‘आलोचना रै आंगणै’ री साख

कवि नीरज दइया री आलोचना पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ में कुल छोटा-मोटा अठारै लेख छप्योड़ा, जिकां रै जरियै वै इण भारत री सगळी विधावां नै सोधणै-समझणै रौ महताऊ काम कियौ।
-पारस अरोड़ा (माणक : अक्टूबर, 2011)
‘आलोचना रै आंगणै’ रो सबळ-पख इणरी उपन्यास-पड़ताल है। यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, करणीदान बारहठ, अब्दुल वहीद ‘कमल’, नंद भारद्वाज, नवनीत पाण्डे रै उपन्यासां री डॉ. दइया पड़ताल करी है। अठै ई किताबां री स्वायत्त-समीक्षा पड़ताल है। उपन्यासां रै कथ्य री खासियतां में डॉ. दइया खेचल करी है अर भासा रूपां माथै ई मैनत। आधी सूं घणी पोथी उपन्यास माथै ई केंद्रित है।
-डॉ. आईदानसिंह भाटी  (राजस्थली-117 : जनवरी-मार्च, 2012)
जिस प्रकार अठारह पुराण, गीता के अठारह अध्याय, उसी प्रकार ‘आलोचना रै आंगणै’ नीरज दइया के अठारह अध्याय कहूं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। किंतु इन अठारह अध्यायों में अनेक साहित्यकारों को जोड़कर उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास साफ झलकता है।
– देवकिशन राजपुरोहित  (दैनिक नवज्योति : 24 जुलाई, 2011)
युवा लेखक नीरज दइया आपरी पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ रै मारफत वां लेखकां रो लेखन उजागर करण री रूपाळी कोसिस करी है, जकां रो लेखन प्रमाणै बडो है, पण आपरी सादगी-सरलता रै पाण नाम रूप वो मुकाम हासिल नीं कर सकिया, जिका रा कै वै वाजिब हकदार है।
-श्यामसुंदर भारती (कथेसर : जुलाई-सितम्बर, 2013)
आलोचना साहित्य रै कसालै में नीरज दइया री पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ रो प्रकासण हुवणो इण विधा में बधेपो कैयो जाय सकै। आपां संतोष कर सकां कै चालो कीं तो हुयो।
-श्याम जांगिड़ (बिणजारो-32 : बरस-2011)
‘आलोचना रै आंगणै’ पोथी में नीं तो बेमतळब रो बिड़द बखाण है अर नीं धिंगाणै किणीं नै खारिज करणै री (कु)चेष्टा। आं दोनूं ई कमियां सूं बच’र डॉ. दइया राजस्थानी रै आधुनिक साहित्य नै स्वस्थ आलोचनात्मक दीठ सूं जांचण-परखण रो जस-जोग काम कर्यो है, जको बां रै विस्तृत अध्ययन अर ऊंडी समझ री साख भरै।
– डॉ. मदन गोपाल लढ़ा (जागती जोत : मार्च, 2012)
नई कविता के टोप-टेन कवियों क्रमश: कन्हैयालाल सेठिया, भगवतीलाल व्यास, मोहन आलोक, सांवर दइया, चन्द्रप्रकाश देवल, अर्जुनदेव चारण और ओम पुरोहित ‘कागद’ को चुनकर उनकी काव्य-यात्रा पर गंभीर विवेचन किया है। इस श्रेणी में मालचंद तिवाड़ी, वासु आचार्य, आईदान सिंह भाटी, कुंदन माली एवं स्वयं नीरज दइया सहित अन्य महत्त्वपूर्ण कवियों की कविताओं पर भी समग्रता से विचार करने की अपेक्षा थी।
-राजेंद्र जोशी (शिविरा : फरवरी, 2013)
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Posted on 21/01/2016, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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