कविता की बदलती तासीर

कविता का फ़लक उतना ही व्यापक है जितना जीवन। जीवन के तमाम रंगों को कविता के विहंगम आकाश में खिलता हुआ देखा जा सकता है। नीरज दइया की राजस्थानी कविताओं के नए संग्रह “पाछो कुण आसी” को पढते हुए इस कथन की पुष्टि होती है।
किताब की कविताएं व्यष्टि जीवन व समष्टि जीवन के मध्य सेतु रचती हैं। प्रेम कविताओं की भरी-पूरी मौजूदगी जहां कवि को राजस्थानी कविता की समृद्ध परम्परा से जोड़ती हैं वहीं सामयिक चिंताओं की सूक्ष्म अभिव्यक्ति इस संग्रह को अपने समय-समाज का प्रामाणिक दस्तावेज बना देता है। इन कविताओं में मरुभूमि खासकर बीकानेर के परिवेश का जो अंकन हुआ है, वह सजावटी नहीं, बल्कि जिया हुआ है। तकनीक का बढ़ता दायरा, अर्थप्रमुख जीवन शैली, रिश्तों में आया ठंडापन, दम तोड़ती संवेदना एवं व्यवस्था की विसंगतियों को पूरी विश्वनीयता से उजागर करने वाली इन कविताओं में मानव मन के ओनों-कोनों की बारीकी से पड़ताल हुई है। ये कविताएं पाठकों से संवाद तो करती ही है, सवाल भी उठाती है। कहना न होगा, इन सवालों की अनुगूंज ही बदलाव की जमीन तैयार करती है। “भळै जोवां बै सबद/ जिण मांय कथीज्यो/ दुनिया रो पैलो साच/ जिण बीज्या मानखै मांय/ बदलाव रा बीज” जैसी पंक्तियों में करवट लेते वक्त को महसूस किया जा सकता है। संवैधानिक मान्यता का इंतजार करती राजस्थानी भाषा की पीड़ा को प्रकट करने वाली करीब आधा दर्जन कविताएं किताब का हिस्सा बनी हैं। “बिना भासा रै/घूमा म्हे उभराणा” उस समाज के दर्द की अभिव्यक्ति है, जिसकी भाषा-संजीवनी सियासी समीकरणों की शिकार होकर रह गई है। किताब के आखिर में गद्य कविताओं की एक शृंखला शामिल हुई है जिनमें जीवन के विविध रंग प्रकाशित हुए हैं। आंतरिक लय को कलात्मक ढंग से साधती ये कविताएं शिल्पगत वैशिष्ट्य से ध्यान खींचती है। राजस्थानी कविता की बदलती तासीर को जानने के लिए यह एक जरूरी किताब मानी जा सकती है।

-मदन गोपाल लढ़ा
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पाछो कुण आसी, कवि- नीरज दइया, प्रकाशक- सर्जना, बीकानेर, पृ. 96, मूल्य 140 रु., फोन:0151 224 2023

Rajasathan-Patrika-27032016(राजस्थान पत्रिका ; रविवार 27 मार्च 2016)

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Posted on 27/03/2016, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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