म्हारा गुरुजी पृथ्वीराज रतनू

P Ratnuजीसा श्री सांवर दइया रै मारफत म्हारो परिचै अकादमी सचिव श्री पृथ्वीराज रतनू सूं होयो हो। वां री रतनूजी सूं मित्रता लांबी ही। कैयो जाय सकै कै रतनूजी जीसा नैं मोटो भाई मानता हा। बां दिनां री यादां मांय म्हारा गुरु सर्व श्री मोहम्मद सद्दीक, मूळदान देपावत, ए.वी.कमल, जगदीश उज्जवल आद री मंडळी मांय रतनूजी सामिल है। कित्ती ही बातां केई-केई घटना-प्रसंगां वां यादां मांय रळियोड़ा चेतै आवै। वै बातां आं मित्रां री आपसरी री बातां है। उण पछै म्हनैं अकादमी सूं भत्तमाल जोशी महाविद्यालय पुरस्कार मिल्यो तद री केई यादां रतनूजी नैं लेय’र लिखी-बखांणी जाय सकै, पण सगळा सूं बेसी जसजोग ओळूं पत्रकारिता अर जनसंचार में स्नातक पाठ्यक्रम री है। कोटा विश्वविद्यालय सूं इण कोर्स री क्लासां डॉ. अजय जोशी, कवि श्री सरल विशारद अर श्री पृथ्वीराज रतनू लिया करता हा। उण बगत सूं बै गुरु बण्या अर आज तांई गुरु है। गुरु सूं मिनख ग्यान लेवै अर रतनूजी ग्यान रा आगार है। पोथ्यां रै ग्यान-विग्यान सूं बारै मिनखीचारै री बीसूं बातां आपां उणा सूं सीख सकां। म्हैं आज जद म्हारै इण गुरु पेटै विचार करूं अर सगळा सूं मोटी खासियत लिखण लागूं तद लखाबै कै अकादमी सचिव रूप आपरो कारज जसजोग है। राजस्थानी रा सगळा लेखक-कवियां सूं संपर्क अर संबंध पोखणो कोई हंसी-खेल कोनी। आम आदमी सूं बेसी संवेदनसील मिनख लेखक-कवि मानीजै अर उण रा छोटा-छोटा सुख-दुख होवै। अकादमी रीत-नीत अर मनीता अध्यक्ष रै मुजब कारज करणो अर बो ई घणो संवेदनसील कै कठैई अठै री वठै नीं होय जावै, खुद री सगळी बातां अर संबंधां नैं एक पासी राख’र नेम अर निरदेस मुजब कारज लगोलग करणो घणो अबखो जिको रतनूजी करियो अर खूब करियो। किणी नैं किणी बात सारू संबंधां में फरक कोनी दरसायो। इण सब बातां मांय लखावै कै म्हारै गुरु माथै मा करणी री किरपा बणियोड़ी रैयी है कै बै अकादमी उप-सचिव रै पद माथै रैय पर घणी घणी बार कार्यकारी सचिव रो कारज बखूबी निभायो-संभाळियो। आप री खासियत मांय एक मोटी खासियत आ पण है कै मंच रा जोरदार संचालन करण री गैरी जाणकारी आपनै है। किणी पण कार्यक्रम मांय जणा चावो ऊभा कर दो आप पावोला कै बगत मुजब धाराप्रवाह बोलण वाळा दमदार वक्ता रै रूप मांय आप री छाप छोड़ै। कुसल संपादक ई है अर “जागती जोत” रै बरसां रै प्रबंध संपादन रै अलावा केई ग्रंथां रै संपादन कारज में आपरो मोटो हाथ रैयो। “आपणी घरती : आपणा लोग” अर “चकरियै रा सोरठा” नैं कुण भूल सकै। सगळी बातां रो सार ओ है कै पृथ्वीराज रतनू मिनख लाख रिपिया रा है अर जिको कोई नीं कर सकै वै कर सकै। काल बै अकादमी रै मांय हा अर बां रै इण लांबै सफर रो पूरो लेखो-जोखो ई घणो रोचक होवैला। उणां पाखती किण-किण लेखक-कवि री किसी-किसी बातां कैवण सुणावण खातर है? देखां उप-सचिव पद सूं मुगत होयां पछै बां री कलम सूं कित्तो नवो-जूनो सांच उजागर होवैला। उम्मीद करां कै अकादमी सेवा सूं मुगत होयां पछै राजस्थानी साहित्य सीगै एक लेखक-कवि अर संपादक रूप रतनू जी आपां साथै रैवैला।                                                                                    (31-07-2013)

डॉ. नीरज दइया

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Posted on 30/07/2013, in संस्मरण. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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