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समाज का अक्स : च्यानण पख

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा का राजस्थानी कहानी संग्रह
Coverराजस्थानी भाषा के युवा कहानीकार मदनगोपाल लढ़ा के प्रथम कहानी-संकलन “च्यानण पख” में वर्तमान समय और समाज के अक्स को प्रस्तुत करती सत्रह कहानियां संकलित है। डायरी शैली में लिखी शीर्षक-कहानी “च्यानण पख” यानी शुक्ल-पक्ष एक ऐसी लड़की की कहानी है जो समय के साथ समझवान होती जैसे स्त्री-विमर्श को नई राह प्रदान करती है। कहानी अपनी शैल्पिक नवीनता के साथ-साथ अति-आत्मियता व निजता से लबरेज भाषा-शैली के कारण जैसे सम्मोहन का जादू बिखेरती पंक्ति-दर-पंक्ति आगे बढ़ती हुई अपने पाठकों को बांधने में सक्षम है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह पाठ अपनी आधुनिकता, परिवेशगत नवीनता के कारण भी ध्यानाकर्षित करता है, और इसे अत्याधुनिक तकनीकों से सज्जित स्वतंत्रता के मार्ग अग्रसर होती स्वाभिमानी नवयुवतियों के बौद्धिक-विकास और विश्वास के रूप में भी पढ़ा-देखा जा सकता है।

मदन गोपाल लढ़ा की इन कहानियों में राजस्थानी जन-जीवन के उन छोटे-छोटे पक्षों को प्रमाणिकता से उभारने का प्रयास किया गया है, जिन से हम रोजमर्रा की दिनचर्या में अपने घर-परिवार और आस-पास के जीवन में सामना करते हैं। यहां कहानीकार का एक रचनाकर के रूप में लेखकीय-संत्रास है तो वहीं सामाजिक अंधविश्वासों और रूढियों के प्रति टूटता मोह भी। घर, परिवार और समाज के अनेकानेक छोटे-बड़े घटना-प्रसंगों को कहानीकार के रूप में सुनाने के स्थान पर उन अनुभवों को भाषा से संजीवनी प्रदान कर जीवित करने का कौशल प्रभावित करता है। सभी स्थितियों में कहानीकार प्रश्नाकुलता के साथ बिना कोई हल सुझाए अपने अनुभव और चिंतन को जस-का-तस प्रस्तुत करने की निसंग्ता-निश्चलता का भाव अर्जित करने में सफल रहा है।

संग्रह की कुछ कहानियों में नवीन प्रयोग भी किए गए हैं। यहां कहानी में उपशीर्षकों के अंतर्गत कोलाज द्वारा रची कहानियों में “आरती प्रियदर्शिनी री गली” और “उदासी रो कोई रंग कोनी हुवै” विशेष उल्लेखनीन है। कहानियों में प्रस्तुत अनुभवजन्य घटनाक्रम के अतिरिक्त लेखकीय कौशल यह भी है कि जिस किसी घटना-प्रसंग को कहानीकार ने लिया है वह अपनी चित्रात्मक-बिम्बात्मक भाषा द्वारा मर्मस्पर्शी बन पड़ा है। इन कहानियों में विभिन्न कला माध्यमों यथा- चित्रकला, संगीत आदि से जुड़ी स्थानीयता और सर्वकालिकता भी उल्लेखनीय है। आकर्षक आवरण और सुंदर मुद्रण से सज्जित इस पुस्तक द्वारा समकालीन राजस्थानी युवा कहानी जैसे अपने शुक्ल-पक्ष में प्रवेश कर रही है।

– नीरज दइयाDr.+Madan+Ladha+Book

जोखम रै ऐन बिचाळै

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एक टीप म्हारी ई
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***************जोखम रै ऐन बिचाळै*****************

