स्नेक चार्मर / नीरज दइया

जैसे-जैसे जन्मदिन नजदीक आता जा रहा था, वैसे-वैसे उस दिन को लेकर अनेक बातें ध्यान में आ रही थी। पहली तो यही कि मोहन काफी दिनों से उधेड़-बुन में था कि जब वह स्टेज से थैंक्यू बोलेगा, तब क्या कहेगा। जिसका भी जन्मदिन होता है, वह स्टेज पर रहता है और बर्थ-डे सोंग के बाद थैंक्यू के साथ ही उसे बताना होता हैं कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। उसे याद है कि उसके जिगरी दोस्त हरिप्रसाद ने इंजिनियर बनने का कहा था। और संगीता जो उसके पड़ोस में रहती है, उसने डॉक्टर बनने का सपना बताया था। मोनिटर रवि ने टीचर बनने की बात कही थी। इन सब के बीच मोहन सोच रहा था कि वह क्या कहेगा?
उसने पापा से इस बारे में बात की तो पापा ने कहा उन्हें तो इंजिनियर बनना अच्छा लगता है। उसने एक बार सोच लिया कि अगर पापा को इंजिनियर बनना अच्छा लगता है तो वह अपने बर्थ-डे के दिन स्टेज से बोलेगा कि वह इंजिनियर बनना चाहता है। समस्या तब बढ़ गई जब मम्मी ने उसे एक नया ही सुझाव दे दिया। मम्मी ने कहा- ‘देश-सेवा के लिए आर्मी ऑफिसर बनाना सबसे अच्छा है।’ मोहन को यह बात भी अच्छी लगी। अब उसके मन में इंजिनियर और आर्मी ऑफिसर के बीच एक जंग होने लगी। दोनों में से किसे चुना जाए, किसे छोड़ा जाए। मम्मी की बात का मान रखे या पापा की।
इसी बीच मोहन अपनी यह दुविधा बताए बिना आपने दादाजी से पूछ बैठा- ‘दादाजी-दादाजी, एक बात तो बताओ..।’
दादाजी बोले- ‘पूछो एक क्यों, दो बातें पूछो।’
– ‘दादाजी हमारे स्कूल में जब मेरा जन्मदिन मनाएंगे, तब मुझे थैंक्यू के साथ माइक पर बताना होगा कि मैं बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूं। आप बताओ मैं क्या बनूं?’
दादाजी हंसने लगे और जब उनकी हंसी थमी तब वे बोले- ‘इतनी सी बात थी? अरे, मैंने सोचा ना जाने क्या पूछने वाला है। इसमें सोचने जैसी कोई बात ही नहीं है रे। तू मेरा पोता है और बड़ा होकर बिजनेस करना। नौकरी में जितना पैसा है, उससे कई गुना पैसा और फायदा बिजनेस में है। अब देख तेरे पापा को, छोटी-सी नौकरी है और आए दिन इधर-उधर बदली होती रहती है। हमने कितने शहर बदल लिए। अब तो एक ही इच्छा है कि तू बड़ा होकर बिजनेस खोल ले और खूब कमाई करे। यह शहर-शहर भटकना अब मुझे अच्छा नहीं लगता।
मोहन को बिजनेस का कुछ भी समझ नहीं आया। उसे यह देखकर अच्छा लगा कि दादाजी खुश हो गए हैं। उसने मुस्कुराते हुए सोचा कि मेरे जन्मदिन वाले दिन जो होगा, देखा जाएगा। इस जरा-सी बात के लिए अभी से परेशान नहीं होना है। फिर ऐसा भी तो नहीं है कि जो बोल दिया वही एकदम पक्का है। उसे बदला भी तो जा सकता है। उसे उन बच्चों के नाम याद आ गए, जिन्होंने अपने पिछले जन्मदिन पर जो कुछ बताया था उसे इस बार बदल लिया था। बड़े होकर जो बनना होता है वह अपने आप हो जाता है। पापा भी तो क्रिकेटर बनना चाहते थे, बने क्या? उसे मम्मी का ध्यान आया, मम्मी भी तो अपने स्कूली दिनों में कुछ बनना चाहती थी। अब तो वह केवल मम्मी ही बनी हुई है। फिर दादीजी का भी तो यही हाल हुआ है। वे भी तो घर ही रहतीं हैं। दादाजी का ख्याल आते ही मोहन सीधा उनकी तरफ चल दिया।
दादीजी अपने कमरे में दादाजी के कुर्ते के टूटे बटन लगा रही थीं। वे अकेली थीं और मोहन को मौका अच्छा मिल गया। उसने जो बातें अब तक किसी से नहीं बताई, वे सारी की सारी अपनी दादीजी को दिल खोल कर बता दी। दादीजी जितने ध्यान से मोहन की बातें सुनती है, उतना ध्यान कोई दूसरा कहां देता है। दादीजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- ‘बेटा तू वह बनाना, जो तेरा मन कहता है। दूसरों की नहीं, बस अपने मन की आवाज सुनना सीखो।’
मोहन हंसने लगा और बोला- ‘दादीजी मेरा मन तो गूंगा है, कभी बोलता ही नहीं।’
दादीजी फिर उतने ही दुलार से बोली- ‘बोलेगा, जरूर बोलेगा। सारे मन बोलता हैं। मन ही सारे भेद खोलता है। ध्यान से सुनना अपने मन की बात, देखना कि वह क्या कहता है।’
अगले दिन मोहन की सहपाठी प्रांजल ने अपने जन्मदिन पर नर्स बनने की बात कही। मोहन ने प्रार्थना से लौटते समय प्रांजल से पूछा कि उसने नर्स बनने की कैसे ठानी। उसने बताया कि उसकी मम्मी नर्स है, इसलिए उसे भी नर्स बनना पसंद है। मोहन को नर्स बनने की बात पर अपना भाई याद आ गया। काफी पुरानी बात है, वे छुट्टियों में ननिहाल गए हुए थे। वह एक छोटा-सा गांव था और वहां उसके नानाजी के बड़े-बड़े खेत थे। उन बड़े-बड़े खेतों में उसे गए काफी साल हो गए, अब वह वहां जाना ही नहीं चाहता। अगर जाना चाहे तो भी उन्हें अब पापा वहां नहीं भेजेंगे। मोहन की आंखों से आंसुओं की बहती धारा को देखकर प्रांजल ने पूछा- ‘क्या हुआ, रो क्यों रहे हो?’
