण सूं पैली आगूंच कीं खुलासा जरूरी लखावै। रचनावां मांय रचनाकार न्यारा-न्यारा खोळिया पैरै, उतारै अर बदळै। वो आप रै रचना-संसार मांय आप री ऊमर सूं ओछो अर मोटो होवण रो हुनर पाळै। किणी रचना री बात करां जणै ऊमर री बात बिरथा होया करै। इण पोसाळ मांय ऊमर ढळियां नवो दाखलो लेवण वाळां नैं कांई युवा रचनाकार कैवांला? कोई जवान कै ऊमरवान कवि पगलिया करतो-करतो आपरी ठावी ठौड़ पूग सकै, अर किणी नैं बरसां रा बरस लियां ई कलम नीं तूठै।

कोई युवा कवि पण जूनी बात कर सकै अर किणी प्रौढ़ कवि री कविता सूं युवा-सौरम आय सकै। आपां जद कोई काम किणी खास दीठ सूं पोळावां कै अंगेजां तद आगूंच कीं पुख्ता काण-कायदा राखणा पड़ै। सींव ई बांधणी पड़ै। अठै युवा कवियां सूं मायनो बरस 1971 पछै जलमिया कवियां सूं तै राखीज्यो है। इण संकलन मांय देस री आजादी रै लगैटगै पचीस बरसां पछै बरस 1972 अर उण पछै जलमिया कवियां री कवितावां एकठ करीजी है। इण युवा पीढी खातर आधुनिक सोच अर संस्कारां री बात इण रूप मांय स्वीकारी जाय सकै कै माईत आजाद भारत मांय नवा संस्कारां साथै आं नैं जवान करिया।

हिंदी साहित्य इतिहास रै आदिकालीन राजस्थानी कीरत-ग्रंथां अर आजादी रै आंदोलन मांय अठै रै कवियां री भूमिका नैं कदैई कोई नीं बिसराय सकैला! दूजै कानी आपणी कविता रो ओ पण सौभाग रैयो है कै हाल तांई राज-काज री इत्ती अबखायां रै रैवतां ई आ जातरा लगोलग चालू है। अठै आ चरचा करणी बे-ओपती कोनी लखावै कै बिना प्रेरणा अर प्रोत्साहन रै केई-केई रचनाकारां रो बगत परवाण पूरो विगसाव नीं होय सक्यो। कोई कवि-लेखक लिखतो-लिखतो बूढो-अधबूढो होय जावै, तद उणरी सरावणा कै मान-सम्मान में कांई सार है! रचनाकारां रा मंडाण देख’र संभाळ अर अंवेर तो बगतसर ई होवणी चाहीजै।

560504_518050271556536_863365167_nनवै जुग अर नवी कविता रै पक्कै आंगणै पांख्यां खोलणिया आं कवियां रै ‘मंडाण’ सूं पचपन कवियां रै इण संकलन मांय बरस 1972 सूं 1995 तांई जलमियां युवा-मनां री कवितावां सूं आपरी ओळख होवैला। लगैटगै चाळीस बरसां तांई रा राजस्थानी रा सगळा कवियां री रचनावां इण जिल्द में कोनी। जिका कवि छूटग्या उणां पेटै किणी ढाळै रो अवमानना-भाव नीं समझ्यो जावै। हो सकै किणी सींव रै रैवतां कोई ऊरमावान रचनाकार अठै सामिल नीं होय सक्यो होवै।

नवी कविता रा वै कवि जिकां रा निजू कविता-संग्रै छप्योड़ा है कै वै कवि जिका आपरी सखरी हाजरी पत्र-पत्रिकावां रै जरियै मांडता रैवै, वां नैं अठै सामिल करण री तजबीज करीजी है। युवा कवियां रै इण संकलन रा केई कवि जियां- संतोष मायामोहन, शिवराज भारतीय, राजेश कुमार व्यास, मदन गोपाल लढ़ा, ओम नागर, विनोद स्वामी, हरीश बी. शर्मा, शिवदान सिंह जोलावास आद साहित्य पेटै लांबै बगत सूं जुड़ाव राखणिया संजीदा अर ओळखीजता कवि है। इण संकलन रा केई दूजा युवा कवि ई ओळख बणावण में लाग्योड़ा दीसै अर कैवणो पड़ैला कै इण ‘मंडाण’ मांय आं कवियां री पळपळाट करती ऊरमा परखी जाय सकै।

हरेक कवि अर कविता रो आप-आप रो न्यारो-न्यारो ढंग-ढाळो होया करै। आं सगळा कवियां नैं एक जाजम माथै जचावतां किणी ढाळै रो कोई फरक संपादन रै ओळावै कोनी कर्यो है। कवितावां री बानगी खातर सगळा कवियां वास्तै च्यार पानां री सींव राखतां थकां, विगत ऊमर रै हिसाब सूं अर परिचै अकारादि क्रम में राखीज्यो है। अठै ओ दावो कोनी कै ओ प्रतिनिधि युवा कवियां कै प्रतिनिधि कवितावां रो संकलन है। हां, इत्तो जरूर कैयो जाय सकै कै इण संकलन मांय केई प्रतिनिधि युवा कवि अर प्रतिनिधि कवितावां आप नैं अवस मिलैला।

कविता परंपरा रो विगसाव है आज री आधुनिक कविता। जूनै काव्य-रूपां अर मंच नैं बिसारती आ लांठी जातरा बगत-बगत री युवा कविता सूं राती-माती होयी। इयां कैयो जाय सकै कै कविता जातरा नैं युवा कवि नवा रंग सूंपै। बरस इक्कोत्तर में ‘राजस्थानी-एक’ रै मारफत कवि तेजसिंह जोधा आधुनिक कविता नै बंधी-बंधाई सींव अर बुणगट सूं न्यारी कर’र साम्हीं लाया। नवी कविता रै इण रूप-रंग अर बानगी रो हाको घणो करीज्यो। इण धमाकै पछै युवा बरस रै टाणै एक बीजो सुर घणै नेठाव साथै 1985 में तिमाही पत्रिका ‘राजस्थली’ ई साम्हीं राख्यो। ‘राजस्थली’ रै च्यार अर ‘राजस्थानी-एक’ रै पांच कवियां री कविता-जातरा री सावळ अंवेर नीं होयी। आं मांय सूं केई कवि कविता सूं लांबो जुड़ाव नीं राख सक्या। अठै कवि जोधा रै सबदां मांय बस इत्तो ई कैयो जाय सकै कै ‘अठै केई-केई हांफळा है’। कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ पोथी रूप अणछपिया कवियां नैं साम्हीं लावणै रो जतन ‘थार सप्तक’ रै मारफत कर रैया है।

किणी दौर रै ऊरमावान युवा कवियां रै थापित होवण कै नीं होवण रै कारणां माथै विचार होवणो चाहीजै। थापित होवणो का नीं होवणो बगत रै हाथां, पण कविता जातरा नैं अणथक चालू राखणी कवि रै हाथां होवै। अठै महताऊ बात आ है कै किणी पण विधा मांय बगतसर युवा रचनाकारां नैं ठौड़ मिलै। लगोलग वै इण मारग आगै बध कविता री नवी ओप दरसावैला।

