आत्मकथ्य : राजस्थान सम्राट में प्रकाशित

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अठै कीं चांनणै री उम्मेद है….

(राजस्थान सम्राट , जयपुर 05 नवम्बर 2013 संयोजन : दुलाराम सहारण)
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Dr. Daiya

राजस्थानी भासा रै लिखारां कांनी देखां तद खासै भरोसै रै साथै जवानी लांघतै अर प्रौढतां कांनी बधतै डॉ. नीरज दइया रौ नांव सबळी भांत दीखै। नीरज आपरै टाबरपणै सूं ई आखर रा ओळिया मांडै। वां ओळियां री विगत किंयां सरू हुयी? खुद नीरज री कोरणी सूं।

आज जद औ सवाल म्हारै साम्हीं आवै कै म्हैं लेखक कियां बण्यौ? तौ केई-केई बातां मन-मगज में आवण लागै। नामी लेखक सांवर दइया रै घरै जलम लेवण सूं म्हैं लेखक कोनीं बण्यौ। म्हारी जलम-घूटी में लेखक बणावण रा कोई जतन कोनीं हा। पड़तख प्रमाण कै म्हारौ सागी भाई लेखक कोनीं। घर में म्हारै खातर म्हैं लेखक बण जासूं औ सपनौ ई कोई कोनीं देख्यौ पण हां, जीसा रौ कठैई औ लुक्योड़ौ सपनौ जरूर लखावै। किणी लेखन नै हवा-पाणी कठैई न कठैई सूं मिलै। हां, औ जरूर कैयौ जाय सकै कै जरूरत परवांण म्हारै लेखक नै खाद घर-परिवार सूं मिली। जूंनी बातां चेतै करूं तौ म्हैं जांणै किणी तलभंवरै उतरण लागू। आज लखावै कै वै बातां घणी लारै छूटगी। वां र्तांइं पूगण नै म्हैं होळै-होळै तलभंवरै रै पगोथिया उतरूं। यादां रै ऐलबम रा आगला पानां खासा गूगळा हुयग्या। केई तौ आपस में काठा चेंठग्या है। जोर मारियां ई आ ओळूं-सांकळ पूरी कोनीं खुलै। इण मारग जिकौ कीं चेतै आवैला उणनै आगै-लारै री बिना चिंता करियां आपरै नजर करूंला, जिण सूं ठाह लागै कै म्हैं लेखक कियां बण्यौ?

