कहाणी मांय मिनखाजूण रा गीत : सुन्दर नैण सुधा

लोक मांय आपां भासा री रूपाळी रंगत देख-सुण सकां। लोक-भासा मांय सटीक सबदां सूं जिकी भासा बंतळ आडियां-ओखाणां अर मुहावरां सूं रळी-मिळी सुणां तो जीव हरखीजै। सटीक भासा-बरताब सुणियां हियो निरायंत सूं भरीज जावै। हिवड़ै हरख उपजै अर भासा रै लोक रूप-रंग माथै गीरबो होवै। ठेठ राजस्थानी भासा री महक अनुवाद-भासा अर नगरीय-भासा सूं साव न्यारी होवै। सरू सूं गांव रा रैवासी ठेठ राजस्थानी संस्कार लियां आखी जूण मास्टरी रै काज में आहूत करणियां रामपालसिंह राजपुरोहित। राजस्थानी कहाणीकारां मांय आपरो नांव पैली पांत मांय लियो जावै। अस्सी बरसां री उमर नैड़ै पूगणिया कहाणीकार राजपुरोहित लारला पंद्रा-बीस बरसां सूं कहाणी मांय मिनखाजूण रा गीत गावै। कहाणियां मांय मानखै री करणी-कथणी नैं बिड़दावै। कहाणी मांय संस्कार अर मिनखाचार रा गीत गावण री झाटी झेल्यां आपां आंनै नवी कहाणी-पीढी भेळै अडिग ऊभा देखां। आपरो नवो कहाणी संग्रै ‘सुंदर नैण सुधा’ (2012) अकादमी इमदाद सूं प्रकाशित होयो है। इण सूं पैली आपरा दोय कहाणी संग्रै ‘परण्या री पेढ़ी’ (2006) अर ‘बिखरता चितराम’ (2001) ई प्रकाशित होयाड़ा।

