Monthly Archives: दिसम्बर 2015

आलोचना विधा नै नूंवां रंग

पोथी-परख / मदन गोपाल लढ़ा
पोथी : आलोचना रै आंगणै, लेखक : नीरज दइया, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,
बरस : 2011 मोल : एक सौ पचास रीपिया

आलोचना री सबळी ओळखाण

साहित्य री सत्ता पाठक में हुया करै। भलांई कोई तुलसीदास जी दांई ‘स्वांत सुखाय’ कलम चलांवतों हुवै पण रचाव रा सांचा रंग तो पाठक देवता रै समरपण में ई राचै। छेकड़ लिखारै रा सगळा कळाप पाठक सारू ई तो होया करै। रचना री पुड़तां खोल‘र पाठक नै उणरी न्यारी-न्यारी अरथ-छिब सूं ओळखाण करावणै रो जिम्मो आलोचना रो। आलोचना असल में रचना री हिमायत हुवै। आलोचना री ताकड़ी तुल्यां ई काची-पाकी रचना री पिछाण हुवै अर उण विधा री परम्परा में किणीं रचनाकार रो अवदान ई कूंतीजै। कैवण रो मतळब आलोचना साहित्य री घणी जरूरी विधा है जिणरो बिगसाव किणीं भाषा रै साहित्य रै सबळाई सारू महताऊ भूमिका निभावै।
आज री आलोचना रो विधागत रूप तो घणो जूनो कोनी पण आलोचनात्मक दीठ रा अैनाण आपांनै केई रूपां में आदिकाल सूं ई देखण नै मिलै। मायड़ भाषा में आलोचना विधा पेटै डॉ. अर्जुन देव चारण, कुन्दन माली, बी.एल.माली ‘अशांत’, नन्द भारद्वाज, डॉ. किरण नाहटा, डॉ. मदन सैनी आद उल्लेखजोग काम करियो है। भळै ई राजस्थानी में आलोचना री गत माड़ी ई कथीजै। इणरो मूळ कारण उण मानसिकता में सोध सकां जिण में आपां खरी बात कैवणो चावां, नीं सुणनो। रचना री आलोचना नै आपां अमूमन व्यक्तिगत ले बैठां अर अठै आवता ई रचनात्मक आलोचना खूंटी टंगजै। आलोचना नै सांचै अरथां में साधणो खांडै री धार माथै चालणै बरोबर है। फगत माळी-पाना बांट्यां का पखापखी सूं आलोचना री आब मोळी पड़ जावै। राजस्थानी आलोचना ई आ संकटां सूं घिर्योड़ी दीसै।
डॉ. नीरज दइया री पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ इण विधा रै आंगणै पसरियोड़ी धंवर नै छांटण पेटै महताऊ पांवडो मानीज सकै। कविता, अनुवाद अर संपादन सागै पत्र-पत्रिकावां में आपरै आलोचनात्मक लेखण सूं राजस्थानी जगत में नाम कमावणियां दइया री डेढ़ सौ पानां री आ पोथी अेक माटी कमी नै पूरै। अठारै अध्यायां में न्यारी-न्यारी विधावां री फिरोळ सागै इण पोथी में आलोचना री आंख री केई भंगिमावां पड़तख हुवै। इण पोथी में नीं तो बेमतळब रो बिड़द बखाण है अर नीं धिंगाणै किणीं नै खारिज करणै री (कु) चेष्टा। आं दोनूं ई कमियां सूं अेक हद तांई बच‘र दइया राजस्थानी रै आधुनिक साहित्य नै स्वस्थ आलोचनात्मक दीठ सूं जांचण-परखण रो जस-जोग काम करियो है जको बां‘रै विस्तृत अध्ययन अर ऊंडी समझ री साख भरै। ‘आलोचना रै आंगणै’ इण कारण ई इण विधा री महताऊ पोथी गिणीजैला क्यूंकै इणरी मारफत पैली वळां विधावार लिखारां अर रचनावां रै नांव गिणावण री लीक सूं आगै बध‘र परम्परा रै उजास में विषय-वस्तु अर प्रवृतियां माथै बात करीजी है। इण पोथी में आलोचक केई अेड़ै लिखारां रै अवदान री कूंत री आफळ ई करी है जका साहित्य साधना में तो जूण खपा दी पण खेमेबंद आलोचना री बंधी-बंधाई सींव रै कारण अजैं लग ‘अननोटिस्ड‘ रैया।
