राजस्थानी कहानी का वर्तमान

दस कहानी-संग्रहों पर केंद्रित आलोचना-पुस्तक / संपादक : डॉ. नीरज दइया
राजस्थानी कहानी का वर्तमान संपादक- डॉ. नीरज दइया।
—————————
।। मायड़ भाषा के लिए दमदार प्रयास।। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’
—————————
डॉ. नीरज दइया सम्पादित यह ग्रंथ एक तरफ राजस्थानी कहानी लेखकों को प्रोत्साहित करने का बड़ा प्रयास है दूसरी तरफ उन लोगों तक राजस्थानी साहित्य पहुंचाना है जो मानते हैं कि राजस्थानी भाषा नहीं; बोली है।
संपादक ने मायड़ भाषा के प्रति गर्व व्यक्त करते हुए लिखा है – यह भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। राजस्थानी भाषा के रचनाकारों की भावना को संपादक ने वजनदार शब्दों में अभिव्यक्त किया है।
डॉ. दइया ने भाषा के मुद्दे को जोरदार शब्दों में उठाते हुए भारतीय कहानी साहित्य में क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान को पुनर्स्थापित किया है।
आज की राजस्थानी कहानी अन्य भाषाओं की आधुनिक कहानियों से कहीं भी कमतर नहीं है। बात या लोककथा की परिपाटी का जो ठप्पा राजस्थानी कहानी पर लगा हुआ था वह अब उतर चुका है।
उन्होंने सन 1956 से वर्तमान तक के राजस्थानी कहानी-सृजन को चार अध्यायों में बांटते हुए राजस्थानी कहानी के नामचीन कहानीकारों के कहानी-संग्रहों, कहानियों व प्रवृत्तियों को भी समेटने का सराहनीय प्रयास किया है।
राजस्थानी कहानी यात्रा को स्पष्ट करते हुए डॉ. नीरज दइया ने केवल अपने विचार ही नहीं बल्कि अनेक साहित्यकारों यथा- रामेश्वरदयाल श्रीमाली, डॉ. अर्जुनदेव चारण, कुंदन माली, सांवर दइया, गोरधन सिंह शेखावत आदि के उद्धरण भी सम्मिलित करते हुए राजस्थानी कहानी के अतीत और वर्तमान को शानदार तरीके से प्रस्तुत किया है। 10 कहानीकारों की कहानियों पर 10-10 साहित्यकारों द्वारा आलोचना और उसे पुस्तक रूप में संजोने का प्रयास राजस्थानी भाषा के साहित्य में विशेष योगदान है।
—————————
।। पुस्तक स्वयं में एक संदर्भ ग्रंथ ।। अरविन्द सिंह आशिया
—————————
डॉ . नीरज दैया एक अद्भुत दृष्टि रखते है साहित्य सृजन व एवं अवलोकन की । रचा जा रहा है राजस्थानी में मगर विपुल नहीं क्योंकि हमारी भाषा पिछले सात दशकों से प्रतीक्षारत् है अपनी अस्मिता हेतु इसलिए सिर्फ वो लिख रहे है जो जो झूंझार है … शेष ने शायद अपने घोड़े अवसर की छाया में बाँध लिए है ।
लिखने में भी गद्य नहीं के बराबर .. क्योंकि गद्य समय व श्रम दोनों माँगता है । ऐसा नहीं कि कविता लिखना आसान है पर एक दूसरे की पीठ खुजाने वाले अकवि तथाकथित कविता में में इतने अधिक है (डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल सर के मुताबिक़ अकेले जयपुर में पचास हज़ार के क़रीब)कि कविता ही शर्मिन्दा है पर वो पठ्ठे ख़ुद को बेशर्मी से कवि कहते है ।
सो ऐसे मे राजस्थानी कहानी रचन पर यह पुस्तक स्वयं में एक संदर्भ ग्रंथ है । मेरी बधाई देने वाले मित्रों से अनुरोध है कपड़े झटक के रवाना होने के बजाय इसे ख़रीदे व अपनी धरोहर बनाएँ ।
—————————
।। कहानी यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव ।। मदन गोपाल लढ़ा
—————————
वरिष्ठ कवि आलोचक डॉ नीरज दइया द्वारा संपादित “101 राजस्थानी कहानियां” एक ऐसी किताब है जिसे राजस्थानी कहानी यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव कह सकते हैं। निश्चय ही इस किताब के माध्यम से राजस्थानी कहानी की महक हिंदी के विस्तृत आंगन में पहुंचेगी। कहना न होगा, कथ्य और शिल्प की दृष्टि से राजस्थानी कहानी विश्व की किसी भी किसी भी भाषा की कहानियों से कहीं कमतर नहीं है। इस किताब को पढ़ते हुए सहज रूप में इस तथ्य को महसूस किया जा सकता है। यह संग्रह इस बात की भी साख भरता है कि विषय वस्तु की दृष्टि से राजस्थानी कहानी का दायरा ग्रामीण जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि नगरीय और महानगरीय जीवन के साथ साथ तकनीक के इस युग में मानवीय संवेदनाओं का विश्वसनीय अंकन राजस्थानी कहानीकारों ने बखूबी किया है। राजस्थानी की पहली कहानी से लेकर 21वीं सदी के दूसरे दशक तक की कहानियों का जायका आप इस संग्रह के माध्यम से ले सकते हैं। एक सौ वर्षों से अधिक कालखंड को करीब 500 पृष्ठों की इस पुस्तक में समेट कर डॉ नीरज दइया जी ने एक ऐतिहासिक कार्य किया है।
