Monthly Archives: जनवरी 2016

‘आलोचना रै आंगणै’ री साख

कवि नीरज दइया री आलोचना पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ में कुल छोटा-मोटा अठारै लेख छप्योड़ा, जिकां रै जरियै वै इण भारत री सगळी विधावां नै सोधणै-समझणै रौ महताऊ काम कियौ।
-पारस अरोड़ा (माणक : अक्टूबर, 2011)
‘आलोचना रै आंगणै’ रो सबळ-पख इणरी उपन्यास-पड़ताल है। यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, करणीदान बारहठ, अब्दुल वहीद ‘कमल’, नंद भारद्वाज, नवनीत पाण्डे रै उपन्यासां री डॉ. दइया पड़ताल करी है। अठै ई किताबां री स्वायत्त-समीक्षा पड़ताल है। उपन्यासां रै कथ्य री खासियतां में डॉ. दइया खेचल करी है अर भासा रूपां माथै ई मैनत। आधी सूं घणी पोथी उपन्यास माथै ई केंद्रित है।
-डॉ. आईदानसिंह भाटी  (राजस्थली-117 : जनवरी-मार्च, 2012)
जिस प्रकार अठारह पुराण, गीता के अठारह अध्याय, उसी प्रकार ‘आलोचना रै आंगणै’ नीरज दइया के अठारह अध्याय कहूं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। किंतु इन अठारह अध्यायों में अनेक साहित्यकारों को जोड़कर उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास साफ झलकता है।
– देवकिशन राजपुरोहित  (दैनिक नवज्योति : 24 जुलाई, 2011)
युवा लेखक नीरज दइया आपरी पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ रै मारफत वां लेखकां रो लेखन उजागर करण री रूपाळी कोसिस करी है, जकां रो लेखन प्रमाणै बडो है, पण आपरी सादगी-सरलता रै पाण नाम रूप वो मुकाम हासिल नीं कर सकिया, जिका रा कै वै वाजिब हकदार है।
-श्यामसुंदर भारती (कथेसर : जुलाई-सितम्बर, 2013)
आलोचना साहित्य रै कसालै में नीरज दइया री पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ रो प्रकासण हुवणो इण विधा में बधेपो कैयो जाय सकै। आपां संतोष कर सकां कै चालो कीं तो हुयो।
-श्याम जांगिड़ (बिणजारो-32 : बरस-2011)
‘आलोचना रै आंगणै’ पोथी में नीं तो बेमतळब रो बिड़द बखाण है अर नीं धिंगाणै किणीं नै खारिज करणै री (कु)चेष्टा। आं दोनूं ई कमियां सूं बच’र डॉ. दइया राजस्थानी रै आधुनिक साहित्य नै स्वस्थ आलोचनात्मक दीठ सूं जांचण-परखण रो जस-जोग काम कर्यो है, जको बां रै विस्तृत अध्ययन अर ऊंडी समझ री साख भरै।
– डॉ. मदन गोपाल लढ़ा (जागती जोत : मार्च, 2012)
नई कविता के टोप-टेन कवियों क्रमश: कन्हैयालाल सेठिया, भगवतीलाल व्यास, मोहन आलोक, सांवर दइया, चन्द्रप्रकाश देवल, अर्जुनदेव चारण और ओम पुरोहित ‘कागद’ को चुनकर उनकी काव्य-यात्रा पर गंभीर विवेचन किया है। इस श्रेणी में मालचंद तिवाड़ी, वासु आचार्य, आईदान सिंह भाटी, कुंदन माली एवं स्वयं नीरज दइया सहित अन्य महत्त्वपूर्ण कवियों की कविताओं पर भी समग्रता से विचार करने की अपेक्षा थी।
-राजेंद्र जोशी (शिविरा : फरवरी, 2013)

कुंवर रवीन्द्र के रंगों में सजी मेरी कविताएं

Kunwar Ravindra 20052017kuvar-ravindrकुंवर रवीन्द्र जी का बहुत बहुत आभार।

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1 September 2013 Kunwar Ravindra G
Kunwar Ravindra G 08032014
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अनुसिरजण – मूळ कविता रो भावाभिनय

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हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर…

