लालित्य ललित के व्यंग्य-संग्रह की भूमिका

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आपके हाथों में जो किताब है उसके लेखक श्री लालित्य ललित मेरे मित्र हैं। हमारी मित्रता की प्रगाढ़ता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मुझे उन्होंने अपनी रचनाएं भेजते हुए संग्रह की भूमिका के साथ इसके नामकरण का भी अनुरोध किया है। मैं लेखन के मामले में बचपन से ही पूरी तरह से स्वत्रंत रहा हूं। अब जब लेखन में कुछ नाम और बदनाम हो जाने के बाद पाता हूं कि लिखता तो मैं भी हूं पर लालित जी तो खूब लिखते हैं। क्या आप प्रतिदिन व्यंग्य लिखने को सरल काम समझते हैं? मैं तो नहीं लिख सकता और इसे बहुत कठिन काम मानता हूं। इस लिहाज से और वैसे भी मैं खुद को लालित्य ललित से छोटा व्यंग्यकार मानता हूं। मैं इस संसार में लालित्य से पहले आया और वे भी बिना देरी किए मुझसे सवा साल बाद आ गए। इसलिए मैंने भी उनसे सवा साल बाद हिंदी व्यंग्य के क्षेत्र में पदार्पण किया था।
दुनिया में बहुत सी बातें समझ नहीं आती। वैसे साहित्य में छोटा-बड़ा क्या होता है? व्यंग्यकार तो कुछ अलग दृष्टि रखता है इसलिए उसे सब कुछ या तो बड़ा-बड़ा दिखाई देता है या फिर छोटा-छोटा। उसे जो जैसा है उसे देखने में जरा संकोच होता है। जैसे निंदक का स्वभाव निंदा करना होता है वैसे ही व्यंग्यकार के स्वभाव में मेन-मेख का भाव समाहित हो जाता है। प्रत्यक्ष में इसे मैं संयोग ही कहूंगा पर सोचता हूं कि उन्होंने इतने मित्रों में मेरा चयन क्यों किया? यह मीन-मेख का स्वभाव ही है। मित्र पर शक-संका करना भला मित्र धर्म है क्या? पर मित्रों में झूठ भी अपराध है। इसलिए सब कुछ बताना ठीक है। मैं चिंता में हूं। मेरे पास इस चिंता के अलावा भी अनेक चिंताएं हैं। कुछ चिंताएं आपसे साझा करना चाहता हूं। मेरी चिंता है कि पहले व्यंग्य लेखन बहुत कठिन काम समझा जाता था, हर कोई लेखक व्यंग्य लिखने की हिम्मत नहीं करता था। अब जब से हमारी पीढ़ी यानी लालित्य ललित और मेरे जैसे लेखकों ने इस विधा में सक्रिया दिखाई है तभी से इसे बहुत सरल समझा कर बहुत से लेखक व्यंग्यकार बनने का प्रयास करने लगे हैं।
वैसे अपनी जमात के लिए यह कहना ठीक नहीं है कि व्यंग्यकार टांग खींचने के मामले में बदनाम हैं। वे अनेक ऐसी युक्तियां जानते हैं कि छोटों को बड़ा और बड़ों को छोटा बनाते में लगे रहते हैं। मैं कोई ठीक बात लिखूंगा तब भी उसे किसी भी रूप में लेने और समझने के लिए सब स्वयं को स्वतंत्र समझते हैं। मैं कह देता हूं कि आपकी स्वतंत्रता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मेरी सीधी और सरल बात को आप गंभीर और कुछ ऐसी-वैसी समझने की भूल करें। देखिए लोग कीचड़ को देखकर बच कर निकलने का प्रयास करते हैं। स्वच्छता अभियान के इस दौर में भला कीचड़ और गंदगी को गले लगना कहां की समझदारी है। व्यंग्यकार तो जैसे बिना नियुक्ति के स्वच्छता अभियान के