गांठ कोनी गंठजोड़ो है घुळगांठ

YugPaksha 26-11-2013

दैनिक युगपक्ष 26-11-2013

Dr. Daiyaभरत ओळा कहाणीकार रूप ओळखीजतो नांव है। कहाणीकार ‘जीव री जात’ अर ‘सेक्टर नं. 5’ पछै कथा-प्रयोग पेटै काम करण रो मानस बणायो। उपन्यास री बुणगट कहाणियां रै रूप रचणो राजस्थानी में नवी बात। इंडू चौधरी बनाम मनीषा मेघवाळ री कथा-योजना मांय लेखक मूळ मांय युवा-वर्ग री बदळती का बदळ्योड़ी मानसिकता नैं साम्हीं लावण रो सपनो देखै। घणी फूटरी बात कै इण कथा रै रचाव मांय मूळ-सुर नवी पीढी रै नवै बदळाव नैं भांडणो का सरावणो कोनी रैयो। आं बातां सूं लेखक हालत अर हालात रा संकेत देवै। कांई आ कथा इंडू चौधरी बनाम मनीषा मेघवाळ असल में परंपरा बनाम आधुनिकता री कथा है? विक्रम-बेताळ रै सुर कथा कैवणियो कहाणीकार भरत परंपरा नैं पोखतो-परोटतो नवी हवा रंगीज्या च्यार भाइला री टाळवी बातां मांडै।
चुनाव री रुणक, ताऊ री बेटी बैण रो ब्याव, जीसा भेळै भागौत बांचणो का सो-रूम मांय दुकानदारी रा गुर सीखण रो काम असल में आं च्यार भाइला रा न्यारा-न्यारा काम हुवता थकां ई अेक ओळी में कैवां तो आं रो घर-परिवार अर जिम्मेदारी सूं रैयो परंपरागत जुड़ाव है। बदळाव पछै ई आं भाइला मांय हाल कीं लूण-लखण बाकी है, जिण रै कारण आपरी दुनिया मांय सैर-सपाटा करणिया असल में घर सूं जुड़्या रैवै। घर सूं जुड़्या च्यारूं भाइला किणी छोरी नैं देख’र सपनो तो घर रो ई पाळ रैया है, पण इण मांय बगत मुजब आं री बदमासी कहाणीकार साम्हीं राखै। आं नैं जिकी खुल्ली छूट मिलगी है का आं ले ली है उण सूं आगै कांई हुय सकै ओ विचार पाठकां नैं करणो है। आ पाळ जे टूटण लागगी तो इण रो इलाज घर-परिवार अर समाज नैं बगतसर सोचणो है।
असल में मुकनै मेघवाळ नैं कहाणीकार रामेसर गोदारा कहाणी मांय लावै तद सूं कठै ई मनीषा मेघवाळ रो जलम हुवै। भरत ओळा ‘घुळगांठ’ सूं पैली इण कथा रो नांव ‘इंडू चौधरी बनाम मनीषा मेघवाळ’ थरप राख्यो हो, अर इण रा केई अंक पत्र-पत्रिकावां मांय प्रकाशित ई हुया। आपरै मूळ रचाव रूप सूं सजती-संवरती इण कथा रो रूपांतरण ‘घुळगांठ’ मांय हुवता-हुवता केई गांठां इण मांय रळगी। जातिवाद अर भगत सिंह भेळै भजन रै पाठ सूं मूळ पाठ मांय केई विषयांतर साफ देख्या जाय सकै। लेखक रै सपनै में जिको रचाव रो सपनो हो बो अबोट हो, अर उण मांय कठैई कोई मिलावट अर अकल बांटण री कोसिस कोनी ही। लेखकीय चतराई रै पाण संदर्भां नैं विस्तार देवण री बात सूं मोटै संदर्भ सूं जोड़ण रो सपनो मूळ कथा रै मरम नैं कमजोर कर देवै। इण सूं कहाणी रै प्रवाह मांय ई नुकसाण देख्यो जाय सकै… अेक नवजवानी री कथा मांय लेखक किणी बूढै-ठाड़ै समझदार मिनख रूप इतिहास अर दूजी बातां सूं बिचाळै ग्यान बांटण लागै। मूळ कथा रा लाजबाब अर बेजोड़ झीणा संकेत आपरो साच अर सीख लियोड़ा हा, बै इण ग्यान रै बोझै हेठै दबग्या।
