Monthly Archives: अगस्त 2017

अनुसिरजण में मूळ कवितावां रौ स्वाद

Manka Jodhpur 2016

पोथी : ऊंडै अंधारै कठैई  / विधा : अनुवाद (काव्य) / मूळ : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया / संस्करण : 2016, पैलौ /  पृष्ठ : 120, मोल : 200 रुपया / प्रकासक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005

‘ऊंडै अंधारै कठैई’ नीरज दइया रौ करियोड़ौ अनुसिरजण है, जिकौ पढतां बगत मूळ कवितावां रौ स्वाद चखावै। हिंदी रा चावा-ठावा कवि नंदकिशोर आचार्य री कवितावां, जिकै वां रै चवदै काव्य संकलनां में पसरियोड़ी ही, दइया आपरी दीठ सूं उण मांय सूं टाळ’र वां री टाळवीं कवितावां राजस्थानी में पाठकां तांई पुगाई है। वै इण किताब में कैयौ है के- “अनुसिरजण मूळ कविता रौ भावाभिनय व्हिया करै।” आपरी बात नै आगै बधावता वै कैवै- “औ अनुसिरजण करतां दोय बातां म्हैं खास ध्यान राखी। एक तौ आ के चावी-ठावी अर न्यारै-न्यारै पोत री कवितावां बानगी रूप ली जावै, दूजी बात के बै कवितावां ली जावै जिकी आपाणी भासा र इण धरा री मनगत सूं जुड्योड़ी है।” नीरज दइया इण अनुसिरजण में इण दोनूं बातां नै पोखी है अर आचार्य जी री कवितावां रै मरम तक पूग’र वां री सौरम पाठकां तक पुगावाण में सफळ व्हिया है। अज्ञेय रै चौथा सप्तक रा कवि नंदकिशोर आचार्य राजस्थान री हिंदी कविता रौ आगीवाण नाम है अर राजस्थानी आंचलिकता री सौरम हिंदी रै माध्यम सूं वां देस-परदेस में बिखेरी है। इण सौरम नै राजस्थानी पाठकां तक पुगावण रौ ठावकौ अर अजरौ काम भाई नीरज दइया कीनौ है जिण री किरणां ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ में रूपास रै साथै पळकै है। अनुसिरजण में अबखौ काम व्है मूळ आतमा रौ संवेदन पकड़णौ अर दूजी भासा में लावणौ, साखकर कविता में तौ घणौ अबखौ। पण नीरज दइया इण काम नै पूरी कूंत साथै पूरौ कीनौ है। राजस्थानी रै टकसाळी सबदां अर राजस्थानी रै मुहावरै नै परोट’र वां इण काम नै सांस्कृतिक रूप सूं पूरौ कीनौ है। आंचळिकता रै सागै पौराणिक चरित्रां री कवितावां रा भाव अर विचारबिंब साधण रौ अजरौ अनुसिरजण राजस्थानी पाठकां नै एक हिंदी कविता रौ स्वाद चाखण री निछरावळ भर है। म्हनै आ निछरावळ इण गत दीखी है- “नीं हुवै कवि रौ कोई घर/ बस जोवतौ इज रैवै घर/ बिंया बौ दीसतौ रैवै भासा मांय/ पण जिंया आभै मांय/ रैवै पंखेरू/” अर पंखेरू ज्यूं उठतै कवि रै एक घर नै, धरती माथै उतार’र दूजी भासा रै खोलियै बसावण रौ ठावकौ जतन नीरज दइया कीनौ है। इण जतन नै भाई मोहन आलोक इण गत सरायौ है- “ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री श्रेष्ठता ई कही जावैला के औ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै, बठै ई केई कवितावां रौ शब्दशः अनुवाद ई पाठकां साम्हीं राखै।” आचार्यजी री कलम अर नीरज नै बधाई।
आईदानसिंह भाटी, 8 बी-47, तिरुपति नगर, नांदड़ी, जोधपुर
(‘माणक’ मासिक जोधपुर / मई 2016)

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डॉ. आचार्य की रचनाओं का मनमोहक कॉलाज

DY 18-09-2016

कविताओं की मार्मिक अनुभूति

DNJ 31-07-2016

अनुवाद के आंगन में गूंजती रेत-राग

RP 06-08-2017

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डेली न्यूज़ में

01052016

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचयन : डॉ. नीरज दइया) ; संस्करण 2017 ; कीमत 100/-  ;  पृष्ठ- 96 : प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट, जोधपुर (राजस्थान)    