कार्यकर्ता हैं, जो जरा गंदगी या फिर कीचड़ दिखते ही झाड़ते हैं। वे कलम हाथ उठाए ही रखते हैं। आज लिखा, कल छपा, के इस दौर में रचना को अधिक पकाने का काम हम नहीं करते हैं। इतना समय ही हमें कहां मिलता हैं और वैसे भी हमारा एक हाथ तो सदा पत्थरों से भरा रहता है। जहां कीचड़ दिखाता है, वहीं पत्थर फेंक निशाना साधते हैं। कभी तो कुछ छींटे हमारे पर आ गिरते हैं और नहीं गिरते तो हम खुद ही थोड़े कीचड़ से सना हुआ दिखते हैं, जिससे लगे कि हम यर्थाथ के धरातल पर हैं। अगले दिन हमारा वह अचूक निशाना अखबारों की शोभा बनता है। हमें निरंतर प्रकाशित होना बहुत अच्छा लगता है।
अन्य विधाओं की तुलना में भाषा का सर्वाधिक प्रखर और प्रांजल प्रयोग व्यंग्य विधा में संभव है। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी दुनिया की विसंगतियां, फोड़े, फुंसिया, घाव, मवाद, गंदगी, कीचड़ आदि जो कुछ भी है, उन के पीछे व्यंग्यकार नश्तर लिए पड़े हुए हैं। हम दुनिया को सुंदर बनाने का स्वप्न लिए हुए, जगह-जगह घाव कर रहे हैं और कहीं-कहीं गहरे तक चीर-फाड़ करते हुए सब कुछ ठीक करने में लगे हुए हैं, किंतु इतना काम करने के बाद भी ढाक के वही तीन पात।
भूमिका का मतलब भूमिका होता है और इसलिए मैंने इतनी लंबी-चौड़ी भूमिका बनाई है। अब असली मुद्दे पर आना चाहिए। बहुत सी भूमिकाएं और प्रवचन मैंने और अपने ऐसे देखें है, जिनमें बहुत बड़ी-बड़ी बातें होती है, पर मुख्य बात किताब और किताब के लेखक को बहुत कम महत्त्व देते हैं। मैं ऐसा करने की भूल नहीं कर सकता हूं। इसलिए मैंने अब तक बिल्कुल छोटी-छोटी मामूली बातें की है और अब गंभीर बात करने जा रहा हूं।
इक्कीसवीं सदी के व्यंग्यकारों में लालित्य ललित बेशक शरीर से भारी-भरकम दिखाई देते हो, किंतु उनकी रचनात्मक तीव्रता किसी तेज धावक सरीखी है। वे उम्र के अर्द्ध शतक के पास हैं और लिखने वाले हाथ में इतनी तेजी है कि ‘की-पेड’ भी उन्हें बहुत बार कहता होगा- ‘भाई साहब जरा धीरे, मैं तो मशीन हूं।’ यह बहुत हर्ष और गर्व का विषय है कि लालित्य आधुनिक तकनीक के मामले में बहुत आगे और तेज है। वे बहुत जल्दी किसी भी घटनाक्रम को रचना को शब्दों से साधते हुए द्रुत गति से दुनिया के सुदूर इलाकों में इंटरनेट के माध्यम से पहुंचने की क्षमता रखते हैं।
जैसा कि मैंने पहले स्पष्ट कर दिया कि मैं कहने-सुनने के मामले में बिल्कुल साफ हूं और साफ मन से आपको स्वतंत्रता देना पसंद नहीं करता। मैं दुआ करता हूं कि मशीनों के बीच हमारे व्यंग्यकार भाई लालित्य ललित की अंगुलियां ‘की-पेड’ जैसी किसी मशीन में ना तब्दील हो जाए। यहां एक खतरे का अहसास है कि हिंदी में सर्वाधिक तेजी से अधिक व्यंग्य लिखने वाले लेखकों में शामिल होना बहुत अपने आप में चुनौति भरा है। इसमें बहुत हुनर और होशियारी चाहिए। इन और ऐसी अनेक विशेषाओं के बारे में आप कुछ भी कहें पर मैं तो ललित-मित्र-धर्म में बंधा, उन्हें अव्वल कहता