सबद-गूंज/ कुंदन माली

neeraj daiya sabd naadभारत सरीखा बहुभासायी, बहुसांस्क्रतिक देस में, मौजूदा इक्कीसमै सइकै में साहित्य रै साम्हीं घणकरी चुनौतियां अर दबावां नै मैसूस कर्‌या जाय सकै अर साथै ई साथै आ बात ई दीवा री भांत साफ है के किणीं देस री साहित्यिक कारण है के साम्प्रत समै में साहित्य री नवी भंगिमावां अर नवा रूप ई साम्हीं आवता जाय रह्‌या है। समकालीन राजस्थानी साहित्य रै परिपेख में आ बात सुभट तौर सूं कैयी जाय सकै के भलांई कमती तादाद में व्हौ, पण आपां री नवी पीढ़ी रा लिखारा राजस्थानी साहित्य री न्यारी-न्यारी विधावां में सिरजण करण री दीठ सूं लगौतार सक्रिय निंगै आवै। जठै आपां रै साहित्य में कहाणी अर कविता रै खेतर में खासौ मैताऊ काम व्हियौ है तो दूजी कानीं कईक विधावां ई समरिद्ध होवती रैयी है- ज्यूं के जातरा-विरतांत, लघुकथा, नाटक, आलोचना इत्याद रै साथै-साथै संस्मरण अर सबद चितराम ई खासी ठौड़ बणाय रैया है। अठै आ बात केवणि ई वाजिब लखावै के सिरजाणाऊ लेखन रै साथै-साथै किणीं भासा री सामरथ अर संभावनावां री असली कसौटी उण भासा में होवण वाळा उल्था माथै ई आधार राखै। असल में देखां तौ किणीं ई भासा री विपुल सामरथ अर सबद-भंडार नै बधावण रौ काम अनुवाद कर्म रै मारफत संभव व्है। भासा री साहित्यिक गेराई, विविधता अर विपुलता रौ मापदंड अर रचनाकार-अनुवादक री रचनात्मक कारीगरी नै अनुवाद रै जरिये इज मापी जाय सकै।

अंजस  अर गुमेज री बात है के लारला पच्चीस-तीस बरसां में राजस्थानी साहित्य में खासी तादाद में अनुवाद रौ काम-काज व्हियौ है अर स्तरीय काम व्हियौ है। गुजराती, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, डोगरी, कश्मीरी, मौथिली, हिंदी, उड़िया, असमिया अर मलयालम इत्याद भारतीय भासावां री प्रख्यात क्रतियां रा उल्था व्हिया है। इत्तौ इज नीं, अंग्रेजी, फ्रेंच, रसियन अर जरमन सरीखी विदेसी भासावां री रचनावां ई राजस्थानी में ठसकै सूं अनूदित व्ही है अर रास्ट्रीय स्तर माथै बरौबर आदरीजी है।कविता, कहाणी, उपन्यास, आलोचना अर दूजी साहित्यिक विधावां रौ उल्थौ इण बात री साख भरै के राजस्थानी साहित्य में अनुवाद रौ भंडार खासौ रातौ-मातौ है।

साहित्य अकादेमी नवी दिल्ली रै राजस्थानी भासा परामर्श-मंडल री भूमिका इण सीगै घणी सरावणजोग रैयी है अर केवण री जरूत कोनीं के साहित्य अकादेमी रै लगौलग प्रोत्साहन रै पांण केईक नवा उल्थाकार साम्हीं आया है। साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार अर राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी बीकानेर रा अनुवाद पुरस्कार सूं इण काम ने बेसक तेजी मिलती रैयी है। देस अर विदेस रा तमाम नामचीन रचनाकारां री रचनावां रै साथै साथै काळजीत रचनावां रा उल्था ई राजस्थानी भासा री खिमता री साख भरै। अनुवाद रै जरियै देस-देसावर री भासावां री उत्तम रचनावां नै राजस्थानी में लावण रौ काम यूं देखां तौ समकालीन राजस्थानी साहित्य नै समरिद्ध करण रौ काम इज बाजैला। जूनी अर नवी पीढ़ियां रा लेखक इण अनुवाद-यग्य में आपरौ योगदान देय रैया है।

