आलोचना विधा नै नूंवां रंग

पोथी-परख / मदन गोपाल लढ़ा
पोथी : आलोचना रै आंगणै, लेखक : नीरज दइया, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,
बरस : 2011 मोल : एक सौ पचास रीपिया

आलोचना री सबळी ओळखाण

साहित्य री सत्ता पाठक में हुया करै। भलांई कोई तुलसीदास जी दांई ‘स्वांत सुखाय’ कलम चलांवतों हुवै पण रचाव रा सांचा रंग तो पाठक देवता रै समरपण में ई राचै। छेकड़ लिखारै रा सगळा कळाप पाठक सारू ई तो होया करै। रचना री पुड़तां खोल‘र पाठक नै उणरी न्यारी-न्यारी अरथ-छिब सूं ओळखाण करावणै रो जिम्मो आलोचना रो। आलोचना असल में रचना री हिमायत हुवै। आलोचना री ताकड़ी तुल्यां ई काची-पाकी रचना री पिछाण हुवै अर उण विधा री परम्परा में किणीं रचनाकार रो अवदान ई कूंतीजै। कैवण रो मतळब आलोचना साहित्य री घणी जरूरी विधा है जिणरो बिगसाव किणीं भाषा रै साहित्य रै सबळाई सारू महताऊ भूमिका निभावै।
आज री आलोचना रो विधागत रूप तो घणो जूनो कोनी पण आलोचनात्मक दीठ रा अैनाण आपांनै केई रूपां में आदिकाल सूं ई देखण नै मिलै। मायड़ भाषा में आलोचना विधा पेटै डॉ. अर्जुन देव चारण, कुन्दन माली, बी.एल.माली ‘अशांत’, नन्द भारद्वाज, डॉ. किरण नाहटा, डॉ. मदन सैनी आद उल्लेखजोग काम करियो है। भळै ई राजस्थानी में आलोचना री गत माड़ी ई कथीजै। इणरो मूळ कारण उण मानसिकता में सोध सकां जिण में आपां खरी बात कैवणो चावां, नीं सुणनो। रचना री आलोचना नै आपां अमूमन व्यक्तिगत ले बैठां अर अठै आवता ई रचनात्मक आलोचना खूंटी टंगजै। आलोचना नै सांचै अरथां में साधणो खांडै री धार माथै चालणै बरोबर है। फगत माळी-पाना बांट्यां का पखापखी सूं आलोचना री आब मोळी पड़ जावै। राजस्थानी आलोचना ई आ संकटां सूं घिर्योड़ी दीसै।
डॉ. नीरज दइया री पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ इण विधा रै आंगणै पसरियोड़ी धंवर नै छांटण पेटै महताऊ पांवडो मानीज सकै। कविता, अनुवाद अर संपादन सागै पत्र-पत्रिकावां में आपरै आलोचनात्मक लेखण सूं राजस्थानी जगत में नाम कमावणियां दइया री डेढ़ सौ पानां री आ पोथी अेक माटी कमी नै पूरै। अठारै अध्यायां में न्यारी-न्यारी विधावां री फिरोळ सागै इण पोथी में आलोचना री आंख री केई भंगिमावां पड़तख हुवै। इण पोथी में नीं तो बेमतळब रो बिड़द बखाण है अर नीं धिंगाणै किणीं नै खारिज करणै री (कु) चेष्टा। आं दोनूं ई कमियां सूं अेक हद तांई बच‘र दइया राजस्थानी रै आधुनिक साहित्य नै स्वस्थ आलोचनात्मक दीठ सूं जांचण-परखण रो जस-जोग काम करियो है जको बां‘रै विस्तृत अध्ययन अर ऊंडी समझ री साख भरै। ‘आलोचना रै आंगणै’ इण कारण ई इण विधा री महताऊ पोथी गिणीजैला क्यूंकै इणरी मारफत पैली वळां विधावार लिखारां अर रचनावां रै नांव गिणावण री लीक सूं आगै बध‘र परम्परा रै उजास में विषय-वस्तु अर प्रवृतियां माथै बात करीजी है। इण पोथी में आलोचक केई अेड़ै लिखारां रै अवदान री कूंत री आफळ ई करी है जका साहित्य साधना में तो जूण खपा दी पण खेमेबंद आलोचना री बंधी-बंधाई सींव रै कारण अजैं लग ‘अननोटिस्ड‘ रैया।
