ज्यों की त्यों धर दीनी….. / विजय माथुर

NEERAJ DAIYA            रेतीले राजस्थान के बीकानेरी साहित्यकार डॉ. नीरज दइया की पुरस्कृत आलोचना कृति ‘बिना हासलपाई’ उनके अपने सरोकारों, प्रतिबद्धताओं तथा प्रतिश्रुचियों का सुचिंतित पाठ है। इसमें भाषा के संयमित, सौंदर्यवाद के बावजूद उनमें सख्ती का स्वर भी सुनाई पड़ता है। इसकी प्रतिध्बनि एक साक्षात्कार में सुनाई पड़ती है कि, ‘मेरा काम तो आलोचना का सृजन जैसे रचना है। रचना प्रक्रिया में उन्होंने बहुत सारे पहलुओं को खोलती हुई टिप्पणियां भी की हैं, ’आलोचना में किसी लेखक के आत्म सम्मान पर चोट न हो, इस बात के प्रति सजग रहता हूं साथ ही अपने लेखक को बड़ा मानकर उसके पीछे-पीछे चलने का प्रयास करता हूं। डॉ. नीरज दइया ने अपने सृजन चिंतन के बूते समकालीन साहित्य को भी गहराई से प्रभावित करने का प्रयास किया है कि, ‘मैं मूल रूप से रचनाकार हूं और आलोचना का काम भी उसे रचना मानकर करता हूं। डॉ. दइया सार्थक रचनात्मकता के कर्ता हैं तो अपने आपको सखा आलोचक की भूमिका से अलग करते हुए स्पष्ट कहते हैं कि, ‘बिना हासलपाई आलोचना पुस्तक की एक सीमा है। हर पुस्तक की होती है और मेरा मानना है कि, आलोचना में कोई मित्र नहीं होता।” डॉ. दइया अपने आलोचनात्मक भाव में विचारधार के साथ दृढ़ता से जुड़े हुए चिंतक नजर आते हैं, जब वे कहते हैं कि, ‘बिना हासलपाई में उन कहानीकारों को लिया गया है जिन पर पर्याप्त ध्यान आलोचना ने नहीं दिया है। किंतु कुछ ऐसे कहानीकारों को छोड़ दिया गया है, जिन्होंने कहानियां तो कम लिखी हैं, लेकिन बातें बहुत की अथवा अपने कहानीकार होने को बहुत प्रचारित करवाया। उनका वाचिक विमर्श जयकार के अतिरेक से बोझिल आत्ममुग्ध कथाकारों की पांत को बेबाकी से परिभाषित करता है। डॉ. दइया की यह विचार दृष्टि उन्हें सदाबाहर आलोचकों और रचनाकार रिझाऊ आलोचकों की भीड़ से अलग करती है।

डॉ. दइया का लेखन ठिठका हुआ नहीं है। लेकिन अपनी आलोचना प्रविधि के बारे में स्पष्ट कहते हैं कि आलोचना का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं होता। मैं लिखते समय बस लिखता हूं। किसी दिन क्या और किन… किन पर ध्यान बंटने लगेगा तो मेरा लेखन अवरुद्ध हो जाएगा। उन्होंने अपने आलोचना कर्म में लिखने का कारण और अंर्तप्रेरणा का परिचय देते हुए अपनी वैचारिक सामर्थ्य का भी खुलासा कर दिया है कि, ‘वैचारिक प्रवाह में घिरने के बाद लेखन में कोई अबरोध नहीं रह जाता।

कहानी विधा पर केंद्रित आलोचना कृति ‘बिना हासलपाई’ को परिभाषित करते हुए समीक्षक देवकिशन राजपुरोहित कहते हैं, ‘बिना हासलपाई का मतलब है बिना कुछ जोड़ या कम किए जैसी रचनाएं हैं, उनके गुण-दोष सप्रभाव अंकित कर दिए हैं, मतलब ज्यों की त्यों धर दीनी…. । पूरी पुस्तक में उन्होंने चर्चित और चुनिंदा 25 रचनाकारों की रचनाओं की परख की है। कई कहानीकारों की विधागत कमियों को गिनाया है तो पुर्नलेखन की गई रचनाओं को भी नहीं छोड़ा है। समीक्षक राजपुरोहित के अनुसार डॉ. नीरज दइया ने एक इशारा कवि से कहानीकार बने कहानीकारों की कहानियों और दूसरी भाषा से राजस्थानी में आए कहानीकारों की कहानियों की कमजोरी की तरफ भी किया है। कृति के आरंभ में कहानी आलोचना और कहानी विधा पर खुलकर बात की है तो कहानी के शिल्प और संवेदना पर भी अपना नजरिया स्पष्ट किया है। डॉ. दइया की लेखकीय समग्रता में समीक्षक का मूल्यांकन एक खास तरीके से उनकी पहचान कराता है। इस पुस्तक से कथाकार हसन जमाल की कृति ‘यह फैसला किसका था?’ पर की गई समीक्षक टिप्पणी ताजा हो जाता है कि, ‘राजस्थानी भाषा का प्रयोग कथा-भाषा और वातावरण को जीवंत कर देता है।”

समीक्षक भवानी शंकर व्यास आलोचना के प्रस्थान बिंदु के रूप में उनके ‘साहस’ को स्थापित करते हैं। उनकी टिप्पणी पुस्तक को प्रासंगिक बनाती है कि,‘डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है, क्यों कि कथा शब्द में कहानी और उपन्यास दोनों का समावेश होता है। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम उत्पन्न करता है। यह टिप्पणी कई सवाल छोड़ती नजर आती है कि, ‘फिर साहित्य अपने समय के प्रश्नों से मुठभेड़ नहीं कर पा रहा? अपनी आलोचकीय दृष्टि में डॉ. दइया, ‘आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना मानकर चलते हैं…. तो साहित्य की बढ़ती प्रासंगिकता और साहित्य के बढ़ते दायित्व को भी रेखांकित करते हैं। साहित्य में बढ़ते दायित्व को भी रेखांकित करते हैं। शैक्षणिक पत्रिका ‘शिविरा’ के नवम्बर 2015 के अंक में डॉ. दइया के बारे में सटीक टिप्पणी की गई थी कि, ‘उनके पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में ना पड़कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहानीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुर सुहाती की है और न ही जानबूझकर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा की है।

प्रसंगवश यहा मशहूर समालोचक नामवर सिंह की टिप्पणी का उल्लेख आवश्यक है। उनका कहना था, आलोचना केवल अपने समकालीन साहित्य का क्लीयरिंग हाऊस नहीं है। आज जो लिखा जा रहा है, उसमें क्या सार्थक है, क्या निरर्थक है और अच्छा है, उसकी छानबीन आवश्यक है तभी आलोचना और रचना विकसित होगी। डॉ. दइया आलोचना को रचना धर्म से अलग नहीं करते, किंतु नामवर सिंह का कहना था, ‘आलोचना रचना के साथ-साथ चलती है, पर एक कदम आगे। यद्यपि उन्होंने आलोचकों की कोटियों का दिलचस्प निर्धारण करते हुए उन आलोचकों की खबर ली है जो बराबर रचना के साथ ही चलते हैं पर रचना से एक कदम आगे चलने की हिम्मत नहीं रखते।

० तहलका (31 जनवरी 2018)

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