हूं। दीवानगी की हद तक लालित्य ललित को पाण्डेय जी का पीछा करते हुए मैंने देखा है। उन्होंने पाण्डेय जी को इतना फेमस कर दिया है कि पाण्डेय जी पर उनका कॉपीराइट हो चुका है। अब सबको पाण्डेय जी को बिल्कुल छोड़ देना चाहिए। मैं या अन्य कोई व्यंग्यकार अपने व्यंग्य में किसी दूसरे पाण्डेय जी को भी लाएंगे तो पाठक यही सोचेंगे कि लालित्य ललित वाले पाण्डेय जी को चुरा कर लाए हैं। पाण्डेय जी इस असंवेदनशील होती दुनिया में संवेदनशीलता की एक मिशाल है। मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि व्यंग्यकार में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संवेदनाशीलता ही होती है, जिसे देखा-समझा जाना चाहिए।
किसी पर ऐसे मजाक कर जाना, जो किसी को चुभे भी नहीं और अपना काम भी कर जाए, यह आत्मकथन हमें लालित्य ललित के उनके पहले व्यंग्य संग्रह के लिए लिखे आरंभिक बयान ‘मेरी व्यंग्य-यात्रा’ में मिलता है। उनके तीनों व्यंग्य-संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ (2015), ‘विलायतीराम पाण्डेय’ (2017) और ‘साहित्य के लपकूराम’ (2020) इस आत्मकथन पर एकदम खरे उतरते हैं। यह कथन उनकी इस यात्रा की संभवानाओं और सीमाओं का भी निर्धारण करने वाला कथन है। यहां यह भी उल्लेख आवश्यक है कि उनके पहले दोनों व्यंग्य संग्रहों की भूमिका प्रख्यात व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने लिखी हैं और तीसरे व्यंग्य संग्रह की भूमिका प्रेम से मैंने लिखी है। जनमेजय जी ने प्रशंसात्मक लिखते हुए अंत में एक रहस्य उजागर कर दिया कि वे नए व्यंग्यकार लालित्य ललित के प्रथम व्यंग्य संग्रह का नई दुल्हन जैसा स्वागत कर रहे हैं। उसकी मुंह-दिखाई की, चाहे कितनी भी काली हो, प्रशंसा के रूप में शगुन दिया और मुठभेड़ भविष्य के लिए छोड़ दी। ललित यदि इस प्रशंसा से कुछ अधिक फूल गए तो यह उनके साहित्यिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होगा।
जाहिर है कि अब मुठभेड़ होनी है और यह भी देखा जाना है कि उनका साहित्यिक स्वास्थ्य फिलहाल कैसा है, क्यों कि उनका दूसरा और तीसरा व्यंग्य संग्रह भी आ गया है। विलायतीराम पाण्डेय, लालित्य ललित का प्रिय और पेटेंट पात्र है। इन पाण्डेय जी की भूमिका में कभी उनमें लालित्य ललित स्वयं दिखाई देते हैं| और कभी वे अनेकानेक पात्रों-चरित्रों को पाण्डेय जी में आरोपित कर देते हैं। यहां यह कहना उचित होगा कि पूर्व की भांति इस व्यंग्य संग्रह में भी लालित्य ललित ने व्यंग्य के नाम पर कुछ जलेबियां पेश की है। व्यक्तिगत जीवन में वे स्वाद के दीवाने हैं और संग्रह के अनेक व्यंग्य पाण्डेय जी के इसी स्वाद के रहते स्वादिष्ठ हो गए हैं। आपके निजी भाषिक अंदाज और चीजों के साथ परिवेश के स्वाद की रंगत और कलाकारी अन्य व्यंग्यकारों से अलग है।
