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गांठ कोनी गंठजोड़ो है घुळगांठ

YugPaksha 26-11-2013

दैनिक युगपक्ष 26-11-2013

Dr. Daiyaभरत ओळा कहाणीकार रूप ओळखीजतो नांव है। कहाणीकार ‘जीव री जात’ अर ‘सेक्टर नं. 5’ पछै कथा-प्रयोग पेटै काम करण रो मानस बणायो। उपन्यास री बुणगट कहाणियां रै रूप रचणो राजस्थानी में नवी बात। इंडू चौधरी बनाम मनीषा मेघवाळ री कथा-योजना मांय लेखक मूळ मांय युवा-वर्ग री बदळती का बदळ्योड़ी मानसिकता नैं साम्हीं लावण रो सपनो देखै। घणी फूटरी बात कै इण कथा रै रचाव मांय मूळ-सुर नवी पीढी रै नवै बदळाव नैं भांडणो का सरावणो कोनी रैयो। आं बातां सूं लेखक हालत अर हालात रा संकेत देवै। कांई आ कथा इंडू चौधरी बनाम मनीषा मेघवाळ असल में परंपरा बनाम आधुनिकता री कथा है? विक्रम-बेताळ रै सुर कथा कैवणियो कहाणीकार भरत परंपरा नैं पोखतो-परोटतो नवी हवा रंगीज्या च्यार भाइला री टाळवी बातां मांडै।
चुनाव री रुणक, ताऊ री बेटी बैण रो ब्याव, जीसा भेळै भागौत बांचणो का सो-रूम मांय दुकानदारी रा गुर सीखण रो काम असल में आं च्यार भाइला रा न्यारा-न्यारा काम हुवता थकां ई अेक ओळी में कैवां तो आं रो घर-परिवार अर जिम्मेदारी सूं रैयो परंपरागत जुड़ाव है। बदळाव पछै ई आं भाइला मांय हाल कीं लूण-लखण बाकी है, जिण रै कारण आपरी दुनिया मांय सैर-सपाटा करणिया असल में घर सूं जुड़्या रैवै। घर सूं जुड़्या च्यारूं भाइला किणी छोरी नैं देख’र सपनो तो घर रो ई पाळ रैया है, पण इण मांय बगत मुजब आं री बदमासी कहाणीकार साम्हीं राखै। आं नैं जिकी खुल्ली छूट मिलगी है का आं ले ली है उण सूं आगै कांई हुय सकै ओ विचार पाठकां नैं करणो है। आ पाळ जे टूटण लागगी तो इण रो इलाज घर-परिवार अर समाज नैं बगतसर सोचणो है।
असल में मुकनै मेघवाळ नैं कहाणीकार रामेसर गोदारा कहाणी मांय लावै तद सूं कठै ई मनीषा मेघवाळ रो जलम हुवै। भरत ओळा ‘घुळगांठ’ सूं पैली इण कथा रो नांव ‘इंडू चौधरी बनाम मनीषा मेघवाळ’ थरप राख्यो हो, अर इण रा केई अंक पत्र-पत्रिकावां मांय प्रकाशित ई हुया। आपरै मूळ रचाव रूप सूं सजती-संवरती इण कथा रो रूपांतरण ‘घुळगांठ’ मांय हुवता-हुवता केई गांठां इण मांय रळगी। जातिवाद अर भगत सिंह भेळै भजन रै पाठ सूं मूळ पाठ मांय केई विषयांतर साफ देख्या जाय सकै। लेखक रै सपनै में जिको रचाव रो सपनो हो बो अबोट हो, अर उण मांय कठैई कोई मिलावट अर अकल बांटण री कोसिस कोनी ही। लेखकीय चतराई रै पाण संदर्भां नैं विस्तार देवण री बात सूं मोटै संदर्भ सूं जोड़ण रो सपनो मूळ कथा रै मरम नैं कमजोर कर देवै। इण सूं कहाणी रै प्रवाह मांय ई नुकसाण देख्यो जाय सकै… अेक नवजवानी री कथा मांय लेखक किणी बूढै-ठाड़ै समझदार मिनख रूप इतिहास अर दूजी बातां सूं बिचाळै ग्यान बांटण लागै। मूळ कथा रा लाजबाब अर बेजोड़ झीणा संकेत आपरो साच अर सीख लियोड़ा हा, बै इण ग्यान रै बोझै हेठै दबग्या।