भारतीय कवितावां पेटै राजस्थानी मांय कई-कई भाषावां रै कवियां रा कविता-संग्रै आगूंच आपां सामी आया। घणासक साहित्य अकादेमी रै मारफत पण सगळी भाषावां रै कवियां री न्यारी न्यारी पीढियां री कवितावां एकठ हाल तांईं सामीं कोनी आई। इणी काम नै सबद-नाद मांय आपरै सामीं बानगी रूप राखता घणो हरख हुवै। म्हैं ओ संचै अनुसिरजण पेटै दस-बारै बरसां पैली करियो। उण बगत म्हारै सामीं भारतीय कविता नै उण रै न्यारै-न्यारै रंगां मांय देखण री बात नीं ही। असल मांय ओ काम म्हैं म्हारी पीढी री कविता री साख दरसावण पेटै करियो।
राजस्थानी कविता री विकास जातरा मांय म्हारी पीढी री कवितावां रो न्यारो रुतबो है। आं मांय जद जूनै छंदां रा पारखी वयण सगाई अलकांर अर काव्य शास्त्र रा दूजा गुण सोधणा चावै तो बां नै हरख कोनी हुवै। राजस्थानी कविता री आपरी एक पूरी परंपरा रैयी है, जिण मांय म्हारो मानणो है कै आधुनिक कविता अर खासकर नै युवा कविता पेटै सरावणाजोग काम हुयो है अनै हुय रैयो है। अठै री कवितावां मांय इण जमीं रै साथै-साथै आखै मुलक अर मिनखाजूण रा रंग ई देख्या जाय सकै, पण जद म्हैं खुद एक कवि रै रूप मांय कलम सूं रिस्तो जोडिय़ो तद नूंवी कविता अर खास कर नै म्हारी पीढ़ी री कवितावां नै लेय’र कई मानीता लेखक-कवि दब्यै सुर में परख पेटै समकालीन भारतीय भाषावां सूं राजस्थानी कविता खातर जिकी बात कैया करता, बा म्हनै दाय कोनी आवती। म्हनै म्हारी खुद री अर म्हारै सायना री कविता माथै गुमेज भलाई ना हुवो पण इण बात खातर कै म्हैं अर म्हारी पीढ़ी, कविता मांय पूरी-पूरी ईमानदारी बरत रैयी ही आ जाण’र कदैई-कदैई जबाब देवण रो मन करतो।
परख कोई पण किणी री ई कर सकै पण उण मांय कीं जरूरी बातां देखी जावणी चाइजै। जियां कै आपां राजस्थानी कविता री बात अठै रै माहोल, पत्र-पत्रिकावां, मांग अर आपसी संवाद आद री जाणकारी ई पैली करां अर पछै कविता रै विकास नै फळावां। कवियां-लेखकां री आप आपरी लिखण-बांचण री सींव हुवै। भारतीय अर विश्व सहित्य मांय किणी रचना नै ऊभी करण खातर आपां नै समूळै साहित्य माथै आपां री नजर पूरी नीं कर सकां तो सरसरी जाणकारी ई कर कीं तो रचनावां देखी ई जावणी चाइजै। अखबाई जद आवै कै आप नै विगतवार भाषावां रै नांवां री ई जाणकारी कोनी हुवै, अर आपां बात भारतीय कविता सूं तुलना री करण लागा। अठै री कविता मांय छंद अर मुगत छंद दोवां री परंपरा रैयी है। हरेक भाषा री आपरी कीं कमी-बेसी हुया ई करै। पण पैली आपां नै खुद रो घर देखणो चाइजै अर पछै किणी गवाड़ी का गांव सूं होड करणी चाइजै। बियां किणी पण रचना मांय अगाड़ी-पिछाड़ी री बात ई मूळ मांय गळत हुया करै। क्यूं कै हरेक रचना जरूरी कोनी कै आपरी दीठ मांय जिको फार्मूलो का आपरी जिकी आंख री पसंद है, उण मांय पूरी दीस जावै का खरी ई साबित हुवै। जे कोई युवा कवि आज मानीता कवि गणेशीलाल व्यास उस्ताद, कन्हैयालाल सेठिया, मोहन आलोक का सांवर दइया दांई रचना करैला तो म्हारो मानणो है कै बां री खुद री कवितावां आपां पाखती आगूंच है नीं ! फेर दूसर बिसी लिखण सूं कांई फायदो ? इण मुजब कैयो जाय सकै कै हरेक कवि री आप-आपरी लकब हुया करै।
