एक व्यक्ति नहीं, स्कूल थे निर्मोही व्यास

निर्मोही व्यास (3 फरवरी, 1934- 12 जनवरी, 2013)

निर्मोही व्यास (3.2.1934- 12.1.2013)

पहली ही पंक्ति में यह स्पष्ट कर दूं कि मैं इस समय कुछ भी लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूं। मेरे जैसे अनेक साथी वरिष्ठ नाटकार निर्मोही व्यास के नहीं रहने पर गहरे अवसाद में डूबें हैं। वे हिंदी और राजस्थानी के नाटककार, कहानीकार होने के साथ-साथ ताजिंदगी जिस भांति रंगमंच से सपरिवार जुड़े रहे वैसा जुड़ना-जोड़ना केवल उनको ही आता था। वे एक व्यक्ति नहीं, स्कूल थे। जयकिसन व्यास उनका मूल नाम था और उनका जन्म 3 फरवरी, 1934 को हुआ। संगीत में जिस प्रकार अलग अलग घराने जाने-पहचाने जाते हैं वैसे ही अनुराग कला केंद्र भी रंगमंच के क्षेत्र में एक बड़े घराने के रूप में जाना जाता रहा है।

निर्मोही व्यास के कलाकार, निर्देशक आदि के रंगमंचीय रूप को समय के पृष्ठों ने सहेज कर रख लिया है। कोई ओडियो-वीडियो रिकार्डिंग, क्लिप या हमारी स्मृतियां ही अब उस समय का साक्षात्कार करा सकेंगी किंतु व्यास द्वारा रचित कृतियां उन्हें जानने-समझने का अवसर देती रहेंगी। “सांवतो” राजस्थानी नाटक और उनकी कहानियों के अनुवाद को लेकर मैं करीब बीस वर्ष पहले उनके संपर्क में आया। निर्मोही व्यास का मेरे लिए स्नेह शायद इस रूप में भी रहा कि मैं अपने पिता सांवर दइया के अवसान के बाद लुटा-पिटा साहित्य-संसार में सक्रिय हो रहा था और वे अपनी उम्र, अनुभव-वरिष्ठा सब को भुलाकर मुझसे सदा आत्मीय मित्र की भांति मिलते। यह एक ऐसा मित्र था जिसकी मित्रताभरी आंखों में मुझे कभी-कभी अपने पिता की आंखें दिखाई देती। किसी भी अवसर-मुलाकात पर यह अहसास नहीं कराया कि मैं बड़ा नाटकार हूं, यह उनकी महानता थी।

जिला साक्षरता समिति में मुझे रूपेश व्यास के साथ काम करने का अवसर मिला और मित्र कुलदीप जनसेवी, दयानंद शर्मा के साथ रहते हुए अनेक अवसरों पर निर्मोही व्यास के सृजन पर बातचीत होती रहती थी। उन सभी दिनों के विभिन्न चित्र आज भी जैसे भीतर अपना आलोक बिखेर रहें हैं। नाटक के बदलते स्वरूप और प्रयोग के नाम पर मंच पर की जाने वाली सस्ती लोकप्रियता और संस्कारों के विरूद्ध हरकते उनको रुचती नहीं थी। नाटक पर जैसे वे मुझे परामर्श अथवा अपनी दृष्टि सौंपते कि आजकल यह संवादों में द्विअर्थीयता आ रही है वह गरिमामय नहीं है। आत्मीय जनों के बीच खुलकर बात करना उनका स्वभाव रहा। अब भीखो ढोली, ओळमो के प्रख्यात नाटकार की अन्य प्रमुख कृतियां प्रणवीर पाबूजी, अनामिका, कथा एक रंगकर्मी की, एक अधूरा नाटक आदि सदा हमारे साथ हैं।

निर्मोही व्यास के नाटकों का मंचन राजस्थान और राजस्थान से बाहर भी कई स्थानों पर हुआ। उनको राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने “सांवतो” के लिए वर्ष 1994-95 का शिवचंद भरतिया गद्य पुरस्कार प्रदान किया तब उनके साथ कविता संग्रह “हुवै रंग हजार” के लिए निधनोपरांत सांवर दइया को गणेशीलाल व्यास उस्ताद पद्य पुरस्कार प्रदान किया गया। “अनामिका” को राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने वर्ष 1995-96 का नाटक विधा के लिए देवीलाल पुरस्कार से भी सम्मानित किया। बाद में दोनों अकादमियों से विशिष्ट सम्मान मिला, वहीं वर्ष 1992 में पूरे बीकानेर शहर ने उनका नागरिक अभिनंदन किया और “नाट्य शेखर” लोकमान से उनको विभूषित किया। उस समय हुआ कवि-सम्मेलन आज भी स्मृति में जिंदा है। निर्मोही व्यास ने अनुराग कला केंद्र के माध्यम से रंगकर्म की जो अलख जगाई उसका कोई शानी नहीं। 