आप री भासा अर कविता नै अंगेजणो-अंवेरणो ई मोटी बात होया करै। केई भाई-बीरा तो राजस्थानी कविता री फगत गरीबी रो रोवणो रोवै अर विचारै कै आ गरीबी कूक्यां सूं कमती होय जासी। कविता रचण खातर कठैई विदेस जावण री दरकार कोनी। खुद कवि नैं आप रो आसो-पासो भाळणो है। घर, परिवार, समाज सूं सजी आ दुनिया ई कविता री जमीन होया करै। राजस्थानी कविता री जातरा मांय आज रा युवा कवि जे विचारैला कै आज कविता नैं कांई करणो है? कविता नैं जिको कीं करणो है उण में आडी कुण लगावै? आज कविता क्यूं लिखा? किण खातर लिखां? किसी बातां कविता में आवै कै आवणी चाहीजै? किसी बातां रै मांय-बारै कविता आवै? केई-केई सवाल है जिकां रा जबाब युवा कवियां नैं सोधणा पड़ैला।

कवि अर कविता री कोई हद कोनी होवै। जठै-जठै सबदां रै मारफत पूगीज सकै, उण हरेक ठौड़ नंै कागद माथै कियां उतारां? कीं अैनाण-सैनाण मांड’र बताया जाय सकै। कवि अर सामाजिक कविता सुण-बांच’र उण हद-अणहद तांई पूग सकै। आ सींव जाणता थकां आं दोनुवां बाबत बात फगत सबदां री हद मांय करीजै।

विग्यान दावै जितरी तरक्की कर लेवै पण कविता बणावण री कोई मसीन कोनी बणा सकै। कविता रो कोई फरमो का संचो ई नीं थरप्यो जाय सकै। कवि कविता रै रूप मांय आप रो रचाव राखै । रचाव खातर पीड़ जरूरी होवै। कांई बिना पीड़ रै रचाव कोनी होवै? कांई रचाव सूं पैली पीड़ ई होया करै? कांई रचाव किणी सुख रो नांव कोनी? रचाव पैली अर पछै रै सुख-दुख नैं रचाव करणियां ई जाण सकै। आपां सुख-दुख झेलता, मिनखा-जूण मांय जूझता, रचाव रा रंग निरखता-परखता आगै बधता आया हां। हरेक नवै बगत में कविता रै आंगणै पगलिया मांडती युवा पीढी न्यारै-न्यारै सुरां नैं सोधती-साधती बगत परवाण सेवट किणी खास राग नैं हासल करै। कविता रै मारग निकळ्या ‘मंडाण’ रा अै कवि अठै री आखी जूण नैं अरथावै-बिड़दावै। आपरै आसै-पासै री दुनिया री हलगल बाबत आपरी बात कविता रै मारफत राखै।

आज नवी कविता छंद नैं राम-राम कर दिया लखावै अर रस-अलंकार री अटकळां ई अकारथ होयगी। आज री युवा कविता रो समूळो दीठाव जूनी आलोचना-दीठ रै ताबै आवै जैड़ी बात कोनी। वयण सगाई, छंद, ओपमा रा रसिया नैं नवा सबदां अर भावां री आ बुणगट सावळ संभाळणी पड़ैला। आं मांयली रचाव री पीड़ नैं परखणी पड़ैला। नवा कवि किणी जूनी रीत कै परंपरा माथै कलम सांभै तद वां रा सवाल आज सूं जुड्योड़ा होवै। नवी कवितावां में इण नैं आज मोटी खासियत रूप इण ‘मंडाण’ मांय ओळख सकां।

कविता हंसी-खेल कोनी अर कविता रचाव-विधि आगूंच कवि नंै ठाह कोनी होया करै। किणी कविता री कोई विधि जाण’र दूजी कविता कोनी लिखीजै। कविता में कोई सीधी सपाट इकसार बुणगट कोनी। दावै जियां ओळ्यां लिखण सूं कोई कविता कोनी बणै। नवी कविता जे पग लिया है तो उण री कोई विधि है। लिखण अर रचण मांयलो आंतरो तो आपां जाणां। कांई साचाणी कविता रचणो सौरो काम है! जद हरेक ओळी आंकी-बांकी अर कीं न्यारो आंतरो लियां किणी बीजी ओळी-घर में बैठी है, तद उण री आपरी आंक-बांक रो कोई तो अरथ है। उण अरथ नैं ओळख’र अरथावणो है। आं रो किणी ओळी रै भेळप में राखणो का अलायदो लिखणो समझ री बात है।

अबार तांई होयै राजस्थानी कविता रै काम नैं देख्यां जाण सकां कै आधुनिक कविता-जातरा री बात करणियां अजेस आ बात करी ई कोनी।  संकलन रा केई कवियां री कवितावां देख्यां ठाह लाग सकै कै आज री युवा कविता रो रंग-रूप, भासा-बिम्ब अर मिजाज आद स्सो कीं बदळग्यो है। असल मांय इण इक्कीसवैं सईकै री आं कवितावां माथै खुल’र बात करण री दरकार लखावै। कैवण नैं तो कैयो जावै कै आज आखै देस नैं युवा पीढी माथै गाढो पतियारो है। सो कैयो जाय सकै कै इणी आस अर भरोसै सागै आवतै बगत में भारतीय कविता पेटै युवा कवि राजस्थानी कविता री साख ऊजळी करैला।

जूनी अर नवी कवितावां मांय बदळाव रा कारण सोधतां आपां नैं आज आखती-पाखती रा हालात देखणा अर विचारणा पड़ैला। आज जद आखी दुनिया एक गांव बण रैयी है। दूजै पासी गांव-गांव बिचाळै आंतरो अर अलगाव पसर रैयो है। गांवां अर देस रै इण बदळाव बिचाळै मिनख-मिनख बिच्चै जुध मंडग्यो है। घर, परिवार, समाज अर देस साम्हीं वो भीड़ थकां एकलो होयग्यो है।

जुध जे रणखेत मांय होवै तो एक दिन निवड़ जावै। नित रै इण जुद्ध सूं कियां पार पावां। आंगणै-आंगणै अर अंतस-अंतस जुध रा बीज पांगर रैया है। अंतस मांयलो अंधारो जीवण-रस नैं खाटो कर रैयो है। इण अबखै बगत मांय स्सो कीं बदळीज’र नवै रंग रूप मांय आपां रै साम्हीं है। इण नैं ओळखती दीठ नवी है। इण खातर नवी दीठ रै आं युवा कवियां री रचनात्मकता लारली पीढी सूं न्यारी होवणी वाजबी है। पण नवै अर जूनै री आ सीर समझणी पड़ैला। कवयित्री किरण राजपुरोहित ‘नितिला’ री कविता ‘ओळूं रो सूरज‘ बानगी रूप देखां-

सगळी बातां

जद बीतगी

बणागी सूरज ओळूं रो

जिण मांय-

पिघळ-पिघळ

भरीजै फेरूं

झील म्हारी

ओळूं री।

कविता अर जीवण दोनूं अड़ो-अड़ चालै, एक नैं समझण खातर दूजै री जरूरत है। अबै वा भारी भरकम सबदावळी, छंद रा बीड़ा अर अलंकारां री छटावां जचावण-उठावण री दरकार कोनी। खुद रो कोई एक कै केई छोटा-छोटा साच घर-परिवार रा कविता में कवि राख सकै। एक दाखलै रूप इण बात नैं कवि मदन गोपाल लढ़ा री कविता ‘म्हारै पांती री चिंतावां’ सूं जाण सकां।