डॉ. मदन सैनी

मदन सैनी

राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर रै सैयोग सूं छपी थकी पोथी ‘सबद-नाद’ मांय भारत में बोली जावणवाळी चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रो अनुवाद करियो है- राजस्थानी रा ऊरमावान कवि, अनुवादक अर समीक्षक डॉ. नीरज दइया। इण संग्रै मांय समकालीन भारतीय कविता आपरै सैंपूर सबद-नाद रै समचै पाठकां सूं रूबरू होवै अर अेक लूंठै फलक माथै मानव-मन रा जथारथ चितराम उकेरै। आं कवितावां में जठै राग-रंग री रूपाळी छिब है, बठै ईज जियाजूण री अंवळायां-अबखायां आपरै जमीनी जथारथ सूं बाथेड़ो करती पण लखावै। असमिया कवि वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य सिंझ्या नैं ‘उदासी दाईं’ उतरती देखै, बठै ईज चाय-बागानां अर धूवां बगावती चिमनियां नैं ई नीं भूलै! ‘मुट्ठी’क चावळिया’ कविता में बै कैवै :
हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर
तरसतो रैयग्यो म्हारो ओ मन
इण संग्रै नैं पढ्यां पछै कीं अैड़ा ईज भाव अंतस में उठै। इण कविता रै समचै म्हैं कैवणो चावूं कै संग्रै री सैंग कवितावां किणी-न-किणी दीठ सूं पाठक री चेतना नैं झकझोरै, नवी दीठ देवै अर नवै सोच सूं सराबोर पण करै। आं कवितावां मांय सांस्कृतिक छिब है- कागलै रो सराध (कोंकणी), बठै ईज बाजारवाद रा सुर भी है- मोल लावो प्रीत-अपणायत (भोजपुरी), तो बीजै कानी सिणगारू भावां री रूपाळी सोभा पण है- मरवण रै नांव (बोड़ो)। आं कवितावां मांय देस-दुनिया अर घर-परिवार रा सांवठा बिंब-पड़बिंब होवता लखावै। मैथिली री ‘घर’ कविता री अेक बानगी जोवो :
घर घर ही हुवै
हुवो बठै भलांई लाख अबखायां
जठै मा हुवै
उडीकती थकी आपरी
बूढी अर थाकल आंख्यां सूं-
भूख अर दरद सूं आकळ-बाकळ
खुद रै बेटै नैं
उडीकती थकी मा।
अठै आपां अनुवादक री भासाई खिमता नैं भी परख सकां, जकी झरणै रै कळ-कळ नाद री दांई सबद-नाद रै समचै अेक जाण्यो-पिछाण्यो जथारथ-बिंब आपां रै पाखती ऊभो करै। इत्तो होवतां थकां ईज अेक बात उल्लेखजोग है अर वा आ है कै इण अनुवाद सूं पैलां नीरज दइया री भासा ‘ओकारांत’ होया करती, पण इण संग्रै में पैली बार (स्यात् डॉक्टरेट रै कारण) ‘औकारांत’ होयगी है। इण सारू अनुवादक नैं कठैई अेक टीप देवणी चाहीजती, नींतर आ भासा-शैली किणी बीजै अनुवादक री कैयी जाय सकै। अेक और विचारजोग बात है कै इण पोथी मांय भेळी करीज्योड़ी चौईसूं भासावां री कवितावां रो उल्थो उणां रै मूळ रूप सूं अनुवादक करियो है, का पछै किणी बीजी भासा रै माध्यम सूं ओ अनुवाद पाठकां साम्हीं परतख होयो है, इण बात रो खुलासो भी होवणो चाहीजतो। नींतर इत्ती भासावां री जाणकारी किणी उल्थाकार नैं होय सकै, आ इचरज री बात नीं है कांई? केई ठौड़ प्रूफ री भूलां भी है, जियां- साम्हीं, सामीं/ जोसेफ मेकवान, योसेफ मेकवान/ बदूंक/ कह्यां/ गोली (गोळी) इत्याद। फेर भी असमिया, बांग्ला, भोजपुरी, बोडो, डोगरी, अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयाळम्, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उडिय़ा, पंजाबी, संस्कृत, संताली, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू इत्याद चौईस भासावां री टाळवीं कवितावां नैं सहेजणो अर वांरी काव्याभासा नैं जीवणो कोई हांसी-खेल नीं है, इण कारज में उल्थाकार री साधना सुथराई सूं परतख होवती लखावै। कवियां रै परिचय सूं पैलां ‘अंतरपट’ री कांई दरकार ही, उल्थाकार ई जाणै! फेर भी नीरज रो ओ अनुवाद भासाई अेकरूपता री दीठ सूं सरावणजोग कैयो जाय सकै। म्हारी हियै-तणी बधाई!