रामपालसिंह राजपुरोहित नैं आपरी निजू भासा-बणगट खातर कहाणी-परंपरा में उल्लेखजोग मान्यो जावै। आंरी कहाणियां आपरी भासा रै कारण लोककथावां सूं होड लेवती-सी लखावै। आ होड कहाणी नंै कैवण अर बणगट री दीठ सूं सरायी जाय सकै। कहाणीकार कहाणी रचै तद खुद कठैई-कठैई कहाणी कैवण ढूक जावै। कहाणी मांय कहाणीकार री आ हाजरी मूळ कहाणी नैं पसार देवै। कहाणी-बणगट री दीठ सूं आप कहाणी-परंपरा मांय दोय धारावां सुभट देख सकां। एक जिण मांय कहाणीकार कहाणी कैवै अर दूजी जिणनैं वो कहाणी में जीवै। रामपालसिंह राजपुरोहित आपरी कहाणियां रै लेखै खुद कहाणी जीवण सूं बेसी कीं कैवण माथै भरोसो दरसावै। आपरो ओ कैवणो ई आपनैं लौकिक परंपरा जोड़ै। आपरी कहाणियां मांय जीवण रा अनुभव मूंडै बोलै। आपरी कहाणियां मांय खास देखी-सुणी अर भोगी बातां मांय सूं कहाणी री बणगट कैवणगत में मिलै।
कांई आपां आ कैय सकां कै रचनाकार आपरी उमर रै किणी मुकाम माथै पूग्यां कीं कैवण री भूमिका सूं ई कहाणी का किणी सिरजाणाऊ विधा मांय रचनाकार उतरिया करै। कहाणी जे कीं कैवण-सुणण री विधा है तो कहाणी मांय रस अर आवेग जरूरी मानीजै। खुद कहाणीकार री हाजरी कहाणी मांय होवै अर वो ई सगळा मारग काढै। कहाणी जथारथ अर कल्पना रो वो घोळियो है जिको कहाणीकार न्यारै न्यारै सवाद मांय त्यार करै। किणी कहाणी री पुरसगारी में माड़ी बात इण रूप में होय जाया करै कै कहाणीकार आपरै व्हाला पढेसरियां माथै कदैई-कठैई अभरोसो करै। कहाणी मांय वो अणचाइजती ओळियां जोड़’र बेसी खुलासा देवण लागै। रामपालसिंह राजपुरोहित री घणकरी कहाणियां मांय औपन्यासिक विस्तार लियोड़ो कथानक मिलै। वै आंनै रसवाळी रळियावणी भासा रै पाण घणी वजनी ढंग सूं परोटै-केवटै। बात जद मूळ कहाणी री करां तद इण ढाळै री कहाणियां रो असर इण खातर मोळो होय जाया करै कै वै अेकठ केई-केई तीर साधै। भासा री सजावट अर रंजकता पेटै कहाणी री धार का खास उद्देश्य सूं समझौतो करणो ठीक कोनी होया करै। आज जिको बदळाव अर विगसाव कहाणी-परंपरा मांय मिलै उणरै जोड़ बैठियां ई किणी कहाणीकार री खरी कूंत करी जाय सकै।
‘सुंदर नैण सुधा’ री कहाणियां रो मूळ सुर बदळतै बगत साम्हीं बूढा-बडेरां री मनगत री संभाळ, लोकजीवण अर संस्कृति नैं परोटता थकां जीवण मूल्यां नैं अंवेर करता संस्कारां नैं पोखणो कैयो जाय सकै। जूण रै छेहलै मुकाम पूगणवाळा बडा-बडेरा नवी पीढी सूं कीं आसावां पाळै। जिका संस्कार अर मोल वै सूंपै, वै वांनै पांगरता देखण री हूंस राखै। आ हूंस का आस राखणी माड़ी बात कोनी। कुण कोनी चावै कै संस्कार अर रिस्ता मांय गरमास बण्योड़ो अर बचियोड़ो रैवै। बगत रै बदळाव मांय मूल्यां री गिरावट सूं दुखी आगोतर रो सोच करतो कहाणीकार राजपुरोहित जाणै नवी अर जूनी पीढी बिच्चै प्रीत रो पुळ बांधतो आपसरी री समझ रो बदळतो गणित ‘सुंदर नैण सुधा’ री कहाणियां मांय समझावण री खेंचल करै।