म्हनैं दिनूगै उठतां पाण

माचै री दावण खींचणी है।

पैलड़ी तारीख आडा हाल सतरह दिन बाकी है

पण बबलू री फीस तो भरणी ई पड़ैला।

जोड़ायत सागै एक मोखाण ई साजणो हुसी

अर कालै डिपू माथै केरोसीन भळै मिलैला।

म्हैं आ ई सुणी है कै

ताजमहल रो रंग पीळो पड़ रैयो है आं दिनां।

सिराणै राखी पोथी री म्हैं

अजै आधी कवितावां ई बांची है।

कवियां री आं कवितावां मांय बगत री झांई देखी जाय सकै। ‘इण दिस पड़ी नीं सुख री  झांई, राज बदळग्यो म्हानै कांई…’ उस्ताद री कविता आपरै बगत री कविता ही। अबै उण बगत, देस अर समाज री वै बातां अर चिंतावां  बदळगी। जूना राज-काज अर रिवाजां रै बदळियां स्सो कीं बदळ जाया करै। आज रै समाज में लुगाई री छिब अर हेत-प्रीत रो उणियारो बदळ्यो है। संसार में लुगायां है, टाबर है, घर-परिवार अर प्रेम है। आ रूपाळी दुनिया इणी प्रेम सूं है। इण प्रेम नैं बदरंग करण वाळी केई बातां होवै। प्रेम बाबत युवा कवि लिखै अर बीजा करतां बेसी लिखै। कवि ओम नागर आपरी कविता में कैवैै-

प्रेम-

आंख की कोर पे

धरियो एक सुपनो

ज्ये रोज आंसू की गंगा में

करै छै अस्नान

अर निखर जावै छै

दूणो।

कैयो जाय सकै कै इण जुग-समाज री सगळी बातां किणी एक कवि में कोनी लाधै। आं सगळा कवियां नंै एकठ करियां आज री पूरी कथा समझ सकां। कविता-मारग माथै चालणिया कवि किणी बंध्यै-बंधायै मारग कोनी चालै। युवा कवियां जाण लियो है कै खुद रो मारग खुद बणावणो पड़ैला। आपरै आसै-पासै रा निजू दीठाव ई कविता रै रूप ढाळता कवि आपरी सरलता-सहजता रै पाण असरदार बणै। कवि विनोद स्वामी री कविता ‘सुपना’ मांय नवै बगत रा नवा सुपनां अर दीठ री एक बानगी दाखलै रूप देख सकां-

माटी रा मोल लियोड़ा दो मोरिया,

दायजै में आयोड़ी दीवार-घड़ी,

जेठ री दुपारी में

हाथां काढ्योड़ी चादर अर सिराणा,

गूगै री चिलकणी कोर आळी फोटू

बरसां सूं संदूक में पड़ी देखै

एक

कमरै नैं सजावण रा सुपना।

केई अंवळाया अर अबखायां इण जुग री मान सकां। हरेक भासा नैं अगाड़ी-पिछाड़ी हरेक जुग मांय जूझ ई जूझ मिलै। बगत-बगत माथै इण जूझ सूं जूझता कवियां अर लेखकां आपरी सखरी हाजरी मांडी। साहित्य री केंद्रीय विधा कविता नंै पैली आपां रा कवि कंठै संभाळ’र राखी अर आज तो जाणै आखो आभो-जमीन आपां नैं नूंतै। आपां रा नवा काम साख सवाई करैला। नवी तकनीक अर विकास रै आयां आज कोई सबद कै अरथ एक खुणै सूं बीजै खुणै तांई देस-दुनिया तांई तुरत जातरा कर सकै। मोबाइल, ई-मेल अर इंटरनेट रै कारण आपस री बंतळ मांय तेजी आई है। हरख री बात है कै घणा-साक नवा कवि इण नवी दुनिया सूं साबको राखै।

परंपरा-विगसाव रै इण दौर मांय नवा संस्कारां अर जीवण-मूल्यां मांय बदळाव ई आपां देख सकां। बदळतै जुग मांय कविता रा रंग अर तेवर आज री भारतीय कविता रै आंगणै कोड सूं सागो करै तो इण रो जस कवियां नैं। हरेक भासा रो कवि आप रै आखती-पाखती री बात करै। आप री जमीन अर आभै रो जस-अपजस कविता मांय गावै तद ई कैय सकां कै वो इण जूण रा सगळा राग-रंग संभाळै। कवि हरीश बी. शर्मा री ओळ्यां है-

थारै खुद रा सबदां नैं

परोटतां

थारै दिखायोड़ै

दरसावां माथै

नाड़ हिलावतां ई जे

म्हारा जलमदिन निकळना हा

फेरूं क्यूं दीन्ही

म्हनैं रचण री ऊरमा?

ओ सवाल करण रो भाव युवा कविता री खासियत रूप आं कवितावां में निजर आवै। कविता रै इण सवाल भेळै आलोचना री बात करणी पड़ैला। आलोचना री आपरी जिम्मेदारी अर जबाबदेही होया करै पण राजस्थानी मांय आलोचना, पत्र-पत्रिकावां, मंच, प्रकासन आद सुभीतै सूं कोनी! आं अबखायां रै चालतां रचनाकारां री रचनावां बगतसर साम्हीं नीं आवै। किणी संग्रै-संकलन मांय कवितावां आयां सूं कवि री ओळख नैं अरथावण मांय सुभीतो होवै। आ बात तो सगळा सूं लांठी मानीजैला कै आज जद राजस्थानी मांय पत्र-पत्रिकावां साव कमती है अर पोथी प्रकासण पेटै ई आपां रा सगळा प्रकाशकां रो हाथ एकदम काठो है, तो ई रचनाकार सिरजण-धरम पोख रैया है!

राजस्थानी साहित्य खातर बीसवीं सदी जावतां-जावतां एक मोटो आडो महिला लेखिकावां खातर खोल्यो। कवयित्री संतोष मायामोहन रै कविता-संग्रै ‘सिमरण’ (1999) माथै केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार-2003 मिलणो चरचा मांय रैयो। भारतीय भासावां री अंवेर करतां साहित्य अकादेमी रै इतिहास मांय आ पैली घटना ही कै तीस बरसां सूं ई कमती ऊमर री कवयित्री नैं ओ सम्मान मिल्यो। इण सूं पैली साहित्य अकादेमी पुरस्कार पेटै डोगरी भासा री लेखिका पद्मा सचदेव रो नांव कमती उमर री कवयित्री पेटै गिणीजतो हो। आ बात भळै अठै गीरबै सूं बखाण सकां कै साहित्य अकादेमी, दिल्ली कानी सूं राजस्थानी साहित्य पेटै युवा कवयित्री संतोष सूं पैली कदैई किणी लेखिका नैं कोई पुरस्कार कोनी मिल्यो।

अठै संकलित कवयित्रियां री कवितावां मांय समूची लुगाईजात री मुगती रो सपनो अर विकास री पोल-पट्टी बाबत कीं बातां घणै असरदार ढंग सूं कविता रै मारफत साम्हीं आवै। आं री कवितावां में एकै कानी तो प्रकृति रो रूप आपां साम्हीं आवै, दूजै कानी कविता आदमी अर लुगाईजात रै अंतरंग संबंधां नंै बखाणै। कविता-काया मांय उण अदीठ-निराकार नंै ई रचै। प्रीत जठै आदमी-लुगाई रै मांय आपरो वासो करै। इण प्रीत नैं रूप देवण मांय आ देही मददगार बणै। प्रीत-राग रा रंग देह मांय खिलै अर आ हियै री उपज अर उण गूंग नैं खोलण सारू युवा कवयित्रियां कमती सबदां नंै काम मांय लेय’र घणी बातां कैय देवै। अठै दाखलै सारू कवयित्री मोनिका गौड़ री कविता ‘ओळख’ देखां-

थूं है

कुण?