 

91KNbbN49NLपोथी : सबद-नाद / विधा : अनुवाद / अनुवादक : नीरज दइया / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर संस्करण : 2012 / मोल : 70 रिपिया।

(जागती जोत : अगस्त-सितम्बर, 2012)

भारतीय कविता री सांतरी जातरा

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सबद-गूंज/ कुंदन माली

neeraj daiya sabd naadभारत सरीखा बहुभासायी, बहुसांस्क्रतिक देस में, मौजूदा इक्कीसमै सइकै में साहित्य रै साम्हीं घणकरी चुनौतियां अर दबावां नै मैसूस कर्‌या जाय सकै अर साथै ई साथै आ बात ई दीवा री भांत साफ है के किणीं देस री साहित्यिक कारण है के साम्प्रत समै में साहित्य री नवी भंगिमावां अर नवा रूप ई साम्हीं आवता जाय रह्‌या है। समकालीन राजस्थानी साहित्य रै परिपेख में आ बात सुभट तौर सूं कैयी जाय सकै के भलांई कमती तादाद में व्हौ, पण आपां री नवी पीढ़ी रा लिखारा राजस्थानी साहित्य री न्यारी-न्यारी विधावां में सिरजण करण री दीठ सूं लगौतार सक्रिय निंगै आवै। जठै आपां रै साहित्य में कहाणी अर कविता रै खेतर में खासौ मैताऊ काम व्हियौ है तो दूजी कानीं कईक विधावां ई समरिद्ध होवती रैयी है- ज्यूं के जातरा-विरतांत, लघुकथा, नाटक, आलोचना इत्याद रै साथै-साथै संस्मरण अर सबद चितराम ई खासी ठौड़ बणाय रैया है। अठै आ बात केवणि ई वाजिब लखावै के सिरजाणाऊ लेखन रै साथै-साथै किणीं भासा री सामरथ अर संभावनावां री असली कसौटी उण भासा में होवण वाळा उल्था माथै ई आधार राखै। असल में देखां तौ किणीं ई भासा री विपुल सामरथ अर सबद-भंडार नै बधावण रौ काम अनुवाद कर्म रै मारफत संभव व्है। भासा री साहित्यिक गेराई, विविधता अर विपुलता रौ मापदंड अर रचनाकार-अनुवादक री रचनात्मक कारीगरी नै अनुवाद रै जरिये इज मापी जाय सकै।

अंजस  अर गुमेज री बात है के लारला पच्चीस-तीस बरसां में राजस्थानी साहित्य में खासी तादाद में अनुवाद रौ काम-काज व्हियौ है अर स्तरीय काम व्हियौ है। गुजराती, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, डोगरी, कश्मीरी, मौथिली, हिंदी, उड़िया, असमिया अर मलयालम इत्याद भारतीय भासावां री प्रख्यात क्रतियां रा उल्था व्हिया है। इत्तौ इज नीं, अंग्रेजी, फ्रेंच, रसियन अर जरमन सरीखी विदेसी भासावां री रचनावां ई राजस्थानी में ठसकै सूं अनूदित व्ही है अर रास्ट्रीय स्तर माथै बरौबर आदरीजी है।कविता, कहाणी, उपन्यास, आलोचना अर दूजी साहित्यिक विधावां रौ उल्थौ इण बात री साख भरै के राजस्थानी साहित्य में अनुवाद रौ भंडार खासौ रातौ-मातौ है।

साहित्य अकादेमी नवी दिल्ली रै राजस्थानी भासा परामर्श-मंडल री भूमिका इण सीगै घणी सरावणजोग रैयी है अर केवण री जरूत कोनीं के साहित्य अकादेमी रै लगौलग प्रोत्साहन रै पांण केईक नवा उल्थाकार साम्हीं आया है। साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार अर राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी बीकानेर रा अनुवाद पुरस्कार सूं इण काम ने बेसक तेजी मिलती रैयी है। देस अर विदेस रा तमाम नामचीन रचनाकारां री रचनावां रै साथै साथै काळजीत रचनावां रा उल्था ई राजस्थानी भासा री खिमता री साख भरै। अनुवाद रै जरियै देस-देसावर री भासावां री उत्तम रचनावां नै राजस्थानी में लावण रौ काम यूं देखां तौ समकालीन राजस्थानी साहित्य नै समरिद्ध करण रौ काम इज बाजैला। जूनी अर नवी पीढ़ियां रा लेखक इण अनुवाद-यग्य में आपरौ योगदान देय रैया है।