नवी पीढ़ी रा लिखारा नीरज दइया री दिलचस्पी कविता, लघुकथा अर आलोचना कर्म में तो है ईज, पण इण रै साथै ई साथै अनुवाद रै कामकाज में ई वां री रुचि बराबर निंगै आवती रैयी है। पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम रै कविता-संग्रै “कागद अर कैनवास” अर हिंदी कथाकार निर्मल वर्मा री कथा-पोथी “कागला अर काळो पाणी” रा नीरज दइया राजस्थानी में मेताऊ उल्था करिया है अर राजस्थानी भासा री मठोठ री वां नै विवेकसम्मत समझ है अर भासा रै सिरजाणात्मक उपयोग री दीठ सूं ई वै सावचेत अर सजग निंगै आवै। इणींज सिलसिलै में नीरज दइया “सबद नाद” नाम रै मैजूदा काव्य-संग्रै साथै मैजूद व्हिया है। देस री चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रै इण संग्रै में भारतीय कवियां री गिणी-चुणी कवितावां रौ उल्थौ सामिल है। कविता रै मारफत नीरज दइया राजस्थानी कविता अर अनुवादकर्म रा जसजोग नुमांइदा कवि देवल रै योगदान नै आदर साथै रेखांकित कर्‌यौ है।

अलबत जिण कवियां नै अठै ठौड़ मिली है वां में सूं इस्या ई कवि है, जिका सूं सवाया कवि उण भासा में मौजूद है, पण इण बात में कोई संका नीं है के जिण कवितावां नै अनुवाद चुणीं है, वै भासा-सिल्प-सौस्ठव अर परिवेस रै स्तर माथै रत्तीभर ई कमजोर नीं है। अनुवादक अर संपादक रै विवेक मुतालिक ओ ईज केवणौ वाजिब है के साहित्य री दुनिया लोकतंत्रिक दुनिया है अर इण दुनिया में एक दूजै री पसंद-नापसंद रौ समांन व्हैणौ इज चाईजै।

कुंदन मालीसमकालीन भारतीय समाज, परिवेस, परम्परा अर न्यारै-न्यारै प्रदेसां रै संवेदनात्मक अर सिरजणात्मक भूगोल अर आबोहवा नै इण संग्रै में मौजूदा कवितावां रै मारफत आसानी सूं मैसूस करी जाय सकै। दूजै सबदा में केवां तो “सबद नाद” रै रूप में आपां रै साम्हीं एक इस्यौ केलिडोस्कोप है जिण नै समकालीन भारतीय कविता री एक गंभीर, सारथक झांकी पेस करण री उल्लेखजोग कोसिस रै तौर माथै देखी जावणी चावै। अनुवादकर्म असल में अनुसिरजण रौ कर्म है अर जद कोई कवि खुद इज कवितावां रै अनुवाद नै हाथ में लेवै तौ वो अनुवाद कर्म सांचा अर्थ में सिरजाणात्मक अनुवाद बण जावण री खिमता दरसावै। नीरज दइया आपरी इण मेताऊ कोसिस रै तैत कवियां रै अंतस ताईं पूग नै, कविता रै मर्म नै ओळखण उण नै आपरी भासा में ढाळै अर नतीजा में आपां नै सम्प्रेसणीय, सिरजणात्मक अर संवेदनसील कवितावां मिलै।

“सबद नाद” राजस्थानी पाठक-समाज रै बीच आप री गैरी पैठ थरपैला अर आवण वाळा अनुवादकां नै प्रोत्साहित करण रौ काम करैला।

कुंदन माली ४०/१२१४, टेकरी, उदयपुर (राज.) ३१३००२

(“सबद-नाद” पोथी री भूमिका)

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Posted on 03/01/2016, in आलोचना and tagged . Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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