आरसी ज्यूं

साम्हीं ऊभो

म्हनैं इज

बतळावै

म्हारा ई सैनाण

अर ओळखाण

गम्योड़ो म्हारो ‘म्हैं’

थूं कठै सूं

ढूंढ लायो है बावळा….।

मीरां नैं तो आखो जगत मान दियो। मीरां री ओळ मांय मध्यकालीन साहित्य मांय केई-केई महिला रचनाकारां री पद्य-रचनावां आपां री परंपरा मांय मिलै। आधुनिक साहित्य पेटै राणी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत रो कारज किणी सूं छानो कोनी। आज तांई जिका संपादित कविता-संकलन प्रकाशित होया है वां मांय फगत अर फगत कवि ई संकलित होवता रैया है। इक्की-दुक्की ठौड़ फगत एक संतोष मायामोहन री कवितावां संकलित मिलै। इण संकलन मांय किरण राजपुरोहित ‘नितिला’, मोनिका गौड़, गीता सामौर, रचना शेखावत, सिया चौधरी, अंकिता पुरोहित, रीना मेनारिया अर कृष्णा सिन्हा री कवितावां मिलैला। आ ऊजळी ओळ बगत परवाण न्यारी ओळखीजैला।

इण संकलन मांय सामिल केई कवियां रा कविता-संग्रै आगूंच छप्योड़ा है, अर भळै ई छपैला। जिकां कवियां रा संकलन साम्हीं आयां वां पछै री कविता-जातरा मांय आपां फरक इण रूप में देख सकां कै आं कवियां री पैली री अर आज री कवितावां मांय संवेदना नैं साधण री भासा-बुणगट अर सावचेती रो विगसाव होयो है। पैली आळी भावुकता अर विस्तार री जागा अबै कविता री समझ, कमती सबदां में रचण लकब आं री कमाई कैयी जावैला। लगोलग कविता माथै काम करण सूं युवा कवि आज कविता रै जिण आंटै नैं परखण-पिछाणण लाग्या है, वो आंटो घणी साधना सूं पकड़ मांय आवै।

संकलन रै कवियां खातर किणी एकल बंधेज री घणी बात नीं कथीज सकै। नवी कविता री पैली सरत है कै वा किणी एकल बखड़ी में कोनी आवै। आं कवितावां रो ढाळो आज री भारतीय भासावां री नवी कविता रै जोड़ रो मिलैला, तो कठैई आप नैं आं कवितावां मांय ठेठ अठै री माटी री न्यारी-निरवाळी सौरम आवैला। मिनखाजूण अर अठै रै लोक रा गीत गावती आं कवितावां मांय न्यारा-न्यारा रंग लाधैला। आज बो टैम कोनी जद दीठाव बेजां साफ होया करता हा। अबै तो अबखाई आ है कै दीठाव मांय केई-केई भेद होवै अर भेद मांयलै भेद रा ई केई आंटा कविता नैं साफ करणा होवै।

अठै आ बात ई लिखणी जरूरी लखावै कै कोई कवि जद नवो-नवो कविता रै मारग निकळै तद उणनैं आपरी लिखी सगळी ओळियां मांय कविता लखावै। होळै-होळै इण मारग रै हेवा होयां वो समझ पकड़ लेवै। समझ आवै कै कोई ओळी कद कविता री ओळी होवै अर कठै कांई सुधार री गुंजाइस है। अठै  म्हारी निजरां साम्हीं एक दीठाव मंडाण रै रूप मांय है।

आखै राजस्थान मांय लिखण-बांचण अर साहित्य-सिरजकां री पूरी एक नवी पीढी ऊभी होयगी है। जरूरत है इण नैं देखण-परखण अर आगै अंवेरण री। ख्यातनाम कवि-संपादक अर अकादमी अध्यक्ष श्याम महर्षि री साधना रो ओ प्रताप कै आखै मुलक मांय साहित्य-गढ़ रूप श्रीडूंगरगढ़ ओळखीजै। साहित्य री हरेक विधावां मांय रचण-खपण वाळा केई-केई रचनाकारां नैं वै ऊभा करिया। युवा कवियां री कवितावां रै इण मंडाण नै जे वै आगूंच नीं ओळखता तो इण ढाळै रो काम नीं होय सकतो हो। ओ निरवाळो संकलन साम्हीं लावण खातर महर्षिजी रो घणो-घणो आभार मानूं जिकां इण युवा-संकलन री जाझी जरूरत समझी अर म्हनैं संपादन कारज सूंप्यो।

सेवट मांय कैवणो चावूं कै अै युवा रचनाकार केई-केई ओळ्यां में नवी दीठ सूं आप री बात साम्हीं राखै। अै कवितावां सरलता, सहजता अर भासा री चतर बुगटण नै नवी दीठ रै पाण आप री न्यारी ओळख थापित करै। अै ऊरमावान रचनाकार जिका आप री भासा अर कविता नैं माथै ऊंचणियां है, आं रो जुड़ाव अर साधना आस उपजावै। कामना करूं कै आं रो जोस, उमाव अर ऊरमा ई कविता नैं आगै बधावैला।  इण आस री जस-बेल सदीव हरी रैवै।

नीरज दइया 

बीकानेर, 10 अक्टूबर, 2012

पुण्य-स्मरण : कन्हैयालाल भाटी

मौलिक कहानीकार, बेजोड़ अनुवाद

नीरज दइया

K L Bhatiहमारे भीतर कुछ स्मृतियां इस तरह भीतर रहती हैं कि हम उनसे मुक्त होना चाहे न चाहे, उनका स्मरण करें चाहे न करें किंतु वे जैसे निरंतर हमारा स्मरण करती है। अपने पिता सांवर दइया की स्मृति और उनके अनन्य मित्र कन्हैयालाल भाटी की स्मृति मेरे जीवन का जैसे अभिन्न अंग है। पुत्र और मानस-पुत्र दोनों पदों में लौकिक अंतर चाहे जितना रहे, किंतु एक जगह पर यह अंतर लुप्त हो जाता है और इस विश्वास में जीना बेहद सुखद होता है कि वे हमारा स्मरण कर रहे हैं। अपने पूर्वजों का पुण्य-स्मरण निशंदेह कोई सुखद अहसास नहीं किंतु इस पीड़ा में आनंद अवश्य है….  पीड़ा में आनंद जिसे हो आए मेरी मधुशाला।

जीवन की इस मधुशाला में किसी भी बालक को होश कहां होता है जो मुझे होता। बेहोशी के ऐसे ही किसी आलम में मैंने जाना कि मेरे पिता के मित्र कन्हैयालाल भाटी किसी पोस्टकार्ड में यह स्नेहिल उपालंभ लिखते हैं कि बीकानेर आकर मिले क्यों नहीं और श्रीलाल मोहता को जैन कॉलेज में नौकर मिल गई है। यह समय वह समय था जब मैं मेरे परिवार के साथ नोखा में था और उन्हीं दिनों का स्मरण है कि “धरती कद तांई धूमैली” कहानी संग्रह को राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर का पुरस्कार मिला था। यह वह समय था जब रावत सारस्वत “राजस्थानी” की परीक्षाएं स्कूलों में आयोजित करवाते थे और कन्हैयालाल सेठिया मान्यता की अलख के लिए दोहे लिखा करते थे। उन दिनों हमारे बाबा छोटू नाथ विद्यालय के खेल शिक्षक डेलूजी हमें खेल-कालांश में अन्नाराम “सुदामा” के उपन्यास-अंश और भूमिका आनंद के साथ सुनाया करते थे। उन्हीं दिनों कभी कहीं मैं कन्हैयालाल भाटी से मिला हूं यह याद नहीं।