पोथी रै आलेखां माथै बांत करां तो पेलै आलेख ‘आधुनिक कविता रा साठ बरस’ में राजस्थानी री आधुनिक कविता जातरा री तीन बीसी लाम्बी जातरा रो दीठाव देख्यो जा सकै। इण आलेख में आलोचना विधा में नूंवों प्रयोग करतां लिखारै आपरी दीठ मुजब ‘नुंवी कविता रा टोप-टेन’ कवियां माथै ई टीप मांडी है। राजस्थानी खातर आ नुवादी बात हुय सकै पण मराठी अर दिखणादै भारत री भाषावां में अैड़ी परम्परा रैयी है। इण सूची सूं आपां सहमत हुवां चावै नीं, पण इणमें दोराय कोनी कै आप-आपरै कांटा-बाट सूं कविता नै इण ढाळै जोखणो रोचक अवस हुवै। जे म्हैं म्हारै मनग्यान ‘टोप-टेन’ सूची बणावूं तो दस में सूं सात-आठ नांव सागी ई हुवैला। दइया री सूची रो आधार कथ्य अर षिल्प है, मोटो नांव, पुरस्कार का पोथ्यां री गिणती कोनी। दो-दो ओळी रै दूहा रा कवि बिहारी री कीरत फगत अेक पोथी (सतसई) रै पाण कोनी के ? इण आलेख में ठौड़-ठौड़ कवि री मौलिक दीठ पळका मारै। बानगी-‘बाळसाद’ (1968) आधुनिक राजस्थानी कविता री पैलड़ी पांत री पोथी है। अठै आपां बिरकाळी जी री दीठ अर कविता नै लेय‘र वां‘री अप्रोच में साव नुंवो रूप देख सकां।’ (पृ. 9)
‘आधुनिक कहाणीः शिल्प अर संवेदना’ आलेख में आधुनिक कहाणी री बीसवीं सदी सूं इक्कीसवै सइकै री जातरा री रंग-रूप, आकार-प्रकार, भाषा-षिल्प अर संवेदना रै हिंसाब सूं परख करीजी है। बरस 1955 सूं अजैं तांई री कथा जातरा नै च्यार टुकड़ा में दरसांवता आलोचक नामी लिखारां री दीठ रै समचै आपरी टीप मांडी है। ‘कोटेशन’ रै सायरै आगै बधतै इण आलेख में कहाणियां री ओळ्यां रै दाखलै सागै कथा विधा रो तुलनात्मक अध्ययन बांचण नै मिलै। ‘लघुकथा री विकास जातरा’ आलेख में दइया लघुकथा री विधागत विषेषतावां री पड़ताल सागै इणरी विकास जातरा नै पारखी दीठ सूं अंवेरी है। इण आलेख में केई ठौड़ व्यंग्य रो झीणों सुर इणरी भाषा नै नूवीं ओपमा देवै। मसलन – ‘जे इण संग्रै री रचनावां आवतै बगत में लघुकथावां गिणीजी तो लघुकथा इतियास री सबसूं छोटी रचना लिखण रो जस लेखक नै मिलैला।’ (पृ.64)
`राजस्थानी साहित्य रै गाखै सूं लारला दस बरस’ आलेख में इक्कीसवीं सदी रै पेलै दषक रै साहित्य रो लेखो-जोखो साम्हीं आवै। जे आपां फगत लिखारां अर पोथ्यां री सूची ई जोवणी चावां तो ओ आलेख बांच‘र निराष हुवणो लाजमी है पण इणमें दस बरसां री जातरा री मारफत राजस्थानी साहित्य री दषा अर दिषा रो मोटो-मोटो खाको अवस देख्यो जा सकै। ‘नामी कवि री नामी कहाणियां’ आलेख चावा कवि मोहन आलोक रै कथा-संसार री सांतरी ओळखाण करावै। ‘कुंभीपाक’, बुद्धिजीवी’ अर ‘उडीक’ जैड़ी सांवठी कथावां रा लिखारा मोहन आलोक रै कथाकार रूप रो अजैं लग दीठाव सूं बारै रैवणो आलोचना रै सांम्ही सवाळ खड़्यो करै। ‘मोहन आलोक री कहाणियां‘ पोथी आयां पछै तो कहाणी रै इतिहास अर आलोचना में सुधार री जरूरत पण लखावै। इण आलेख में आपां भळै दइया री स्पष्ट सोच सूं अरूं-भरूं हुवां- ‘बिना किणीं लाग-लपेट रै अठै लिखतां म्हनै संको कोनी कै आधुनिक कहाणीं री सरुआत विजयदान देथा सूं नीं कर परा आपां नै नृसिंह राजपुराहित सूं करणी चाइजै। क्यूंकै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंह राजपुरोहित ई गिणीजैला।’(पृ.49)
