सुकून देती नीरज दइया की कविताएं

विजय शंकर आचार्य
उचटी हुई नींद के बाद/ जब लगती है आंख/ अटकी रहती हो तुम/ भीतर-बाहर/ जैसे नींद में/ जागते हुए।/ नहीं चलता मेरा कोई बस। मैं नहीं जान ही पाया- कब उचटी नींद/ कब लगी आंख!
नींद का उचटना सामान्य आदमी के लिए साधारण घटना हो सकती है। संवेदनशील मन इस नींद के उचटने को बहुत अलग ढंग से समझता है और अभिव्यक्त करता है। उचटी हुई नींद कवि, आलोचक डॉ. नीरज दइया का प्रथम हिंदी काव्य संग्रह है। इस दौर में जब कहा जा रहा है कि कविता का युग समाप्त हो चुका है नीरज की कविताएं कुछ हौसला देती नजर आती हैं। साठ कविताओं के इस संग्रह में अंतिम तीन कविताओं में प्रायोगिक रूप में तीन गद्य कविताओं को भी स्थान दिया है।
नीरज की कविताओं से गुजरते हुए लगता है उनका अपना एक संसार है जो केवल ऐसा सपना भर नहीं जो सिर्फ देख कर भूला जा सके। संग्रह ‘एक सपना’ कविता से प्रारम्भ होता जहां कवि कह देता है- किसी भी उडान के लिए/ एक आंख चाहिए/ और चाहिए, आंख में/ एक सूर्यदर्शी सपना। इस युग में जब चारों ओर सपनों के सौदागर बाजीगरी से सपनों को बेचकर मुनाफाखोर बने हुए हैं। ऐसे में जब सपनों पर पहरे बैठाएं जा रहे हों। ऐसे में जब सपने दिखाकर, सपनों को तोड़ा जा रहा हो तब डॉ. दइया के ‘कुछ सपने और’ आशा जगाते हुए आह्वान करते नजर आते हैं- घुट-घुट कर मरने से बेहतर हैं जिए कुछ देर और… / भूल जाएं सब कुछ, चले कुछ आगे और…./ किसी आकाश का बनकर बादल बरसें कुछ देर और…/ आंसुओं को पोछ कर चुनें जिंदा कुछ सपने और….
किसी भी रचना का पाठ करते हुए यदि पाठक अपनी संवेदनाओं में गमन करते हुए कवि की संवेदनाओं का हमसफर बन जाए तो रचना की सफलता ही कही जा सकती है। इस संग्रह को पढ़ते हुए यदि पाठक के साथ ऐसा होता है कोई अतिश्योक्ति नहिं है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक उनके साथ बतियाने लगता है। वह प्रेम के लोक में विचरण करने लगता है और प्रेममय हो जाता है। खोखली होती जिन्दगी में प्रेम के मरने के इस दौर में जब पाठक अपनी खोखली हंसी के बीच डॉ. दइया की ‘खोखली हंसी’ में प्रवेश करता है उसे अपने अंतस तक पैठे खोखलेपन से दो-चार होना पड़ता है- प्रेम के बिना/ नहीं खिलते फूल/ कुछ भी नहीं खिलता/ … जो खिलता हुआ उसके पीछे प्रेम है/ जहां नहीं प्रेम/ वहां सुनता हूं- खोखली हंसी।
इस भयावह, क्रूर उठापटक वाले स्वार्थपरक युग में जब प्रेम ‘ढूंढते रह जाओगे’ की सीमा तक आ चुका है। ऐसे जलते उबलते परिवेश में कवि का प्रेम को ढूंढना और उसे बचाए रखने की जद्दोजहद में अपनी नींद को उचटा देना साधारण प्रेम के बूते की बात नहीं है। इन कविताओं को प्रेम कविता कहना शायद इसलिए उचित नहीं होगा क्योंकि बदलते युग में प्रेम के मायने बदल गए हैं। नीरज की कविताओं के प्रेम में जमाने की हवा की स्थूलता नहीं है एक गहराई जिसे जानने के लिए अनुभूति के गहनतम अंतस तक पैठना जरूरी हो जाता है।
आज के इस युग में जब मानवीयता सिर्फ समाचारों की सुर्खियां बटोरने के लिए सप्रयास की जाती है, जब हमारी स्मृतियों को खत्म करने के लिए साजिशें की जा रही हैं। ऐसे में कवि अपनी स्मृति को सहेज कर रखना चाहता है और कह देता है तुम्हारी स्मृति में हैं/ कई गीत/ उन में से चुनकर एक/ गा रही हो तुम/ कहा तुमने/ आवाज पर मत जाना/ स्मृति पर जाना/ क्या गीत के सहारे/ पहुंच सकूंगा मैं/ तुम्हारी स्मृति तक?
सामान्यतः लोग अपने संग्रह का शीर्षक संग्रह में प्रकाशित किसी एक कविता के शीर्षक को रख देते हैं। लेकिन डॉ. नीरज ने यहां एक प्रयोग किया है। उनके कविता संग्रह में ‘उचटी हुई नींद’ नाम की कविता नहीं है। लेकिन कवि का गद्य कविता का प्रयोग कम असरकारक रहा। गद्य कविताएं पहले की कविताओं की तुलना में कम प्रभाव छोड़ती हैं।
कुल मिलाकर नीरज की कविता दैहिक और आलोकिक प्रेम की उस सीमा पर खड़ी है जहां पाठक अपनी अन्तरावस्था से जहां भी पहुंचना चाहे वहां जा सकता है। इन कविताओं की खास बात इनका सीधापन है। इनमें लय है जो पाठक को कविता दर कविता आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। डॉ. नीरज की कहीं कृत्रिमता नजर नहीं आती। आज के इस कृत्रिम युग में कविताएं सुकून देती हैं।

संयुक्त निदेशक (कार्मिक)माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर
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उचटी हुई नींद (कविता संग्रह) ; कवि – डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर ; संस्करण : 2013 ; पृष्ठ संख्या : 80 ; मूल्य : 60/-
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(शिविरा, नवम्बर 2015 में प्रकाशित)

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Posted on 28/12/2015, in आलोचना and tagged . Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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