मानखै रै ऊजळ–पख री कहाणियां

कैवण नै तो कैयो जावै कै राजस्थानी कहाणी-जातरा ठावै नै पुखता मुकाम माथै पूगगी है पण इण जातरा री अंवेर करतां जठै आपां नै केई अबखायां अर बंध्या-बंधाया धड़ा ई देख नै मिलै, वठै ई केई साहित्य सिरजक ऐड़ा ई मिलै जिका बाबत राजस्थानी कहाणी आलोचना अजेस मून धार राखी है। जठै आपां री कथा-जातरा मांय मानखै री अंवळाया-अबखयां अर अंधार-पख री कहाणियां कीं बेसी मिलै तो इण गत मांय कहाणीकार अन्नाराम ‘सुदामा’ री ओळ मांय रचीजी ऊजळ-पख री ई केई-केई कहाणियां ई देखी जाय सकै। खरी बात तो आ है कै आं कहाणीकारां अर कहाणियां बाबत चरचा कमती होयी है का होयी ई कोनी।

आज आधुनिक जुग मांय जद मिनख आपरो मिनखपणो छोड़’र नित मसीन बणतो जाय रैयो है तो कैयो जावै कै इण अबखै बगत मांय मिनख नै मिनख बणायो राखण खातर साहित्य एक सीगो खोल राख्यो है। आपां रो लोक साहित्य मिनख नै मारग दिखावण खातर आखै मुलक मांय जाणीजै। नीति री घणी बातां आपां लोक साहित्य मांय देख सकां अर जाणी-पिछाणी केई केई बातां नै लोक कथावां आपां रै सामीं घणै असरदार ढंग सूं राखै। लोक मांय जाणी-पिछाणी बातां अर सांच री अंवेर करां तो कीं बातां कैय सकां- जियां कै बूढ़ा मायतां री सेवा-चाकरी रो काम इण जुग मांय साव कमती होवतो जाय रैयो है, प्रेम आपरै ऊजळ-पख नै भूलतो जाय रैयो है, जवान होवती पीढी आपरी लारली पीढी नै बगत सूं बारै करती जाय रैयी है, मोटा मिनखां मांय बैमानी घर करती जाय रैयी है तो ईमानदारी कीं छोटा समझीजण वाळा नाकुछ लोगां रै पाण अजेस कठैई-कठैई जीवै है, लूट-खसोट अर रोळा-रप्पा मांय जूण रो संगीत कठैई गुमतो जाय रैयो है….. आं अर इसी सगळी बातां बिचाळै कीं कहाणियां राजस्थानी ओ पतियारो दिरावै कै अजेस मिनखपणै री आस मिनख मांय खूटी कोनी। इण रूपाळी दुनिया रो रूप बाचणो जरूरी लखावै अर साहित्य टाळ कोई दूजो मारग म्हारै ध्यान कोनी बैठै। बै रंग जिका सूं आ रूपाळी दुनिया हरी होवै, बै रंग जिणां मांय मिनखपणो सांस लेवै। वै रंग जिका रो पोत कीं फीको पड़ग्यो है, बां रंगां नै नुंवी राग में गावण री तजबीज कर मानखै रै ऊजळ-पख री अंवेर करणियां कहाणीकारां मांय एक नांव कहाणीकार रामनरेश सोनी रो घणै मान सूं लियो जावैला।

रामनरेश सोनी रो पैलो कहाणी-संग्रै ‘सोनल मछली’ (2003) छप्यो अर अबै आपरी बारा कहाणियां रो दूजो कहाणी-संकलन ‘बै अबै कठै लाधै’ (2012) राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी रै आर्थिक सैयोग सूं प्रकाशित होयो है। कहाणीकार लगैटगै दस बरसां पछै छ्प्यै आप रै इण कहाणी संकलन मांय पैलड़ै संकलन वाळै ढंग-ढाळै नै पोखतो निजर आवै का कैय सकां कै कहाणीकार उणी सीगै नै आगै बधावण रा अठै जतन करै। कहाणियां रै नांव माथै प्रयोग अठै कोनी मिलै, पण आपां जे कहाणी नै कथा-तत्वां रै आधार माथै परख करणी चावां तो सगळा कथा-तत्व इण कहाणियां मांय आपां नै मिलैला। दूजी बात कै कहाणियां नै बांचण अर बांच’र सुणावण मांय स्वाद रा रसिया नै ऐ पक्कायत दाय आवैला।