नवी पीढ़ी रा लिखारा नीरज दइया री दिलचस्पी कविता, लघुकथा अर आलोचना कर्म में तो है ईज, पण इण रै साथै ई साथै अनुवाद रै कामकाज में ई वां री रुचि बराबर निंगै आवती रैयी है। पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम रै कविता-संग्रै “कागद अर कैनवास” अर हिंदी कथाकार निर्मल वर्मा री कथा-पोथी “कागला अर काळो पाणी” रा नीरज दइया राजस्थानी में मेताऊ उल्था करिया है अर राजस्थानी भासा री मठोठ री वां नै विवेकसम्मत समझ है अर भासा रै सिरजाणात्मक उपयोग री दीठ सूं ई वै सावचेत अर सजग निंगै आवै। इणींज सिलसिलै में नीरज दइया “सबद नाद” नाम रै मैजूदा काव्य-संग्रै साथै मैजूद व्हिया है। देस री चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रै इण संग्रै में भारतीय कवियां री गिणी-चुणी कवितावां रौ उल्थौ सामिल है। कविता रै मारफत नीरज दइया राजस्थानी कविता अर अनुवादकर्म रा जसजोग नुमांइदा कवि देवल रै योगदान नै आदर साथै रेखांकित कर्‌यौ है।

अलबत जिण कवियां नै अठै ठौड़ मिली है वां में सूं इस्या ई कवि है, जिका सूं सवाया कवि उण भासा में मौजूद है, पण इण बात में कोई संका नीं है के जिण कवितावां नै अनुवाद चुणीं है, वै भासा-सिल्प-सौस्ठव अर परिवेस रै स्तर माथै रत्तीभर ई कमजोर नीं है। अनुवादक अर संपादक रै विवेक मुतालिक ओ ईज केवणौ वाजिब है के साहित्य री दुनिया लोकतंत्रिक दुनिया है अर इण दुनिया में एक दूजै री पसंद-नापसंद रौ समांन व्हैणौ इज चाईजै।

कुंदन मालीसमकालीन भारतीय समाज, परिवेस, परम्परा अर न्यारै-न्यारै प्रदेसां रै संवेदनात्मक अर सिरजणात्मक भूगोल अर आबोहवा नै इण संग्रै में मौजूदा कवितावां रै मारफत आसानी सूं मैसूस करी जाय सकै। दूजै सबदा में केवां तो “सबद नाद” रै रूप में आपां रै साम्हीं एक इस्यौ केलिडोस्कोप है जिण नै समकालीन भारतीय कविता री एक गंभीर, सारथक झांकी पेस करण री उल्लेखजोग कोसिस रै तौर माथै देखी जावणी चावै। अनुवादकर्म असल में अनुसिरजण रौ कर्म है अर जद कोई कवि खुद इज कवितावां रै अनुवाद नै हाथ में लेवै तौ वो अनुवाद कर्म सांचा अर्थ में सिरजाणात्मक अनुवाद बण जावण री खिमता दरसावै। नीरज दइया आपरी इण मेताऊ कोसिस रै तैत कवियां रै अंतस ताईं पूग नै, कविता रै मर्म नै ओळखण उण नै आपरी भासा में ढाळै अर नतीजा में आपां नै सम्प्रेसणीय, सिरजणात्मक अर संवेदनसील कवितावां मिलै।

“सबद नाद” राजस्थानी पाठक-समाज रै बीच आप री गैरी पैठ थरपैला अर आवण वाळा अनुवादकां नै प्रोत्साहित करण रौ काम करैला।

कुंदन माली ४०/१२१४, टेकरी, उदयपुर (राज.) ३१३००२

(“सबद-नाद” पोथी री भूमिका)