nirmohi vyasमैं फिर से पहली पंक्ति पर लौटता हूं। निर्मोहीजी व्यास से उनके अंतिम दिनों में मैं नहीं मिल सका। मिल लूंगा यही सोचता रहा कि बीमार है, किंतु किसी भी समय मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि समय बीतता जा रहा है। कोई ऐसी कल्पना ही क्यों करेगा? इस नहीं मिलने ने मेरे भीतर डर, निराशा, हताशा और थोड़ा अलगाव-सा व्याप्त कर दिया है। मैं स्वयं से प्रतिप्रश्न करता हूं कि अगर मैं मिल लेता तो क्या स्थितियां बदल जाती? जो हुआ है उसे हम या कोई भी स्थगित करने की किसी भूमिका में नहीं था? होनी और अनहोनी के बीच कोई कुछ नहीं कर सकता। अगर माने कि यह होना ही था तो इसके होने पर अब भी यकीन करने का मन क्यों नहीं। यकीन बेशक मन नहीं कर रहा किंतु जिस शव-यात्रा के शोक से मन अब भी भारी है उससे मुक्ति संभव नहीं। असंतोष और अवसाद यह भी है कि व्यासजी मेरे हिस्से की जो कुछ बातें मुझे से मिलने पर कहते या कह सकते थे और जिन्हें मैं सुनता, अब यह केवल एक सपना है।

रंगमंच के संस्कारों से सम्मपन पूरे परिवार और अनुराग कला केंद्र के साथियों में जो अपनत्व रहा है, वह बेमिसाल है। निर्मोही व्यास ने जिस रंग-अनुराग को स्वरूप प्रदान किया अथवा कहें कि जिस रंग-अनुराग की गंगा को अपने रंग-संस्कारों के साथ प्रवाहित किया वह अविकल सदा प्रवाहित होती रहेगी। इस गंगा को अपनी गरिमा देने वाले उनके अनुज देवकिसनजी, पुत्र सुधेश, पुत्री राजस्थली, विनीता, भतीजे कमल अनुरागी, सुनील, विक्रम, संजय, विशाल, भतीजी निकिता, पौत्र तपन, निखिल, शुभम, गौरव, पौत्री कनुप्रिया, अंकिता, अर्पिता और सृष्टि जैसे अनेक शक्तिशाली जीवट नाम हैं। बीकानेर के रंगकर्म को अपना संपूर्ण परिवार समर्पित करने वाले व्यास एक बिरले सृजनधर्मी के रूप में सदैव याद किए जाते रहेंगे और उनका सृजन-कार्य आने वाले समाज के लिए सदा प्रेरक रहेगा।

अपने साहित्यिक-संसार में हम अपनों के लिए क्या कर सकते हैं या करते है? इस आधुनिक होते फेसबुकिया रचनाकार-पाठक-समाज में अपने अग्रज, समव्यस्क और अनुज सब को “मित्र” की संज्ञा दे रहे हैं। लिंग-भेद और आयु-विभेद को गौण करता हुआ हमारा आधुनिक समाज जिस “मित्रता” के रंग में आज रंगा है, उस पर यहां लिखना विषयांतर नहीं होगा कि ताजिंदगी निर्मोही व्यास जिंदाजिल इंसान के रूप में जिस मित्रता को छोटो-बड़ों पर नौछावर करते रहे वह रेखांकित की जानी चाहिए। अपने समय के कला-जगत से जुड़े समाज को जिस मित्र-भाव के बंधनों से निर्मोहीजी ने बंधना आरंभ किया था वह बहुत विरल और अनुपम अनुभव है।

नाटक-लेखन और मंचन के लिए बीकानेर के जिस नाम को पूरे देश में जाना-पहचाना गया वह नाम और व्यवहार में जरा भी समानता नहीं रखता- नाम निर्मोही और स्वभाव से अनुपम-अनुरागी। यह कितना सुखद अहसास है कि वे जीवनभर सादगी के साथ एक मिशन को लेकर जिंदादिल बने रहे। अब याद करें हम उनका ऐनक लगा चेहरा, कंधे का लेखकीय-झोला और साइकिल। यह रूप-चित्र कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। हर दिल अजीज और सब को पूरे मान-सम्मान-प्रेम से मीठी झिड़की देते वे सब दिलों में गहरे बसे हैं। मुझे लगता है कि मेरे स्मृति-लोक में उठ कर जैसे अभी-अभी बाहर आए हैं और मुझसे पूछ रहे हैं- नीरज! कियां…. मिलण नै क्यूं कोनी आयो?… अब आप ही बता दे मैं इसका क्या जबाब दूं?

डॉ. नीरज दइया

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Posted on 04/05/2013, in सिमरण. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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