“कैवती ही मां” सुमन गौड़

Sumana G Book & Ravi Pगहन आत्मियता और रागात्मकता का अनुवाद
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डॉ. नीरज दइया

“कैवती ही मां” सुमन गौड़ के पहले काव्य-संग्रह का कवि रवि पुरोहित द्वारा किया गया राजस्थानी अनुवाद है। अनुवाद से जहां किसी कवि को पाठकों का एक नया संसार मिलता है, वहीं अनुवादक को दो भाषाओं के बीच इस पुल बनाने जैसे कार्य से आत्मिक संतोष और अपनी जिम्मेदारी-जबाबदेही के पूरित होने का एक सुखद अहसास भी। सुमन गौड़ ने अपनी कविता के लिए माध्यम भाषा हिंदी को चुना किंतु अपनी जन्मस्थली बीकानेर और राजस्थानी का कहीं न कहीं कोई विचार-बिंदु प्रेरणा-स्रोत अथवा उत्प्रेरक के रूप में रहा, जिसने उनसे रवि पुरोहित को संग्रह के अनुवाद प्रस्ताव पर सहमत किया। किसी रचना को अनुवाद हेतु मन से स्वीकारने का कार्य अनुवाद की रुचि और मेधा पर निर्भर करता है और जैसा कि अनुवादक ने अपनी बात कहते यह स्पष्ट भी किया है उनको सुमन गौड़ की कविताएं प्रभावित कर करने वाली लगी। क्या किसी रचना का अनुवाद के लिए चुना जाना और पुस्तकाकार प्रकाशित होना उसकी श्रेष्ठता का ही प्रमाण है।
निश्चय ही हिंदी में सुमन गौड़ की कविता प्रभावित करती हैं और इसका सीधा सरल कारण कविता में व्यक्त भावों की सरलता-सहजता और निजता को माना जा सकता है। हमारे बीच “मां” एक उभयनिष्ठ घटक है और जो मां कहती थी उसका स्मरण निश्चय ही ममतामयी वाणी के संवाद का स्मरण है। कविता संग्रह के प्रति उत्सुकता का भाव शीर्षक में छिपी निजता के कारण व्याप्त है, जिसमें कहना और सुनना दो महिलाओं के बीच है और जग-जाहिर है कि ऐसे में इस कहने-सुनने में भी क्या का भाव लिए शामिल हो जाते हैं। हिंदी की मूल कविताओं में मां के आखर जितने सच्चे, सरल, सुगम और हृदयग्राही है उनसे भी कहीं आगे रवि पुरोहित के अनुवाद में नजर आने स्वभाविक इसलिए भी है कि मां के प्राणों का आधार राजस्थान और राजस्थानी भाषा को माना जा सकता है।
संग्रह की शीर्षक विहीन छोटी-छोटी कविताओं में स्त्रीवादी स्वर के भीतर जो गहन आत्मियता और रागात्मकता का अनुवाद राजस्थानी भाषा में उजागर हुआ है। इसके आस्वाद से कहीं कही तो यह अहसास इस सीमा तक भी होता है कि जैसे मूल और अनुवाद की सीमाएं एकमेक हो गई है। संग्रह में कविताओं का अनुक्रम मूल कविता-संग्रह और इस अनुवाद में भी शामिल नहीं है, और राजस्थानी अनुवाद में सभी कविताओं को पृष्ठ के आखिरी भाग पर एक बड़े काले बिंदु के साथ समाप्ति का भाव देने का प्रयास किया गया है। जाहिर है कि संग्रह “कैवती ही मां” का मर्म ही इसकी विषय-वस्तु है और मां के कहे संवाद की कोई भी अनुक्रमणिका नहीं होनी चाहिए। यह तो ऐसे मर्मस्पर्शी वचनों का संग्रह है, जिसे जिस क्रम में पढ़ा जाए वह उचित ही है। इससे बड़ी सार्थकता किसी रचना की भला क्या होगी कि वह पाठक को किसी निश्चित परिधी में बांधने का उपक्रम नहीं करती, उसे स्वतंत्र आकाश प्रदान है। जैसे आरंभ कहीं से हो किंतु अंत एक निश्चित है और वह विराम या हर कविता के विरामों के साथ ही उस बड़े और अटल विराम की उद्धोषणा के अन्वेषण का संकेत भी संभवतः यहां समाहित एवं सांकेतित है।
मां की ममतामय भाषा शब्दों की मोहताज नहीं होती, वैसे ही यह अनुवाद की सफलता है कि वह मूल जैसा प्रतीत होता है। राजस्थानी-पाठ में जब पाठक कविताओं के नाद में खो कर भाषा को भूलकर भावों के सागर में गोते लगाता है तब कहीं यह भी विचार उपजता है कि मूल कविताएं भले हिंदी में लिखी गई हो किंतु कविताओं का आंतरिक स्वर राजस्थानी भाषा में अधिक मर्मस्पर्शी बन पड़ा है जिसके लिए अनुवाक को साधुवाद। असल में इस कृति को अपने स्त्रीवाद सोच और स्वर के कारण राजस्थानी रचनाकारों और महिला लेखन के लिए प्रेरणास्पद कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। राजस्थानी में अनेक कवियों के कविता-संग्रहों के अनुवाद प्रकाशित हुए है, जिनमें हिंदी समेत देश-विदेश की अनेक भाषाओं का नामोल्लेख यहां किया जा सकता है किंतु इस व्यापक अनुवाद संसार के बीच यह उपस्थिति आवश्यक और अनिवार्य जान पड़ती है।
यहां अंत में सफल अनुवाद की अपनी बात के साक्ष्य में एक कविता मूल एवं अनुवाद प्रस्तुत करना उचित समझता हूं, संभव है जो बात अनुवाद के विषय में कहने का प्रयास मेरे द्वारा किया गया है वह मर्म यह अनुवाद ही आप तक पहुंचा दे-