पोथी रै आलेखां माथै बांत करां तो पेलै आलेख ‘आधुनिक कविता रा साठ बरस’ में राजस्थानी री आधुनिक कविता जातरा री तीन बीसी लाम्बी जातरा रो दीठाव देख्यो जा सकै। इण आलेख में आलोचना विधा में नूंवों प्रयोग करतां लिखारै आपरी दीठ मुजब ‘नुंवी कविता रा टोप-टेन’ कवियां माथै ई टीप मांडी है। राजस्थानी खातर आ नुवादी बात हुय सकै पण मराठी अर दिखणादै भारत री भाषावां में अैड़ी परम्परा रैयी है। इण सूची सूं आपां सहमत हुवां चावै नीं, पण इणमें दोराय कोनी कै आप-आपरै कांटा-बाट सूं कविता नै इण ढाळै जोखणो रोचक अवस हुवै। जे म्हैं म्हारै मनग्यान ‘टोप-टेन’ सूची बणावूं तो दस में सूं सात-आठ नांव सागी ई हुवैला। दइया री सूची रो आधार कथ्य अर षिल्प है, मोटो नांव, पुरस्कार का पोथ्यां री गिणती कोनी। दो-दो ओळी रै दूहा रा कवि बिहारी री कीरत फगत अेक पोथी (सतसई) रै पाण कोनी के ? इण आलेख में ठौड़-ठौड़ कवि री मौलिक दीठ पळका मारै। बानगी-‘बाळसाद’ (1968) आधुनिक राजस्थानी कविता री पैलड़ी पांत री पोथी है। अठै आपां बिरकाळी जी री दीठ अर कविता नै लेय‘र वां‘री अप्रोच में साव नुंवो रूप देख सकां।’ (पृ. 9)
‘आधुनिक कहाणीः शिल्प अर संवेदना’ आलेख में आधुनिक कहाणी री बीसवीं सदी सूं इक्कीसवै सइकै री जातरा री रंग-रूप, आकार-प्रकार, भाषा-षिल्प अर संवेदना रै हिंसाब सूं परख करीजी है। बरस 1955 सूं अजैं तांई री कथा जातरा नै च्यार टुकड़ा में दरसांवता आलोचक नामी लिखारां री दीठ रै समचै आपरी टीप मांडी है। ‘कोटेशन’ रै सायरै आगै बधतै इण आलेख में कहाणियां री ओळ्यां रै दाखलै सागै कथा विधा रो तुलनात्मक अध्ययन बांचण नै मिलै। ‘लघुकथा री विकास जातरा’ आलेख में दइया लघुकथा री विधागत विषेषतावां री पड़ताल सागै इणरी विकास जातरा नै पारखी दीठ सूं अंवेरी है। इण आलेख में केई ठौड़ व्यंग्य रो झीणों सुर इणरी भाषा नै नूवीं ओपमा देवै। मसलन – ‘जे इण संग्रै री रचनावां आवतै बगत में लघुकथावां गिणीजी तो लघुकथा इतियास री सबसूं छोटी रचना लिखण रो जस लेखक नै मिलैला।’ (पृ.64)
`राजस्थानी साहित्य रै गाखै सूं लारला दस बरस’ आलेख में इक्कीसवीं सदी रै पेलै दषक रै साहित्य रो लेखो-जोखो साम्हीं आवै। जे आपां फगत लिखारां अर पोथ्यां री सूची ई जोवणी चावां तो ओ आलेख बांच‘र निराष हुवणो लाजमी है पण इणमें दस बरसां री जातरा री मारफत राजस्थानी साहित्य री दषा अर दिषा रो मोटो-मोटो खाको अवस देख्यो जा सकै। ‘नामी कवि री नामी कहाणियां’ आलेख चावा कवि मोहन आलोक रै कथा-संसार री सांतरी ओळखाण करावै। ‘कुंभीपाक’, बुद्धिजीवी’ अर ‘उडीक’ जैड़ी सांवठी कथावां रा लिखारा मोहन आलोक रै कथाकार रूप रो अजैं लग दीठाव सूं बारै रैवणो आलोचना रै सांम्ही सवाळ खड़्यो करै। ‘मोहन आलोक री कहाणियां‘ पोथी आयां पछै तो कहाणी रै इतिहास अर आलोचना में सुधार री जरूरत पण लखावै। इण आलेख में आपां भळै दइया री स्पष्ट सोच सूं अरूं-भरूं हुवां- ‘बिना किणीं लाग-लपेट रै अठै लिखतां म्हनै संको कोनी कै आधुनिक कहाणीं री सरुआत विजयदान देथा सूं नीं कर परा आपां नै नृसिंह राजपुराहित सूं करणी चाइजै। क्यूंकै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंह राजपुरोहित ई गिणीजैला।’(पृ.49)