‘नारी री ओळख नै आथड़ता आखर’ आलेख में चावा लिखारा यादवेन्द्र षर्मा ‘चन्द्र’ रै राजस्थानी उपन्यासां रै कथ्य अर शिल्प री परख करीजी है तो ’बा जीवैला अर धाड़फाड़ जीवैला‘ में चंद्र जी रै कथा-संसार में लुगाई जात री नूंवै ढाळै सूं ओळखाण करीजी है। इण आलेख नै बांच्या पछै आपां डंकै री चोट कैय सकां कै यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ रो मूल सुर फगत लुगाई रै डील रै ओळै-दोळै कोनी घूमै, बां‘री कथावां रा महिला पात्र जमानै रै जोर-जुलमां साम्हीं ऊभण में ई लारै कोनी रेवै।
नामी साहित्यकार कन्हैयालाल सेठिया, नानूराम संस्कर्ता अर प्रेमजी प्रेम माथै लिख्योड़ा आलेखां में बां‘री ओळूं रै सागै सिरजण जातरा री अंवेर ई हुई है।
ख्यातनाम लिखारा करणीदान बारहठ अर अब्दुल वहीद कमल रै उपन्यासां माथै दो न्यारा-न्यारा आलेखां में उपन्यास विधा री परम्परा री फिरोळ देखी जा सकै। इणींज भांत ‘साम्हीं खुलातो मारग’ (नंद भारद्वाज) अर माटी जूण (नवनीत पाण्डे) माथै दो समीक्षात्मक आलेख ई पोथी में सामल करीज्या है। ‘शिक्षक दिवस प्रकाषनः अेक परख’ अर ‘साहित्य दरसावः बरस 1999‘ सूचनात्मक आलेख है जकां भरती पेटै ई खपाईजैला पण आं‘रै ओळावै आपां आलोचना रै न्यारै-न्यारै रूपां री बानगी जरूर जोय सकां। शिक्षक दिवस प्रकाशन री पोथ्यां री अेकठ जाणकारी शोधार्थियां सारू उपयोगी हुय सकै।
इण पोथी रै पैली सूं लेय‘र छेकड़लै ओळी तांई अेक रचनात्मक आलोचकीय दीठ रा दरसाव हुवै। हालांकि इण पोथी में असहमति री गुंजायस गैर मौजूद कोनी। कोई पाठक नांव छूटण री बात ई उठा सकै पण सेवट असहमति ई तो संवाद रो आधार बणै। साहित्य री सबळाई सारू संवाद री सारथकता किण सूं छानी है।
पोथी री बीजी खासियत इणरी सध्योड़ी भाषा है। दइया री भाषा में पांडित्य प्रदर्षन रो भाव कोनी, नदी रै बहाव जैड़ी सहजता है। बे जरूरत मुजब रात-दिन काम आवण वाळा अंगरेजी सबदां नै बापरतां ई संकै कोनी। इणींज कारण आ पोथी जबरी पठनीय है।
अंत-पंत ओ नैहचै सूं कैयो जा सकै कै ‘आलोचना रै आंगणै’ इण विधा री सबळी ओळखाण करावै। इण पोथी री मारफत डॉ. नीरज दइया आलोचना विधा नै नूंवां रंग सूंप्यां है। इणनै बांच्यां पछै म्हारै दांई बीजा पाठक ई बां‘री अगली पोथी री उडीक अवस करैला।
—————————————
पुस्‍तक का नाम : आलोचना रै आंगणै. रचनाकार :नीरज दइया. विधा : आलोचना. प्रथम संस्‍करण : मई, 2011. पृष्‍ठ : 152. मूल्‍य : 150. प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,. एफ-77, सेक्‍टर-9, रोड न- 11,. करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया,. बाईस गोदाम,. जयपुर-302006. फोन – 0141-2503989