म्हारी पीड़ ही कै बां आपरी जाणकारी मुजब ई आधुनिक राजस्थानी कविता नै दब्यै सुर मांय का साफ सुर मांय खंखारो कर’र लारै हुवण री तोहमत लगाई तद म्हैं उण बगत म्हैं कई कवितावां भारतीय भाषावां सूं अनुसिरजित राजस्थानी मांय करी। भारतीय भाषावां री कवितावां छुट-पुट राजस्थानी पत्र-पत्रिकावां मांय ई छपती रैयी है अर राजस्थानी कहाणी रै सीगै भारतीय भाषावां सूं कहाणियां रो अनुसिरजण पत्रिकावां रै विशेषांक अर पोथी रूप ई आपां सामीं आय चुक्या है। साथै ई कई कई कवियां रा पूरा काव्य-संकलन ई राजस्थानी मांय छप्या है।
साहित्य अकादेमी रो आपानै घणो घणो आभार मानणो चाइजै कै अकादेमी आपरी योजनावां मांय बळ पड़ता कई सांठा काज साध्या है अर राजस्थानी पाठकां नै भारतीय कविता सूं ओळखाण करावण रै इणी जतन पेटै ओ काव्य संकलन आपरै सामीं है। इण संकलन मांय भारत रै संविधान में सामिल भाषावां रै भेळै अंग्रेजी अर राजस्थानी नै मिला’र चोबीस कवि आपरै सामीं है। चोबीसवै कवि रै रूप में चंद्रप्रकास देवल री एक राजस्थानी कविता बानगी रूप बां रै अनुवाद रै सीगै लूंठै काम नै निवण करता थकां सामिल करीजी है।
इण पोथी बाबत अठै कीं बात आपरै सामीं राखणी चावूं- इण ढाळै रै काव्य-संकलन री एक लांठी योजना दस-बारै बरसां पैली किणी दिन संपूरण हुई ही। फगत हवाई योजना कोनी ही जद संविधान मांय 19 भारतीय भाषावां ही, 20 वीं अंग्रेजी अर 21 वीं आपणी राजस्थानी सो देसूंटो काविता-संग्रै रै परिचै लिखण छपण तांई 21 भारतीय भाषावां रै 150 सूं बेसी प्रतिनिधि कवियां री रचनावां रो संचयन, संपादन अर राजस्थानी अनुवाद सबद नाद रै रूप मांय छपण री उडीक मांय उडीकतो ई रैयो अर पछै तो जूण रा कई आंटा रै कारणै ओ काम सुपनो ई बणग्यो। भाग रै पलटी खायां बोधि प्रकाशन कानी सूं अनुवाद री पोथी बाबत एक अपणायत भरियो हेलो सुणीज्यो, अर खास बात कै फगत सौ रुपिया मांय दस पोथ्यां री जगत-चावी योजना रा करता-धरता भाई श्री मायामृग अनुवाद रै सीगै कोई इण ढाळै री पोथी योजना मांय राजस्थानी सेट खातर पोथी चावै हा, अर आदरजोग कवि श्री मोहन आलोक अर भाई प्रमोद कुमार शर्मा इण बाबत भरोसो नै परियारो करा दियो। राजस्थानी पोथ्यां रा संयोजक संपादक मानीता कवि श्री ओम पुरोहित ‘कागद’ ई तदादा करण लाग्या तद बां पांडुलिपि जोय नै काढ़ तो ली पण कई अखबायां ही। भाषावां नै मान्यता मिलती गई अर राजस्थानी हाल मूढ़ो बायां ऊभी है, 19 री भाषावां गिणती 21 पूगगी तो आज छपण मांय 24 भाषावां री रचनावां रैवणी चाइजै। कविता री पोथी अर बा ही अनुवाद सो बेजा मोटी छपण री अखबायां नै विचारता हरेक भाषा सूं एक कवि ही लियो जा सकै अर इण रूप ही आ पोथी छप सकै ही। अखबाई नै जोखम ओ कै 150 मांय सूं किण नै टाळा अर किण नै भेळा ? नूवीं भाषावां जिण नै राज री मानता मिलगी सूं किण कवि नै सबद नाद मांय सामिल करां ? जे किणी कवि नै सीधो सामिल करणो हुवै तो इत्ती अखबाई कोनी, जियां कै संथाली री बात करां तो कवयित्री निर्मला पुतुल रो नांव म्हनै चेतै आयो पण कवि आदित्य कुमार मांडी री कवितावां सूं ई म्हारो परिचै हो सो मांडी री कवितावां सामिल करी। संथाली भारत री बीजी भाषावां करता कम रचनाकारां री भाषा है, राजस्थानी मांय ई काम संथाली करता घणो-घणो हुय है अर हुय रयो है।