‘नारी री ओळख नै आथड़ता आखर’ आलेख में चावा लिखारा यादवेन्द्र षर्मा ‘चन्द्र’ रै राजस्थानी उपन्यासां रै कथ्य अर शिल्प री परख करीजी है तो ’बा जीवैला अर धाड़फाड़ जीवैला‘ में चंद्र जी रै कथा-संसार में लुगाई जात री नूंवै ढाळै सूं ओळखाण करीजी है। इण आलेख नै बांच्या पछै आपां डंकै री चोट कैय सकां कै यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ रो मूल सुर फगत लुगाई रै डील रै ओळै-दोळै कोनी घूमै, बां‘री कथावां रा महिला पात्र जमानै रै जोर-जुलमां साम्हीं ऊभण में ई लारै कोनी रेवै।
नामी साहित्यकार कन्हैयालाल सेठिया, नानूराम संस्कर्ता अर प्रेमजी प्रेम माथै लिख्योड़ा आलेखां में बां‘री ओळूं रै सागै सिरजण जातरा री अंवेर ई हुई है।
ख्यातनाम लिखारा करणीदान बारहठ अर अब्दुल वहीद कमल रै उपन्यासां माथै दो न्यारा-न्यारा आलेखां में उपन्यास विधा री परम्परा री फिरोळ देखी जा सकै। इणींज भांत ‘साम्हीं खुलातो मारग’ (नंद भारद्वाज) अर माटी जूण (नवनीत पाण्डे) माथै दो समीक्षात्मक आलेख ई पोथी में सामल करीज्या है। ‘शिक्षक दिवस प्रकाषनः अेक परख’ अर ‘साहित्य दरसावः बरस 1999‘ सूचनात्मक आलेख है जकां भरती पेटै ई खपाईजैला पण आं‘रै ओळावै आपां आलोचना रै न्यारै-न्यारै रूपां री बानगी जरूर जोय सकां। शिक्षक दिवस प्रकाशन री पोथ्यां री अेकठ जाणकारी शोधार्थियां सारू उपयोगी हुय सकै।
इण पोथी रै पैली सूं लेय‘र छेकड़लै ओळी तांई अेक रचनात्मक आलोचकीय दीठ रा दरसाव हुवै। हालांकि इण पोथी में असहमति री गुंजायस गैर मौजूद कोनी। कोई पाठक नांव छूटण री बात ई उठा सकै पण सेवट असहमति ई तो संवाद रो आधार बणै। साहित्य री सबळाई सारू संवाद री सारथकता किण सूं छानी है।
पोथी री बीजी खासियत इणरी सध्योड़ी भाषा है। दइया री भाषा में पांडित्य प्रदर्षन रो भाव कोनी, नदी रै बहाव जैड़ी सहजता है। बे जरूरत मुजब रात-दिन काम आवण वाळा अंगरेजी सबदां नै बापरतां ई संकै कोनी। इणींज कारण आ पोथी जबरी पठनीय है।
अंत-पंत ओ नैहचै सूं कैयो जा सकै कै ‘आलोचना रै आंगणै’ इण विधा री सबळी ओळखाण करावै। इण पोथी री मारफत डॉ. नीरज दइया आलोचना विधा नै नूंवां रंग सूंप्यां है। इणनै बांच्यां पछै म्हारै दांई बीजा पाठक ई बां‘री अगली पोथी री उडीक अवस करैला।
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पुस्‍तक का नाम : आलोचना रै आंगणै. रचनाकार :नीरज दइया. विधा : आलोचना. प्रथम संस्‍करण : मई, 2011. पृष्‍ठ : 152. मूल्‍य : 150. प्रकाशक : बोधि प्रकाशन,. एफ-77, सेक्‍टर-9, रोड न- 11,. करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया,. बाईस गोदाम,. जयपुर-302006. फोन – 0141-2503989

Neeraj Daiya

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Posted on 28/12/2015, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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