गणित रो अेक सवाल है कै जे आपां पाखती कोई च्यार आंक है, तो उणा नैं चोबीस भात री विगत मांय जचा सकां। जे आ बात किणी च्यार नवजवानां रा नांव लेय’र सोची जावै, तो उण विगत में पैली-पछै रो हिसाब कियां कर सकां। च्यार नवजवान भाइला रा नांव कथित उपन्यास ‘घुळगांठ’ में है- इण्डू चौधरी, किसन मेघवंसी, पंकज भारद्वाज अर विपिन गुप्ता। भाइला इसा के अेकै दांतै रोटी टूटै। विचार करां- जे आं च्यारू भाइला सूं अेकठ का जुदा-जुदा मिलण रो संजोग सज जावै तो कांई सवाल करां? सवाल तो केई कर सकां, पण अेक माथै ई विचार करां। आप च्यारां रा नांव कठैई लिखणा हुवै तो पैली पंडत रो लिखा कै मेघवाळ भाई रो। जे हुकम करोला तो चौधरी रो सगळा सूं पैली अर किराड़ रो दूजै नंबर नांव लिखसां। पण ओ फगत हवाई सोच है। पोथी बांच्यां पछै म्हारो मानणो है कै आं च्यारू भाइला में किणी ढाळै पैली-पछै री कोई गांठ कोनी। बै च्यारू पक्का भाइला है, तो कैय सकां असल कोई गांठ है ई कोनी, गांठ कोनी गंठजोड़ो है ‘घुळगांठ’।
लोक मांय हरेक न्यारै न्यारै निजू ढंग-ढाळै सूं सोचण-समझण रो हक राखै। मिनख सोभा री बात कम, मतलब री बात बेसी सोचै-विचारै। आजादी रै इत्ता बरसां पछै ‘जात’ अर ‘धरम’ रै हिसाब सूं सोचणो सोभा नीं देवै। मानां कै अकारादि क्रम, जलम तारीख अर जात रै हिसाब सूं कोई विगत बणाई जाय सकै। बदळाव रा बीज बीजणिया गुरुजी हा जिका अबै मास्टरजी होयग्या, फेर ई बै मिनख-मिनख में फरक करण री ऊंधी पाटी कोनी पढावै। इण बाबत सरकारी कानून रै होवण नीं होवण सूं आगै री बात करां कै कोई लेखक जातीय-समीकरण री सूगली सोच कियां राख सकै है? असल में कहाणीकार भरत ओळा आपरी पोथी ‘घुळगांठ’ में इक्कीसवीं सदी रै कीं दरसावां नैं राखै, जिण में जातिय समन्वय अर युवा पीढी रो बदळतो सोच है, पण भूमिका लेखक मालचंद तिवाड़ी स्यात उण तांई पूगै कोनी। अर जे पूगै तो ई गळती सूं पूरी इण कथा नैं अेक सींव मांय बांध देवै।
फ्लैप अर भूमिका किणी पण पोथी नैं सींव में बांधै, अर केई बार तो किणी भूमिका-लेखक री निजरां सूं मरम ई बदळ जावै। भूमिका रै दरवाजै सूं पोथी बांचणियां मारग गळत ले लेवै। हरेक भूमिका-लेखक री आपरी निजू पसंद-नापसंद होवै, पण हरेक राग में पंचम सुर सोधणो ठीक कोनी हुया करै। किणी लेखक अर पाठक नैं किणी मोह मांय नीं बंधणो चाइजै। बात गळत दिसा में नीं जावै परी इण सारू इण नैं अठै बिसराम देय’र, भूमिका री बै ओळ्यां राखूं जिण सूं म्हारी राय जुदा है- ‘‘बरहाल, भरत आपरै उपन्यास ‘घुळगांठ’ में जाति रै सामूहिक मनोविज्ञान री बां ऊंडी जड़ां नै रोसनी दिखावण री खेचळ करी है, जिकी अेकदम अदीठ दीवळ री गळाई भारतीय समाज री पूरी मनोरचना में पसरती जाय रैयी है। संचार प्रोद्योगिकी अर वैस्वीकरण जेड़ा मौजूदा कारकां अर आधुनिकता री लांबी जातरा रै उपरांत इयां लागै जाणै भारतीय समाज बजाय अेक ‘साठा सो पाठा’ आळै परिपक्व लोकतंत्र रै आंतरिक सून्य रौ सिकार हुंवतां-हुंवतां अेक सफां-सफां आत्महीन अर असुरक्षित समाज में बदळग्यौ है।’’ (घुळगांठ : समाजू पीड़ रौ अेक औपन्यासिक उपचार, भूमिका : पेज 7-8)
