अनुसिरजण में मूळ कवितावां रौ स्वाद

Manka Jodhpur 2016

पोथी : ऊंडै अंधारै कठैई  / विधा : अनुवाद (काव्य) / मूळ : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया / संस्करण : 2016, पैलौ /  पृष्ठ : 120, मोल : 200 रुपया / प्रकासक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005

‘ऊंडै अंधारै कठैई’ नीरज दइया रौ करियोड़ौ अनुसिरजण है, जिकौ पढतां बगत मूळ कवितावां रौ स्वाद चखावै। हिंदी रा चावा-ठावा कवि नंदकिशोर आचार्य री कवितावां, जिकै वां रै चवदै काव्य संकलनां में पसरियोड़ी ही, दइया आपरी दीठ सूं उण मांय सूं टाळ’र वां री टाळवीं कवितावां राजस्थानी में पाठकां तांई पुगाई है। वै इण किताब में कैयौ है के- “अनुसिरजण मूळ कविता रौ भावाभिनय व्हिया करै।” आपरी बात नै आगै बधावता वै कैवै- “औ अनुसिरजण करतां दोय बातां म्हैं खास ध्यान राखी। एक तौ आ के चावी-ठावी अर न्यारै-न्यारै पोत री कवितावां बानगी रूप ली जावै, दूजी बात के बै कवितावां ली जावै जिकी आपाणी भासा र इण धरा री मनगत सूं जुड्योड़ी है।” नीरज दइया इण अनुसिरजण में इण दोनूं बातां नै पोखी है अर आचार्य जी री कवितावां रै मरम तक पूग’र वां री सौरम पाठकां तक पुगावाण में सफळ व्हिया है। अज्ञेय रै चौथा सप्तक रा कवि नंदकिशोर आचार्य राजस्थान री हिंदी कविता रौ आगीवाण नाम है अर राजस्थानी आंचलिकता री सौरम हिंदी रै माध्यम सूं वां देस-परदेस में बिखेरी है। इण सौरम नै राजस्थानी पाठकां तक पुगावण रौ ठावकौ अर अजरौ काम भाई नीरज दइया कीनौ है जिण री किरणां ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ में रूपास रै साथै पळकै है। अनुसिरजण में अबखौ काम व्है मूळ आतमा रौ संवेदन पकड़णौ अर दूजी भासा में लावणौ, साखकर कविता में तौ घणौ अबखौ। पण नीरज दइया इण काम नै पूरी कूंत साथै पूरौ कीनौ है। राजस्थानी रै टकसाळी सबदां अर राजस्थानी रै मुहावरै नै परोट’र वां इण काम नै सांस्कृतिक रूप सूं पूरौ कीनौ है। आंचळिकता रै सागै पौराणिक चरित्रां री कवितावां रा भाव अर विचारबिंब साधण रौ अजरौ अनुसिरजण राजस्थानी पाठकां नै एक हिंदी कविता रौ स्वाद चाखण री निछरावळ भर है। म्हनै आ निछरावळ इण गत दीखी है- “नीं हुवै कवि रौ कोई घर/ बस जोवतौ इज रैवै घर/ बिंया बौ दीसतौ रैवै भासा मांय/ पण जिंया आभै मांय/ रैवै पंखेरू/” अर पंखेरू ज्यूं उठतै कवि रै एक घर नै, धरती माथै उतार’र दूजी भासा रै खोलियै बसावण रौ ठावकौ जतन नीरज दइया कीनौ है। इण जतन नै भाई मोहन आलोक इण गत सरायौ है- “ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री श्रेष्ठता ई कही जावैला के औ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै, बठै ई केई कवितावां रौ शब्दशः अनुवाद ई पाठकां साम्हीं राखै।” आचार्यजी री कलम अर नीरज नै बधाई।
आईदानसिंह भाटी, 8 बी-47, तिरुपति नगर, नांदड़ी, जोधपुर
(‘माणक’ मासिक जोधपुर / मई 2016)

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Posted on 06/08/2017, in आलोचना. Bookmark the permalink. टिप्पणी करे.

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