याद तो कुछ भी नहीं और भूला भी कुछ नहीं, यह दोनों एक साथ संभव है। भीतर सब कुछ है और जब खोजने लगता हूं तो जैसे कुछ नहीं या वह कुछ हाथ लगता है जो यहां आवश्यक नहीं। समय में एक छलांग लगा कर मैं हमारे पास-पास जमीन खरीदने के किस्से, खुद कन्हैयालाल भाटी की बीमारी और बेड रेस्ट, पारिवारिक कार्यों के विभिन्न अवसर। बहन अंजू की बीमारी और जयपुर की स्मृतियों से आगे निकल कर अपने पिता सांवर दइया की दांत की तकलीफ तक पहुंच जाता हूं। इस यात्रा के बीच के काफी किस्से-कहानियां किसी अवसर के लिए बचा कर रख छोड़े है। जीवन के लंबे अंतराल को कुछ वाक्यों या पृष्टों पर उतारना सहज कहां होता है। अंतस भीतर से इतना उलझनों से भरा है कि सारे किस्से एक दूसरे में लिपटे हैं। सब कुछ बाहर आने को बेसब्र। यहां धैर्य के साथ सबदों को संभलना पड़ेगा। पिता के नहीं रहने पर मैंने अपने करीब जिन को पाया उनमें एक नाम कन्हैयालाल भाटी का है। वे मेरे लिए एक मार्गदर्शक और सबसे अधिक मित्रवत भाव से इतने करीब आए कि लगता है उन जैसा इस संसार में कोई नहीं। कोई किसी के समान न तो होता है और न ही होना चाहिए।

शिविरा पत्रिका में रहते हमारी पारिवारिक प्रगाढता बढ़ी और हमने परस्पर एक दूसरे परिवारों को गंभीरता और गहराई से जाना-पहचाना। कहानीकार-अनुवाद कन्हैयालाल भाटी का अवदान राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जितना है वह पूरा पहचाना नहीं गया। यहां मुझे मंगलेश डबराल की कविता संगतकार का स्मरण होता है। भाटी बीकानेर के साहित्य समाज में एक संगतकार के रूप में जीवनकाल में सदैव जिन मुख्य गायकों का साथ देते रहे उनका यह दायित्व बनता है कि उनके अवदान को रेखांकित करें। मौलिक कहानीकार के रूप में उनसे प्रभावित हुआ जा सकता है, वहीं उनके अनुवाद-कर्म से भी बहुत कुछ सीखा-समझा जा सकता है। सबसे अधित प्रभावित तो इस बात से होना चाहिए कि एक साहित्यकार को जीवन में जितना लिखना चाहिए उससे केई गुना उसका अध्ययन होना चाहिए। उनसे हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि भारतीय साहित्य का अधिकाधिक अध्ययन-चिंतन-मनन ही किसी साहित्यिक रचना के लिए खाद-पानी का काम करती है।

कन्हैयालाल भाटी एक आदर्श शिक्षक के रूप में जीवन काल में जितने लोकप्रिय रहे उससे कहीं अधिक उनकी कार्यनिष्ठता शिविरा के संदर्भ कक्ष के प्रभारी के रूप में देखी जा सकती है। कभी कभी मुझे आभास-सा होता है कि वे किसी पुस्तकालय के किसी कक्ष में अखबारों-पत्रिकाओं और पुस्तकों के ढेर में अब भी कुछ पढ़-लिख रहे हैं। किंतु खेद है कि आप और हम दुनिया के भूगोल पर अब उस जगह को कहीं नहीं खोज सकते।

E-mail : neerajdaiya@gmail.com

14-01-2013

एक व्यक्ति नहीं, स्कूल थे निर्मोही व्यास

निर्मोही व्यास (3 फरवरी, 1934- 12 जनवरी, 2013)

निर्मोही व्यास (3.2.1934- 12.1.2013)

पहली ही पंक्ति में यह स्पष्ट कर दूं कि मैं इस समय कुछ भी लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूं। मेरे जैसे अनेक साथी वरिष्ठ नाटकार निर्मोही व्यास के नहीं रहने पर गहरे अवसाद में डूबें हैं। वे हिंदी और राजस्थानी के नाटककार, कहानीकार होने के साथ-साथ ताजिंदगी जिस भांति रंगमंच से सपरिवार जुड़े रहे वैसा जुड़ना-जोड़ना केवल उनको ही आता था। वे एक व्यक्ति नहीं, स्कूल थे। जयकिसन व्यास उनका मूल नाम था और उनका जन्म 3 फरवरी, 1934 को हुआ। संगीत में जिस प्रकार अलग अलग घराने जाने-पहचाने जाते हैं वैसे ही अनुराग कला केंद्र भी रंगमंच के क्षेत्र में एक बड़े घराने के रूप में जाना जाता रहा है।

निर्मोही व्यास के कलाकार, निर्देशक आदि के रंगमंचीय रूप को समय के पृष्ठों ने सहेज कर रख लिया है। कोई ओडियो-वीडियो रिकार्डिंग, क्लिप या हमारी स्मृतियां ही अब उस समय का साक्षात्कार करा सकेंगी किंतु व्यास द्वारा रचित कृतियां उन्हें जानने-समझने का अवसर देती रहेंगी। “सांवतो” राजस्थानी नाटक और उनकी कहानियों के अनुवाद को लेकर मैं करीब बीस वर्ष पहले उनके संपर्क में आया। निर्मोही व्यास का मेरे लिए स्नेह शायद इस रूप में भी रहा कि मैं अपने पिता सांवर दइया के अवसान के बाद लुटा-पिटा साहित्य-संसार में सक्रिय हो रहा था और वे अपनी उम्र, अनुभव-वरिष्ठा सब को भुलाकर मुझसे सदा आत्मीय मित्र की भांति मिलते। यह एक ऐसा मित्र था जिसकी मित्रताभरी आंखों में मुझे कभी-कभी अपने पिता की आंखें दिखाई देती। किसी भी अवसर-मुलाकात पर यह अहसास नहीं कराया कि मैं बड़ा नाटकार हूं, यह उनकी महानता थी।

जिला साक्षरता समिति में मुझे रूपेश व्यास के साथ काम करने का अवसर मिला और मित्र कुलदीप जनसेवी, दयानंद शर्मा के साथ रहते हुए अनेक अवसरों पर निर्मोही व्यास के सृजन पर बातचीत होती रहती थी। उन सभी दिनों के विभिन्न चित्र आज भी जैसे भीतर अपना आलोक बिखेर रहें हैं। नाटक के बदलते स्वरूप और प्रयोग के नाम पर मंच पर की जाने वाली सस्ती लोकप्रियता और संस्कारों के विरूद्ध हरकते उनको रुचती नहीं थी। नाटक पर जैसे वे मुझे परामर्श अथवा अपनी दृष्टि सौंपते कि आजकल यह संवादों में द्विअर्थीयता आ रही है वह गरिमामय नहीं है। आत्मीय जनों के बीच खुलकर बात करना उनका स्वभाव रहा। अब भीखो ढोली, ओळमो के प्रख्यात नाटकार की अन्य प्रमुख कृतियां प्रणवीर पाबूजी, अनामिका, कथा एक रंगकर्मी की, एक अधूरा नाटक आदि सदा हमारे साथ हैं।