Neeraj Daiya

आलोचना रै आंगणै सरावणजोग आफळ

श्यामसुंदर भारती
01 02
01

नीरज दइया के अठारह अध्याय

देवकिशन राजपुरोहित
11aipursunPage-220110724JaipursunPage-2

दैनिक नवज्योति में प्रकाशित

चावा ठावा कवि श्री पारस अरोड़ा री टीप

DSCN2266 “माणक” (मासिक) में

Paras Aroda on Neeraj Daiya (1)Paras Aroda on Neeraj Daiya (2)Paras Aroda on Neeraj Daiya (3)

 

परम्परागत आलोचना : आलोचना रै आंगणै

समीक्षा / राजेंद्र जोशी

img_0012

शिविरा में प्रकाशित

आलोचना रै आंगणै : समीक्षा / राजेंद्र जोशी

‘आलोचना रै आंगणै’ पैलड़ो पगोथियो

डॉ. आईदानसिंह भाटी
01 02
“आलोचना रै आंगणै” री कूंत / डॉ. आईदानसिंह भाटी

टाबरां री मनगत रो चितराम : जादू रो पेन

/ पोथी-परख / डॉ. नमामीशंकर आचार्य /
Jadoo+ro+pen+book+review

रामजीलाल घोड़ेला द्वारा समीक्षा

Jadoo ro pen

बहुत ही सहज बाल कहानियां

Deendayal Sharma 2आज के बदलते परिवेश में बच्चे भले ही इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की गिरफ्त में बंधते जा रहे हैं फिर भी अधिकांश बच्चे ऐसे भी हैं जो बाल साहित्य की रचनाओं से आनंद की अनुभूति के साथ-साथ ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा को भी शांत करते हैं। बाल साहित्य की चूंकी अनेक विधाएं हैं लेकिन कहानी विधा में बच्चे सबसे ज्यादा रूचि लेते हैं। अब जीवन की भागमभाग और एकल परिवार के कारण दादी-नानी की ओर से कहानी सुनाने की ‘वाचन परम्परा’ तो लगभग खत्म सी हो गई है। ऐसे माहौल में किसी रचनाकार की मायड़ भाषा में सृजित बाल कथा कृति यदि बाल पाठक तक पहुंचती है तो यूं लगता है मानो तपती रेत में बादलों से फुहार हो रही है। बाल मन की संवेदना को साझा करने वाले डॉ.नीरज दइया स्वयं शिक्षक है और एक शिक्षक जब बाल साहित्य का सृजन करता है तो वह रचना वास्तविकता के आस-पास महसूस होती है।
डॉ.दइया की सद्य प्रकाशित बाल कथा कृति ‘जादू रो पेन’ में बच्चों का लडऩा-झगडऩा, खेलना-कूदना, पढऩा-लिखना, छिपाना-बताना आदि अनेक क्रियाक्लापों को बाल कहानियों द्वारा बहुत ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। कार्य की नियमितता बनाए रखने की प्रेरणा देती कहानी ‘रोज रो काम रोज’, कहानी लिखने की सीख देती ‘कहाणी लिख सूं’, आपस के मनमुटाव और झगड़ों को मिटाने का मूलमंत्र देती कहानी ‘लड़ाई-लड़ाई माफ करो’, मेहनत का बल पर आगे बढऩे का भेद बताती शीर्षक कहानी ‘जादू रो पेन’, पढ़ाई में ‘शॉर्ट कट’ अपनाने वाले विद्यार्थियों की आँख खोलने वाली कहानी ‘गैस उडग़ी’ समेत ‘फैसलो’, ‘म्हैं चोर कोनी बणूं’, ‘सीखै तो अेक ओळी घणी’, ‘राजू री हुसयारी’, ‘गणित री कहाणी’, तथा ‘बरस गांठ’ भी बालमन की सरल, तरल और सहज कहानियां हैं।
चित्रकार सुनील कांगड़ा द्वारा बनाया गया पुस्तक का आवरण आकर्षक होने के साथ-साथ इसकी साज-सज्जा में राजूराम बिजारणियां का कला पक्ष भी सराहनीय है। स्तरीय कागज पर साफ सुथरी छपाई के लिए प्रकाशक भी बधाई के पात्र हैं।

