सौ रुपये का नोट / नीरज दइया

मुझे तीन दिन हो गए, घर से बाहर बिल्कुल बाहर नहीं निकला। गली में भी नहीं। वैसे कुछ पड़ौसी गली में बैठ कर बातें करते हैं पर मेरा विचार है कि जब सबको घर में रहने का कहा गया है तो घर में ही रहना चाहिए। आज मजबूरी में सड़क तक आना पड़ा तो मैं पूरी सावधानी के साथ आया हूं। मास्क लगा कर और जेब में सेनेटाइजर की बोलत लेकर डरते डरते निकला हूं। बेटा बोला भी- पापा आप तो ऐसे डर रहे हो जैसे कोरोना बाहर बैठा आपका ही इंतजार कर रहा है। आप घर में बैठो। बताओ क्या लाना है, मैं ले आता हूं। मैंने कहा- नहीं तुम नहीं। सड़क पर पुलिस वाले होंगे और तुमको देखकर वे पूछताछ करेंगे। कौन हो, क्यों बाहर आए हो, कहां जा रहे हो? मुझे देखकर कुछ नहीं पूछेंगे। लड़का ने मुस्कान बिखेरते हुए पूछा- क्यों? मैंने कहा- मैं मास्क लगा कर जा रहा हूं, तुम नहीं लगाओगे। तुमको लगता है लोग हंसेंगे। और लोगों का क्या, अपनी सुरक्षा अपने हाथ में है। और मैं हाथ में एक छोटा थेला लेकर निकल पड़ा।

सड़क पर दो पुलिसकर्मी दिखाई दिए। डंडा लिए हुए थे और दिखते भी रोबदार थे। मैं डरा डरा सुस्त कदमों से परचून की दुकान को देखते उसकी तरफ चलता गया। दो ग्राहक सामान ले रहे थे। मैं दुकान से कुछ दूर खड़ा हो गया। एक ने नाक और मुंह को रुमाल से ढक रखा था तो दूसरे ने शायद अपनी बहन की चुन्नी से पूरे चेहरे को ही बंद कर रखा था। आंखों के आगे काला चश्मा लगाए हुए था। दोनों सामान लेकर हटे तो मैं दुकान की तरफ बढा। दुकानदार ने भी मास्क लगा रखा था। मैंने उसे सामान की पर्ची पकड़ा दी। जिस पर छोटा-मोटा जरूरी सामान लिखा था। उसने मुझसे कहा- थेला दो। मैंने कहा- यहां काउंटर पर सामान रख दो मैं उठा कर डाल लूंगा। वह सामान रखता गया और मैंने एक-एक सामान को बहुत ध्यान से उठा-उठा कर थेले के हवाले कर दिया। वह बोला- एक सौ बाइस। मैंने एक सौ तीस रुपये काउंटर पर रखे और बोला- आठ रुपये की टोफी दे दो। उसने काउंटर पर टोफी रखी और मैंने पहले की भांति सावधानी से उन्हें थेले में डाल लिया। एक आदमी दुकान पर सामान लेने मेरे पास आने लगा तो मैंने उसे संकेत किया कि दूर रहे।

पुलिसवालों ने मुझे कुछ नहीं कहा। दुकान से पांच कदम चला कि पास वाले मंदिर के पुजारी मिल गए। मैंने हाथ जोड़े और नमस्कार कहा। वे बोले- खुश रहो। पर बड़ा अनर्थ हो गया। यह कोरोना क्या हुआ अब तो कोई भक्त मंदिर ही नहीं आता। और पंडितों का कोई कारोबार तो चलता नहीं। दान-दक्षिणा पर ही घर चलता है। मैंने जेब से एक सौ का नोट निकाला और उनकी तरफ बढ़ा दिया। वे बोले- मेरा मतलब यह नहीं था। मैंने संकेत किया इसे रखें और श्रद्धा से उन्हें फिर नमस्कार किया। उन्होंने नोट ले लिया और उनके चेहरे पर एक चमक आ गई, मैंने विचार किया कि पंडित जी सोच रहे हैं- काश! सारे भक्त, मेरे जैसे हो जाएं। उन्होंने फिर कहा- मैंने तो बस यूं ही कहा था। मैंने कहा- रखिए। और हाथ से विदा कहते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ गया। गली में पड़ौस के दो तीन सज्जान खड़े थे और मुझे मास्क लगाए हाथ में थेला लिए देख मुस्कान बिखेरने लगे। एक ने पूछने के लहजे में कहा- सामान ले आए क्या? मैंने सहमति में सिर हिलाया। वे हंसते हुए बोले- ठीक है, ठीक है। लाना ही पड़ता है। ना जाने कोरोना कब पीछा छोड़ेगा।