पैली बात- अठै किणी कवि नै इण संकलन मांय लेवण का नीं लेवण रो कारण किणी री काव्य-जातरा अर भरतीय कविता मांय उणा री ठौड़ अर ओळख आधार कोनी, अठै संचै मांय म्हारी खुद री पसंद अर उण कवि री मंजूरी राजस्थानी अनुसिरजण पेटै आधार रैयो है। अठै ओ दावो ई कोनी कै म्हारी आ अर भारतीय कविता पेटै म्हारी जाणकारी साव खरी अर पूरी है, बस इत्तो कैयो जाय सकै कै भारतीय कविता मांय जिका मोती म्हनै मिल्या का जिणा नै म्हैं मूंधा मोती मान्या बां नै भेळा करतो गयो, बीं टैम अर आज रै टैम मांय बारा-तेरा बरसां रो आंतरो तो सांपरतै ई दीसै, सो किणी ढालै री कमी-बेसी कठैई लाजमी है। जे म्हैं इण कमी-बेसी बाबत कीं बात करूं तो म्हारै पख मांय बस इत्तो ई कै हिंदी राजस्थानी री करीबी भाषा है, हिंदी कविता पेटै बीजी भाषावां करता जाणकारी कीं बेसी है, तो म्हारै सामीं ई नीं किणी पण अनुवाद सामीं मोटो नै जोखम भरियोड़ो ओ सवाल हो सकै कै कवि श्री गिरधर राठी री कवितावां लेवण रो कांई आधार है ? कविता मांय बिंयां तो कोई कवि किणी सूं छोटो-मोटो कोनी हुवै पण गिरधर राठी खुद कवि आलोचक नै जे कोई भारत री हिंदी कविता पेटै इणी ढाळै रो सवाल करैला तो म्हनै पतियारो है कै बां नै ई एकर अखबाई आवैला, कै हिंदी रै किण कवि री कवितावां रो अनुसिरजण राजस्थानी रै इण ढाळै रै संकलन मांय लिया ओपती बात हुवैला। जे फैसलो ई करणो हुवै तो खुद गिरधर राठी आपरी कवितावां ढाळ किणी बीजै कवि रो नांव ई सुझाव रूप बता ई सकै, पण कांई बो नांव ई सगळा नै मान्य हुय जावैला। म्हारो अरथ ओ है कै जे बिरमा जी ई आय’र किणी एक कवि रो नांव बता जावै तो ई सगळा उण माथै एक राय कोनी हुवैला। कविता एक राय हुवण रो मसलो ई कोनी। कई कई राय ई इण दीठाव नै पूरो दीठाव बणावैला। आ बात घणी घणी जरूरी है। जद श्री गिरधर राठी समकालीन भारतीय साहित्य रा संपादक हा तद जोधपुर मांय कवि-कथाकार मानीता श्री मीठेस निरमोही एक लांठै आयोजन राजस्थानी कहाणी माथै करायो हो अर म्हारी राठी जी सूं मुलाकत बठै ई हुई, इण सूं पैलां आपसरी मांय कागदां सूं कई बात हुय चुकी ही। बां दिनां बठै ई भाई नवनीत पाण्डे एक लांबी बंतळ ई श्री गिरधर राठी जी सूं मधुमती खातर करी ही। बो एक म्हारै युवा-कवि मन रै समझण अर कीं सीखण-बांचण रो दौर हो, समकालीन भारतीय साहित्य खातर कई राजस्थानी कवियां रा म्हारै करियोड़ा उल्था हिंदी मांय बीं बरसां प्रकासित हुया। पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम रो ई एक नसो हुयो अर बीं बरसां रै काम मांय भारतीय ज्ञानपीठ सूं पुरस्क्रत कविता पोथी कागद अर कैनवास ई बरस 2000 मांय छ्पण रो जोग संध्यो। कविता-संग्रै देसूंटो अर कागद अर कैनवास रै छपण-लिखण री ई एक लांबी काहाणी है। श्री सांवर दइया जयंती बरस 2000 रै दिन आं पोथ्या भेळै इज्जत मांय इजाफो (श्री बुलाकी शर्मा) री पोथी रो ई लोकार्पण समारोह हुयो, बो आज याद करू तद मन भरीज जावै। पोथी कागद अर कैनवास रो लोकार्पण मानीता कवि श्री मोहन आलोक रै हाथं कवि हरीश भादाणी अर कथाकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ री साख मांय हुयो। अबै बै दिन कठै ?