निर्मोही व्यास के नाटकों का मंचन राजस्थान और राजस्थान से बाहर भी कई स्थानों पर हुआ। उनको राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने “सांवतो” के लिए वर्ष 1994-95 का शिवचंद भरतिया गद्य पुरस्कार प्रदान किया तब उनके साथ कविता संग्रह “हुवै रंग हजार” के लिए निधनोपरांत सांवर दइया को गणेशीलाल व्यास उस्ताद पद्य पुरस्कार प्रदान किया गया। “अनामिका” को राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने वर्ष 1995-96 का नाटक विधा के लिए देवीलाल पुरस्कार से भी सम्मानित किया। बाद में दोनों अकादमियों से विशिष्ट सम्मान मिला, वहीं वर्ष 1992 में पूरे बीकानेर शहर ने उनका नागरिक अभिनंदन किया और “नाट्य शेखर” लोकमान से उनको विभूषित किया। उस समय हुआ कवि-सम्मेलन आज भी स्मृति में जिंदा है। निर्मोही व्यास ने अनुराग कला केंद्र के माध्यम से रंगकर्म की जो अलख जगाई उसका कोई शानी नहीं। 

nirmohi vyasमैं फिर से पहली पंक्ति पर लौटता हूं। निर्मोहीजी व्यास से उनके अंतिम दिनों में मैं नहीं मिल सका। मिल लूंगा यही सोचता रहा कि बीमार है, किंतु किसी भी समय मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि समय बीतता जा रहा है। कोई ऐसी कल्पना ही क्यों करेगा? इस नहीं मिलने ने मेरे भीतर डर, निराशा, हताशा और थोड़ा अलगाव-सा व्याप्त कर दिया है। मैं स्वयं से प्रतिप्रश्न करता हूं कि अगर मैं मिल लेता तो क्या स्थितियां बदल जाती? जो हुआ है उसे हम या कोई भी स्थगित करने की किसी भूमिका में नहीं था? होनी और अनहोनी के बीच कोई कुछ नहीं कर सकता। अगर माने कि यह होना ही था तो इसके होने पर अब भी यकीन करने का मन क्यों नहीं। यकीन बेशक मन नहीं कर रहा किंतु जिस शव-यात्रा के शोक से मन अब भी भारी है उससे मुक्ति संभव नहीं। असंतोष और अवसाद यह भी है कि व्यासजी मेरे हिस्से की जो कुछ बातें मुझे से मिलने पर कहते या कह सकते थे और जिन्हें मैं सुनता, अब यह केवल एक सपना है।

रंगमंच के संस्कारों से सम्मपन पूरे परिवार और अनुराग कला केंद्र के साथियों में जो अपनत्व रहा है, वह बेमिसाल है। निर्मोही व्यास ने जिस रंग-अनुराग को स्वरूप प्रदान किया अथवा कहें कि जिस रंग-अनुराग की गंगा को अपने रंग-संस्कारों के साथ प्रवाहित किया वह अविकल सदा प्रवाहित होती रहेगी। इस गंगा को अपनी गरिमा देने वाले उनके अनुज देवकिसनजी, पुत्र सुधेश, पुत्री राजस्थली, विनीता, भतीजे कमल अनुरागी, सुनील, विक्रम, संजय, विशाल, भतीजी निकिता, पौत्र तपन, निखिल, शुभम, गौरव, पौत्री कनुप्रिया, अंकिता, अर्पिता और सृष्टि जैसे अनेक शक्तिशाली जीवट नाम हैं। बीकानेर के रंगकर्म को अपना संपूर्ण परिवार समर्पित करने वाले व्यास एक बिरले सृजनधर्मी के रूप में सदैव याद किए जाते रहेंगे और उनका सृजन-कार्य आने वाले समाज के लिए सदा प्रेरक रहेगा।

अपने साहित्यिक-संसार में हम अपनों के लिए क्या कर सकते हैं या करते है? इस आधुनिक होते फेसबुकिया रचनाकार-पाठक-समाज में अपने अग्रज, समव्यस्क और अनुज सब को “मित्र” की संज्ञा दे रहे हैं। लिंग-भेद और आयु-विभेद को गौण करता हुआ हमारा आधुनिक समाज जिस “मित्रता” के रंग में आज रंगा है, उस पर यहां लिखना विषयांतर नहीं होगा कि ताजिंदगी निर्मोही व्यास जिंदाजिल इंसान के रूप में जिस मित्रता को छोटो-बड़ों पर नौछावर करते रहे वह रेखांकित की जानी चाहिए। अपने समय के कला-जगत से जुड़े समाज को जिस मित्र-भाव के बंधनों से निर्मोहीजी ने बंधना आरंभ किया था वह बहुत विरल और अनुपम अनुभव है।

नाटक-लेखन और मंचन के लिए बीकानेर के जिस नाम को पूरे देश में जाना-पहचाना गया वह नाम और व्यवहार में जरा भी समानता नहीं रखता- नाम निर्मोही और स्वभाव से अनुपम-अनुरागी। यह कितना सुखद अहसास है कि वे जीवनभर सादगी के साथ एक मिशन को लेकर जिंदादिल बने रहे। अब याद करें हम उनका ऐनक लगा चेहरा, कंधे का लेखकीय-झोला और साइकिल। यह रूप-चित्र कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। हर दिल अजीज और सब को पूरे मान-सम्मान-प्रेम से मीठी झिड़की देते वे सब दिलों में गहरे बसे हैं। मुझे लगता है कि मेरे स्मृति-लोक में उठ कर जैसे अभी-अभी बाहर आए हैं और मुझसे पूछ रहे हैं- नीरज! कियां…. मिलण नै क्यूं कोनी आयो?… अब आप ही बता दे मैं इसका क्या जबाब दूं?

डॉ. नीरज दइया

निशांत री कहाणियां

निशांत, पीलीबंगा

निशांत, पीलीबंगा

आज राजस्थानी कहाणी-जातरा जिण मुकाम माथै पूगी है, उण मुकाम नै हासिल करणवाळा कहाणीकारां री ओळ मांय कहाणीकार निशांत रौ नांव लिखणौ लाजमी लखावै। निशांत जी लांबै बगत सूं राजस्थानी अर हिंदी मांय कहाणियां-कवितावां अर बीजी रचनावां लिखता रैया है। इण संग्रै- “बींरौ आणौ अर जाणौ” री केई कहाणियां मांय कहाणीकार रौ हुनर आपां देख सकां, पण हरेक कहाणी हरेक री उम्मीद कद पूरी करै। इण ओळी नै आपां इण ढाळै ई अरथा सकां कै इण संग्रै री बगत-बगत माथै रचीजी आं कहाणियां मांय निशांत री सिरजण-जातरा रा केई उतार-चढाव निजर आवै। आं कहाणियां री मोटी खासियत आ है कै आपां आं नै किणी खास विचार-धारा री सींव मांय कोनी बांध सकां। असल मांय आं कहाणियां मांय बगत परवाण राजस्थान रै घर-समाज अर आपां रै असवाड़ै-पसवाड़ै री दुनिया रा केई सांच उकेरण वाळा चितराम निजर आवै।

किणी रचना री परख करती बगत उण नै उणरी परंपरा मांय देखणी चाइजै। निशांत री कहाणियां जठै बात परंपरा सूं जुड़्योड़ी लखावै, बठै ई आधुनिक काहाणी परंपरा रै मरम नै पिछाणती केई कहाणियां तौ भासा अर बुणगट री दीठ सूं इक्कीस लखावै। बात परंपरा रै मोह सूं मुगत कहाणियां री बात करां तौ कहाणी ‘‘अखबार पानै री चोरी” मांय छोटै सै घटना-प्रसंग परवांण कहाणीकार आपां नै आज रै जिण सांच सूं ओळखाण करावै बा काळजौ हिलावै जैड़ी है। बस जातरा मांय अखबार पानै री चोरी करण सूं सुरू हुई आ जातरा कहाणीकार देस-सुधार री बात सूं जोड़ैै । इण कहाणी मांय आपरी ठीमर भासा रै पाण निशांत जिकी जातरा करावै, बा बरसां लगा चेतै रैवै जैड़ी हुय जावै।