गणित रो अेक सवाल है कै जे आपां पाखती कोई च्यार आंक है, तो उणा नैं चोबीस भात री विगत मांय जचा सकां। जे आ बात किणी च्यार नवजवानां रा नांव लेय’र सोची जावै, तो उण विगत में पैली-पछै रो हिसाब कियां कर सकां। च्यार नवजवान भाइला रा नांव कथित उपन्यास ‘घुळगांठ’ में है- इण्डू चौधरी, किसन मेघवंसी, पंकज भारद्वाज अर विपिन गुप्ता। भाइला इसा के अेकै दांतै रोटी टूटै। विचार करां- जे आं च्यारू भाइला सूं अेकठ का जुदा-जुदा मिलण रो संजोग सज जावै तो कांई सवाल करां? सवाल तो केई कर सकां, पण अेक माथै ई विचार करां। आप च्यारां रा नांव कठैई लिखणा हुवै तो पैली पंडत रो लिखा कै मेघवाळ भाई रो। जे हुकम करोला तो चौधरी रो सगळा सूं पैली अर किराड़ रो दूजै नंबर नांव लिखसां। पण ओ फगत हवाई सोच है। पोथी बांच्यां पछै म्हारो मानणो है कै आं च्यारू भाइला में किणी ढाळै पैली-पछै री कोई गांठ कोनी। बै च्यारू पक्का भाइला है, तो कैय सकां असल कोई गांठ है ई कोनी, गांठ कोनी गंठजोड़ो है ‘घुळगांठ’।
लोक मांय हरेक न्यारै न्यारै निजू ढंग-ढाळै सूं सोचण-समझण रो हक राखै। मिनख सोभा री बात कम, मतलब री बात बेसी सोचै-विचारै। आजादी रै इत्ता बरसां पछै ‘जात’ अर ‘धरम’ रै हिसाब सूं सोचणो सोभा नीं देवै। मानां कै अकारादि क्रम, जलम तारीख अर जात रै हिसाब सूं कोई विगत बणाई जाय सकै। बदळाव रा बीज बीजणिया गुरुजी हा जिका अबै मास्टरजी होयग्या, फेर ई बै मिनख-मिनख में फरक करण री ऊंधी पाटी कोनी पढावै। इण बाबत सरकारी कानून रै होवण नीं होवण सूं आगै री बात करां कै कोई लेखक जातीय-समीकरण री सूगली सोच कियां राख सकै है? असल में कहाणीकार भरत ओळा आपरी पोथी ‘घुळगांठ’ में इक्कीसवीं सदी रै कीं दरसावां नैं राखै, जिण में जातिय समन्वय अर युवा पीढी रो बदळतो सोच है, पण भूमिका लेखक मालचंद तिवाड़ी स्यात उण तांई पूगै कोनी। अर जे पूगै तो ई गळती सूं पूरी इण कथा नैं अेक सींव मांय बांध देवै।
फ्लैप अर भूमिका किणी पण पोथी नैं सींव में बांधै, अर केई बार तो किणी भूमिका-लेखक री निजरां सूं मरम ई बदळ जावै। भूमिका रै दरवाजै सूं पोथी बांचणियां मारग गळत ले लेवै। हरेक भूमिका-लेखक री आपरी निजू पसंद-नापसंद होवै, पण हरेक राग में पंचम सुर सोधणो ठीक कोनी हुया करै। किणी लेखक अर पाठक नैं किणी मोह मांय नीं बंधणो चाइजै। बात गळत दिसा में नीं जावै परी इण सारू इण नैं अठै बिसराम देय’र, भूमिका री बै ओळ्यां राखूं जिण सूं म्हारी राय जुदा है- ‘‘बरहाल, भरत आपरै उपन्यास ‘घुळगांठ’ में जाति रै सामूहिक मनोविज्ञान री बां ऊंडी जड़ां नै रोसनी दिखावण री खेचळ करी है, जिकी अेकदम अदीठ दीवळ री गळाई भारतीय समाज री पूरी मनोरचना में पसरती जाय रैयी है। संचार प्रोद्योगिकी अर वैस्वीकरण जेड़ा मौजूदा कारकां अर आधुनिकता री लांबी जातरा रै उपरांत इयां लागै जाणै भारतीय समाज बजाय अेक ‘साठा सो पाठा’ आळै परिपक्व लोकतंत्र रै आंतरिक सून्य रौ सिकार हुंवतां-हुंवतां अेक सफां-सफां आत्महीन अर असुरक्षित समाज में बदळग्यौ है।’’ (घुळगांठ : समाजू पीड़ रौ अेक औपन्यासिक उपचार, भूमिका : पेज 7-8)
