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मूळ कवितावां रो साखीणो अनुसिरजण : ऊंडै अंधारै कठैई

dr madan sainiडॉ. मदन सैनी
‘ऊंडै अंधारै कठैई’ संग्रै मांय मनीसी कवि नंदकिशोर आचार्य री चवदै काव्य-पोथ्यां मांय सूं चारबीसी-तीन टाळवीं कवितावां रो अनुसिरजण, ऊरमावान कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया घणै मनोग्यान सूं करियो है। आपां मांय सूं घणा-सारा पाठक नंदकिशोर आचार्य री थोड़ी-भोत कवितावां जरूर पढ़ी है, पण बांरै सांवठै सिरजण री सांवठी बानगी सूं रू-ब-रू होवण वाळा भोत कम ई पाठक मिलैला। आं पाठकां मांय गीरबैजोग अेक नाम डॉ. नीरज दइया रो भी है, जका नंदकिशोरजी री सैंग काव्य-पोथ्यां री कवितावां नै नीं फगत पढी, पण पढणै रै सागै-सागै मूळ कवितावां रै मर्म नैं भावाभिनय रै समचै सहेज्यो, अंवेरियो अर आत्मसात ई करियो। ओ ईज कारण रैयो कै अनुसिरजक आपरी दीठ सूं आं कवितावां मांय अेक-सूं-अेक इधकी कवितावां इण संग्रै मांय पाठकां सारू संजोई है।
संग्रै रै ‘आमुख’ मांय अनुसिरजण नैं मूळ कविता रो भावाभिनय बतावता थकां अनुसिरजक लिखै- ‘आचार्यजी री नाटक माथै लिखी कवितावां बांचता म्हनै लखायो जाणै अनुसिरजण ई अेक भांत रो भावाभिनय हुवै। जिण ढाळै नाटक मांय कलाकार आपरै अभिनय सूं मूळ पात्र अर मूळ रचाव नै जीवै, ठीक बियां ई अनुसिरजण मांय म्हैं मूळ कवि अर कविता नै जीवण री पूरी-पूरी कोसीस करतो रैवूं।’ हरख री बात है कै डॉ. दइया इण कोसीस मांय भरोसैजोग भावाभिनय करियो है। ‘आमुख’ मांय बै लिखै- ‘कवि री मौलिकता इण मांय हुवै कै बो घणी कवितावां बांचै। किणी कविता पेटै म्हनै लागै कै आ म्हारी भासा में आवणी चाइजै तो अेक तरीको तो ओ है कै उण जोड़ री कविता रचूं। कोई कवि किणी कवि जिसी कोई रचना रचै, तो मौलिकता कांई हुवै?’ अैड़ी सैंग जिग्यासावां रा समाधान इण कवितावां मांय ईज मिल जावै।
‘मूळ’ कविता री बानगी देखो- ‘रचूं थन्नै/ कित्ती भासावां मांय/ मूळ है हरेक भासा मांय/ कठैई थूं अनुसिरजण कोनी। बसंत री हुवै का पतझड़ री/ पंखेरूवां री का पानड़ा री/ भाखरां री का झरणां री/ काळ री का बिरखा री।
मरुथळ रै बुगलां री हुवो/ समदर रै तूफानां री/ लुकोवण री, का भेद खुल जावण री/ मून री हुवो का बंतळ री/ रोवण री, मुळकण री/ मिलण री, का मिलण सूं ईज/ आंती आय जावण री।
हरेक मौलिकता/ आपोआप मांय निरवाळी–/ म्हारी हरेक कविता/ भासा नै नवी करती थकी।’
इण कविता नैं प्रस्थान-बिंदु मानता थकां जठै मौलिकता, मूळ कविता अर अनुसिरजण रो जथारथ पाठकां साम्हीं आवै बठै ईज संग्रै री हरेक कविता भासा नै नवी करती लखावै। किणी अेक भासा री भावभोम रो बीजी भासा में हू-ब-हू रचाव, अनुसिरजण रै सीगै, अेक लोक सूं बीजै लोक री जातरा दांई लखावै। डॉ. दइया रै सबदां में- ‘म्हारी दीठ मांय नंदकिशोर आचार्य री पूरी काव्य-जातरा री असल कामाई किणी अरथ मांय ऊंडै अंधारै कठैई पूग’र आपरै बांचणियां साम्हीं अबोट साच लावणो मानी जावैला। इण ओळी नै दूजै सबदां मांय इण ढाळै कैय सकां कै बै ऊंडै अंधारै कठैई फगत पूगै ई कोनी, आप भेळै बांचणियां नै उण अंधारै रै लखाव मांय लेय’र जावै। आ अेक लोक सूं दूजै लोक री जातरा कैयी जाय सकै। जूनै रंगां साम्हीं नवा रंग, नवा दीठाव। आज पळपळाट करती इण दुनिया मांय कोई पण दीठाव सावळ-सावळ आपां अंधारै री दिसाअ सूं ईज देख-परख सकां।’ आ बात खरी है, अंधारै बिना उजाळै रो कांई अरथ? तमसोमाज्योतिर्गमय रै मारग बगती अै कवितावां ‘बगत’ मांय आपरै होवणै नैं अरथावै। ‘बगत’ कविता री अै ओळियां देखो- ‘बगत सूंप्यो-/ खुद नै/ म्हनै/ कीं ताळ तांई/ कै कीं बगत खातर/ बगत हुयग्यो हूं म्हैं।/ टिपग्यो सगळो बगत/ इणी दुविधा मांय।/ नीं बगत बणायो/ म्हारो कीं/ नीं बणा सक्यो म्हैं ईज/ बगत रो कीं।’ (पृ.68)
बगत बीततो जावै अर जीयाजूण री जातरा ई मजल कानी बधती जावै। इण जातरा में खथावळ री ठौड़ मारग रै चप्पै-चप्पै सूं हेत दरसांवता थकां कवि कैवै- ‘रैयग्या दीठावां मांय’ – इण छेहलै पड़ाव माथै/ आंख्यां साम्हीं आवै/ बै सगळा दीठाव/ निरांयत सूं मिलणो नीं हुयो/ बेगो पूगण री खथावळ मांय-/ मजल पूग्यां ई/ अधूरी ईज रैयी जातरा।/ मजल माथै पूगणो जातरा कोनी/ मारग सूं प्रेम पाळणो पड़ै। – भटकूं छूटियोड़ा दीठावां मांय/ कर रैयो हूं अबै जातरा। (पृ.79)
इण संग्रै री कवितावां मांय जीयाजूण रा बहुआयामी दीठाव आपां साम्हीं आवै, जठै प्रकृति-प्रेम रा दीठाव है, आतमा-परमातमा अर फेर- जलम रै भरोसै रा दीठाव है। अेक ठौड़ कवि कैवै- ‘फेरूं जलमण खातर’- किणी नै ठाह कोनी/ म्हारै आतमघात बाबत/ म्हनै खुद नै कठै ठाह हो/ खुद म्हैं टूंपो दियो/ आतमा नैं खुद री/ अर ओ जिको दीसूं आपानै/ हूं लोथ उण री/ पण आज/ अै आंख्यां/ जिकी कीं आली हुयगी-/ स्यात उणी रो दरद है/ फेरूं जलमण खातर म्हारै मांय। (पृ.78)