‘बै अबै कठै लाधै’ संग्रै री सिरैनांव कहाणी माथै बात करां तो आ कहाणी बांचता नंद भारद्वाज रो उपन्यास ‘साम्हीं खुलतौ मारग’ ओळूं मांय आवै, ओ महज एक संयोग है कै उपन्यास री नायिका दांई इण कहाणी मांय बैनजी सावित्री रो तार आवै अर बा सागण ढाळै आपरी मा सूं मिलण नै रेलगाड़ी सूं जावै। कहाणी मांय रेलगाड़ी अर जातरा रो जिकर करां तो अठै दोय कहाणियां आपां चेतै करां- पैली सांवर दइया री ‘खेल जिसो खेल’ जिण मांय रेल जातरा मांय एक खेल रो सिलसिलो किण ढालै चालू होवै अर किण ठौड़ पूगै, बगत काटण रै जतन सारू होयै संवादां मांय कहाणी केई केई अरथां अर संकेतां नै सांवटती सामीं आवै। दूजी कहाणी मोहन आलोक री ‘बुद्धिजीवी’ री बात करां जिण मांय बातां अर बातां है, अर बां बातां रो निवेड़ो कोनी, सार भाई सार बातां रा ई विचार। मूळ बात असार मांय सार अर सार मांय असार। कीं करणो कराणो कोनी फगत बातां अर बातां। काम तो हाथ-पग हियायां सूं होवै, पण जीभ चलावणी सोरी। सागी उणी वातावरण अर मनगत नै खोलती पण आं कहाणियां सूं जुदा अरथ देवती कहाणी ‘बै अबै कठै लाधै’ मांय टी.टी. री फटकार सूं जूझती कहाणी री नायिका सावित्री है, जिकी जिका दस रिपिया मंगता नै दिया बै भाई-बैन ई आपरा दस रिपिया पाछा इण खातर देय देवै कै नायिका सावित्री नै पैनल्टी भरणी होवै। इत्तै लोगां बिच्चै खडूस टी.टी. नै कोई कीं नीं कैवै, अर ना कोई भलो आदमी- इण विपदा मांय लुगाई खातर दस रिपिया काढै। कहाणी-संग्रै री भूमिका मांय कहाणीकार अन्नाराम सुदामा ई इण कहाणी नै बड़ी प्रभावशाली अर काळजै उतरती भाव-विह्वल करती कारुणिक गाथा बतावता सरावणा करी है।

मानखै री डीगाई री अंवेर सोरी कोनी होया करै अर उण नै किणी कहाणी मांय राखणो अबखो काम इण खातर मानीजै कै उण माथै घणखरां नै तो पतियारो ई कोनी होवै। कांई कोई गरीब आदमी आपरी गरीबी रै रैवतां ई ईमानदार होय सकै है? कूड़ रा सरदारां बिच्चै इण आधुनिक अर तर तर बदळतै जीवण मांय सत अजेस खूटियो कोनी। किणी देवता री आण राख’र आपरी कमाई खावणियै नै हराम री खावणी साजै कोनी। रामनरेश सोनी री कहाणी ‘ऊजळी आतमा’ इणी बातां रो खुलासो घणै सांतरै नै असरदार नै सांतरै ढंग सूं करै। सीख सीखावती आ कहाणी वालाराम जिसा कामगारां री ईमानदारी री महागाथा गावती एक पाठ पढावै।

संकलन मांय  “असल कमाई” अर “उमर रो ढळतो पड़ाव” दोय प्रेम-कहाणियां है। इणा मांय प्रेम रो ऊजळ-पख उजागर होवै। आं कहाणियां सूं कहाणीकार नायक भोळाराम अर प्रभात री त्याग-भावना नै दरसावतो प्रेम नै ई जीवण री असल कमाई सिध करै। भोग रै सामीं त्याग नै मोटो मानण री सीख सिखावती आं कहाणियां मांयलो प्रेम आपां रै अंतस नै परस करै। प्रेम रै दूजै रंग नै राखती कहाणी “एकदम फड़द” आपरै ढंग-ढाळै री निरवाळी कहाणी है। इण कहाणी रो पात्र बाबोजी एक यादगार पात्र मानीजैला, जिको जीवण जीवण रो साव नुंवो तरीको आपां सामीं राखै। मोह मांड’र मोह नै त्यागणो किणी तप सूं कमती कोनी अर बाबोजी इणी तप रो धणी कथीजैला।

