बिज्जी जिसा लेखकां नैं काळ कदैई कोनी मार सकै….

VIJAYDAN DETHAआखै देस-विदेस मांय राजस्थानी रै नांव साथै ई जिका नांव आवै वां मांय साहित्य अकादेमी अर पद्मश्री सूं सम्मानित विजयदान देथा ‘बिज्जी’ रो नांव हरावळ। बिज्जी रो जस ओ कै राजस्थान अर राजस्थानी नैं नोबल रै दरवाजै पूगायो। विजयदान देथा री मोटी खासियत कै बां नैं देथा जी नांव सूं संबोधन करण रै अलावा बिना जिकारै रो नांव बिज्जी घणी रुचतो। बिज्जी फगत अेक नांव है जिण रै आगै-लारै कीं लगावण री दरकार कोनी। श्री अर जी रै मोह सूं बिज्जी बरसां पैली मुगत हुयग्या अर बिज्जी नांव री जिकी काया ही उण सूं ई मुगत हुयग्या। बिज्जी आपरै तरै रा निरवाळा लेखक हा जिका रो किणी सूं कोई मुकाबलो कोनी रैयो। बिज्जी राजस्थानी साहित्य पेटै इत्तो जसजोग काम करग्या कै आवण वाळै बगत मांय किणी अेक लेखक सूं उण री बरोबरी ई कोनी हुय सकैला। बां आपरी पूरी जूण ई साहित्य अर सबद मांय होम दी। तारीख रै हिसाब सूं तो विजयदान देथा 1 सितम्बर, 1926 नैं जलमिया अर 10 नवम्बर 2013 नैं सौ बरस लिया, पण साहित्य रै आंगणै बै हजारी उमर लाया। बिज्जी आपां रै बिचाळै सदीव हा अर सदीव रैसी…. अठै ओ लिखणो ठीक रैसी कै बिज्जी जिसा लेखकां नैं काळ कदैई कोनी मार सकै। पहेली फिल्म सूं बिज्जी रो जस नवी पीढी जाणियो। बिज्जी राजस्थानी लेखक रूप आखै जगत मांय बोरूंदा बैठा-बैठा डंको बजायो।
लोक साहित्य पेटै लोक कथावां नैं लिखित रूप ढाळण मांय बिज्जी आपरी आखी ऊरमा लगा दी। बां रो जस बातां री फुलवाड़ी अर कहावत कोस रै मारफत जुगा-जुगा जाणीजैला। बिज्जी आधुनिक गद्य भाषा नैं आपरी ठौड़ जचावण अर जमावण रो मोटो काम बातां री फुलवाड़ी सूं करियो। किणी लेखक रा सबद चेतै आवै जिण मुजब बिज्जी राजस्थानी रा भगवान है। भगवान रो जिको कीं अरथ हुवै उण नैं बिज्जी राजस्थानी साहित्य रै सीगै साकार कर दिखायो। भगवान रो अरथाव कै कीं रचण पेटै हुवै अर बिज्जी कहाणी साहित्य मांय अेक इतिहास रचियो है। बियां आपां रा संस्कार है कै सौ बरस पूगणियै नैं भगवान मानां। किणी नवै लेखक रै हियै आपरै पैली रा लेखकां पेटै घणो माण हुया करै अर उण मान री हद आ ई हुवै कै बो किणी लेखक नैं भगवान मान लेवै। जिका नैं जीवता जीव बिज्जी भगवान कोनी लगता बां रै देवलोक गयां पछै तो आ ओळी खरोखरी स्वीकारी जाय सकै कै बै आपारी काया रै गुण-दोसां सूं मुगत हुयग्या।
बिज्जी री राजस्थानी हिंदी मांय घणी घणी पोथ्यां प्रकाशित हुई। घणै अंजस री बात कै राजकमल प्रकाशन राजस्थानी कहाणी संकलन अलेखूं हिटलर तो नेशनल बुक ट्रस्ट ई विजयदांन देथा री सिर कथावां पोथी प्रकाशित करी। बिज्जी मंच, माइक, सभा-गोष्ठी सूं अळधा रैवणिया लेखक हा, म्हैं जोधपुर रै प्रांतीय कथा समारोह में मिल्यो उण पछै बीकानेर में मुलाकात हुई। बिज्जी हरेक लेखक सूं घणै हेत-अपणायत सूं मिलता। कथाकार मीठेस निरमोही री खिमता कै बै कथा समारोह में बिज्जी नैं बुला’र लाया अर कवि-कहाणीकार मालचंद तिवाड़ी नैं तो बेटै जिसो माण देवणो जग जाहिर है। साहित्य अकादेमी, बिज्जी अर सीपी बन्ना सूं जुड़ी केई केई बातां है जिण सूं आगै री बात कै बिज्जी नैं आपरी आलोचना सहन कोनी ही। नेगचार संपादक नीरज दइया रूप बिज्जी साम्हीं ऊभै हुवण री बात बगत री मांग ही अर बिज्जी नैं माण देवणियो म्हैं लेखक-परिवार नैं ई अकेक घर-घराणो मानूं। राजस्थानी साहित्य रै आंगणै मांय बिज्जी नैं म्हैं दादोसा कैया करतो हो। बै बडेरा हा अर बडेरा ई आपरी रचनावां मांय साच रो पल्लो झलण री सीख सीखावै तो उण नैं कोई कियां बिसरावै। बिज्जी री सिरजण-जातरा नैं घणै मान नमन।

Bijji pr lekha Neeraj Daiya

रंग राजस्थानी में 11-11-13 नैं प्रकाशित

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Posted on 13/11/2013, in सिमरण. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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