अठै परायै दुख दूबळो नीं हुवण री मनगत मांय परदुख-कातरता रा दीठाव भी है। ‘पण आपां नै कांई’ कविता में कवि कैवै- ‘देखो/ मोरियै नै देखो/ जिकी पांख्यां सूं आपां नै/ बो दीसै रूपाळो/ पण कोनी भरीजै उडार/ बां रै पाण-/ लांबी अर ऊंधी।/ पण आपां नै कांई/ बस आपां तो राजी हां/ देख’र उण रो नाच। (पृ.91)
आं ओळ्यां मांय हर किणी रै दुख-दरद नै देखण-परखण री दीठ रो दीठाव हुवै, बठै ई सबद रै सीगै जीवण मांय औचित्य री अंवेर रा दीठाव भी है। ‘आसरै फगत ठौड़ माथै’ कविता री अै ओळियां इणी बात री साख भरै- ‘अेक सबद री ठौड़/ बदळियां/ बदळ जावै जाणै/ कविता री आखी दुनिया/ ठीक बियां ईज बदळ जावै/ सबद रो ई आखो-संसार।/ कांई किणी खुद रो/ कोनी कोई अरथ/ स्सौ-कीं है आसरै/ फगत ठौड़ माथै।’ (पृ.95)
जाणै ऊंडै अंधारै कठैई अै दीठाव दीठाव जीयाजूण रा महताऊ पड़ावां माथै पळका नाखता थकां आपां नै मांयली-बारली दुनिया री नवी ओळखाण करावै। जठै जीयाजूण रा फीका पड़ियोड़ा रंग फेरूं खिल जावै। ‘जीयग्या’ कविता मांय अैड़ो अेक दीठाव देखो- ‘रंग/ जिका हुयग्या हा/ ठाडी ओस मांय/ गूंगा-/ अेक चिड़कली रै सुर में/ सगळा पाछा खिलग्या।’ (पृ.94)
अंधेरे मांय सगळा रंग अेकमेक हुय जावै। किणी री अळगी ओळखाण री कल्पना तकात नीं करी जाय सकै। अैड़ै में ‘अंधारै ई ठीक’ कविता मांय नीं होवणै रो होवणो सबळाई सूं प्रगट हुवै- ‘भलांई कोनी/ म्हैं कठैई/ थारै दीठाव मांय/ अंधारै ई ठीक हूं।/ दीठाव सूं थाक’र/ जद-जद मींचीजैला आंख्यां/ लाधूंला म्हैं बठैई।’ (पृ.88)
जीयाजूण मांय मोकळी अंवळायां-अबखायां है, पण जको सुख ‘सम’ माथै आयां मिलै, बो भाग-दौड़ मांय कठै है? ‘दिनूगै-सिंझ्या’ कविता मांय कवि कैवै- ‘आखै दिन/ खीरा उछाळतो जिको सूरज/ दिनूगै-सिंझ्या/ जद-जद धरती रै/ साथै हुवै/ हुय जावै कित्तो कंवळो/ कित्तो ऊजळो।’ (पृ.89) इण कविता नैं बांचती वेळा म्हनै लाग्यो, जाणै ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ री ठौड़ इण संग्रै रो नाम ‘मुंअंधारै कठैई’ भी राख्यो जाय सकै हो। दिनूगै सूं पैलां अर दिन आथमती वेळा ‘मुंअंधारै’ री संग्या सूं जाणी जावै। पण ऊंडै अरथ मांय ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ शीर्षक सारथक लखावै। इण कविता मांय कवि कैवै- ‘जिका दिखावणो चावै खुद नै/ बै जावै/ अंधारै सूं उजास कानी/ म्हैं जिको/ मन-आंगणै थारै/ लेवणी चावूं कठैई नींद/ ऊंडै अंधारै/ क्यूं भटकूं उजास खातर/ जिको कर देवै म्हनै थारै सूं अळगो।’ (पृ.63)
‘अभिनय कांई आतमघात हुवै’ अर ‘होकड़ो’ कवितावां मांय भी जीयाजूण रै मंच माथै आपरै होवणै अर आतम-ओळखाण रा दीठाव है। इण होवणै मांय कवि होवणो तो और ई अरथाऊ बात है। ‘कवि ईश्वर हुवै’ कविता मांय कवि कैवै- ‘जद कुमळावै फूल/ -खिलै जिको कुमळावै ईज-/ बसा लेवै उणां नै/ सबदां मांय आपां रै गुण मानता थकां/ खिल जावैला कुमळायोड़ा बै\ आ कविता ईज है/ कुमळायोड़ा नै ई खिला देवै-/ कवि इणी खातर ईश्वर मानीजै।’ (पृ.71)
बारै री दांई अेक स्रिस्टि कवि रै मांयनै पण हुवै। जिकी बारै री स्रिस्टि सूं संवाद करणो चावै। “खोलै कोनी किंवाड़’ कविता मांय कवि कैवै- ‘अेक दुनिया बारै/ अर अेक मांय म्हारै।/ बा जिकी बारै है/ मिलणो चावै/ आय’र मांयली सूं/ इणी खातर खड़कांवती रैवै/ जद-कद उण रो कूंटो। (पृ.97) इंसान मांय भगवान भी हुवै अर सैतान भी। दोनूं अेक-बीजै बाबत सोधै। अैड़ै में मानखै री मनगत रो भूंडो हाल हुंवतो लखावै। ‘कुटीजूं म्हैं’ कविता री अै ओळियां निजर है- ‘सैतान सोधै ईश्वर बाबत, सदीव/ अर सैतान बाबत ईश्वर।/ कूटीजूं म्हैं/ दोनूं बिचाळै/ दोनूं बसै मांय म्हारै/ सोचै–/ अेक-दूजै बाबत।’ (पृ.96)
इणी भांत जीयाजूण रै अंधारै-ऊजळै पखां नैं पड़तख करती आं कवितावां मांय ‘बरबरीक’ अर ‘पांचाली’ रा पौराणिक दाखलां रा दीठाव ई देखणजोग है। ‘बरबरीक’ में महाभारत रै जुद्ध में चतुर्भुजधारी री बाजीगरी बतावता थकां बरबरीक रै मूंढै सूं कवि कैवावै- ‘साम्हीं दीठाव भिड़ती हुवै/ छियावां कठपूतळियां री जियां।/ साच है, हां/ कठपूतळियां ई हा सगळा बै–/ जिकी नै डोर सूं झल्यां आभै मांय/ बो दीसै हो म्हनै/ चतुर्भुजधारी अेक बाजीगर/ खुद रै खेल सूं राजी/ – बो भयानक जुद्ध उण रो खेल ईज तो हो।’
बीजै कानी ‘पांचाळी’ मांय द्रौपदी री मनगत केई ऊंडा अरथ उघाड़ती लखावै। भीष्म जद कैयो कै- ‘दुष्टां रो अन्न मति बिगाड़ दी ही।’ तद द्रौपदी रा अै बोल- ‘ना, पितामह/ अन्न तो बो सागी ई खावतो हो विकर्ण ई।’ सामाजिक नै नवी दीठ देवै। अै कवितावां धरम, अरथ, काम अर मोक्ष जैड़ा समाजू सरोकारां सूं जुड़िया सवाल उठावै अर राग-विराग सूं जुड़ी लोकमानसिक वृत्तियां रो ऊंडो जथारथ उघाड़ती थकी ‘दिन रो ई दिन’ दिखावण री आफळ करती ई लखावै। कवि कैवै- ‘कित्ता’क दिन रैवैला/ रात?/ कदैई तो आसी/ दिन रो ई दिन/ कोई तो।’ (पृ.51)
म्हैं इण सांतरै अनुसिरजण सारू अनुसिरजक अर प्रकाशक नै हियैतणी बधाई देवूं। मूळ सिरजक री आसीस बिना तो ओ अनुसिरजण संभव ई नीं हो, बांनैं घणा-घणा रंग। प्रणाम”