पैली बात तो किणी पण जात (जाति) रै अेकठ मनोविज्ञान री बात घुळगांठ समाजू पीड़ रै इलाज (उपचार) रूप कोनी राखै। दूजी बात कै घुळगांठ आपरै किणी संकेत में समस्यामूलक रचना है ई कोनी। इण में जे किणी पण जात री बात करां तो बा है- नवी-नवी जवानी रै जोस चढिया बां कपूतां का कैवां सपूतां री रै लूण-लखण री बात, जिण में जूनी जात बस निसाण रूप मौजूद है। लेखक भरत ओळा आ दरसावै पण बै बेली आप-आपरी हूंस में, उण जूनी-जात नैं बिसराय’र किणी अदीठ गंठजोड़ै सूं जाणै बंधियोड़ा है। फेरां री टैम तो फगत सात कौल करीजै, पण मन रा अै मीत अणगिणती रै कोलां सूं जुड़्योड़ा है। लेखक भरत ओळा री आंगळी डोफाचूक होयोड़ा च्यार भायला- इण्डू चौधरी, किसन मेघवंसी, पंकज भारद्वाज अर विपिन गुप्ता ठेठ तांई कोनी छोड़ै, का इयां कैवां कै लेखक आं नैं मरजी मुजब ठेठ तांई नाच नचावै। आं रो ओ नाचणो मनीषा मेघवाळ जैड़ी पदमणी खातर है। मनीषा री फेट में आयां आं च्यार दीवाना री दीठ जाणै बंध जावै। ओ तो चोखो होवै कै अैदीदा फाडऩा बंद कर’र फगत मनीषा री ध्यावना-चावना करै। आ नवी पीढी री आंधी कामुकता है, जिण सूं बै ‘झट-फाउल’ सरीखी हीण बात तांई पूगै।
घाव भरीजग्यो अर खरूंट आय’र बो साफ हुयग्यो। बस जरा सो निसान बाकी है, अर बो कदै-कदासा होळी-दीयाळी दीस जावैै। इण नैं पाछी ऊंडी जड़ा जाय’र जगावण रो सांवठो संकेत भूमिका-लेखक करै। ओ निजू है- सोच कै जात री अदीठ दीवळ भारतीय समाज री पूरी मनोरचना में पसरती जाय रैयी है। मूळ मांय च्यार भाइलां री च्यार सरभरी कहाणियां घुळगांठ री बुणगट है। आ सोची-समझी कहाणी लेखक भरत ओळा प्रयोग रूप लिखी है।
असल में घुळगांठ जिण खेल सूं चालू होवै उणी ढाळै सेवट आखड़’र जाणै सेवट धूड़ झाड़ता अै बोल निसरै- ‘‘इयां तो आपां कीं माथै ई ब्लेम लगा सकां हां।….किणी रो कोई मुकाबलो थोड़ी ई है।’’ इणी मारमिक ओळी रै सार मांय पूरो होवै घुळगांठ। आ बात साव साची है- ओ आत्महीन अर असुरक्षित समाज है, पण इण रो कारण जात-पांत नैं नीं मानता थकां युवावां री गळत आदतां नैं मान्यो जावणो चाइजै। आज आपां देखां कै आं नैं लूण-लखण देवण मांय कठै कमी रैय जावै, जिण सूं आ नवी पीढी इण ढाळै री प्रीत री घुळगांठ खेल रूप लेय बैठै। घुळगांठ रै पाठ री आ खासियत है कै ओ ग्यारा कहाणियां रै पाठ रूप कीं कमियां नैं टाळ देवां तो पठनीय रचना रूप घणो सरावणजोग है।
तीन भाइल्यां- प्रतिभा अग्रवाल, प्रीति आडवाणी अर मनीषा मेघवाळ अर च्यार भायला- इण्डू चौधरी, किसन मेघवंसी, पंकज भारद्वाज अर विपिन गुप्ता री सींव मांय रचीजी घुळगांठ-कथा मांय भाषण, कविता अर गीत रो पूरो पूरो पाठ देवणो इण नैं कमजोर करै। कांई युवा पीढी रै हुवतै नैतिक पतन नैं दरसाण खातर भरत ओळा सामाजिक सद्भाव रै नांव माथै च्यार जणा नैं छांट’र माडाणी भाइला बणा दिया है? कांई इण रचाव सूं ओ सवाल आपां साम्हीं राखणो चावै कै इण हुवण वाळै बदळाव मांय दोस किण रो- परंपरा का आधुनिकता रो? घुळगांठ असल मांय नवजवानां रै खूटतै लूण-लखण रै री घंटी बाजावै। अलाराम बाजै जियां बगतसर बोलती आ रचना बगत रैवतां सावचेत करण री रचना है। लेखक री आ जोरदार दमदार कोसिस है, सो इण नैं गांठ रूप नीं गंठजोड़ै रूप संबंधां नैं बणावण अर निभावण री जसजोग कथा रूप जाणाला।