आमतौर पर अनुवाद के अभाव में भारतीय भाषाओं का श्रेष्ठ साहित्य व्यापक परिदृश्य में अनदेखा रह जाता है। राजस्थानी कहानी के मामले में भी यह बात खरी उतरती है। राजस्थानी के अत्यंत प्रतिभावान कहानीकार अनुवाद के अभाव में भारतीय साहित्य के विहंगम परिदृश्य में नोटिस में नहीं आ पाए। यह किताब हिंदी के माध्यम से राजस्थानी कहानी के उज्जवल पक्ष को सामने लाने का श्लाघनीय प्रयास प्रयास है। निश्चय ही मान्यता के लिए जूझती राजस्थानी भाषा के सामर्थ्य व वैभव से दुनिया भर को अवगत करवाने के लिए ऐसे प्रयासों की महती आवश्यकता है। डॉ दइया ने इससे पूर्व भी इस प्रकार के अनेक कार्य किए हैं जिनमें “राजस्थानी कहानी का वर्तमान”, “मंडाण” “सबद नाद” आदि। इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए प्रकाशक, संपादक, अनुवादक व कहानीकार साधुवाद के अधिकारी हैं। उम्मीद है हिंदी पट्टी के पाठकों के साथ लेखक व आलोचक भी राजस्थानी कहानी के रूप रंग को प्रामाणिकता से जानने के लिए इस किताब पर उदारता से स्नेह बरसाएंगे।
—–
वे जुनून की हद पर काम करने वाले लोगों में से एक है। ऐसे अनेकों काम हैं जो पहली बार उनकी कलम से संभव हुए हैं। राजस्थानी आलोचना की नई जमीन तलाशने का महत्वपूर्ण काम आदरजोग डॉ नीरज दइया ने गत एक दशक में किया है। “राजस्थानी कहानी का वर्तमान” के रूप में नई किताब इस सफर का एक उल्लेखनीय पड़ाव है। हिन्दी भाषा के माध्यम से राजस्थानी कहानी की समालोचना का यह नया प्रयोग वाकई अनूठा है। इस किताब की मार्फ़त राजस्थानी कहानी के रूप रंग की बात दूर तक जाएगी, इसमें संदेह नहीं। गौरतलब है कि आलोच्य पुस्तक में राजस्थानी कहानी की चुनिंदा दस किताबों पर दस-दस टिप्पणियों को प्रस्तुत किया है। भूमिका में संपादक ने राजस्थानीे कहानी की विकास यात्रा व वर्तमान परिदृश्य पर विस्तृत प्रकाश डाला है। कहना न होगा, चर्चा के लिए किताबों का चयन संपादक-आलोचक की पसंद का मसला है। असल में तो यह बीजारोपण है। इस काम को आगे बढाने के लिए खुला मैदान पड़ा है। कल कोई अपनी पसंद की चुनिंदा एक सौ किताबों पर बात करे तो उसका भी स्वागत ही होगा।
बहरहाल इस जरूरी व सार्थक काम के लिए डॉ नीरज दइया को असीम बधाई व लखदाद। किताब प्राप्ति के लिए प्रकाशक से सम्पर्क किया जा सकता है।
——–
डॉ. दइया संपादित ‘राजस्थानी कहानी का वर्तमान’ 264 पृष्ठों की आलोचनात्मक कृति है। राजस्थानी कहानी साहित्य की खासियत को हिंदी जगत के समक्ष रखने का अनूठा कार्य है यह। इस पुस्तक में राजस्थानी के 10 आधुनिक कहानी संग्रहों पर 10-10 समीक्षाएं शामिल हैं।
-सत्यनारायण सोनी
———–
‘बारीक बात’ (रामस्वरूप किसान), ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ (बुलाकी शर्मा), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (मधु आचार्य ‘आशावादी’), ‘अगाड़ी’ (राजेन्द्र जोशी), ‘कथा-२’ (अरविन्द सिंह आशिया), ‘मेळौ’ (राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’), ‘मेटहु तात जनक परिताप’ (पूर्ण शर्मा ‘पूरण’), ‘धान कथावां’ (सत्यनारायण सोनी), ‘च्यानण पख’ (मदन गोपाल लढ़ा) व ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ (सतीश छिम्पा) पर केंद्रित कहानी आलोचना-पुस्तक / संपादक : डॉ. नीरज दइया
——–
101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
प्रकाशन वर्ष : 2019 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s