कविता की बदलती तासीर

कविता का फ़लक उतना ही व्यापक है जितना जीवन। जीवन के तमाम रंगों को कविता के विहंगम आकाश में खिलता हुआ देखा जा सकता है। नीरज दइया की राजस्थानी कविताओं के नए संग्रह “पाछो कुण आसी” को पढते हुए इस कथन की पुष्टि होती है।
किताब की कविताएं व्यष्टि जीवन व समष्टि जीवन के मध्य सेतु रचती हैं। प्रेम कविताओं की भरी-पूरी मौजूदगी जहां कवि को राजस्थानी कविता की समृद्ध परम्परा से जोड़ती हैं वहीं सामयिक चिंताओं की सूक्ष्म अभिव्यक्ति इस संग्रह को अपने समय-समाज का प्रामाणिक दस्तावेज बना देता है। इन कविताओं में मरुभूमि खासकर बीकानेर के परिवेश का जो अंकन हुआ है, वह सजावटी नहीं, बल्कि जिया हुआ है। तकनीक का बढ़ता दायरा, अर्थप्रमुख जीवन शैली, रिश्तों में आया ठंडापन, दम तोड़ती संवेदना एवं व्यवस्था की विसंगतियों को पूरी विश्वनीयता से उजागर करने वाली इन कविताओं में मानव मन के ओनों-कोनों की बारीकी से पड़ताल हुई है। ये कविताएं पाठकों से संवाद तो करती ही है, सवाल भी उठाती है। कहना न होगा, इन सवालों की अनुगूंज ही बदलाव की जमीन तैयार करती है। “भळै जोवां बै सबद/ जिण मांय कथीज्यो/ दुनिया रो पैलो साच/ जिण बीज्या मानखै मांय/ बदलाव रा बीज” जैसी पंक्तियों में करवट लेते वक्त को महसूस किया जा सकता है। संवैधानिक मान्यता का इंतजार करती राजस्थानी भाषा की पीड़ा को प्रकट करने वाली करीब आधा दर्जन कविताएं किताब का हिस्सा बनी हैं। “बिना भासा रै/घूमा म्हे उभराणा” उस समाज के दर्द की अभिव्यक्ति है, जिसकी भाषा-संजीवनी सियासी समीकरणों की शिकार होकर रह गई है। किताब के आखिर में गद्य कविताओं की एक शृंखला शामिल हुई है जिनमें जीवन के विविध रंग प्रकाशित हुए हैं। आंतरिक लय को कलात्मक ढंग से साधती ये कविताएं शिल्पगत वैशिष्ट्य से ध्यान खींचती है। राजस्थानी कविता की बदलती तासीर को जानने के लिए यह एक जरूरी किताब मानी जा सकती है।

-मदन गोपाल लढ़ा
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पाछो कुण आसी, कवि- नीरज दइया, प्रकाशक- सर्जना, बीकानेर, पृ. 96, मूल्य 140 रु., फोन:0151 224 2023

Rajasathan-Patrika-27032016(राजस्थान पत्रिका ; रविवार 27 मार्च 2016)