ghulaganth

घुळगांठ / भरत ओळा / उपन्‍यास / 2009 / मूल्य 125 रूपये / पृष्ठ :- 112 / आई एस बी एन :- 978-81-905208-9-8 / प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001

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आत्मकथ्य : राजस्थान सम्राट में प्रकाशित

RS 01
RS 02

अठै कीं चांनणै री उम्मेद है….

(राजस्थान सम्राट , जयपुर 05 नवम्बर 2013 संयोजन : दुलाराम सहारण)
RS 03

Dr. Daiya

राजस्थानी भासा रै लिखारां कांनी देखां तद खासै भरोसै रै साथै जवानी लांघतै अर प्रौढतां कांनी बधतै डॉ. नीरज दइया रौ नांव सबळी भांत दीखै। नीरज आपरै टाबरपणै सूं ई आखर रा ओळिया मांडै। वां ओळियां री विगत किंयां सरू हुयी? खुद नीरज री कोरणी सूं।

आज जद औ सवाल म्हारै साम्हीं आवै कै म्हैं लेखक कियां बण्यौ? तौ केई-केई बातां मन-मगज में आवण लागै। नामी लेखक सांवर दइया रै घरै जलम लेवण सूं म्हैं लेखक कोनीं बण्यौ। म्हारी जलम-घूटी में लेखक बणावण रा कोई जतन कोनीं हा। पड़तख प्रमाण कै म्हारौ सागी भाई लेखक कोनीं। घर में म्हारै खातर म्हैं लेखक बण जासूं औ सपनौ ई कोई कोनीं देख्यौ पण हां, जीसा रौ कठैई औ लुक्योड़ौ सपनौ जरूर लखावै। किणी लेखन नै हवा-पाणी कठैई न कठैई सूं मिलै। हां, औ जरूर कैयौ जाय सकै कै जरूरत परवांण म्हारै लेखक नै खाद घर-परिवार सूं मिली। जूंनी बातां चेतै करूं तौ म्हैं जांणै किणी तलभंवरै उतरण लागू। आज लखावै कै वै बातां घणी लारै छूटगी। वां र्तांइं पूगण नै म्हैं होळै-होळै तलभंवरै रै पगोथिया उतरूं। यादां रै ऐलबम रा आगला पानां खासा गूगळा हुयग्या। केई तौ आपस में काठा चेंठग्या है। जोर मारियां ई आ ओळूं-सांकळ पूरी कोनीं खुलै। इण मारग जिकौ कीं चेतै आवैला उणनै आगै-लारै री बिना चिंता करियां आपरै नजर करूंला, जिण सूं ठाह लागै कै म्हैं लेखक कियां बण्यौ?