जूनी ओळूं रै रूप में जीसा री वौ अेक थाप म्हनैं अजेस चेतै है। उण दिन री हर करियां म्हारै गालां माथै ढळकण वाळां वै आंसूं म्हनै आज ई गळगळौ कर देवै। गाल आज ई आलौ लखावै। म्हे वां दिनां म्हारै ददाणै में रैया करता हा। मोटौ परिवार हौ अर घर में किणी रौ ब्याव हौ। बेकळू रा दोय गाडा घर अगाड़ी न्हाख्योड़ा हा। टाबरां भेळै म्हैं रमत में बेकळू आपसरी में उछाळै हौ। साची में तो बेकळू नैं रंग जाणनै म्हैं भायला-भायला होळी रम्मै हा। वीं टैम ठाह नीं कठै सूं चांणचकै जीसा आया अर म्हां सगळा नैं दाकल दी। तद सगळा छोरा-छोरियां तौ भाजग्या, म्हैं रैयग्यौ। म्हैं वांरौ लाडेसर हौ, जकौ म्हनैं परसाद मिलणौ ई हौ। औ वौ बगत हौ जद म्हारै जीसा रौ उठ-बैठ रौ ठिकाणो चुन्नीलाल जी री होटल हुया करती। आ वां दिनां री बात है जद जेळ रोड वाळै म्हारै घर साम्हीं नवौ-नवौ उपडाकघर खुल्यौ हौ। जीसा रै नांव केई पोस्टकार्ड, लिफाफा, अखबार, पत्रिकावां अर किताबां आया करती ही।
टाबरपणै री बातां अंवेरू तौ अेक दूजो दीठाव चेतै आवै, जिण मांय म्हैं अनादिष्ट कला रा पेंटर के. राज री होबी क्लास में जाया करतौ हौ। जीसा आपरै भायला हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी, परशुराम, गणेश मोदी आद साथै म्हारै सूं मिलण नैं वां दिनां अेकर फोर्ट स्कूल आयां। बियां म्हनैं पछै ठाह पड़ी कै वै मानजोग पेंटर के. राज जी सूं रामास्यामा करणनै आया हा अर लगतै हाथ आपरै भायला नैं म्हारै सूं मिलवा दिया। औ वौ बगत है जद म्हनैं कीं-कीं ठाह पड़ियौ कै म्हारा जीसा सांवर दइया अेक लेखक है। पण म्हैं लेखक रौ मतलब सावळ कोनीं जाणतौ हौ।
लेखक अर किताब सूं ओळख तौ नोखा रै बाबा छोटूनाथ स्कूल में हुयी जद जीसा रै कहाणी संग्रै ‘धरती कद तांई घूमैला’ नैं अकादेमी पुरस्कार घोसित हुयौ। प्रार्थना में इण बात री जांणकारी दीरीजी तौ म्हैं घणौ राजी हुयौ, पण इण घटना नैं किताबां री दुनिया पेटै अंतस कोड उपजावण री कड़ी ई कैयी जावैला। इण सांकळ नैं पुखता करण में म्हारा पीटीआई डेलू जी गुरुजी नैं जस जावै। वै म्हानै अन्नाराम सुदामा री पोथी ‘दूर दिसावर’ री भूमिका रस लेय-लेय बांचनै सुणाया करता हा।
म्हनैं नोखा में भंवरलाल-छगनलाल मोहता रौ वौ घर चेतै जावै जिण री अटाण माथै म्हारै घरै जीसा री पोथ्यां री भरमार हुया करती ही। आ बात उणी ढाळै री है कै आपरी आंख्यां साम्हीं सागर हुवै अर आपनै आपरी तिरस रौ ठाह ई नीं हुवै। उण घर में म्हारौ अर म्हारै लेखक जीसा रौ कोई मेळ गुरु-चेलै र्दांइं कोनीं बैठ सक्यौ। कारण कै म्हैं गणित-विग्यांन रौ पढेसरी अर म्हारा जीसा हिंदी रा मास्टर। अै वै दिन हा जद कन्हैयालाल सेठियां दूहा लिखनै मायड़भासा री अलख चेतन करण में लाग्योड़ा हा अर रावत सारस्वत री राजस्थानी परीक्षा योजना में म्हनैं ई राजस्थानी बांचण रौ कोड नवौ-नवौ लाग्यौ। केई पोथ्यां बांची वां दिना पण ‘एक बीनणी दो बीन’ श्रीलाल नथमल जोशी रै अनुवाद करियोड़ै उपन्यास नैं अजेस याद करूं। वां दिनां राजस्थानी रा पेपर दिया अर इनाम ई मिल्यौ। साथै वाळा छोरा ओलै-छानै अर कदैई साम्हीं ई कैया करता- ‘थन्नै तौ इनाम मिलणौ ई हो…’, अर वांरी मुळक हाल ई कदै-कदास चेतै आवै पण वांरा उणियारां नैं अबै बिसरग्यौ । इणनै इयां कैयौ जाय सकै कै अेक दुनिया रै भेळै अेक दूजी दुनिया म्हारै असवाड़ै-पसवाड़ै ही पण उण सूं म्हारी अजेस पूरी सैंध हुवणी बाकी ही।