क्या हमारी यह मांग जायज नहीं

नीरज दइया

SAW NKDमेरी पुरस्कृत राजस्थानी बाल-कहानियों की पुस्तक का नाम “जादू रो पेन” यानी जादुई पेन है। इसे जादू नहीं तो क्या कहेंगे कि किसी रचना की पहली पंक्ति, यहां तक कि किसी शब्द को चयनित करते हुए भी कुछ सहमा और निरंतर संदेह से जूझने वाला यह लेखक आज यहां उपस्थित है। आगे कुछ कहने से पूर्व राजस्थानी के संयोजक डॉ. अर्जुनदेव चारण, परामर्श मंडल, चयन समिति और पूरे साहित्य अकादेमी परिवार आभार प्रदर्शित करता चलूं। अंत में आभार औपचारिक लगाता है।
किसी भी प्रकार का ज्ञान सदैव हमारे आनंद का हनन करता है। बाल साहित्य के संदर्भ में यह उक्ति कुछ अधिक अर्थवान सिद्ध हुई है। शब्दों की दुनिया में आज अनेक खतरे और संकट महसूस किए जा सकते हैं। प्रत्येक लेखक अपने शब्दों से एक संसार गढ़ता है। इस शब्द-संसार के विषय में मैं कहना चाहता हूं कि हमारे गढ़े जाने के बाद, दूसरे समय में कोई अंतर और अंतराल क्यों होता है। मेरी आकांक्षा ऐसे शब्द हैं जो मेरे भावों से किसी विषयांतर को दूर रखे। किसी बात का अलग रूप में पहुंचना अथवा नहीं पहुंचना किस की कमी है? आज भूमंडलीकरण के इस दौर में बाल साहित्य विमर्श अनिवार्य है। यांत्रिकता और मूल्यों के बदलाव ने बाल मन को भी नहीं छोड़ा है। ऐसा लगता है कि पुराने अर्थ शब्दों को अलविदा कह रहे हैं। इस नए समय में कुछ नया करने की आवश्यकता है। युग सापेक्ष सृजन हेतु जहां स्व-मूल्यांकन की आवश्यता है वहीं यह भी सोचना जरूरी है कि क्या हम हमारी पुरानी दुनिया बच्चों को सौंपना चाहते हैं, या बदलती दुनिया से मुकाबला करने की जिम्मेदारी और जबाबदेही हेतु उनको समर्थ बनाना चाहते हैं।
आज मुझे मेरी बाल-स्मृतियों बुला रही है। उस समय की बहुत सारी बातों को आज याद नहीं किया जा सकता। वे बहुत सी बातें भीतर कहीं लुप्त हो गई हैं। उस दौर में कभी यह सोचा न था कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार के अभिभाषण में मेरा बचपन मुझे आवाज देगा। मेरी अब तक की साहित्य-यात्रा अनेकानेक विवरणों का रोमांचकारी समुच्चय है। मैं लेखक क्यों हूं? जब इस सवाल के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि मैंने लेखन को विरासत के रूप में अंगीकार किया है। मेरे पिता साहित्य अकादेमी के मुख्य पुरस्कार से सम्मानित राजस्थानी के प्रख्यात कहानीकार श्री सांवर दइया से मैंने लेखन की विधिवत शिक्षा-दीक्षा तो नहीं पाई, बस उनके अध्ययन-कक्ष से कुछ किताबें पढ़कर कोई बीज बना होगा। बाल पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकालय के प्रति मेरी रुचि ने जिस मार्ग तक पहुंचाया, उसमें मेरे शिक्षकों और पिता के साहित्यिक-लगाव ने मुझे वह पर्यावरण दिया। जहां मैं कुछ आधारभूत बातें सीख सका। मेरे अनुभव ने बल प्रदान किया कि कुछ लिखने से पहले पढ़ना जरूरी है।
वर्ष 1982 के बाद का कोई समय है जो स्मृति-पटल पर अब भी अंकित है। मेरे पिता हिंदी शिक्षक के रूप में जिस विद्यालय में सेवारत थे, उसकी नवमीं कक्षा में मैंने प्रवेश लिया था। एक दिन प्रातः कालीन प्रार्थना सभा में हमें सूचना दी गई कि सांवर दइया जी को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का पुरस्कार उनके कहानी संग्रह के लिए घोषित किया गया है। उसी दौर में कवि कन्हैयालाल सेठिया की कृति “मायड़ रो हेलो” से मातृभाषा राजस्थानी से लगाव में अभिवृद्धि हुई। साथ ही राजस्थानी भाषा और साहित्य के उन्नयन के लिए श्री रावत सारस्वत और श्रीलाल नथमल जोशी द्वारा चलाए गए उल्लेखनीय अभियान भी मेरी बाल-स्मृति में है। राजस्थानी के प्रचार-प्रसार के उस दौर में जैसे मुझे मेरा कोई सीधा मार्ग मिल रहा था। सच तो यह है कि उस समय ऐसा लगा कि मैं अब तक किसी असुविधाजनक मार्ग पर था, और जैसे इन सब बातों-घटनाओं ने मेरी अंगुली मेरी भाषा को थमा दी। मेरे लेखन में लगभग दस वर्षों का आरंभिक काल बड़ा आनंदमय रहा। ‘जादू रो पेन’ की अधिकांश रचनाएं उसी समय लिखी गई।
मेरी बाल कहानियों में बाल-स्मृतियों की विभिन्न घटनाएं कहानियों के रूप में प्रकट हुई है। मुझे लगता है कि बाल साहित्य लेखन के लिए जिस बालमन की आवश्यकता होती है, वह मुझे अपने घर-परिवार में सहजता से सुलभ हुआ। राजस्थानी की लोकप्रिय मासिक पत्रिका “माणक” ने इन बाल कहानियों को प्रकाशित कर मुझे बाल साहित्य के लेखक के रूप में नाम दिया। कुछ बाल कहानियां मैंने बाद लिखी, उसके बारे में मुझे लगता है उनमें अभिव्यक्त आनंद, मेरे अपने ज्ञान से मुक्त नहीं है। बालकों के लिए लिखने के लिए बालक बन कर उन जैसी सहजता, सरलता और निश्छलता पाना आवश्यक है।