जूनी ओळूं रै रूप में जीसा री वौ अेक थाप म्हनैं अजेस चेतै है। उण दिन री हर करियां म्हारै गालां माथै ढळकण वाळां वै आंसूं म्हनै आज ई गळगळौ कर देवै। गाल आज ई आलौ लखावै। म्हे वां दिनां म्हारै ददाणै में रैया करता हा। मोटौ परिवार हौ अर घर में किणी रौ ब्याव हौ। बेकळू रा दोय गाडा घर अगाड़ी न्हाख्योड़ा हा। टाबरां भेळै म्हैं रमत में बेकळू आपसरी में उछाळै हौ। साची में तो बेकळू नैं रंग जाणनै म्हैं भायला-भायला होळी रम्मै हा। वीं टैम ठाह नीं कठै सूं चांणचकै जीसा आया अर म्हां सगळा नैं दाकल दी। तद सगळा छोरा-छोरियां तौ भाजग्या, म्हैं रैयग्यौ। म्हैं वांरौ लाडेसर हौ, जकौ म्हनैं परसाद मिलणौ ई हौ। औ वौ बगत हौ जद म्हारै जीसा रौ उठ-बैठ रौ ठिकाणो चुन्नीलाल जी री होटल हुया करती। आ वां दिनां री बात है जद जेळ रोड वाळै म्हारै घर साम्हीं नवौ-नवौ उपडाकघर खुल्यौ हौ। जीसा रै नांव केई पोस्टकार्ड, लिफाफा, अखबार, पत्रिकावां अर किताबां आया करती ही।
टाबरपणै री बातां अंवेरू तौ अेक दूजो दीठाव चेतै आवै, जिण मांय म्हैं अनादिष्ट कला रा पेंटर के. राज री होबी क्लास में जाया करतौ हौ। जीसा आपरै भायला हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी, परशुराम, गणेश मोदी आद साथै म्हारै सूं मिलण नैं वां दिनां अेकर फोर्ट स्कूल आयां। बियां म्हनैं पछै ठाह पड़ी कै वै मानजोग पेंटर के. राज जी सूं रामास्यामा करणनै आया हा अर लगतै हाथ आपरै भायला नैं म्हारै सूं मिलवा दिया। औ वौ बगत है जद म्हनैं कीं-कीं ठाह पड़ियौ कै म्हारा जीसा सांवर दइया अेक लेखक है। पण म्हैं लेखक रौ मतलब सावळ कोनीं जाणतौ हौ।
लेखक अर किताब सूं ओळख तौ नोखा रै बाबा छोटूनाथ स्कूल में हुयी जद जीसा रै कहाणी संग्रै ‘धरती कद तांई घूमैला’ नैं अकादेमी पुरस्कार घोसित हुयौ। प्रार्थना में इण बात री जांणकारी दीरीजी तौ म्हैं घणौ राजी हुयौ, पण इण घटना नैं किताबां री दुनिया पेटै अंतस कोड उपजावण री कड़ी ई कैयी जावैला। इण सांकळ नैं पुखता करण में म्हारा पीटीआई डेलू जी गुरुजी नैं जस जावै। वै म्हानै अन्नाराम सुदामा री पोथी ‘दूर दिसावर’ री भूमिका रस लेय-लेय बांचनै सुणाया करता हा।