कैयौ जावै कै कहाणी बा सगळा सूं सिरै मानीजै जिकी नै जे आपां एक‘र बांच लेवां तौ उण रौ लखाव आपां रै अंतस मांय आपरा मांडणा मांडतौ रैवै। केई कहाणियां तौ इसी हुवै कै वां री संवेदना हियै रै आंगणै जाणै आसण लगा’र जम जावै। “नुमांइंदा” कहाणी नै बातपोसी अंदाज मांय कहाणीकार जिण ढाळै चालू करै अर जिण मुकाम माथै पूगावै बौ जसजोग है। किणी कहाणी नै मरम तांई पूगावण री तजबीज मांय कहाणीकार री कोई ओळी अणमाप असरदार हुय सकै, इण ओळी री साख मांय इणी कहाणी री छेहली ओळी आपां देख सकां। इण ओळी सूं अेक खास चरित्र रा रंग उतार‘र, उण रै होकड़ै नै लीरम्लीर करतौ कहाणीकार जाणै जनसेवकां रौ असली रूप चरूड कर देवै।

संवेदना री बुणगट सारू कहाणीकार निशांत कथा-भासा मांय अरथ पेटै रचाव रा नूंवा रंग रचतौ, इण संग्रै मांय ठेठ देसज केई केई सबदां रा सांवठा प्रयोग कर्या है। इयां लागै जाणै कै अठै आपां रै गुमियोड़ा सबदां री तपास करतौ कहाणीकार वांनै आसरौ देवै। सार रूप मांय निशांत कहाणी-परंपरा मांय आपरौ मारण काढण री खेचळ करता घणी-घणी आस उपजावै।

डॉ. नीरज दइया

मानखै रै ऊजळ–पख री कहाणियां

कैवण नै तो कैयो जावै कै राजस्थानी कहाणी-जातरा ठावै नै पुखता मुकाम माथै पूगगी है पण इण जातरा री अंवेर करतां जठै आपां नै केई अबखायां अर बंध्या-बंधाया धड़ा ई देख नै मिलै, वठै ई केई साहित्य सिरजक ऐड़ा ई मिलै जिका बाबत राजस्थानी कहाणी आलोचना अजेस मून धार राखी है। जठै आपां री कथा-जातरा मांय मानखै री अंवळाया-अबखयां अर अंधार-पख री कहाणियां कीं बेसी मिलै तो इण गत मांय कहाणीकार अन्नाराम ‘सुदामा’ री ओळ मांय रचीजी ऊजळ-पख री ई केई-केई कहाणियां ई देखी जाय सकै। खरी बात तो आ है कै आं कहाणीकारां अर कहाणियां बाबत चरचा कमती होयी है का होयी ई कोनी।

आज आधुनिक जुग मांय जद मिनख आपरो मिनखपणो छोड़’र नित मसीन बणतो जाय रैयो है तो कैयो जावै कै इण अबखै बगत मांय मिनख नै मिनख बणायो राखण खातर साहित्य एक सीगो खोल राख्यो है। आपां रो लोक साहित्य मिनख नै मारग दिखावण खातर आखै मुलक मांय जाणीजै। नीति री घणी बातां आपां लोक साहित्य मांय देख सकां अर जाणी-पिछाणी केई केई बातां नै लोक कथावां आपां रै सामीं घणै असरदार ढंग सूं राखै। लोक मांय जाणी-पिछाणी बातां अर सांच री अंवेर करां तो कीं बातां कैय सकां- जियां कै बूढ़ा मायतां री सेवा-चाकरी रो काम इण जुग मांय साव कमती होवतो जाय रैयो है, प्रेम आपरै ऊजळ-पख नै भूलतो जाय रैयो है, जवान होवती पीढी आपरी लारली पीढी नै बगत सूं बारै करती जाय रैयी है, मोटा मिनखां मांय बैमानी घर करती जाय रैयी है तो ईमानदारी कीं छोटा समझीजण वाळा नाकुछ लोगां रै पाण अजेस कठैई-कठैई जीवै है, लूट-खसोट अर रोळा-रप्पा मांय जूण रो संगीत कठैई गुमतो जाय रैयो है….. आं अर इसी सगळी बातां बिचाळै कीं कहाणियां राजस्थानी ओ पतियारो दिरावै कै अजेस मिनखपणै री आस मिनख मांय खूटी कोनी। इण रूपाळी दुनिया रो रूप बाचणो जरूरी लखावै अर साहित्य टाळ कोई दूजो मारग म्हारै ध्यान कोनी बैठै। बै रंग जिका सूं आ रूपाळी दुनिया हरी होवै, बै रंग जिणां मांय मिनखपणो सांस लेवै। वै रंग जिका रो पोत कीं फीको पड़ग्यो है, बां रंगां नै नुंवी राग में गावण री तजबीज कर मानखै रै ऊजळ-पख री अंवेर करणियां कहाणीकारां मांय एक नांव कहाणीकार रामनरेश सोनी रो घणै मान सूं लियो जावैला।

रामनरेश सोनी रो पैलो कहाणी-संग्रै ‘सोनल मछली’ (2003) छप्यो अर अबै आपरी बारा कहाणियां रो दूजो कहाणी-संकलन ‘बै अबै कठै लाधै’ (2012) राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी रै आर्थिक सैयोग सूं प्रकाशित होयो है। कहाणीकार लगैटगै दस बरसां पछै छ्प्यै आप रै इण कहाणी संकलन मांय पैलड़ै संकलन वाळै ढंग-ढाळै नै पोखतो निजर आवै का कैय सकां कै कहाणीकार उणी सीगै नै आगै बधावण रा अठै जतन करै। कहाणियां रै नांव माथै प्रयोग अठै कोनी मिलै, पण आपां जे कहाणी नै कथा-तत्वां रै आधार माथै परख करणी चावां तो सगळा कथा-तत्व इण कहाणियां मांय आपां नै मिलैला। दूजी बात कै कहाणियां नै बांचण अर बांच’र सुणावण मांय स्वाद रा रसिया नै ऐ पक्कायत दाय आवैला।