अेक लाम्बै मिठास रै सीगै

Mohan Alokमोहन आलोक

हिन्दी भासा रै ‘चौथा सप्तक’ रा ख्यातनाम कवि नन्दकिशोर आचार्य री अब तांई छपियोड़ी चवदै काव्य पोथ्यां सूं टाळवीं कवितावां रो ओ महताऊ अनुसिरजण ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ जठै डॉ. नीरज दइया री अेक सांतरी उपलब्धि है, बठै ई मायड़ भासा रै अनूदित साहित्य रो अेक गीरबै जोग ग्रन्थ ई है।
डॉ. दइया जैड़ै आगीवाण आधुनिक कवि रै, ऊंडै अंधारै कठैई, पूगण रो अैसास आचार्य जी जैड़ै कवि-रिख री आंगळी थाम’र ई संभव हो, क्यूं कै ‘अलेखू उणियारां रै बीच अदीठ’ (इतनी शक्लों में अदृश्य, आचार्य जी रो काव्य संकलन) रो छणिक दीठाव ई नीठ साधना-संभव हुवै है।
किणी भी अनुवादक री पैली कसौटी, उण री अनुवाद सारू टाळ्योड़ी रचना हुवै। आंग्ल भासा रै ख्यातनाम अनुवादक ‘फिट्जेराल्ड’ री ऊंचाई, जेकर उण रो खैयाम री रूबायां रो अनुवाद है, तो उण सूं पैली उण री वा दीठ है जिकी खैयाम री प्रज्ञा तांई पूग’र पाछी बावड़ै। वां नै अनुवाद सारू टाळै। वां री महत्ता नै पिछाणै। डॉ. आचार्य जैड़ै सिध अर सारगर्भित कवि री कवितावां नै आपरै अनुवाद सारू टाळ’र डॉ. दइया आपरी चयन-प्रतिभा रो परिचय दियो है।
‘ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै किणी भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री सिरैता ई कही जावैला कै ओ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै बठैई केई कवितावां रो तो शब्दश: अनुवाद ई पाठक रै साम्हीं राखै।
आप सारू इण अनूदित कृति ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ मांय आचार्य जी रै अब तांई प्रकाशित चवदै काव्य संकलनां- जल है जहाँ, वह एक समुद्र था, शब्द भूले हुए, आती है जैसे मृत्यु, कविता में नहीं है जो, अन्य होते हुए, चाँद आकाश गाता है, उडऩा सम्भव करता आकाश, गाना चाहता पतझड़, केवल एक पत्ती ने, इतनी शक्लों में अदृश्य, छीलते हुए अपने को, मुरझाने को खिलाते हुए अर आकाश भटका हुआ सूं वां री टाळवी कवितावां लिरीजी है। बै कवितावां जिकी मांय ‘अज्ञेय’ रै सबदां मांय— ‘आंगन के पार द्वार खुलै, द्वार के पार आंगन’ अनै फेर खुलता ई चल्या जावै, अेक अधुनातन अध्यात्म री भासा मांय।