म्हनैं नोखा में भंवरलाल-छगनलाल मोहता रौ वौ घर चेतै जावै जिण री अटाण माथै म्हारै घरै जीसा री पोथ्यां री भरमार हुया करती ही। आ बात उणी ढाळै री है कै आपरी आंख्यां साम्हीं सागर हुवै अर आपनै आपरी तिरस रौ ठाह ई नीं हुवै। उण घर में म्हारौ अर म्हारै लेखक जीसा रौ कोई मेळ गुरु-चेलै र्दांइं कोनीं बैठ सक्यौ। कारण कै म्हैं गणित-विग्यांन रौ पढेसरी अर म्हारा जीसा हिंदी रा मास्टर। अै वै दिन हा जद कन्हैयालाल सेठियां दूहा लिखनै मायड़भासा री अलख चेतन करण में लाग्योड़ा हा अर रावत सारस्वत री राजस्थानी परीक्षा योजना में म्हनैं ई राजस्थानी बांचण रौ कोड नवौ-नवौ लाग्यौ। केई पोथ्यां बांची वां दिना पण ‘एक बीनणी दो बीन’ श्रीलाल नथमल जोशी रै अनुवाद करियोड़ै उपन्यास नैं अजेस याद करूं। वां दिनां राजस्थानी रा पेपर दिया अर इनाम ई मिल्यौ। साथै वाळा छोरा ओलै-छानै अर कदैई साम्हीं ई कैया करता- ‘थन्नै तौ इनाम मिलणौ ई हो…’, अर वांरी मुळक हाल ई कदै-कदास चेतै आवै पण वांरा उणियारां नैं अबै बिसरग्यौ । इणनै इयां कैयौ जाय सकै कै अेक दुनिया रै भेळै अेक दूजी दुनिया म्हारै असवाड़ै-पसवाड़ै ही पण उण सूं म्हारी अजेस पूरी सैंध हुवणी बाकी ही।
लेखकां री दुनिया सूं म्हारी सीध सैंध कराण रौ जस म्हारै शंकर बाबोसा रा मोभी बेटा अर म्हारा मोटा भाई नंदलाल जी नैं जावै। कवितावां लिखणौ अर कवि कैवावणौ वांरौ कोड हौ। वां ‘बालराही’ नांव सूं अेक पत्रिका काढी। उण में म्हारी ई कोई कविता छापी ही, अै वै दिन हा जद श्यामलाल भाई जी रौ नांव फरमाइसी गाणां रै कार्यक्रम में रेडियो माथै गिरधर व्यास, चंचल हर्ष आद उद्घोषक बोल्या करता हा। पत्र-मित्र अर रेडियो री दुनिया सूं वांरौ सरोकार हौ। म्हैं किणी कविता पेटै आ नीं कैय सकूं कै आ म्हारी पैली कविता है…. अर अठै सूं आ जातरा चालू हुवै।
बाळपणै री म्हारी सगळी आडी-टेडी आंकी-बाकी ओळ्यां पैली तौ नंदलाल भाई जी फेल कर दिया करता अर पछै जीसा सूं इण पेटै बात करण री हिम्मत ई कोनीं हुया करती। आकाशवाणी रै युववाणी प्रोग्राम में पैली दफै जद कविता पाठ रौ बुलावौ आयौ तद सागी रिकोर्डिंग वाळै दिन जीसा कैयौ- ‘ला देखांण, देखां किसी कवितावां बांचसी?’ म्हैं कवितावां रा कागज दिया तौ देख्या अर दो-च्यार गळत्यां निकाळ दी ही। बोल्या- ‘अबार तौ धिक जासी। पण रसगुल्ला जी, कविता कांई हुवै पैली आ जांणकारी करौ।’