दीनदयाल शर्मा, प्रसिद्ध बाल साहित्यकार,
संपादक : ‘टाबर टोल़ी’(बच्चों के लिए पाक्षिक समाचार-पत्र)
10/22, आर.एच.बी.कॉलोनी, हनुमानगढ़ संगम-335512 मो. 094145 14666

Sivira

Parsmani

प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द

नीरज दइया
कमरे की साफ-सफाई झाड-फौंछ के सिलसिल में हाथ में एक पुरानी डायरी आ गई है। यह संयोग ही है कि जो पृष्ठ मेरे सामने खुला है, उस पर बड़े अक्षरों में लिखा है- प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द। आगे के पृष्ठ पर एक फूल का अधूरा-सा चित्र बनाने की गई मेरी कोशिश देखते ही हरी हो गई है। पहली पंक्ति- वह उससे आखिरी मुलाकात थी, को पढ़कर एक स्मित भीतर ही भीतर जैसे खिल आई। जैसे कोई पुरानी कहानी जवान हो गई हो। कुछ क्षण पहले सब कुछ सामान्य था, बस पलक झकते ही किसी एक शब्द, चित्र या पंक्ति से बंधा मैं कहां से कहां चला गया।
एक ही बस में हम दोनों एक ही शहर से रवाना हुए थे। उसकी और मेरी मंजिल जुदा-जुदा थी, बस हमारा रास्ता एक था। मेरा शहर उसके रास्ते में आता था। सोचा थोड़ा सफर साथ-साथ रहेगा। मैंने कहा कुछ नहीं बस सोचा था कि यदि वह चाहती तो मेरे यहां रुक सकती थी। आगे दो दिन की छुट्टी थी। उसे या मुझे कोई जल्दी नहीं थी। अब इस पल भी सोचता हूं कि मैंने उससे रुकने का कहा क्यों नहीं। वह रुकती या फिर नहीं रुकती किंतु मुझे कहना तो चाहिए था। पता नहीं रुकने का कहता तो वह रुकती भी या नहीं। कहीं एक डर और संदेह था कि मेरे रुकने का कहने का वह क्या अर्थ लेगी? कोई स्त्री-पुरुष साथ या पास-पास आते ही कहानी जन्म लेती है। कहानी तो कोई भी पास-पास और साथ-साथ आए तो आरंभ होती ही है। हमारे समय में ऐसी मित्रता कठिन है। उसके रुकने का अथवा मेरे इस सोचने का सिरा आप पकड़ कर इस कहानी को कहां से कहां ले जाएंगे। क्या एक इन्सान का दूसरे इन्सान से प्रेम के अतिरिक्ति कोई दूसरा संबंध भी होता है।
उसकी समय की याद एक खुशबू की तरफ अब भी अपने अहसास को लिए जिंदा है। मैं इतने वर्षों बाद अब तक मैं इसे अपनी प्रेम कहानी की तरह संभाले हुए हूं। आज भी लगता है कि वह जख्म हरा है। पीड़ा नहीं, बस कोई सुखद अहसास है जो किसी हवा के झोंके के साथ आया है। वैसे आप जानते हैं कि वर्तमान में जीते हुए, हमारा अतीत में विचरण कभी सुखद और कभी दुखद होता है। मैं अपना काम करते-करते, क्यों सुखद-दुखद जैसी बातें लेकर आत्म-संवाद करने लगा हूं। अभी काम काफी बाकी है। आपका कभी किसी लेखक के कमरे को देखने का अनुभव रहा होगा तो आप जानते होंगे कि कितनी किताबें, पत्र- पत्रिकाएं और भी ढेर सारी सामग्री रहा करती है लेखकों के कमरों में… कोई जरा-सा कागद या पुर्जा भी बेहद जरूरी होता है। किसी कविता की कोई पंक्ति या फिर कहानी की शुरुआत की कुछ पंक्तियां ना जाने कहां कहां लिखी हुई मिल जाती है। हमारे भीतर बहुत सारे नदी-नाले और खिड़कियां-दरवाजे आदी-आदी हुआ करते हैं, जहां से हम जब चाहे-अनचाहे निकलते हैं, और बस खो जाते हैं।