प्रकाशन-संकट व पत्र-पत्रिकाओं के अभाव का कारण राजस्थानी भाषा को सरकारी संरक्षण नहीं मिलना है। कोई लेखक क्यों और किस के लिए लिखें? लगभग दस वर्षों से अधिक समय ‘जादू रो पेन’ के प्रकाशन में लगा। इसका प्रकाशन जैसे किसी मृत पांडुलिपि में प्राणों का संचार होना था, वहीं मेरे बाल साहित्यकार का दूसरा जन्म भी। राजस्थानी में जयंत निर्वाण, बी.एल. माली, भंवरलाल भ्रमर, आनंद वी. आचार्य, रामनिरजंन ठिमाऊ, दीनदयाल शर्मा, नवनीत पाण्डे, हरीश बी. शर्मा, मदन गोपाल लढ़ा, विमला भंडारी, रवि पुरोहित आदि लेखक बाल साहित्य की विविध विधाओं में सक्रिय है। यह सच है कि इन वर्षों मैं बाल-साहित्य नहीं लिख पाया। बाल साहित्य लिखना आज के दौर में बड़ों के साहित्य-लेखन से भी मुश्किल हो गया है। अनेक प्रश्नों और आशंकाओं ने मुझे घेर रखा है। ऐसा क्यों हुआ? यह तो मैं नहीं जानता, किंतु लगता है कि मैं अब अभय होकर नहीं लिख सकता। शायद यह भय स्वयं को एक जिम्मेदार लेखक मानने से भीतर लद गया है। गत वर्षों में मैंने कविता, आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में कुछ काम करने का प्रयास किया है। मुझे लगता है कि मेरा लेखन मेरे दिवंगत लेखक पिता को फिर-फिर अपने भीतर जीवित करने और स्वयं को ऊर्जावान करने का उपक्रम है। वर्तमान दौर में लेखन को कार्य के रूप में सामाजिक मान्यता नहीं है। हमारी चिंता होनी चाहिए कि समाज में लेखन को पर्याप्त सम्मान मिले।
जटिल से जटिलतर होते जा रहे इस समय में सरल कुछ भी नहीं, सरलता कहीं भी नहीं। ऐसे में बाल साहित्य लेखन से जुड़ी हमारी जिम्मेदारियां और अपेक्षाएं निश्चय ही अपरिमित है। यह जिम्मेदारी मैं इस रूप में भी ग्रहण करता हूं कि बच्चों में आयु-विभेद से जुड़ी जटिलताएं और विभेदीकरण के बिंदु कुछ अधिक मिलते हैं। हम लिखते तो बच्चों का साहित्य है किंतु अकसर वह किसी वर्ग विशेष अथवा आयु विशेष के लिए सिमट कर रह जाने की त्रासदी भोगता है।
मेरा मानना है कि किसी भी युवा, प्रौढ़ अथवा वृद्ध के भीतर का उसका बचपन सदा-सदा हरा रहता है, और इस रूप में सभी के अंतस में एक बालमन जीवित रहता है। बाल साहित्य के पाठक केवल बच्चे ही नहीं है। इसमें बड़े बच्चे और बूढ़े भी शामिल हैं। ऐसे में इस समग्र-पाठक संसार से एक उभयनिष्ट छोटे संसार को हमें पहचानना है। पाठक के रूप में बालक-बालिका या कुछ चयनित समूह के बच्चों की परिकल्पना मैं करता हूं। जब मैं लिखता हूं तो मुझे यह भी ज्ञान होना चाहिए कि मैं किस के लिए लिख रहा हूं। किसी इकाई के रूप में हर रचना से पहले यह विचार करना मुझे आवश्यक जान पड़ता है। किसी आदर्श और उभयनिष्ट इकाई को स्वीकारना बाल साहित्य के परिपेक्ष्य में सरल कार्य नहीं है।
मैं जिस भाषा और प्रदेश का लेखक हूं वहां मेरे सामने आ रही चुनौतियों का अंदाजा आप इस रूप में लगा सकते हैं कि एक समय हिंदी के हित में शहीद की गई मेरी मातृ-भाषा राजस्थानी आज भी रोती-बिलखती है। उसे अपने बच्चों और घर-परिवार से अलग रखा गया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम साहित अनेक शिक्षा समितियों के प्रबल प्रावधानों के बावजूद प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत हमारे बच्चे को अपनी मातृभाषा से वंचित रखा गया है। कुछ सीखने और सहजता से पढ़ने की उम्र में बच्चों का सामना अनेकानेक उलझनों से होता है। घर की भाषा और स्कूल की भाषा में अंतर है। बच्चे कुंठित और दुविधाग्रस्त है। उनका सर्वांगीण विकास भाषा के अभाव में कैसे संभव है? बच्चों के माता-पिता के सामने इन सब बातों की तुलना में बड़ा संकट रोजगार का है। अभावों में निरंतर जीवनयापन करते परिवारों के बच्चे निरंतर स्कूल को अलविदा कहते जा रहे हैं। वहां ऐसे समय में कोई जादू काम नहीं कर सकता।
यकीनन जैसा कि मैंने आरंभ में कहा कि मुझे बचपन में बहुत बाद में अपनी मातृभाषा की अंगुली थामने का सुख मिला। किसी भाषा को मां के रूप में स्वीकार किए जाने की अहमियत का अहसास मिलना बहुत जरूरी है। वही अहसास मैं अपनी भाषा में लिख कर अपने नन्हें दोस्तों को देना चाहता हूं। मैं राजस्थानी में इसलिए लिखता हूं। आज साहित्य अकादेमी के इस मंच से मेरे प्रदेश के उन सवा एक करोड़ से अधिक बच्चों की तरफ से मैं यह पुरजोर मांग करता हूं कि उनकों उनके अधिकार दिए जाए। मेरे इस उद्बोाधन की अंतिम पंक्ति पर आप सभी का समर्थन चाहूंगा- क्या हमारी यह मांग जायज नहीं कि राजस्थान के बच्चों की प्राथमिक शिक्षा उनकी अपनी मातृभाषा में होनी चाहिए।
(साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार को ग्रहण करने के बाद दिया गया संभाषण)