पैली बात तो किणी पण जात (जाति) रै अेकठ मनोविज्ञान री बात घुळगांठ समाजू पीड़ रै इलाज (उपचार) रूप कोनी राखै। दूजी बात कै घुळगांठ आपरै किणी संकेत में समस्यामूलक रचना है ई कोनी। इण में जे किणी पण जात री बात करां तो बा है- नवी-नवी जवानी रै जोस चढिया बां कपूतां का कैवां सपूतां री रै लूण-लखण री बात, जिण में जूनी जात बस निसाण रूप मौजूद है। लेखक भरत ओळा आ दरसावै पण बै बेली आप-आपरी हूंस में, उण जूनी-जात नैं बिसराय’र किणी अदीठ गंठजोड़ै सूं जाणै बंधियोड़ा है। फेरां री टैम तो फगत सात कौल करीजै, पण मन रा अै मीत अणगिणती रै कोलां सूं जुड़्योड़ा है। लेखक भरत ओळा री आंगळी डोफाचूक होयोड़ा च्यार भायला- इण्डू चौधरी, किसन मेघवंसी, पंकज भारद्वाज अर विपिन गुप्ता ठेठ तांई कोनी छोड़ै, का इयां कैवां कै लेखक आं नैं मरजी मुजब ठेठ तांई नाच नचावै। आं रो ओ नाचणो मनीषा मेघवाळ जैड़ी पदमणी खातर है। मनीषा री फेट में आयां आं च्यार दीवाना री दीठ जाणै बंध जावै। ओ तो चोखो होवै कै अैदीदा फाडऩा बंद कर’र फगत मनीषा री ध्यावना-चावना करै। आ नवी पीढी री आंधी कामुकता है, जिण सूं बै ‘झट-फाउल’ सरीखी हीण बात तांई पूगै।
घाव भरीजग्यो अर खरूंट आय’र बो साफ हुयग्यो। बस जरा सो निसान बाकी है, अर बो कदै-कदासा होळी-दीयाळी दीस जावैै। इण नैं पाछी ऊंडी जड़ा जाय’र जगावण रो सांवठो संकेत भूमिका-लेखक करै। ओ निजू है- सोच कै जात री अदीठ दीवळ भारतीय समाज री पूरी मनोरचना में पसरती जाय रैयी है। मूळ मांय च्यार भाइलां री च्यार सरभरी कहाणियां घुळगांठ री बुणगट है। आ सोची-समझी कहाणी लेखक भरत ओळा प्रयोग रूप लिखी है।
असल में घुळगांठ जिण खेल सूं चालू होवै उणी ढाळै सेवट आखड़’र जाणै सेवट धूड़ झाड़ता अै बोल निसरै- ‘‘इयां तो आपां कीं माथै ई ब्लेम लगा सकां हां।….किणी रो कोई मुकाबलो थोड़ी ई है।’’ इणी मारमिक ओळी रै सार मांय पूरो होवै घुळगांठ। आ बात साव साची है- ओ आत्महीन अर असुरक्षित समाज है, पण इण रो कारण जात-पांत नैं नीं मानता थकां युवावां री गळत आदतां नैं मान्यो जावणो चाइजै। आज आपां देखां कै आं नैं लूण-लखण देवण मांय कठै कमी रैय जावै, जिण सूं आ नवी पीढी इण ढाळै री प्रीत री घुळगांठ खेल रूप लेय बैठै। घुळगांठ रै पाठ री आ खासियत है कै ओ ग्यारा कहाणियां रै पाठ रूप कीं कमियां नैं टाळ देवां तो पठनीय रचना रूप घणो सरावणजोग है।
तीन भाइल्यां- प्रतिभा अग्रवाल, प्रीति आडवाणी अर मनीषा मेघवाळ अर च्यार भायला- इण्डू चौधरी, किसन मेघवंसी, पंकज भारद्वाज अर विपिन गुप्ता री सींव मांय रचीजी घुळगांठ-कथा मांय भाषण, कविता अर गीत रो पूरो पूरो पाठ देवणो इण नैं कमजोर करै। कांई युवा पीढी रै हुवतै नैतिक पतन नैं दरसाण खातर भरत ओळा सामाजिक सद्भाव रै नांव माथै च्यार जणा नैं छांट’र माडाणी भाइला बणा दिया है? कांई इण रचाव सूं ओ सवाल आपां साम्हीं राखणो चावै कै इण हुवण वाळै बदळाव मांय दोस किण रो- परंपरा का आधुनिकता रो? घुळगांठ असल मांय नवजवानां रै खूटतै लूण-लखण रै री घंटी बाजावै। अलाराम बाजै जियां बगतसर बोलती आ रचना बगत रैवतां सावचेत करण री रचना है। लेखक री आ जोरदार दमदार कोसिस है, सो इण नैं गांठ रूप नीं गंठजोड़ै रूप संबंधां नैं बणावण अर निभावण री जसजोग कथा रूप जाणाला।

ghulaganth

घुळगांठ / भरत ओळा / उपन्‍यास / 2009 / मूल्य 125 रूपये / पृष्ठ :- 112 / आई एस बी एन :- 978-81-905208-9-8 / प्रकाशक :- एकता प्रकाशन, चूरू-331001

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Posted on 24/11/2013, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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