एक समय में एक जीवन के साथ, समांनतर हम अनेक जीवन जिया करते हैं। करने को तो मैं अब भी अपने कमरे को ठीक-ठाक करने का नाटक कर रहा हूं, किंतु खो गया हूं उस कहानी में। मैंने उससे कहा था कि घर पहुंच कर मिस कॉल जरूर करना, और उसका उस रात मिस कॉल आया भी था। वह अच्छे से अपने घर पहुंच गई और फिर कभी नहीं मिली। जरा-सी कोई बात जीवन में खलबली मचा सकती है। एक कोड वर्ड हो सकता है- मिस कॉल वाली। अतीत की यह छोटी-सी कहानी वर्तमान में अनेक कहानियों को जन्म दे सकती है। पत्नी, बेटे-बेटियां और मेरे मित्र, सब के सब अपनी अपनी नजर से इसका पोस्टमार्टम करेंगे।
सच में ऐसी कहानियां जग-जाहिर नहीं करते। बहुत-सी कहानियां पुरानी होकर भी पुरानी नहीं होती, जैसे- यह प्रेम-कहानी। आप उत्सुक हैं जानने को कि आगे मैं क्या लिखने वाला हूं। हम दोनों किसी एक कार्यशाला के सिलसिले अपने अपने शहरों से रवाना होकर किसी एक शहर में मिले थे। वह देखने में सुंदर और दूसरों से अलग-सी दिखती थी। मेरा उसके प्रति आकर्षण का कारण उसकी सुंदरता या विपरित लिंगी होना नहीं था। हम दोनों के अलग-अलग समूह थे। चाय के वक्त जब मैंने पहली बार उसको देखा और उसकी तरफ देखता रहा, तो इसका कारण उसके हाथ में हिंदी की प्रसिद्ध कथा-पत्रिका का होना था। उसका साहित्य-प्रेम जाहिर हो रहा था। मैं हैरान था कि इस उजाड़ में और हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के आरंभिक दौर को जानने-पहचानने वाले मास्टरों और मास्टरनियों में इक्कीसवी शताब्दी की आधुनिक साहिबा कौन है? मेरा अनुमान ठीक निकला वह कहानी लेखिका थी और उसकी कहानी उस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
अपनी और उसकी कहानी मैं आगे बढ़ाता हूं, किंतु बीच में जो मैंने एक आकलन प्रस्तुत कर दिया है उसके भी स्पष्ट करता चलू। जिससे आपको लगे कि मैं सही हूं। मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। वहां मौजूद जमात से यदि सवाल किया जाए कि हिंदी कहानीकार कौन-कौन? तो जबाब होगा- प्रेमचंद। और उनके लिए प्रेमचंद के आगे-पीछे भी प्रेमचंद। जिनकी दुनिया सूर, कबीर, तुलसी से आरंभ होकर पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी तक पूरी हो जाती हो, वह भला उस कथा-पत्रिका को क्या जानेंगे। उस पत्रिका के बारे में उससे कुछ मित्रों ने पूछा और उन्हें अफसोस हुआ- अरे यह पत्रिका तो प्रेमचंदजी निकाला करते थे, क्या फिर से निकालने लगे? मैं बिना किसी नाटकीय मुद्रा और व्यंग्य के यह सत्य वचन लिख रहा हूं कि हिंदी साहित्य को पढ़ाने वाले समकालीन साहित्य से पर्याप्त सरोकार नहीं रखते। मैं जानता हूं कि आपको भी इस कहानी की नायिका से सरोकार है, कि कैसे-क्या हुआ?