Cover Unde Andhare Kathei

कहाणी जातरा री सांतरी कपड़छांण

Madan Gopal Ladhaमदन गोपाल लढ़ा

हासलपाई बिना जोड़-बाकी को हुवै नीं तो आलोचना में हासलपाई सारू कोई ठौड़ कोनी हुवै। पण भळै ई आलोचना में हासलपाई लगावणै रो काम लगोलग चालतो रैयो है। इण हासलपाई रै पांण ई केई लूंठा बण बैठ्या तो केई गिणती में ई कोनी आया। चावा आलोचक नीरज दइया आपरी नवी पोथी ‘बिना हासलपाई’ री मारफत कहाणी जातरा री कपड़छांण री खरी खेचळ करी है। आ खेचळ इण सारू महताऊ मानी जावैला कै इण पोथी सूं केई अैड़ा कहाणीकारां रा नांव अर बां रो जस उजास में आयो है जका बाबत अजै लग जाबक मून ही।
कैवण री दरकार कोनी कै राजस्थानी कहाणी री जातरा जित्ती लाम्बी अर रंगधारी रैयी है, आलोचना पेटै बित्ती ई सुनेड़ रैयी है। आपां जाणां कै आधुनिक कहाणी री सरुवात १९५६ में हुई जद मुरलीधर व्यास अर नानूराम संस्कर्ता कहाणी रै सीगै जमीन बणावणै रो जसजोग काम करियो। सातवै दसक पछै कहाणी री जातरा डांडी पकड़गी आधुनिकता रा पगोथिया चढतां थकां भारतीय साहित्य रै दीठाव में आपरी ठावी ठौड़ बणाय ली। बीसवीं सदी रै छेहलै दसक तांई पूगतां-पूगतां कहाणी री दुनियां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं सवाई सांवठी हुयगी। इणरै बरक्स आपां जे कहाणी री आलोचना री बात करां तो लाम्बै बगत तांई पोथ्यां री भूमिकावां का फुटकर आलेखां नैं टाळ‘र ठंड ई रैयी। सांचै अरथां में कहाणी आलोचना पेटै पैलो पांवडो डॉ. अर्जुनदेव चारण धर्यो। कहाणी आलोचना माथै केन्द्रित बां री पोथी ‘राजस्थानी कहाणीः परम्परा अर विकास’ १९९८ में आई। चालीस बरसां सूं बेसी जूनी राजस्थानी कहाणी री जातरा री अेकठ फिरोळ रो सुतंतर पोथी रूप ओ पैलो अर उल्लेखजोग प्रयास हो। अैड़ा काम बगतसर अर पूरसल हुवता तो स्यात कहाणी रो दीठाव वैड़ो कोनी हुवतो जैड़ो आज है। आ बात आलोचना विधा साम्हीं अेक सवालियो निसान लगावै। विचारणो पड़ैला कै क्यूं पांच टणका कहाणी संग्रै रै मिस ८५ नेड़ी कहाणियां लिखण वाळा लिखारा नानूराम संस्कर्ता कहाणी जातरा में ‘आउट-साइडर’ ई रैया। क्यूं कृष्ण कुमार कौशिक आ मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ जैड़ा कहाणीकारां री कलम इक्की-दुक्की पोथ्यां सूं आगै कोनी बधी। कन्हैयालाल भाटी, मोहन आलोक आद सबळा कहाणीकार ई सावळ अंवेर नीं हुवणै सूं बगतसर पोथी रूप कोनी छप सक्या। आलोचना किणी नैं रचनाकार तो कोनी बणा सकै पण रचनाकार नैं बधावणै सारू आलोचना री महताऊ भूमिका हुया करै। कहाणी रो इतियास साख भरै कै खरी कूंत नीं हुयां कलम री कोरणी मंदी पड़ता जेज नीं लागै।
कहाणी आलोचना री कूंत करां तो तीन मोटी कमियां पड़तख दीसै- कहाणी रै पाठ री ठौड़ कहाणीकारां रै नांवां माथै ध्यान, हासलपाई लगावणै मतळब बिड़दावणै री बाण अर कूंत सारू अेकल मानदण्ड नीं हुवणो। आं कमियां रै कारण ई आलोचना किणी नैं थरपण अर किणी नै पटकण रो साझन बणगी। ओ अकारण कोनी कै कहाणी आलोचना नीं तो पाठकां रो भरोसो हासल कर पाई अर नीं लिखारां रो। आ पोथी इण छेती नैं पाटण पेटै अेक महताऊ पांवडो मानीज सकै।
इण पोथी में कहाणी आलोचना अर कहाणी री परम्परा नैं अंवेरता दो आलेख है बठैई नवा-जूना पच्चीस कहाणीकारां री कहाणी जातरां री पूरी सुथराई सूं फिरोळ करीजी है। पैलो आलेख ‘कहाणी आलोचना : बिना हासलपाई’ पोथी री भूमिका दांई है जिणमें आलोचक इण विधा पेटै अजैलग हुयोड़ै काम नैं अंवेरतां आपरी दीठ नैं साम्हीं ल्यावै। आपां जाणां कै हरेक आलोचक रा निजू राछ-पानां हुया करै, जकां सूं बो कोई रचना री परख करै। अै औजार ई उणरी समदीठ नैं अंतरदीठ सूं जोड़ै। इण आलेख में आलोचना पोथ्यां अर संपादित कहाणी संकलनां री बात करतां थकां ‘जमारो’, ‘समद अर थार’ जैड़ी संजोरी पोथ्यां रचणिया यादवेन्द्र शर्मा जेड़ै राजस्थानी मनगत