घर का मेन गेट लड़के ने खोला और प्रवेश द्वारा भी। मैंने थेले को एक कोने में रख दिया कि कोई हाथ नहीं लगाएगा। कल इस सामान को काम लेंगे और खुद साबुन से हाथ धोने लगा। हाथ ऐसे धोए जैसे थोड़ी सी देर बाहर जाने से बहुत मैल हाथों पर चढ गया हो। फिर मास्क उतारा और उसे अपने ऑफिस बैग में रख दिया। बेटा हंस रहा था। मैंने कहा- हंसने की बात नहीं है। सावधानी जरूरी है और अपने पेंट-शर्ट भी बदल लिए। पत्नी से बोला- मेरे कपड़े गर्म पानी से धोना।

वह चाय बना लाई और मैंने उसे बताया कि सड़क पर पंडित जी मिले थे। वह तपाक से बोली- उन्हें कुछ दिया क्या? उसमें भक्तिभाव कुछ अधिक ही है। सारी बात जानकर खुश हुई और बोली- ठीक किया। लड़का बीच में बोला- आप बता तो ऐसे रहे हो जैसे पांच सौ रुपये दे कर आए हो।

गली में कुछ हलचल हुई तो लड़का बाहर की तरफ देखने गया और भीतर आकार बोला- सब्जी वाली गाड़ी आई है। सब्जी लेनी है क्या? पत्नी के ‘हां’ कहने पर वह बोला- बताओ क्या-क्या और कितनी-कितनी लानी है। मैंने उससे कहा- तुम रहने दो। मैं लेकर आ जाऊंगा। वह फिर बोला- क्या गली में जरा सा निकलने में भी मास्क लगा कर बाहर जाओगे। लोग हंसेंगे। वह नाराज होने लगा। मैंने कहा- लोगों के हंसने या रोने से हमें क्या? हम हमारा काम कर रहे हैं और मास्क लगाना जरूरी है। पत्नी से पूछा- सब्जी घर में कितनी और क्या-क्या है? वह बोली- सब खत्म हो गई। जो कुछ मिले ले आओ। दो-तीन दिन के लिए साथ ही ले आना। आलू, प्याज, टमाटर और मिर्च तो चाहिए ही चाहिए। कोई हरी सब्बजी हो तो देखना। मैंने जल्दी से मास्क लगाया और बाहर निकल आया। जेब में पर्श से रुपये रख लिए थे। गाड़ी के पास पहुंचा तब वह जाने वाली ही थी। मैंने आवाज लगाई- भैया, जरा रुकना। गाड़ी रुक गई। आलू, प्याज, टमाटर, मिर्च, तोरू, भिंडी, करेला जो ठीक लगा और जो ठीक दिखा सभी ले लिए। उसने एक बड़ी थेली में सामान डाल दिया तो मैंने कहा कितने हुए? पांच सौ का नोट उसकी टोकरी में रख दिया। छुट्टे हो जाएंगे। उसने एक सौ पचास रुपये वापस दिए। मुझे आश्चर्य हुआ कि साढ़े तीन सौ रुपये की सब्जी हो गई। मैंने कहा- भैया, भाव ठीक लगाए हैं क्या? वह बोला- जी साहब। मंडी में ही सब्जी महंगी है और पास वाली मंडी तो बंद है। हम तो बाहर वाली से लाएं है। आपके वैसे होते तो तीन सौ पचपन है, पर पचास काटे हैं।

मैंने बहस नहीं की और ना ही फिर कुछ पूछा। थेली के नीचे हाथ लगाया और घर में गोली की तरफ सप से आ गया। सोचा पड़ौसी देख कर सोचेंगे- इतनी सब्जी। और घर में जैसे पहले थेला रखा था उसके पास ही सब्जी को रख दिया। कहना जरूरी नहीं था, फिर भी बोला- बहुत मंहगी है सब्जियां। हाथ धोने की कसरत फिर से करने लगा। दरवाजा बजा। मैंने लड़के से कहा- देख कौन है? उसने देखा और बोला- पता नहीं कौन है? मैंने कहा- बाहर जाकर पूछ तो सही। कोई दरवाजा बजा रहा है और तुम अंदर से देख रहो हो। वह बाहर गया तब आवाज आई- सब्जी अभी साहब लाए थे क्या? उसने बोला- हां। मैंने हाथ धो लिए थे और देखा बेटा सौ का नोट और पर्ची लेकर आया था। वह बोला- आप सौ रुपये अधिक देकर आ गए थे। हिसाब भी सही नहीं किया क्या? मैं क्या कहता, बस चुप रहा और जरा सी मुस्कान बिखेर दी होंठों पर। पत्नी पास ही बैठी थी। वह बोली- बाहर कोरोना बैठा था इसलिए तेरे पापा जल्दी में आ गए बिना ठीक से हिसाब किए। मैंने कहा- यह पर्ची और सौ का नोट उधर एक तरफ रख दे और हाथ ठीक से धो ले। बेटा बोला- सच्ची।

डॉ. नीरज दइया

Rajasthani Patrika 23-04-2020

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