आपको यह जानना अच्छा लगेगा कि मैं जानता हूं कि आपको पता है- आंखें सेकना क्या होता है। यह दोनों तरफ से होता है। चाय के वक्त एक दृश्य बहुत करीब मेरी आंखों के सामने घटित हो रहा था, जिसमें भाई लोग उस कथा-पत्रिका को ले लेकर उलट-पलट कर अपना ज्ञान आलाप कर रहे थे। मैंने एक काम करने की हिम्मत जुटा ली। अपने थेले में से एक पत्रिका निकाली और उस रुपसी को यह कहते हुए दे दी कि मेरी कहानी छपी है। इस उजड़े चमन में यह चुपके-चुपके कोई फिज़ा थी। आश्चर्य कि वहां हिंदी कहानी में अकहानी का दौर कब तक चलेगा… जैसी आवश्यक बहस गर्म थी, और एक साहब तो कह रहे थे कि हिंदी कहानी में प्रेमचंदजी के बाद कोई ढंग का कहानीकार पैदा ही नहीं हुआ। ठीक उस समय हम एक-दूसरे को देख रहे थे! आज इतने लंबे अंतराल के बाद भी मैं उसी जगह जा कर खड़ा हो गया हूं- उसे देखते हुए। थोड़ी देर बाद ही वह मधुर मुस्कान के साथ पत्रिका मुझे लौटाते हुए आंखों ही आंखों में कुछ कहती है। मैं उसका कहना सुनता हूं। अब वह मित्र-मंडली से संबोधित है- प्रेमचंद के बाद… वाह री अकहानी…. उसकी हंसी भीतर गूंज रही है। इस कहानी का यहां कोई सूत्र कस कर हमे एक दूसरे से अब भी जैसे बांधे हुए है।
क्या मैं अब भी उसकी स्मृति में कहीं हूं या यह कोरी मेरी ही स्मृति है जो उसे अब तक बांधे है। आपको यह जादू जैसा नहीं लगता। हम जिसे बांधे बैठे हैं और उसको इसकी खबर नहीं! संबंधों में ऐसा कुछ बीज जैसा होता है कि वह सपना बुनता है। क्या उसकी स्मृति कोई सपना है, जो जड़े फैलाए मेरे भीतर अब भी जिंदा है। आज वह भले ही मुझे भूल गई हो, किंतु जब किसी सूत्र से उसकी स्मृति विगत के उस बिंदु पर पहुंचेगी तब मैं उसके भीतर किसी दृश्य में उपस्थित हो जाऊंगा। मेरी उस उपस्थिति का मुझे भला कैसे अहसास होगा। मुझे इसकी कोई खबर नहीं होगी। बेखबर हमारा ऐसा होना, असल में होना नहीं चाहिए। हम शादी-सुदा ऐसे आकर्षण में अनचाहे बंध गए। हमारी इस कहानी के लिए हमें प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द नहीं मिल सकता। अंतस में कोई दृश्य कहां से कहां पहुंच कर जुड़ जाता है! इस समय भीतर जैसे गीत बज रहा है- प्यार को प्यार रहने दो…. कोई नाम ना दो…. । इस अनाम कहानी का कोई नाम नहीं, फिर भी एक नाम है। घर-परिवार की आत्मीय बातों, किस्सों-कहानियों में जो संबंध का सिरा बना और विकसित हुआ, वह हमारी आखिरी मुलाकात में कहीं पीछे छूट गया। नहीं ऐसा नहीं हुआ, उसका कोई अंश अब भी भीतर बच है। जो कि अब भी लहरा रहा है। उसका लहराना या रोकना मेरे बस में नहीं।
मैंने एक बार सोचा भी था कि हमारी उस मुलाकात पर एक कहानी लिख कर प्रकाशनार्थ भिजवा दूं। किंतु नहीं लिख सका। सोचता हूं कि हमारा मन क्या किसी कागद की तरह होता है कि उस पर कभी कोई पेपरवेट रख दे, और वह हवा में फड़फड़ाता रहे। ऐसा प्रम जो कभी आकार लेता संभव होता दिखता है, उसे दिखाया कैसे जाए? और क्यों दिखाया जाए? दिखने से दूर सदा छुपा कर रखने वाला प्रेम हमे जिंदा रखता है। भले ऐसे प्रेम पर किसी को यकीन हो या नहीं, किसी के यकीन की आवश्यकता भी नहीं। यह है तो बस है। इस प्रेम को अपना नाम नहीं दिया जा सकता, इसलिए उस पृष्ठ पर मैंने उस दिन लिखा था- प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द … फूल का वह अधूरा-सा चित्र बनाया था, जो अब भी कभी-कभार महक उठता है। बस मेरे लिए, जैसे आज अभी-अभी सजीव हो गया हो।
(राजस्थान पत्रिका 22.03.2015)
Raj Patrika 2015