रै सबळै लिखारै नैं हिंदी प्रतिमान वाळा कहाणीकार बतावणै, मनमरजी सूं जुग थरपणै, उपन्यास री ठौड़ नवल कथा सबद बरतणै रै प्रस्ताव, पोथ्यां री विगत बणावणै आद माथै आलोचक जका सवाल उठावै बै पाठक नैं ई सोचणै सारू मजबूर करै। आलोचक-संपादकां री देवळ्यां तो कोनी बणै पण बां री पखापखी पाठकां नैं भटका सकै। इणींज कारण आलोचना कारज नैं खांडै री धार माथै धावणो कैयो जावै। ‘आधुनिक कहाणीः शिल्प आ संवेदना’ सिरैनांव सूं दूजो आलेख इण विधा रै रूप-रंग माथै उजास न्हाखै। नांवी लिखारां रै ‘कोटेशन’ सूं आगै बधतै इण आलेख में ओपतै उदाहरणां सूं कहाणी रै ढंग-ढाळै री कूंत करीजी है।
नृसिंह राजपुरोहित री कहाणी जातरा माथै केन्द्रित आलेख ‘बगत रै सागै : बगत सूं आगै’ बां नै अेक टाळवैं कहाणीकार रै रूप में बखाणै। पैली ओळी मे ई आलोचक रो सफीट मानणो है कै ‘समकालीन भारतीय कहाणी मांय जे राजस्थानी सूं किणी अेक ई टाळवैं कहाणीकार नै सामिल करण री बात हुवै तो म्हारी दीठ सूं नृसिंह राजपुरोहित नै सामिल किया जावणा चाइजै। (पृ. ३१) राजपुरोहित जी री १९५१ सूं सरू हुयोड़ी कहाणी जातरा री पांच कहाणी संग्रै री मारफत फिरोळ कर’र आलेख रै अंत में आलोचक आपरी बात नैं इण भांत पोखै- ‘बिना हासलपाई अठै लिखतां म्हनैं संको कोनी कै आधुनिक कहाणी री सरूवात विजयदान देथा सूं नी कर’र आपां नै नृसिंह राजपुरोहित सूं करणी चाइजै, क्यूंकै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंह राजपुरोहित ई गिणीजैला।’ (पृ. ३६)
पैली पीढी रा कहाणीकार श्रीलाल नथमल जोशी री कहाणियां माथै केन्द्रित आलेख ‘जोशी थांरा पगल्या पूजूं’ में आलोचक लोक रंग, सामाजिक काण-कायदा, विषयगत नवीनता रै सागै आगाऊ सोच अर बोल्डनेस नैं रेखांकित करै। इणींज भांत ‘पाटी पढावती कहाणियां’ सिरैनांव सूं आलेख में अन्नाराम सुदामा री कहाणियां नैं सीख नै पोखणवाळी बतावै। ‘बां जीवैला अर धाड़फाड़ जीवैला’ आलेख में आलोचक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ री कहाणियां में लुगाई जात री ओळखाण बगत परवाण नुंवै ढंग-ढाळै सूं करियोड़ी बतावै। आलोचक री पीड़ है कै ‘आलोचना मांय जठै अेक बाट आपां नै सगळा खातर राखणो चाइजै, बठै तो आपां न्यारा-न्यारा राखां अर जठै आपां नै की तकलीफ हुवै नुंवा बाट सोधण री, बठै काम नै चलतै में सलटावणो चावां।’ इण आलेख में पूरै नैठाव सूं ओपता उदाहरणां सागै आ बात पुखता करीजी है कै चंद्र जी री कहाणियां में लुगाई री ओळखाण फगत देह-राग सूं बंध्योड़ी कोनी, बा बगत मुजब आपरी नवी ओळखाण सारू संभ्योड़ी दीखै। ‘कहाणियां री सळवंटा काढतो कहाणीकार’ आलेख में रामेश्वर दयाल श्रीमाली री कहाणी जातरा बाबत सांगोपांग बात करीजी है तो ‘आदमी रो सींग अर माटी री महक’ सिरैनांव सूं करणीदान बारहठ री कहाणियां री जमीन संभाळीजी है। ‘असवाड़ै-पसवाड़ै रा छोटा-छोटा सुख-दुख’ पोथी रो खास आलेख है जिणमें डॉ. नीरज दइया आधुनिक कहाणी रा हरावळ कहाणीकार सांवर दइया री कहाणी-कला माथै बात करी है। आपां जाणां कै बेटै रै रूप में सांवरजी री दुनियां सूं आलोचक रो निजू जुड़ाव रैयो है। अेक आलोचक री निजर सूं सांवर जी रै कहाणी जगत री आ जातरा जोवण जैड़ी है। इण आलेख में राजस्थानी कहाणी नैं नवी बुणगट, प्रामाणिक जीवण अनुभव, ओपती भाषा अर संवाद शैली सूं राती-माती करणै वाळा सखरा कारीगर सांवर दइया री कहाणी-कला माथै घणी सुथराई सूं विचार करीज्यो है। संवाद कहाणियां रै मिस सांवर जी जको नवो प्रयोग करियो उणनैं ‘कथा रूढ़ि बणावणै बाबत’ ‘माणक’ सारू आम्ही-साम्ही में कन्हैयालाल भाटी रै सवाल रो सांवर जी रो उथळो ‘रिमाइण्ड’ करवा’र आलोचक चोखो काम करियो है।