‘आलोचना रै आंगणै’ री साख

कवि नीरज दइया री आलोचना पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ में कुल छोटा-मोटा अठारै लेख छप्योड़ा, जिकां रै जरियै वै इण भारत री सगळी विधावां नै सोधणै-समझणै रौ महताऊ काम कियौ।
-पारस अरोड़ा (माणक : अक्टूबर, 2011)
‘आलोचना रै आंगणै’ रो सबळ-पख इणरी उपन्यास-पड़ताल है। यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, करणीदान बारहठ, अब्दुल वहीद ‘कमल’, नंद भारद्वाज, नवनीत पाण्डे रै उपन्यासां री डॉ. दइया पड़ताल करी है। अठै ई किताबां री स्वायत्त-समीक्षा पड़ताल है। उपन्यासां रै कथ्य री खासियतां में डॉ. दइया खेचल करी है अर भासा रूपां माथै ई मैनत। आधी सूं घणी पोथी उपन्यास माथै ई केंद्रित है।
-डॉ. आईदानसिंह भाटी  (राजस्थली-117 : जनवरी-मार्च, 2012)
जिस प्रकार अठारह पुराण, गीता के अठारह अध्याय, उसी प्रकार ‘आलोचना रै आंगणै’ नीरज दइया के अठारह अध्याय कहूं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। किंतु इन अठारह अध्यायों में अनेक साहित्यकारों को जोड़कर उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास साफ झलकता है।
– देवकिशन राजपुरोहित  (दैनिक नवज्योति : 24 जुलाई, 2011)
युवा लेखक नीरज दइया आपरी पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ रै मारफत वां लेखकां रो लेखन उजागर करण री रूपाळी कोसिस करी है, जकां रो लेखन प्रमाणै बडो है, पण आपरी सादगी-सरलता रै पाण नाम रूप वो मुकाम हासिल नीं कर सकिया, जिका रा कै वै वाजिब हकदार है।
-श्यामसुंदर भारती (कथेसर : जुलाई-सितम्बर, 2013)
आलोचना साहित्य रै कसालै में नीरज दइया री पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ रो प्रकासण हुवणो इण विधा में बधेपो कैयो जाय सकै। आपां संतोष कर सकां कै चालो कीं तो हुयो।
-श्याम जांगिड़ (बिणजारो-32 : बरस-2011)
‘आलोचना रै आंगणै’ पोथी में नीं तो बेमतळब रो बिड़द बखाण है अर नीं धिंगाणै किणीं नै खारिज करणै री (कु)चेष्टा। आं दोनूं ई कमियां सूं बच’र डॉ. दइया राजस्थानी रै आधुनिक साहित्य नै स्वस्थ आलोचनात्मक दीठ सूं जांचण-परखण रो जस-जोग काम कर्यो है, जको बां रै विस्तृत अध्ययन अर ऊंडी समझ री साख भरै।
– डॉ. मदन गोपाल लढ़ा (जागती जोत : मार्च, 2012)
नई कविता के टोप-टेन कवियों क्रमश: कन्हैयालाल सेठिया, भगवतीलाल व्यास, मोहन आलोक, सांवर दइया, चन्द्रप्रकाश देवल, अर्जुनदेव चारण और ओम पुरोहित ‘कागद’ को चुनकर उनकी काव्य-यात्रा पर गंभीर विवेचन किया है। इस श्रेणी में मालचंद तिवाड़ी, वासु आचार्य, आईदान सिंह भाटी, कुंदन माली एवं स्वयं नीरज दइया सहित अन्य महत्त्वपूर्ण कवियों की कविताओं पर भी समग्रता से विचार करने की अपेक्षा थी।
-राजेंद्र जोशी (शिविरा : फरवरी, 2013)

कुंवर रवीन्द्र के रंगों में सजी मेरी कविताएं

Kunwar Ravindra 20052017kuvar-ravindrकुंवर रवीन्द्र जी का बहुत बहुत आभार।

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1 September 2013 Kunwar Ravindra G
Kunwar Ravindra G 08032014
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अनुसिरजण – मूळ कविता रो भावाभिनय

mayar bhasha page 05012015

हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर…

डॉ. मदन सैनी

मदन सैनी

राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर रै सैयोग सूं छपी थकी पोथी ‘सबद-नाद’ मांय भारत में बोली जावणवाळी चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रो अनुवाद करियो है- राजस्थानी रा ऊरमावान कवि, अनुवादक अर समीक्षक डॉ. नीरज दइया। इण संग्रै मांय समकालीन भारतीय कविता आपरै सैंपूर सबद-नाद रै समचै पाठकां सूं रूबरू होवै अर अेक लूंठै फलक माथै मानव-मन रा जथारथ चितराम उकेरै। आं कवितावां में जठै राग-रंग री रूपाळी छिब है, बठै ईज जियाजूण री अंवळायां-अबखायां आपरै जमीनी जथारथ सूं बाथेड़ो करती पण लखावै। असमिया कवि वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य सिंझ्या नैं ‘उदासी दाईं’ उतरती देखै, बठै ईज चाय-बागानां अर धूवां बगावती चिमनियां नैं ई नीं भूलै! ‘मुट्ठी’क चावळिया’ कविता में बै कैवै :
हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर
तरसतो रैयग्यो म्हारो ओ मन
इण संग्रै नैं पढ्यां पछै कीं अैड़ा ईज भाव अंतस में उठै। इण कविता रै समचै म्हैं कैवणो चावूं कै संग्रै री सैंग कवितावां किणी-न-किणी दीठ सूं पाठक री चेतना नैं झकझोरै, नवी दीठ देवै अर नवै सोच सूं सराबोर पण करै। आं कवितावां मांय सांस्कृतिक छिब है- कागलै रो सराध (कोंकणी), बठै ईज बाजारवाद रा सुर भी है- मोल लावो प्रीत-अपणायत (भोजपुरी), तो बीजै कानी सिणगारू भावां री रूपाळी सोभा पण है- मरवण रै नांव (बोड़ो)। आं कवितावां मांय देस-दुनिया अर घर-परिवार रा सांवठा बिंब-पड़बिंब होवता लखावै। मैथिली री ‘घर’ कविता री अेक बानगी जोवो :
घर घर ही हुवै
हुवो बठै भलांई लाख अबखायां
जठै मा हुवै
उडीकती थकी आपरी
बूढी अर थाकल आंख्यां सूं-
भूख अर दरद सूं आकळ-बाकळ
खुद रै बेटै नैं
उडीकती थकी मा।
अठै आपां अनुवादक री भासाई खिमता नैं भी परख सकां, जकी झरणै रै कळ-कळ नाद री दांई सबद-नाद रै समचै अेक जाण्यो-पिछाण्यो जथारथ-बिंब आपां रै पाखती ऊभो करै। इत्तो होवतां थकां ईज अेक बात उल्लेखजोग है अर वा आ है कै इण अनुवाद सूं पैलां नीरज दइया री भासा ‘ओकारांत’ होया करती, पण इण संग्रै में पैली बार (स्यात् डॉक्टरेट रै कारण) ‘औकारांत’ होयगी है। इण सारू अनुवादक नैं कठैई अेक टीप देवणी चाहीजती, नींतर आ भासा-शैली किणी बीजै अनुवादक री कैयी जाय सकै। अेक और विचारजोग बात है कै इण पोथी मांय भेळी करीज्योड़ी चौईसूं भासावां री कवितावां रो उल्थो उणां रै मूळ रूप सूं अनुवादक करियो है, का पछै किणी बीजी भासा रै माध्यम सूं ओ अनुवाद पाठकां साम्हीं परतख होयो है, इण बात रो खुलासो भी होवणो चाहीजतो। नींतर इत्ती भासावां री जाणकारी किणी उल्थाकार नैं होय सकै, आ इचरज री बात नीं है कांई? केई ठौड़ प्रूफ री भूलां भी है, जियां- साम्हीं, सामीं/ जोसेफ मेकवान, योसेफ मेकवान/ बदूंक/ कह्यां/ गोली (गोळी) इत्याद। फेर भी असमिया, बांग्ला, भोजपुरी, बोडो, डोगरी, अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयाळम्, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उडिय़ा, पंजाबी, संस्कृत, संताली, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू इत्याद चौईस भासावां री टाळवीं कवितावां नैं सहेजणो अर वांरी काव्याभासा नैं जीवणो कोई हांसी-खेल नीं है, इण कारज में उल्थाकार री साधना सुथराई सूं परतख होवती लखावै। कवियां रै परिचय सूं पैलां ‘अंतरपट’ री कांई दरकार ही, उल्थाकार ई जाणै! फेर भी नीरज रो ओ अनुवाद भासाई अेकरूपता री दीठ सूं सरावणजोग कैयो जाय सकै। म्हारी हियै-तणी बधाई!