    
DKR PS Yugpaksha
मोहन थानवी, बीकानेर

कथा-धरोहर

dkr-ri-t-k-neeraj-daiyaमनोहर सिंह राठौड़

राजस्थान के गणमान्य साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित साहित्य जगत में एक जाना-पहचाना नाम है। इन्होंने साहित्य की प्रत्येक विधा में अपनी लेखनी चलाई है और हिंदी-राजस्थानी भाषा में समान रूप से सक्रिय राजपुरोहितजी आयु के 70 वें पायदान पर पैर जमाते हुए अभी भी लेखन में सक्रिय हैं। उनकी 70 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी सद्य प्रकाशित कृति ‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ राजस्थानी भाषा की इनकी कहानियों में से चयनित कहानियों का संचयन है। जो राजस्थान के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नीरज दइया द्वारा किया गया है। इस कथा-कृति में कुल 23 कहानियां सम्मिलित हैं। इन कहानियों में कुछ कहानियां 3-4 पृष्ठों की हैं, बाकी लघुकथाएं हैं। आधे पृष्ठ या एक पृष्ठ की ये लघुकथाएं जीवन के किसी एक पहलू या एक बिंदु को उद्घाटित करती हैं। ये कहानियां मानवीय संवेदनाओं से सराबोर हैं, जिस संवेदना का आज हमारे जीवन में सर्वथा अभाव होता जा रहा है।

‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ में संकलित कथाओं, लघुकथाओं में लोक-जीवन, लोकरस, लोक-भाषा का आस्वाद मिलता है। इनमें कहानी कहने की कला या बतरस की दैदिप्यमान झलक मिलती है। हमारी लोक संस्कृति, परंपराएं ही हमारी अस्मिता है। उन सभी तत्वों को समेटते हुए, बात कहने की शैली में इनकी प्रस्तुति इन्हें अलग मुकाम पर पहुंचाती हैं। कहानी ने कई पड़ाव पार करते हुए आज जिस स्थान पर पहुंची है वह हमारे गर्व का विषय है। इस विकास यात्रा से नई ऊंचाइयों को छूने की बात की जाती है लेकिन कहानी की पठनीयता पाठक को बांधे रखने की कला भी आवश्यक अंग है। हमारी राजस्थानी लोक-कथाओं में यही गुण प्रचुर मात्रा में था और यह होना आवश्यक है। संचयनकर्त्ता डॉ. नीरज दइया ने अपनी टीप में यह स्पष्ट किया है कि लोक कथाओं के कथारस का संवर्द्धन करने से ही हमारी कहानी विधा पूर्णतया समृद्ध होगी।

राजपुरोहितजी की कहानियों में यह लोककथाओं का कथारस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है इसलिए ये पाठकों को आकर्षित करती हैं। एक बार पढ़ना प्रारंभ करने के पश्चात पुस्तक को आंखों से परे हटाने का मन नहीं करता है। छोटी कहानियां और लघुकथाएं थोड़े समय में पढ़ी जाती हैं। आज की भागमभाग जिंदगी में इनका पढना सहज-सरल है। राजपुरोहितजी राजस्थानी जन जीवन व संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं। इनकी वेशभूषा, भाषा ठेठ राजस्थानी है। मुख्य रूप से राजस्थान की संस्कृति को जीने वाले राजपुरोहितजी ने अपने अनुभवों को कल्पनाओं तथा लोककथाओं के साथ मिलाकर अनूठा प्रभाव पैदा किया है। इससे ये कथाएं सभी को प्रिय लगती हं। इन में स्वयं में राजस्थानी जन जीवन की झलक मिलती है। एक अच्छे साहित्यकार के अनुसार इस में भाषायी सरलता, सादगी, ताजगी, अपनापन झलकता है। दुरुहता नहीं होने से इनका लेखन पाठकों को सरलता से जोड़ लेता है। पाठक में अपने या आसपास के अनुभव से उपजी कहानियां मोहित करती हैं।

नाटकों, फिल्मों, टी.वी. धारावाहिकों में काम कर चुके मूर्धन्य साहित्यकार राजपुरोहितजी के राजस्थानी कथा साहित्य में से बानगी के रूप में ये कथाएं प्रस्तुत करते हुए डॉ. नीरज दइया ने स्तुत्य कार्य किया है। राजस्थान की समृद्ध लोक कथाओं की याद दिलाने वाली इस पुस्तक में बतरस का आनंद व प्राचीन बातपोश शैली की याद ताजा हो जाती है। हास्य व्यंग्य का पुट इन में चमत्कार भर देता है। इन में पुराने गांव व लोक विश्वास की ओर भी इंगित किया गया है। अशुद्धि रहित, साफ छपाई से अच्छी बनी पुस्तक का मुख पृष्ठ भी सादगी लिए आकर्षक है।


देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचयन : डॉ. नीरज दइया) ; संस्करण 2017 ; कीमत 100/-  ;  पृष्ठ- 96 : प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट, जोधपुर (राजस्थान)          


संपर्क : 421- ए, हनुवंत-ए, मार्ग-3, बी.जे.एस. कॉलोनी, जोधपुर-342006 

ओम पुरोहित कागद पोथी सुरंगी संस्कृति

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