हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर…

डॉ. मदन सैनी

मदन सैनी

राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर रै सैयोग सूं छपी थकी पोथी ‘सबद-नाद’ मांय भारत में बोली जावणवाळी चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रो अनुवाद करियो है- राजस्थानी रा ऊरमावान कवि, अनुवादक अर समीक्षक डॉ. नीरज दइया। इण संग्रै मांय समकालीन भारतीय कविता आपरै सैंपूर सबद-नाद रै समचै पाठकां सूं रूबरू होवै अर अेक लूंठै फलक माथै मानव-मन रा जथारथ चितराम उकेरै। आं कवितावां में जठै राग-रंग री रूपाळी छिब है, बठै ईज जियाजूण री अंवळायां-अबखायां आपरै जमीनी जथारथ सूं बाथेड़ो करती पण लखावै। असमिया कवि वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य सिंझ्या नैं ‘उदासी दाईं’ उतरती देखै, बठै ईज चाय-बागानां अर धूवां बगावती चिमनियां नैं ई नीं भूलै! ‘मुट्ठी’क चावळिया’ कविता में बै कैवै :
हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर
तरसतो रैयग्यो म्हारो ओ मन
इण संग्रै नैं पढ्यां पछै कीं अैड़ा ईज भाव अंतस में उठै। इण कविता रै समचै म्हैं कैवणो चावूं कै संग्रै री सैंग कवितावां किणी-न-किणी दीठ सूं पाठक री चेतना नैं झकझोरै, नवी दीठ देवै अर नवै सोच सूं सराबोर पण करै। आं कवितावां मांय सांस्कृतिक छिब है- कागलै रो सराध (कोंकणी), बठै ईज बाजारवाद रा सुर भी है- मोल लावो प्रीत-अपणायत (भोजपुरी), तो बीजै कानी सिणगारू भावां री रूपाळी सोभा पण है- मरवण रै नांव (बोड़ो)। आं कवितावां मांय देस-दुनिया अर घर-परिवार रा सांवठा बिंब-पड़बिंब होवता लखावै। मैथिली री ‘घर’ कविता री अेक बानगी जोवो :
घर घर ही हुवै
हुवो बठै भलांई लाख अबखायां
जठै मा हुवै
उडीकती थकी आपरी
बूढी अर थाकल आंख्यां सूं-
भूख अर दरद सूं आकळ-बाकळ
खुद रै बेटै नैं
उडीकती थकी मा।
अठै आपां अनुवादक री भासाई खिमता नैं भी परख सकां, जकी झरणै रै कळ-कळ नाद री दांई सबद-नाद रै समचै अेक जाण्यो-पिछाण्यो जथारथ-बिंब आपां रै पाखती ऊभो करै। इत्तो होवतां थकां ईज अेक बात उल्लेखजोग है अर वा आ है कै इण अनुवाद सूं पैलां नीरज दइया री भासा ‘ओकारांत’ होया करती, पण इण संग्रै में पैली बार (स्यात् डॉक्टरेट रै कारण) ‘औकारांत’ होयगी है। इण सारू अनुवादक नैं कठैई अेक टीप देवणी चाहीजती, नींतर आ भासा-शैली किणी बीजै अनुवादक री कैयी जाय सकै। अेक और विचारजोग बात है कै इण पोथी मांय भेळी करीज्योड़ी चौईसूं भासावां री कवितावां रो उल्थो उणां रै मूळ रूप सूं अनुवादक करियो है, का पछै किणी बीजी भासा रै माध्यम सूं ओ अनुवाद पाठकां साम्हीं परतख होयो है, इण बात रो खुलासो भी होवणो चाहीजतो। नींतर इत्ती भासावां री जाणकारी किणी उल्थाकार नैं होय सकै, आ इचरज री बात नीं है कांई? केई ठौड़ प्रूफ री भूलां भी है, जियां- साम्हीं, सामीं/ जोसेफ मेकवान, योसेफ मेकवान/ बदूंक/ कह्यां/ गोली (गोळी) इत्याद। फेर भी असमिया, बांग्ला, भोजपुरी, बोडो, डोगरी, अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयाळम्, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उडिय़ा, पंजाबी, संस्कृत, संताली, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू इत्याद चौईस भासावां री टाळवीं कवितावां नैं सहेजणो अर वांरी काव्याभासा नैं जीवणो कोई हांसी-खेल नीं है, इण कारज में उल्थाकार री साधना सुथराई सूं परतख होवती लखावै। कवियां रै परिचय सूं पैलां ‘अंतरपट’ री कांई दरकार ही, उल्थाकार ई जाणै! फेर भी नीरज रो ओ अनुवाद भासाई अेकरूपता री दीठ सूं सरावणजोग कैयो जाय सकै। म्हारी हियै-तणी बधाई!

 

91KNbbN49NLपोथी : सबद-नाद / विधा : अनुवाद / अनुवादक : नीरज दइया / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर संस्करण : 2012 / मोल : 70 रिपिया।

(जागती जोत : अगस्त-सितम्बर, 2012)

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Posted on 03/01/2016, in आलोचना and tagged . Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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