सांवर जी रा समकालीन कहाणीकार भंवरलाल भ्रमर री कहाणियां बाबत ‘अमूजो दरसावती कहाणियां अर सातोतूं सुख’ में आलोचक भ्रमर जी रै कहाणी जगत रो दरसाव तो करावै ई है, संपादन आ आलाचना री बिडरूपतावां नैं ई साम्हीं ल्यावै। ‘गांव री संस्कृति अर संस्कृति रो गांव’ सिरैनांव सूं ग्रामीण संस्कृति रा सबळा चितेरा मनोहर सिंह राठौड़ री कहाणी-कला री परख करीजी है। ‘नामी कवि री नामी कहाणियां’ अर ‘आत्मकथा रा खुणा-खचुणा परसती कहाणियां’ आलेखां में क्रमश: मोहन आलोक अर नंद भारद्वाज री कहाणी जातरा री परख करीजी है। आपां जाणा कै अै दोनूं लिखारा कवि रूप जाणीता रैया है पण आं री सबळी-सांतरी कहाणियां इण विधा रै इतियास नैं दूसर जांचण-पाखण री मांग करै। अनुवाद पेटै जस कमावणियां कन्हैयालाल भाटी अर रामनरेश सोनी री कहाणी कला माथै क्रमश: ‘कहाणियां मांय नुंवी भावधारा रा मंडाण’ अर ‘मानखै रै ऊजळ पख री कहाणियां’ में विचार करीज्यो है। ‘अधूरी कहाणी जातरा रा पूरा अैनाण’ सिरैनांव सूं अशोक जोशी ‘क्रांत’ री कहाणी माथै बात करता दइया लिखै- ‘कहाणी जातरा मांय नुंवा प्रयोग, नाटकीय भाषा अर साव निरवाळी बुणगट रै पाण अषोक जोषी ‘क्रांत’ लूंठै कहाणीकार रै रूप सदा याद करीजैला। (पृ. १२३)
‘अेक बिसरियोड़ै कहाणीकार री बात’ आलेख में अस्सी रै दसक में सांतरी कहाणियां रचणियां मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ री कहाणी-कला री संभाळ हुई है। इणरै सागै अैड़ा केई बीजा कहाणीकारां माथै ई न्यारै-न्यारै आलेखां में चरचा हुई है जका आलोचना रै दीठाव में लारै छूटग्या का लेखन प्रमाणै वाजिब मुकाम नीं मिल्यो। अैड़ा कहाणीकार है- रामपाल सिंह राजपुरोहित, मेहरचंद धामू, अर डॉ. चांदकौर जोशी। ‘अंतस रै साच माथै जोर’ आलेख में बुलाकी शर्मा री कहाणी कला री अंवेर करता आलोचक बां नैं बणता-बदळता संबंध अर संबंधा री थोथ उजागर करणिया कहाणीकार मानै। ‘फुरसत मांय भोळी बातां रो जथारथ’ आलेख में मदन सैनी री कहाणी दीठ री परख करीजी है। ‘सावळ-कावळ स्सो कीं राम जाणै’ सिरैनांव सूं आलेख में नीरज दइया प्रमोद कुमार शर्मा री कहाणियां नैं अरथावै तो ‘न्यारै-न्यारै हेत नै अरथावती कहाणियां’ रै मिस नवनीत पाण्डे री कहाणिया रा रंग ओळखणै री आफळ करीजी है। ‘चौथै थंब माथै चढ’र चहकती कहाणियां’ आलेख में मनोज कुमार स्वामी री सामाजिक चेतना री अंवेर हुयी है तो ‘भाषा अर बुणगट रै सीगै भरोसैमंद कहाणियां’ सिरै नांव सूं पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ रै कहाणी जगत में भाषा बुणगट अर भावगत सिमरधता री ओळखाण करीजी है। ‘दलित कहाणी रो विधिवत श्रीगणेष सिरैनांव सूं छेहलै आलेख में आलोचक नवी पीढी रा कहाणीकार उम्मेद धानियां री कहाणियां में जथारथ अर सांच नैं उल्लेखजोग बतावता लिखै कै ‘आं दोनूं पोथ्यां मांय दलिता रो ग्रामीण जन-जीवन, जातीय अबखायां, जूझ, गरीबी, कुप्रथावां, निरक्षरता, सामाजिक जुड़ाव, जनचेतना, अनुभव-जातरा, रीस अर हूंस रो पूरो लेखो-जोखो किणी दस्तावेज रूप अंवेरती कहाणियां मिलै।’ (पृ. १५७)
राजस्थानी आलोचना में आपां नैं जठै सकारात्मक भाव सांची कैवां तो बिड़दावणै रो भाव प्रमुख रैयो है बठै ई आलोच्य पोथी में खरी अर खारी कैवण री हिम्मत करीजी है। जरूरत फगत इण बात री लखावै कै आपां आलोचना नैं खुल्लै मन सूं स्वीकार करण री बांण घालां।
सार रूप कैयो जा सकै कै कहाणीकार री ठौड़ कहाणी रै पाठ री प्रमुखता, स्वस्थ आलोचनात्म्क दीठ अर आलोचना सारू ओपती भाषा इण पोथी तीन मोटी खासियत है। आलोचना विधा में आपरी पैली पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ सूं दइया जकी सखरी हाजरी मांडी, उण पछै, बिना हासलपाई’ नैं अेक लाम्बी अर अरथाऊ छलांग कैयी जा सकै। कैवण री दरकार कोनी कै इण छलांग सूं पक्कायत ई आलोचना विधा दो फलांग आगै बधी है। इण महताऊ अर जसजोग काम सारू आलोचक अर प्रकाशक नैं घणा-घणा रंग।

(कथेसर जन-जून 2015 में प्रकाशित)  मूल आलेख डाउनलोड़