आ हळसी सी छींयां है जठै म्हारी लेखकीय दुनिया खातर इण ढाळै रा कीं संकेत पिछाण्या जाय सकै। अठै म्हैं खुद नैं लेखक समझण री भूल जद ई कोनीं करी अर अबै ई कोनीं कर सकूं। अेक लेखक अर इणनै उण दुनिया रै पळकै री चपेट में आवणौ ईज कैय सकां।
लेखक, अकादमी अर पुरस्कारां री जांणकारी खातर जीसा सांवर दइया री पोथी- ‘एक दुनिया म्हारी’ नै जस जावै। जद इण पोथी नै अकादेमी पुरस्कार मिल्यौ तद नागरी भंडार में जीसा रै अभिनंदन में नंदलाल भाई जी म्हनै ई लेयग्या। जायां ठाह लाग्यौ कै अैन मंच माथै अन्नाराम जी सुदामा हा जिका कदै कदास ई कार्यक्रमां में आया करै अर आज आया है। उण कार्यक्रम में कुण कांईं कैयौ माळावां री ओळूं तौ है पण म्हरै कानां में तौ डेलू जी गुरु जी रा सबद रेडियौ दांईं दूसर ‘दूर दिसावर’ री भूमिका सुणावै हा। आज रै दिन गुरुजी रा बोल भलांईं बिसरग्या हुवै पण वौ रस अर जायकौ तौ चेतै है।
लेखकां री दुनिया सूं जोड़ण में सूर्य प्रकाशन मंदिर रा बिस्सा जी नै जस जावै कै वांरी हेत-अपणायत रै पांण ई म्हनैं लागण लाग्यौ कै म्हैं काचौ-पाकौ कीं लेखक हूं। महाविद्यालय स्तर रौ भतमाल जोशी पुरस्कार अर अकादमी सूं जुड़ाव हुयां इण दिस कीं भरोसौ बंध्यौ। लघुकथा पोथी ‘भोर सूं आथण तांई’ प्रकाशित हुयां का पछै प्रांतीय युवा रचनाकार सम्मेलन करायां इण दुनिया रा कूड़-सांच समझ आवण लाग्या। लेखक नैं किणी री आंगळी पकड़नै नीं चालणौ चाइजै अर नीं किणी नैं चलावणो चाइजै। जीसा री आंगळी लेखक रै रूप में पकड़नै कीं आगै बधूं औ मौकौ बेमाता कोनीं दियौ अर कविता संग्रै ‘साख’ पेटै चावा-ठावा कवि मोहन आलोक री भोळावण सूं कविता रै मारग जातरा चालू तौ कर दी पण इण री मजल कठै? नेगचार रै मारफत काळा-गोरा इण दुनिया रा उजागर करियां अेक बात पक्की धार ली कै लेखक हुवण रौ अरथाव भासा अर साहित्य रौ सिपाही हुवणौ है।
कैवण नै तौ कैयौ जावै कै लेखक दुनिया रौ अंधारौ अळघौ करै पण खुद लेखकां री दुनिया मांय ई अंधारौ है। अंधारै री दुनिया सूं ऊजास री उम्मेद लगावण वाळा रौ भरोसौ बण्यौ राखणौ है।
इण अंधारी दुनिया में म्हारै खातर औ जरूरी कोनीं कै कोई म्हनै लेखक मानै के नीं मानै । म्हारै खातर औ जरूरी है कै म्हैं खुद नैं लेखक मानूं अर चावूं कै आखी दुनिया सबदां रै ऊजास सूं जगमगावै। खरोखरी बात तौ आ है कै इण अंधारै जे हीयै आंख री बात अंगेजां तौ लेखक हुवणौ हीयै आंख उपजावणौ है। अठै कीं चांनणै री उम्मेद है, इणी खातर म्हैं लेखक हूं।