 

91KNbbN49NLपोथी : सबद-नाद / विधा : अनुवाद / अनुवादक : नीरज दइया / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर संस्करण : 2012 / मोल : 70 रिपिया।

(जागती जोत : अगस्त-सितम्बर, 2012)

भारतीय कविता री सांतरी जातरा

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सबद-गूंज/ कुंदन माली

neeraj daiya sabd naadभारत सरीखा बहुभासायी, बहुसांस्क्रतिक देस में, मौजूदा इक्कीसमै सइकै में साहित्य रै साम्हीं घणकरी चुनौतियां अर दबावां नै मैसूस कर्‌या जाय सकै अर साथै ई साथै आ बात ई दीवा री भांत साफ है के किणीं देस री साहित्यिक कारण है के साम्प्रत समै में साहित्य री नवी भंगिमावां अर नवा रूप ई साम्हीं आवता जाय रह्‌या है। समकालीन राजस्थानी साहित्य रै परिपेख में आ बात सुभट तौर सूं कैयी जाय सकै के भलांई कमती तादाद में व्हौ, पण आपां री नवी पीढ़ी रा लिखारा राजस्थानी साहित्य री न्यारी-न्यारी विधावां में सिरजण करण री दीठ सूं लगौतार सक्रिय निंगै आवै। जठै आपां रै साहित्य में कहाणी अर कविता रै खेतर में खासौ मैताऊ काम व्हियौ है तो दूजी कानीं कईक विधावां ई समरिद्ध होवती रैयी है- ज्यूं के जातरा-विरतांत, लघुकथा, नाटक, आलोचना इत्याद रै साथै-साथै संस्मरण अर सबद चितराम ई खासी ठौड़ बणाय रैया है। अठै आ बात केवणि ई वाजिब लखावै के सिरजाणाऊ लेखन रै साथै-साथै किणीं भासा री सामरथ अर संभावनावां री असली कसौटी उण भासा में होवण वाळा उल्था माथै ई आधार राखै। असल में देखां तौ किणीं ई भासा री विपुल सामरथ अर सबद-भंडार नै बधावण रौ काम अनुवाद कर्म रै मारफत संभव व्है। भासा री साहित्यिक गेराई, विविधता अर विपुलता रौ मापदंड अर रचनाकार-अनुवादक री रचनात्मक कारीगरी नै अनुवाद रै जरिये इज मापी जाय सकै।

अंजस  अर गुमेज री बात है के लारला पच्चीस-तीस बरसां में राजस्थानी साहित्य में खासी तादाद में अनुवाद रौ काम-काज व्हियौ है अर स्तरीय काम व्हियौ है। गुजराती, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, डोगरी, कश्मीरी, मौथिली, हिंदी, उड़िया, असमिया अर मलयालम इत्याद भारतीय भासावां री प्रख्यात क्रतियां रा उल्था व्हिया है। इत्तौ इज नीं, अंग्रेजी, फ्रेंच, रसियन अर जरमन सरीखी विदेसी भासावां री रचनावां ई राजस्थानी में ठसकै सूं अनूदित व्ही है अर रास्ट्रीय स्तर माथै बरौबर आदरीजी है।कविता, कहाणी, उपन्यास, आलोचना अर दूजी साहित्यिक विधावां रौ उल्थौ इण बात री साख भरै के राजस्थानी साहित्य में अनुवाद रौ भंडार खासौ रातौ-मातौ है।

साहित्य अकादेमी नवी दिल्ली रै राजस्थानी भासा परामर्श-मंडल री भूमिका इण सीगै घणी सरावणजोग रैयी है अर केवण री जरूत कोनीं के साहित्य अकादेमी रै लगौलग प्रोत्साहन रै पांण केईक नवा उल्थाकार साम्हीं आया है। साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार अर राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी बीकानेर रा अनुवाद पुरस्कार सूं इण काम ने बेसक तेजी मिलती रैयी है। देस अर विदेस रा तमाम नामचीन रचनाकारां री रचनावां रै साथै साथै काळजीत रचनावां रा उल्था ई राजस्थानी भासा री खिमता री साख भरै। अनुवाद रै जरियै देस-देसावर री भासावां री उत्तम रचनावां नै राजस्थानी में लावण रौ काम यूं देखां तौ समकालीन राजस्थानी साहित्य नै समरिद्ध करण रौ काम इज बाजैला। जूनी अर नवी पीढ़ियां रा लेखक इण अनुवाद-यग्य में आपरौ योगदान देय रैया है।