पूरी लांबी कहाणी है अनुवाद री अर बेजोड़ कवयित्री अमृता जी अर इमरोज जी सूं मिलण, बोलण-बतळावण री, बा फेर कदैई अठै तो आ बात पुखता रूप मांय कैवण री हिम्मत कर रैयो हूं कै बगत जावै परो अर बाताम रैय जावै। जावतै बगत नै एक ओळूं मांय बस घरियो ई जाय सकै कै बगत आयां उण री आपां हर कर लेवां। हां तो बां तूफानी योजना हरेक भाषा रै सात कवियां नै लेवण री ही अर जद हरेक भाषा सूं सात कवियां रो संजोग नीं बैठियो तद कमी-बेसी कर’र 150 कवियां री कवितावां लीवी, जिण मांय किणी कवि री एक तो किणी कवि री एक सूं बेसी कवितावां लेय’र पोथो बणा लियो जिको एक जोसीलो काम हो अर आपाणै अठै रै प्रकासनां अर प्रकासकां भेळै बिक्री नै विचारतां पार कोनी पड़णो हो।
अबै नूंवै ढंग सूं उण माथै विचार कर’र ओ संकलन आपरै सामीं है। हां तो पंजाबी मांय म्हारै करियोड़ै कागद अर कैनवास नै विचारतां थकां कवि मित्र श्री रामसिंह चाहल री कवितावां ली है। कवि चाहल जी सूं ई खूब काम करियो अर खूब काम करणो चवतां हा, पण काळ बांनै बगत ई कोनी दियो। म्हैं आज बां रै काम नै अर बांरी ओळूं नै नमण करतो खुलासो करणो चावूंला कै रामसिंह चाहल जी पंजाबी मांय इणी ढाळै ई योजना पेटै खासो काम करियो हो। भारत री सगळी भाषावां मांय एकौ इण अनुवाद सूं ई होय सकै जिण री घणी दरकार ई है। भारत मांय मिलै सुर मेरा तुम्हाराज् रो गीत इण कविता संकलन मांय न्यारी न्यारी भाषावां री कवितावां साथै जाणै कैवती हुवै- मिलै सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा ज्ज्। तो सा अठै ओ जतन कै आपां नै आपांरै सुर री ओळख जे इण भारतीय कविता रूप मांय हुवै का इण मिस ई हुवै तो आ कोसिस सफळ मानीजैला।
भारतीय कविता रै लांठै दीठाव रै सामीं अंत-पंत ओ सगळो काम राजस्थानी री साख मांय एक चिमठी’क हांती बरोबर ई’ज है, पण ओ काज लगोलग आगै बधैला। छेकड़ मांय बस इत्तो ई’ज कै इण पूरै भारतीय कविता पसराव का कैवां दीठाव मांय जे राजस्थानी कविता री कीरत बाबत किणी ढाळै री चरचा, विचार का कोई फैसलो करणो है तो बो आपां नै ई करणो है।
इण बानगी मांय आप मूल रूप सूं मिनखपणै री अवळांया, अबखायां, हरख साथै जीवण खातर मानखै री जूझ देख सकां। भारत रो मानवी किणी एक सूत्र मांय गुंथीजतो थको एक है। अलायदी भाषा कै देस रै किणी शहर-गांव मांय बसणियां रो मन अपसरी मांय एक है। आपरै दुख-दरद अर तकलीफ मांय हकां खातर जूण जूझती दीसै तो हेत-प्रीत मान-मनवार मांय जिको सुख अर सौरप है उण रो बखाण एक है।
इण संचै मांय कई कई कमियां रै अलावा जो कीं गुण है बै आपरा अर संकलित रचनाकारां रा। आप आगूंच जाणो कै इण ढाळै रो काम री आपरी एक सींव हुया करै। किणी रचनाकार नै सामिल करणो म्हारी खुद री पसंद अर सहुलियत साथै हुयो है। इण मांय किणी नै छोटो का मोटो दरसावण री मंशा दर ई कोनी रैयी। ओ काम एक दिसा मांय एक जातरा री फगत रवानगी है। इण मारग मांय बीजा रचनाकार आवैला अर इण ढाळै रै कई कई संचै सामीं आयां ई भारतीय कविता री खरी खरी ओळखाण आपां कर सकालां। इण संचै री खरा पारखी आप इण बात आपरा विचार लिखोला तो आगै रै काम नै दिसा मिलैला।

नीरज दइया सूरतगढ
26 मई, 2011