“राधा रै आंगणै कुंती” अर “सुक्खं शरणं” जैड़ी कहाणियां मांय संजोग दर संजोग सूं कथा रो विगसाव देखण नै मिलै। आं कहाणियां रो फलक घणो लांबो चौड़ो है। अठै एक सवाल उपजै कै जीवण मांय जिकी जटिलतावां अर सूक्ष्मतावां है, बै उण रूप मांय रामनरेश सोनी री कहाणियां मांय क्यूं नीं आवै। आज री आधुनिक कहाणी किणी ढालै रो कोई पाठ कोनी पढावै अर ना ई कोई सीख देवै बा तो पगत एक अनुभव जातरा नै आपां रै जीव मांय कर काढ’र कीं सांस बपरावै। किणी घटना का प्रसंग नै इण ढाळै जीव सूंपणो ई कहाणीकार री कला मानैजी। पण आं कहाणियां मांय मिनख रै अंतस मांय चालती उठा-पटक, उणा री चिंतावां, हरख नै विसाद, का झळ री जूझ रा चितराम कहाणीकार कोनी दिखावै। किणी कहाणी री बुणगट खातर आपां कैय सकां कै ओ एक मारग है जिण रो चयन खुद रचनाकार नै आपरै खातर करणो होवै। रामनरेश सोनी री कहाणियां राजस्थानी कथा-धारा सूं न्यारी निरवाळी आपरी औपान्यासिक बुणगट, लांबै कथा-फलक अर काल-खंड नै रचाव मांय सांवटती सहजता, सरलता अर पठनीयता री जरूरी मांग पूरी करै।

अठै आं लिखण री दरकार कोनी कै किणी बंध्यै-बधायै चलस सूं निरवाळी किणी दूजी धारा मांय सिरजण ओखो होया करै। कहाणीकार रामनरेश सोनी इण कहाणी-संग्रै मांय जठै कहाणी रचणअ मांय सफल होवै बठै ई केई जागावां अर कीं कहाणियां पेटै विचार करण री दरकार लखावै कै आज री कहाणी मांय मिनखपणै रै विगसाव रो सोच करणो कांई माडी बात है। कहाणी ‘मरद आदमी’ री छेहली ओळ्यां देखो- “म्हारै कनै बांरी गैरी यादां रा गोट उड़ रैया है अर म्हैं बांनै आं आखरां में संवेटबा री खेचळ कर रैयो हूं।” (पेज- 67) इण खेचळ मांय केई वळा कहाणी रेखाचित्र अर संस्मरण विधा रै चकारियै मांय पूग जाया करै, अर म्हारी दीठ मांय इण कहाणी साथै ओ ई हुयो है। इणी ढाळै कहाणी संग्रै मांय संकलित रचना ‘पांगरै जिका ई पगां चालै’ मांय एक विचार नै कहाणी रो रूप देवण री कोसीस तो लखावै पण आधुनिक कहाणी री मांग इण ढाळै पूरी कोनी होवै।

छेकड़ मांय एक बात रामनरेश सोनी री भाषा बाबत करणी चावूं कै इण पूरी पोथी मांय राजस्थानी भेळै एक आंचलिक रंग ई आपां रो ध्यान खीचै। खाबा, कैबा, रैबा, आबा, जाबा, सीखबा, उड़ाबा इयांन, जियांकली, कियांन जैड़ा सबदां रो प्रयोग देख सकां। केई सबदां रा प्रयोग अखरण जैड़ा है- जियां अदीतवार नै दीतवार, स्कूटर नै इसकूटर, स्कूल नै इसकूल, संस्कारी नै सेंस्कारी, विज्ञान नै बिग्यांन आद। आप आशीर्वाद मूळ सबद काम में लियो है अर राजस्थानी मांय सिरीमतीजी जैड़ै सबद रूप नै देख’र कैवणो पड़ैला कै मूळ मांय सोनी जी उल्थै रै कारज सूं घणो जुड़ाव राखै इण खातर आं कहाणियां री भाषा मांय उल्थै री सुगंध ई पिछाणी जाय सकै।

डॉ. नीरज दइया

बै अबै कठै लाधै (कहाणी संग्रै) रामनरेश सोनी
प्रकाशक : ज्योति पब्लिकेशन्स, बीकानेर ; संस्करण : 2012 ; मोल : 150/-

रामनरेश सोनी

रामनरेश सोनी

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Posted on 03/05/2013, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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