नवी पीढ़ी रा लिखारा नीरज दइया री दिलचस्पी कविता, लघुकथा अर आलोचना कर्म में तो है ईज, पण इण रै साथै ई साथै अनुवाद रै कामकाज में ई वां री रुचि बराबर निंगै आवती रैयी है। पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम रै कविता-संग्रै “कागद अर कैनवास” अर हिंदी कथाकार निर्मल वर्मा री कथा-पोथी “कागला अर काळो पाणी” रा नीरज दइया राजस्थानी में मेताऊ उल्था करिया है अर राजस्थानी भासा री मठोठ री वां नै विवेकसम्मत समझ है अर भासा रै सिरजाणात्मक उपयोग री दीठ सूं ई वै सावचेत अर सजग निंगै आवै। इणींज सिलसिलै में नीरज दइया “सबद नाद” नाम रै मैजूदा काव्य-संग्रै साथै मैजूद व्हिया है। देस री चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रै इण संग्रै में भारतीय कवियां री गिणी-चुणी कवितावां रौ उल्थौ सामिल है। कविता रै मारफत नीरज दइया राजस्थानी कविता अर अनुवादकर्म रा जसजोग नुमांइदा कवि देवल रै योगदान नै आदर साथै रेखांकित कर्‌यौ है।

अलबत जिण कवियां नै अठै ठौड़ मिली है वां में सूं इस्या ई कवि है, जिका सूं सवाया कवि उण भासा में मौजूद है, पण इण बात में कोई संका नीं है के जिण कवितावां नै अनुवाद चुणीं है, वै भासा-सिल्प-सौस्ठव अर परिवेस रै स्तर माथै रत्तीभर ई कमजोर नीं है। अनुवादक अर संपादक रै विवेक मुतालिक ओ ईज केवणौ वाजिब है के साहित्य री दुनिया लोकतंत्रिक दुनिया है अर इण दुनिया में एक दूजै री पसंद-नापसंद रौ समांन व्हैणौ इज चाईजै।

कुंदन मालीसमकालीन भारतीय समाज, परिवेस, परम्परा अर न्यारै-न्यारै प्रदेसां रै संवेदनात्मक अर सिरजणात्मक भूगोल अर आबोहवा नै इण संग्रै में मौजूदा कवितावां रै मारफत आसानी सूं मैसूस करी जाय सकै। दूजै सबदा में केवां तो “सबद नाद” रै रूप में आपां रै साम्हीं एक इस्यौ केलिडोस्कोप है जिण नै समकालीन भारतीय कविता री एक गंभीर, सारथक झांकी पेस करण री उल्लेखजोग कोसिस रै तौर माथै देखी जावणी चावै। अनुवादकर्म असल में अनुसिरजण रौ कर्म है अर जद कोई कवि खुद इज कवितावां रै अनुवाद नै हाथ में लेवै तौ वो अनुवाद कर्म सांचा अर्थ में सिरजाणात्मक अनुवाद बण जावण री खिमता दरसावै। नीरज दइया आपरी इण मेताऊ कोसिस रै तैत कवियां रै अंतस ताईं पूग नै, कविता रै मर्म नै ओळखण उण नै आपरी भासा में ढाळै अर नतीजा में आपां नै सम्प्रेसणीय, सिरजणात्मक अर संवेदनसील कवितावां मिलै।

“सबद नाद” राजस्थानी पाठक-समाज रै बीच आप री गैरी पैठ थरपैला अर आवण वाळा अनुवादकां नै प्रोत्साहित करण रौ काम करैला।

कुंदन माली ४०/१२१४, टेकरी, उदयपुर (राज.) ३१३००२

(“सबद-नाद” पोथी री भूमिका)

अेक लाम्बै मिठास रै सीगै

Mohan Alokमोहन आलोक

हिन्दी भासा रै ‘चौथा सप्तक’ रा ख्यातनाम कवि नन्दकिशोर आचार्य री अब तांई छपियोड़ी चवदै काव्य पोथ्यां सूं टाळवीं कवितावां रो ओ महताऊ अनुसिरजण ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ जठै डॉ. नीरज दइया री अेक सांतरी उपलब्धि है, बठै ई मायड़ भासा रै अनूदित साहित्य रो अेक गीरबै जोग ग्रन्थ ई है।
डॉ. दइया जैड़ै आगीवाण आधुनिक कवि रै, ऊंडै अंधारै कठैई, पूगण रो अैसास आचार्य जी जैड़ै कवि-रिख री आंगळी थाम’र ई संभव हो, क्यूं कै ‘अलेखू उणियारां रै बीच अदीठ’ (इतनी शक्लों में अदृश्य, आचार्य जी रो काव्य संकलन) रो छणिक दीठाव ई नीठ साधना-संभव हुवै है।
किणी भी अनुवादक री पैली कसौटी, उण री अनुवाद सारू टाळ्योड़ी रचना हुवै। आंग्ल भासा रै ख्यातनाम अनुवादक ‘फिट्जेराल्ड’ री ऊंचाई, जेकर उण रो खैयाम री रूबायां रो अनुवाद है, तो उण सूं पैली उण री वा दीठ है जिकी खैयाम री प्रज्ञा तांई पूग’र पाछी बावड़ै। वां नै अनुवाद सारू टाळै। वां री महत्ता नै पिछाणै। डॉ. आचार्य जैड़ै सिध अर सारगर्भित कवि री कवितावां नै आपरै अनुवाद सारू टाळ’र डॉ. दइया आपरी चयन-प्रतिभा रो परिचय दियो है।
‘ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै किणी भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री सिरैता ई कही जावैला कै ओ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै बठैई केई कवितावां रो तो शब्दश: अनुवाद ई पाठक रै साम्हीं राखै।
आप सारू इण अनूदित कृति ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ मांय आचार्य जी रै अब तांई प्रकाशित चवदै काव्य संकलनां- जल है जहाँ, वह एक समुद्र था, शब्द भूले हुए, आती है जैसे मृत्यु, कविता में नहीं है जो, अन्य होते हुए, चाँद आकाश गाता है, उडऩा सम्भव करता आकाश, गाना चाहता पतझड़, केवल एक पत्ती ने, इतनी शक्लों में अदृश्य, छीलते हुए अपने को, मुरझाने को खिलाते हुए अर आकाश भटका हुआ सूं वां री टाळवी कवितावां लिरीजी है। बै कवितावां जिकी मांय ‘अज्ञेय’ रै सबदां मांय— ‘आंगन के पार द्वार खुलै, द्वार के पार आंगन’ अनै फेर खुलता ई चल्या जावै, अेक अधुनातन अध्यात्म री भासा मांय।

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