नवी अर जूनी पीढी बिचाळै इण जुग मांय बदळतै गणित री केई बानगियां आं कहाणियां मांय मिलै। जियां ‘डूबता रिस्ता’ कहाणी मांय नवी हवा रै चालतां भाई-बैन रै रिस्तै माथै काळख पोतण री कहाणी मांय कहाणीकार री आ टीप घणी अरथावू लखावै, ‘सहर में पसरी आथूणी संस्कृति रै खुला चौगान में नवी तरंगां में घोड़ा बिना लगाम हिणहिणाट करता उधम विचरता। प्रेम पाप रै पंखेरुआं भरपूर पांख्यां पसार दी। बडेरां रै थिरप्या समाजू रिस्ता री चींदियां उडायदी। अवैध रिस्तां रा मैदान में गेंद गुड़कावण लाग्या। खुद नैं भणिया-गुणिया अर डोढ हुंसियार समझणवाळा इण पाप रै रिस्ता ऊपर पवित्र प्रेम संबंध री छाप चिपकाय दी। वो ई प्रेम संबंध मामा-भुवा री पीढियां बिचाळै पांगरण लाग्यो।’ (डूबता रिस्ता, पाना सं. 28)
रामपालसिंह राजपुरोहित री कहाणियां मांय ‘प्रेम’ रा केई-केई रूप देख्या जाय सकै। एक प्रेम कहाणी ‘डूबता रिस्ता’ में रिस्ता नैं डूबोवण में लाग्योड़ी है तो दूजै पासी ‘दादोसा’ जैड़ी कहाणी मांय बडेरां री हामळ सूं प्रेम नैं अतूट रिस्ता मांय साधण री तजबीज देखी जाय सकै। कहाणी ‘उजवणो’ में बूढा-बडेरां रै हियै री प्रेम-गांठ छेकड़ मांय खुलै तो जीवण सफळ होय जावै। किणी ढाळै रो सक-सूबो प्रेम-गाड़ी मांय माड़ी बात रूप बखाणीजै तो इणी ओळी रो मरम कहाणी ‘भरम रो भूत’ उजागर करै। कहाणीकार रिस्ता अर प्रेम मांय पतियारै री बात करै तो इणी पतियारै री पत ‘धरम री चिड़कली’ में जड़ां छोड़ती मिलै। इण कहाणी मांय विस्वास रा चींथरा करीजण री करुण-कथा देखणजोग है, ‘पाप री पीड़ जाई सूं इधको पद हो म्हारी उण धरम री चिड़कली रो। उणरी करुण पुकार सुण डील में लकवो क्यूं नीं जागो। अरे! पडिय़ा नैं पाणी पावती वा। पाळी-पोसी कबूतरी री गाबड़ मुरड़ उणरो रगत चूसतां दया क्यूं नीं उपजी। मांयलो मिनख क्यूं नीं जागो? म्हनैं जीवती नैं मारदी। मानूं मौत अखी पण वै दोनूं कुमौत तो नीं मरणो चावती। कैड़ो दौरो प्राण निकळियो व्हैला म्हारी छोरियां रो।’ (धरम री चिड़कली, पाना सं. 92-93)
कहाणीकार केई नवा अर स्थानीय सबदां नैं लोकचावा करै, जियां कै ‘कढी’ खातर ‘पिरथीनाथ’ सबद केई कहाणियां में मिलै अर पढेसरी इण सूं सैंध कर लेवै। बडेरां री अपणायत कहाणी ‘स्नेह री हांडी’ मांय दीखै तो पूरै कहाणी संग्रै मांय भासा री प्रखता अर प्रबला रै होयां उपरांत ई कीं बातां विचारणजोग है। कोई बात खुल्लै-खाळै कैयां लाजमी है कै किणी सबद का ओळी मांय किणी ढाळै री कोई चूक होय जावै। आपां संस्कारां री बात करां अर संस्कार मांय कीं बातां खातर पड़दो राखण री भोळावण मिलै। इण बात रै मरम तांई पूगण खातर दाखलै रूप आं ओळियां माथै विचार कर सकां :