लेखकां री दुनिया सूं म्हारी सीध सैंध कराण रौ जस म्हारै शंकर बाबोसा रा मोभी बेटा अर म्हारा मोटा भाई नंदलाल जी नैं जावै। कवितावां लिखणौ अर कवि कैवावणौ वांरौ कोड हौ। वां ‘बालराही’ नांव सूं अेक पत्रिका काढी। उण में म्हारी ई कोई कविता छापी ही, अै वै दिन हा जद श्यामलाल भाई जी रौ नांव फरमाइसी गाणां रै कार्यक्रम में रेडियो माथै गिरधर व्यास, चंचल हर्ष आद उद्घोषक बोल्या करता हा। पत्र-मित्र अर रेडियो री दुनिया सूं वांरौ सरोकार हौ। म्हैं किणी कविता पेटै आ नीं कैय सकूं कै आ म्हारी पैली कविता है…. अर अठै सूं आ जातरा चालू हुवै।
बाळपणै री म्हारी सगळी आडी-टेडी आंकी-बाकी ओळ्यां पैली तौ नंदलाल भाई जी फेल कर दिया करता अर पछै जीसा सूं इण पेटै बात करण री हिम्मत ई कोनीं हुया करती। आकाशवाणी रै युववाणी प्रोग्राम में पैली दफै जद कविता पाठ रौ बुलावौ आयौ तद सागी रिकोर्डिंग वाळै दिन जीसा कैयौ- ‘ला देखांण, देखां किसी कवितावां बांचसी?’ म्हैं कवितावां रा कागज दिया तौ देख्या अर दो-च्यार गळत्यां निकाळ दी ही। बोल्या- ‘अबार तौ धिक जासी। पण रसगुल्ला जी, कविता कांई हुवै पैली आ जांणकारी करौ।’
आ हळसी सी छींयां है जठै म्हारी लेखकीय दुनिया खातर इण ढाळै रा कीं संकेत पिछाण्या जाय सकै। अठै म्हैं खुद नैं लेखक समझण री भूल जद ई कोनीं करी अर अबै ई कोनीं कर सकूं। अेक लेखक अर इणनै उण दुनिया रै पळकै री चपेट में आवणौ ईज कैय सकां।
लेखक, अकादमी अर पुरस्कारां री जांणकारी खातर जीसा सांवर दइया री पोथी- ‘एक दुनिया म्हारी’ नै जस जावै। जद इण पोथी नै अकादेमी पुरस्कार मिल्यौ तद नागरी भंडार में जीसा रै अभिनंदन में नंदलाल भाई जी म्हनै ई लेयग्या। जायां ठाह लाग्यौ कै अैन मंच माथै अन्नाराम जी सुदामा हा जिका कदै कदास ई कार्यक्रमां में आया करै अर आज आया है। उण कार्यक्रम में कुण कांईं कैयौ माळावां री ओळूं तौ है पण म्हरै कानां में तौ डेलू जी गुरु जी रा सबद रेडियौ दांईं दूसर ‘दूर दिसावर’ री भूमिका सुणावै हा। आज रै दिन गुरुजी रा बोल भलांईं बिसरग्या हुवै पण वौ रस अर जायकौ तौ चेतै है।
लेखकां री दुनिया सूं जोड़ण में सूर्य प्रकाशन मंदिर रा बिस्सा जी नै जस जावै कै वांरी हेत-अपणायत रै पांण ई म्हनैं लागण लाग्यौ कै म्हैं काचौ-पाकौ कीं लेखक हूं। महाविद्यालय स्तर रौ भतमाल जोशी पुरस्कार अर अकादमी सूं जुड़ाव हुयां इण दिस कीं भरोसौ बंध्यौ। लघुकथा पोथी ‘भोर सूं आथण तांई’ प्रकाशित हुयां का पछै प्रांतीय युवा रचनाकार सम्मेलन करायां इण दुनिया रा कूड़-सांच समझ आवण लाग्या। लेखक नैं किणी री आंगळी पकड़नै नीं चालणौ चाइजै अर नीं किणी नैं चलावणो चाइजै। जीसा री आंगळी लेखक रै रूप में पकड़नै कीं आगै बधूं औ मौकौ बेमाता कोनीं दियौ अर कविता संग्रै ‘साख’ पेटै चावा-ठावा कवि मोहन आलोक री भोळावण सूं कविता रै मारग जातरा चालू तौ कर दी पण इण री मजल कठै? नेगचार रै मारफत काळा-गोरा इण दुनिया रा उजागर करियां अेक बात पक्की धार ली कै लेखक हुवण रौ अरथाव भासा अर साहित्य रौ सिपाही हुवणौ है।
कैवण नै तौ कैयौ जावै कै लेखक दुनिया रौ अंधारौ अळघौ करै पण खुद लेखकां री दुनिया मांय ई अंधारौ है। अंधारै री दुनिया सूं ऊजास री उम्मेद लगावण वाळा रौ भरोसौ बण्यौ राखणौ है।
इण अंधारी दुनिया में म्हारै खातर औ जरूरी कोनीं कै कोई म्हनै लेखक मानै के नीं मानै । म्हारै खातर औ जरूरी है कै म्हैं खुद नैं लेखक मानूं अर चावूं कै आखी दुनिया सबदां रै ऊजास सूं जगमगावै। खरोखरी बात तौ आ है कै इण अंधारै जे हीयै आंख री बात अंगेजां तौ लेखक हुवणौ हीयै आंख उपजावणौ है। अठै कीं चांनणै री उम्मेद है, इणी खातर म्हैं लेखक हूं।

-डॉ. नीरज दइया

Books Neeraj Daiya

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Posted on 24/11/2013, in आत्मकथ्य. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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