मूल हिंदी में-
प्रेम सिर्फ प्रेम है
निःस्वार्थ निःशब्द
कुछ भी नष्ट नहीं होता
प्रेम में
नष्ट होते हैं सिर्फ हम
अचेतन में दबी रहती हैं
हमारी यादें, टूटे सपने
मासूम प्रसन्नताएँ, उजड़ी नींदें
उत्सवों मेलों पर
बाहर आती हैं कभी-कभी
प्रेम के जर्जर द्वार से
मौन उदासी अहाते के
आर पार।

राजस्थानी अनुवाद
हेत फगत हेत है
बिना किणी स्वारथ रै
बिना किणी सबद रै
निराकार
कीं हाण नीं हुवै
हेत में
खतम हुवां फगत आपां
जड़ में जम्योड़ी रैवै
आपणी ओळुवां, तूट्योड़ा सुपना
अचींतो हरख, उणींदी नींदां
उच्छबां अर मेळां माथै
बारै आवै कदै-कदास
हेत री खिंड-बिंड पोळ सूं
अणमणै अर उदास चौबारै सूं
आर-पार।

“कैवती ही मां” / हिंदी कविता संग्रै / मूळ : सुमन गौड़ / राजस्थानी उथळो : रवि पुरोहित/संस्करण : 2012 / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

Dr. Neeraj Daiyaहाईलाइन (21 जून 2013)

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Posted on 08/06/2013, in आलोचना. Bookmark the permalink. 2 टिप्पणियाँ.

  1. kin aata chkki ro aato khaao ho daiya ji…. ? gjab urja h sa… lakhdaad h.

    • आटो जिको बरतियां करां वो दुकानदार कैयो दो-च्यार दिनां में आसी….. तो भाईजी, टंक टाळां …..दो-तीन कट्टा काजू-बिदामां रा न्हाख’र पीसणै री पूरती करी है।

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