मोहन ने प्रांजल को रोते-रोते बताया कि उसके भाई को गांव में सांप ने काट लिया था और गांव में डॉक्टर नहीं बस नर्स थी, जो उसके भाई को बचा नहीं सकी। उसका भाई भगवानजी के घर चला गया।
मोहन सोचने लगा- माना यह स्कूल है और यहां उसे रोना नहीं चाहिए। क्या उसे उसका भाई याद आए, तब भी रोना नहीं चाहिए? प्रांजल ने मोहन से कहा- ‘सॉरी मोहन, मैं बड़ी होकर नर्स नहीं डॉक्टर बनूंगी। बस तेरे लिए। सच्ची मैं डॉक्टर बनूंगी।’ मोहन ने इस पर भी कुछ नहीं कहा तो प्रांजल फिर बोली- ‘अब भी खुश नहीं है क्या, मैंने कह तो दिया ना कि मैं डॉक्टर बनूंगी।’
मोहन ने अपने को कुछ संभला और बोला- ‘डॉक्टर बनने से कुछ नहीं होगा। बनना ही है तो वह बन जो सांपों को पकड़ते हैं ना।’
इस पर प्रांजल हंसने लगी और बोली- ‘पागल लड़कियां कभी सांपों को पकड़ती है क्या, अगर तुझ में हिम्मत है तो तू ही बन जा सपेरा।’
‘हां मैं सपेरा ही बनूंगा। पर मुझे यह पता नहीं है कि सपेरे को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?’
‘स्नेक चार्मर।’
‘ओके, मैं स्नेक चार्मर बनूंगा। पर तुझे यह नाम कैसे पता है?’
‘अरे बुद्धू मैं डिस्कवरी चैनल जो देखती हूं, उसमें बहुत बार यह सब आता है।’
यह रहस्य मोहन ने किसी को नहीं बताया कि उसे अपने मन की आवाज सुनाई देने लगी है। उसका मन कह रहा है कि उसे स्नेक चार्मर ही बनना चाहिए।
जन्मदिन वाले दिन स्टेज पर मोहन की आवाज में उत्साह था, पर यह क्या उसी की कक्षा के दो-तीन दोस्त उस पर हंस रहे थे। उन्हें मोहन समझा रहा था कि इस में हंसने जैसी भला क्या बात है। मैं स्नेक चार्मर नहीं बन सकता क्या? मैं दुनिया के बड़े-बड़े सांपों को पकड़ कर लोगों की जिंदगी बचा लूंगा। वे बदमाश दोस्त जैसे पहले से ही ठाने बैठे थे कि उन्हें तो उसका मजाक ही बनाना है।
प्रभा मेडम को पता नहीं किसने सारी बातें बता दी और वे बच्चों को समझाने लगी। किसी की बात पर हंसना और मजाक बनाना गलत बात है। लड़कों की बातें सुनकर मोहन को पहले लगा कि उसने गलत फैसला कर लिया है और वह अपने फैसले पर फिर से विचार भी करने लगा था पर उसे अब लगने लगा जैसे उसने जो कुछ सोचा है वह ठीक सोचा है। यह उसके मन की आवाज है। उसने पक्का ठान लिया कि उसे क्या बनना है। कोई कुछ भी कहे उसे तो स्नेक चार्मर ही बनना है।
मेडम भी तो यही कह रही थी- ‘लोग भले कुछ भी कहे, कहते रहे। हमें वही करना चाहिए जो हमारा मन हमें करने को कहता है।’
स्कूल से घर लौटते ही मोहन ने उस दिन दादीजी के चरण स्पर्श करते हुए कहा- ‘दादीजी आपने ठीक कहा था, मेरा मन बोलने लगा है। उसने मुझे बता दिया कि मुझे बड़ा होकर क्या बनना है।’
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