‘बै अबै कठै लाधै’ संग्रै री सिरैनांव कहाणी माथै बात करां तो आ कहाणी बांचता नंद भारद्वाज रो उपन्यास ‘साम्हीं खुलतौ मारग’ ओळूं मांय आवै, ओ महज एक संयोग है कै उपन्यास री नायिका दांई इण कहाणी मांय बैनजी सावित्री रो तार आवै अर बा सागण ढाळै आपरी मा सूं मिलण नै रेलगाड़ी सूं जावै। कहाणी मांय रेलगाड़ी अर जातरा रो जिकर करां तो अठै दोय कहाणियां आपां चेतै करां- पैली सांवर दइया री ‘खेल जिसो खेल’ जिण मांय रेल जातरा मांय एक खेल रो सिलसिलो किण ढालै चालू होवै अर किण ठौड़ पूगै, बगत काटण रै जतन सारू होयै संवादां मांय कहाणी केई केई अरथां अर संकेतां नै सांवटती सामीं आवै। दूजी कहाणी मोहन आलोक री ‘बुद्धिजीवी’ री बात करां जिण मांय बातां अर बातां है, अर बां बातां रो निवेड़ो कोनी, सार भाई सार बातां रा ई विचार। मूळ बात असार मांय सार अर सार मांय असार। कीं करणो कराणो कोनी फगत बातां अर बातां। काम तो हाथ-पग हियायां सूं होवै, पण जीभ चलावणी सोरी। सागी उणी वातावरण अर मनगत नै खोलती पण आं कहाणियां सूं जुदा अरथ देवती कहाणी ‘बै अबै कठै लाधै’ मांय टी.टी. री फटकार सूं जूझती कहाणी री नायिका सावित्री है, जिकी जिका दस रिपिया मंगता नै दिया बै भाई-बैन ई आपरा दस रिपिया पाछा इण खातर देय देवै कै नायिका सावित्री नै पैनल्टी भरणी होवै। इत्तै लोगां बिच्चै खडूस टी.टी. नै कोई कीं नीं कैवै, अर ना कोई भलो आदमी- इण विपदा मांय लुगाई खातर दस रिपिया काढै। कहाणी-संग्रै री भूमिका मांय कहाणीकार अन्नाराम सुदामा ई इण कहाणी नै बड़ी प्रभावशाली अर काळजै उतरती भाव-विह्वल करती कारुणिक गाथा बतावता सरावणा करी है।

मानखै री डीगाई री अंवेर सोरी कोनी होया करै अर उण नै किणी कहाणी मांय राखणो अबखो काम इण खातर मानीजै कै उण माथै घणखरां नै तो पतियारो ई कोनी होवै। कांई कोई गरीब आदमी आपरी गरीबी रै रैवतां ई ईमानदार होय सकै है? कूड़ रा सरदारां बिच्चै इण आधुनिक अर तर तर बदळतै जीवण मांय सत अजेस खूटियो कोनी। किणी देवता री आण राख’र आपरी कमाई खावणियै नै हराम री खावणी साजै कोनी। रामनरेश सोनी री कहाणी ‘ऊजळी आतमा’ इणी बातां रो खुलासो घणै सांतरै नै असरदार नै सांतरै ढंग सूं करै। सीख सीखावती आ कहाणी वालाराम जिसा कामगारां री ईमानदारी री महागाथा गावती एक पाठ पढावै।

संकलन मांय  “असल कमाई” अर “उमर रो ढळतो पड़ाव” दोय प्रेम-कहाणियां है। इणा मांय प्रेम रो ऊजळ-पख उजागर होवै। आं कहाणियां सूं कहाणीकार नायक भोळाराम अर प्रभात री त्याग-भावना नै दरसावतो प्रेम नै ई जीवण री असल कमाई सिध करै। भोग रै सामीं त्याग नै मोटो मानण री सीख सिखावती आं कहाणियां मांयलो प्रेम आपां रै अंतस नै परस करै। प्रेम रै दूजै रंग नै राखती कहाणी “एकदम फड़द” आपरै ढंग-ढाळै री निरवाळी कहाणी है। इण कहाणी रो पात्र बाबोजी एक यादगार पात्र मानीजैला, जिको जीवण जीवण रो साव नुंवो तरीको आपां सामीं राखै। मोह मांड’र मोह नै त्यागणो किणी तप सूं कमती कोनी अर बाबोजी इणी तप रो धणी कथीजैला।

“राधा रै आंगणै कुंती” अर “सुक्खं शरणं” जैड़ी कहाणियां मांय संजोग दर संजोग सूं कथा रो विगसाव देखण नै मिलै। आं कहाणियां रो फलक घणो लांबो चौड़ो है। अठै एक सवाल उपजै कै जीवण मांय जिकी जटिलतावां अर सूक्ष्मतावां है, बै उण रूप मांय रामनरेश सोनी री कहाणियां मांय क्यूं नीं आवै। आज री आधुनिक कहाणी किणी ढालै रो कोई पाठ कोनी पढावै अर ना ई कोई सीख देवै बा तो पगत एक अनुभव जातरा नै आपां रै जीव मांय कर काढ’र कीं सांस बपरावै। किणी घटना का प्रसंग नै इण ढाळै जीव सूंपणो ई कहाणीकार री कला मानैजी। पण आं कहाणियां मांय मिनख रै अंतस मांय चालती उठा-पटक, उणा री चिंतावां, हरख नै विसाद, का झळ री जूझ रा चितराम कहाणीकार कोनी दिखावै। किणी कहाणी री बुणगट खातर आपां कैय सकां कै ओ एक मारग है जिण रो चयन खुद रचनाकार नै आपरै खातर करणो होवै। रामनरेश सोनी री कहाणियां राजस्थानी कथा-धारा सूं न्यारी निरवाळी आपरी औपान्यासिक बुणगट, लांबै कथा-फलक अर काल-खंड नै रचाव मांय सांवटती सहजता, सरलता अर पठनीयता री जरूरी मांग पूरी करै।

अठै आं लिखण री दरकार कोनी कै किणी बंध्यै-बधायै चलस सूं निरवाळी किणी दूजी धारा मांय सिरजण ओखो होया करै। कहाणीकार रामनरेश सोनी इण कहाणी-संग्रै मांय जठै कहाणी रचणअ मांय सफल होवै बठै ई केई जागावां अर कीं कहाणियां पेटै विचार करण री दरकार लखावै कै आज री कहाणी मांय मिनखपणै रै विगसाव रो सोच करणो कांई माडी बात है। कहाणी ‘मरद आदमी’ री छेहली ओळ्यां देखो- “म्हारै कनै बांरी गैरी यादां रा गोट उड़ रैया है अर म्हैं बांनै आं आखरां में संवेटबा री खेचळ कर रैयो हूं।” (पेज- 67) इण खेचळ मांय केई वळा कहाणी रेखाचित्र अर संस्मरण विधा रै चकारियै मांय पूग जाया करै, अर म्हारी दीठ मांय इण कहाणी साथै ओ ई हुयो है। इणी ढाळै कहाणी संग्रै मांय संकलित रचना ‘पांगरै जिका ई पगां चालै’ मांय एक विचार नै कहाणी रो रूप देवण री कोसीस तो लखावै पण आधुनिक कहाणी री मांग इण ढाळै पूरी कोनी होवै।

छेकड़ मांय एक बात रामनरेश सोनी री भाषा बाबत करणी चावूं कै इण पूरी पोथी मांय राजस्थानी भेळै एक आंचलिक रंग ई आपां रो ध्यान खीचै। खाबा, कैबा, रैबा, आबा, जाबा, सीखबा, उड़ाबा इयांन, जियांकली, कियांन जैड़ा सबदां रो प्रयोग देख सकां। केई सबदां रा प्रयोग अखरण जैड़ा है- जियां अदीतवार नै दीतवार, स्कूटर नै इसकूटर, स्कूल नै इसकूल, संस्कारी नै सेंस्कारी, विज्ञान नै बिग्यांन आद। आप आशीर्वाद मूळ सबद काम में लियो है अर राजस्थानी मांय सिरीमतीजी जैड़ै सबद रूप नै देख’र कैवणो पड़ैला कै मूळ मांय सोनी जी उल्थै रै कारज सूं घणो जुड़ाव राखै इण खातर आं कहाणियां री भाषा मांय उल्थै री सुगंध ई पिछाणी जाय सकै।

डॉ. नीरज दइया

बै अबै कठै लाधै (कहाणी संग्रै) रामनरेश सोनी
प्रकाशक : ज्योति पब्लिकेशन्स, बीकानेर ; संस्करण : 2012 ; मोल : 150/-

रामनरेश सोनी

रामनरेश सोनी