-डॉ. नीरज दइया

Books Neeraj Daiya

बिज्जी जिसा लेखकां नैं काळ कदैई कोनी मार सकै….

VIJAYDAN DETHAआखै देस-विदेस मांय राजस्थानी रै नांव साथै ई जिका नांव आवै वां मांय साहित्य अकादेमी अर पद्मश्री सूं सम्मानित विजयदान देथा ‘बिज्जी’ रो नांव हरावळ। बिज्जी रो जस ओ कै राजस्थान अर राजस्थानी नैं नोबल रै दरवाजै पूगायो। विजयदान देथा री मोटी खासियत कै बां नैं देथा जी नांव सूं संबोधन करण रै अलावा बिना जिकारै रो नांव बिज्जी घणी रुचतो। बिज्जी फगत अेक नांव है जिण रै आगै-लारै कीं लगावण री दरकार कोनी। श्री अर जी रै मोह सूं बिज्जी बरसां पैली मुगत हुयग्या अर बिज्जी नांव री जिकी काया ही उण सूं ई मुगत हुयग्या। बिज्जी आपरै तरै रा निरवाळा लेखक हा जिका रो किणी सूं कोई मुकाबलो कोनी रैयो। बिज्जी राजस्थानी साहित्य पेटै इत्तो जसजोग काम करग्या कै आवण वाळै बगत मांय किणी अेक लेखक सूं उण री बरोबरी ई कोनी हुय सकैला। बां आपरी पूरी जूण ई साहित्य अर सबद मांय होम दी। तारीख रै हिसाब सूं तो विजयदान देथा 1 सितम्बर, 1926 नैं जलमिया अर 10 नवम्बर 2013 नैं सौ बरस लिया, पण साहित्य रै आंगणै बै हजारी उमर लाया। बिज्जी आपां रै बिचाळै सदीव हा अर सदीव रैसी…. अठै ओ लिखणो ठीक रैसी कै बिज्जी जिसा लेखकां नैं काळ कदैई कोनी मार सकै। पहेली फिल्म सूं बिज्जी रो जस नवी पीढी जाणियो। बिज्जी राजस्थानी लेखक रूप आखै जगत मांय बोरूंदा बैठा-बैठा डंको बजायो।
लोक साहित्य पेटै लोक कथावां नैं लिखित रूप ढाळण मांय बिज्जी आपरी आखी ऊरमा लगा दी। बां रो जस बातां री फुलवाड़ी अर कहावत कोस रै मारफत जुगा-जुगा जाणीजैला। बिज्जी आधुनिक गद्य भाषा नैं आपरी ठौड़ जचावण अर जमावण रो मोटो काम बातां री फुलवाड़ी सूं करियो। किणी लेखक रा सबद चेतै आवै जिण मुजब बिज्जी राजस्थानी रा भगवान है। भगवान रो जिको कीं अरथ हुवै उण नैं बिज्जी राजस्थानी साहित्य रै सीगै साकार कर दिखायो। भगवान रो अरथाव कै कीं रचण पेटै हुवै अर बिज्जी कहाणी साहित्य मांय अेक इतिहास रचियो है। बियां आपां रा संस्कार है कै सौ बरस पूगणियै नैं भगवान मानां। किणी नवै लेखक रै हियै आपरै पैली रा लेखकां पेटै घणो माण हुया करै अर उण मान री हद आ ई हुवै कै बो किणी लेखक नैं भगवान मान लेवै। जिका नैं जीवता जीव बिज्जी भगवान कोनी लगता बां रै देवलोक गयां पछै तो आ ओळी खरोखरी स्वीकारी जाय सकै कै बै आपारी काया रै गुण-दोसां सूं मुगत हुयग्या।
बिज्जी री राजस्थानी हिंदी मांय घणी घणी पोथ्यां प्रकाशित हुई। घणै अंजस री बात कै राजकमल प्रकाशन राजस्थानी कहाणी संकलन अलेखूं हिटलर तो नेशनल बुक ट्रस्ट ई विजयदांन देथा री सिर कथावां पोथी प्रकाशित करी। बिज्जी मंच, माइक, सभा-गोष्ठी सूं अळधा रैवणिया लेखक हा, म्हैं जोधपुर रै प्रांतीय कथा समारोह में मिल्यो उण पछै बीकानेर में मुलाकात हुई। बिज्जी हरेक लेखक सूं घणै हेत-अपणायत सूं मिलता। कथाकार मीठेस निरमोही री खिमता कै बै कथा समारोह में बिज्जी नैं बुला’र लाया अर कवि-कहाणीकार मालचंद तिवाड़ी नैं तो बेटै जिसो माण देवणो जग जाहिर है। साहित्य अकादेमी, बिज्जी अर सीपी बन्ना सूं जुड़ी केई केई बातां है जिण सूं आगै री बात कै बिज्जी नैं आपरी आलोचना सहन कोनी ही। नेगचार संपादक नीरज दइया रूप बिज्जी साम्हीं ऊभै हुवण री बात बगत री मांग ही अर बिज्जी नैं माण देवणियो म्हैं लेखक-परिवार नैं ई अकेक घर-घराणो मानूं। राजस्थानी साहित्य रै आंगणै मांय बिज्जी नैं म्हैं दादोसा कैया करतो हो। बै बडेरा हा अर बडेरा ई आपरी रचनावां मांय साच रो पल्लो झलण री सीख सीखावै तो उण नैं कोई कियां बिसरावै। बिज्जी री सिरजण-जातरा नैं घणै मान नमन।

Bijji pr lekha Neeraj Daiya

रंग राजस्थानी में 11-11-13 नैं प्रकाशित