  • खासतां-खासतां मूंडै साथै मूळद्वार ई पूंगी बजावण लागो। (दो फाफरा, पाना सं. 45)
  • बास-गवाड़ री लुगायां ईसको करती पूछती, ‘धा सा, आप रंधोज कीकर बणावो, म्हांनैं ई बतावो तो सरी!’ धा सा उणां री बात मसखरी नांख पडूत्तर करता, ‘सिनान संपाड़ो कर रसोई में सगळा वस्तर खूंटी टांग मां जाई जैड़ी नवसरी होय छमको देयदो, बस।’ सगळी दांतिया तिड़काय बात रो आणंद लेवती पण नादान अचंभा साथै कैवती, ‘साच्याणी! अबकै आवण दो म्हारी बारी रसोड़ा में।’ (‘स्नेह री हांडी’ पाना सं. 59)
  • ‘खासा अळगा गयां आयचुकी साफ नवसरी डील ऊभी, ऊपर काचो तांतण तक नीं।’ (दादोसा, पाना सं. 69)
  • उणरी मूतरणी रै बट देय खरगोस रै ज्यूं खालरवाई करनै मांय मिरचां भरदूं।’ (धरम री चिड़कली, पाना सं. 88)

कैवण री दरकार कोनी कै कीं सबदां नै लोक मांय खुल्लै-खातै बरतण रो चलन है, पण लेखक रूप वां सबदां सूं परहेज कियो जावणो जरूरी है अर जरूरत परवाण ओ फैसलो कहाणीकार नंै ई लेवणो होया करै।
कहाणी ‘धरम री चिड़कली’ री नायिका घणी मोटै हियैवाळी अर ताकतवर किरदार रूप बट काढण री खिमतावान होयां उपरांत ई कहाणी मांय सेवट चुप्पी क्यूं साध लेवै। उणरै मून मांय जुग री लाचारी लुक्योड़ी है। कहाणीकार इण साव अबोट कथानक नैं आपरै अजमायोड़ै कहाणी-फारमेट मांय ई रचै। जरूरत अठै इण बात री ई घणी मानी जावैला कै कहाणी नंै उणरै तयसुदा बणाव-सिणगार रूप-रंग सूं बारै काढण रा जतन करिया जावै। नवा प्रयोगां सूं कहाणी री विकास जातरा में खुद नंै जोड़णो अर भारतीय भासावां री जोड़ मांय ऊभो होवणो बगत री मांग है। नवा कहाणीकारां लोककथा री घड़त सूं आज री कहाणी नैं मुगत कर दी है अर उमीद करां बगत परवाण जूनै री जागा नवी बणगट रामपालसिंह राजपुरोहित आगै बरतैला।
पख रै साथै-साथै विपख ई मिलै। सुख-दुख रो तावड़ै-छियां सरीखो साथो है पण मिनख बगत परवाण केई बातां बिसर जावै। पोथी रै सिरैनांव वाळी कहाणी ‘सुन्दर नैण सुधा’ मांय वकील, डागदर अर कलाकार रो मेळ संस्कारां अर समाज खातर सरावणजोग कैयो जावैला तो साथै ई इण जुग मांय इण ढाळै रा मानवी मिलैला आ आस ई आपां पाळां। कहाणी ‘मीठी माजिया’ मांय खुद री अड़ी मांय धरम-करम-जात भेळा कर’र गींडियो बणा राखणियां पंडित-पिंडताणी री असलियत साम्हीं आवै तो दाई रै हुनर पीड़ा सूं मुगत करती मीठी माजिया री पीड़ अेकर बांच्यां अंतस मांय अमिट ठौड़ बणा लेवै। सामंत जुग सूं जुड़ी दोय कहाणियां मांय एक ‘नंदकळा’ लोककथा बणगट में रची अर दूजी ‘पता रो पाणी’ दोय कहाणियां नैं अेक मांय घणै असरदार ढंग सूं रची कहाणियां कैयी जा सकै। समाज में कमती मोलवाळा मिनखां मांय ई मरजादा होवै अर वांरा गुणां री होड नीं होय सकै इणरी बानगी ‘पता रो पाणी’ में मिलै अर साथै ई मोटै मिनखां रै अंतस री पोल ई आ कहाणी आपां साम्हीं राखै। ‘हड़मत वीर’ हास्य कहाणी नीं संस्मरण है तो कहाणी ‘नार बिना नर अधूरो’ मांय दोय लुगायां रो संवाद कहाणी रै रूप में ढाळण री अधूरी खेंचल है।
सेवट मांय नवी अर जूनी पीढी रो गणित समझण-समझावण अर भासा रो रळियावणो रूप दरसावण वाळै इण कहाणी-संग्रै खातर कहाणीकार नैं बधाई, भेळै आ कामना करूं कै आवतै संग्रै मांय कहाणी कैवण साथै मन री पुड़तां मांयली बातां खोलतां कहाणी में जीवण री नवी जुगत जुड़ैला।

पोथी : सुन्दर नैण सुधा / विधा : कहाणी संग्रै / कहाणीकार : रामपालसिंह राजपुरोहित / प्रकाशक : साहित्य सरिता, बीकानेर / पैलो फाळ : 2012 / पानां : 120 / मोल : 150 रिपिया।

(जागती जोत, मई : 2013 )

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Posted on 21/07/2013, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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