लालित्य ललित कवि के रूप में भी जाने जाते हैं और संख्यात्मक रूप से भी आपकी कविताओं की किताबों का आंकड़ा मेरे जैसे कवि को डराने वाला है। उनके कवि-मन के दर्शन पाण्डेय जी में हम कर सकते हैं। लालित्य ललित कवि हैं और गद्य को कवियों का निकष कह गया है। निबंध गद्य का निकष कहा जाता है, इसमें व्यंग्य को भी समाहित कर विशेष माना जाना चाहिए।
लालित्य ललित के व्यंग्य की तुलना किसी अन्य व्यंग्यकार ने इसलिए नहीं की जा सकती कि उन्होंने निरंतर एक शैली विकसित करने का प्रयास किया है। उनके व्यंग्य मुख्य धारा से अलग अपने ही तरह के व्यंग्य कहे जाते हैं। पाण्डेय जी की अनेक रूढ़ताओं में मौलिकता और निजताएं भी हैं। प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह में भी उनके व्यंग्यकार का स्वभाव पुष्ट होते हुए स्थितियों को एक दूसरे से जोड़ते हुए बीच-बीच में हल्की-फुलकी चुहलबाजी का रहा है। कहीं पे निगाहें और कहीं पर निशाना का भाव उनके व्यंग्य पोषित करते हैं। जैसा कि वे कवि हैं और सौंदर्य पर मुग्ध होने का उनका स्वभाविक अंदाज जैसा कि वे चाहते हैं कि कोई बात किसी को चुभे नहीं, की अभिलाषा पूरित करता है। उनके पाण्डेय जी के सभी अंदाज चुभने और अखरने वाले नहीं है। उनका हल्के-हल्के और प्यारे अंदाज से चुभना अखराता नहीं है।
विलायतीराम पाण्डेय सर्वगुण सम्पन्न है कि वे किसी फिल्म के हीरो की भांति कुछ भी कर सकते हैं। वे जब कुछ भी करते हैं, तब उनकी सहजता नजर आती है, किंतु उसमें व्यंग्यकार का हस्तक्षेप अखरने वाला भी रहता है। लालित्य ललित की यह विशेषता है कि वे विभिन्न रसों से युक्त परिपूर्ण जीवन को व्यंग्य रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं। अनेक वर्तमान संदर्भों-स्थितियों को उकेरते हुए वे बहु-पठित, शब्दों के साधक, कुशल वक्ता, कुशाग्र बुद्धि होने का अहसास कराते हैं।
इस संग्रह का उनका मुख्य पात्र विलायतीराम पाण्डेय उनके पहले दोनों संग्रहों में सक्रिय रहा है और यहां तो उनकी हाय-तौबा देखी जा सकती है। नाम- विलायतीराम पाण्डेय, पिता का नाम- बटेशरनाथ पाण्डेय, माता का नाम- चमेली देवी, पत्नी- राम प्यारी यानी दुलारी और दोस्त- अशर्फीलाल जैसे कुछ स्थाई संदर्भों यानी आम आदमी से व्यंग्यकार देश-दुनिया और समाज का इतिहास लिपिबद्ध करता है। यहां आधुनिकता की चकाचौंध में बदलते जीवन की रंग-बिरंगी झांकियां और झलकियां हैं। हमारे ही अपने सुख-दुख और त्रासदियों का वर्णन भी पाण्डेय जी के माध्यम से हुआ है। कहना होगा कि लालित्य ललित मजाक मजाक में अपना काम भी कर जाते हैं। यह उनकी सीमा है कि उनके व्यंग्य का मूल केवल कुछ पंक्तियों में समाहित नहीं होता है, किंतु यह उनकी खूबी है कि उनके व्यंग्य का वितान जीवन के इर्द-गिर्द व्यापकता के साथ दिखाई देता है। स्वार्थी और मोल-भाव करने वाले प्राणियों के बीच नायक विलायतीराम पाण्डेय इस दुनिया को देख-समझ रहे हैं अथवा दिखा-समझा रहे हैं। यहां एक चेहरे में अनेक चेहरों की रंगत है। सार रूप में कहा जाए तो एक बेहतर देश और समाज का सपना इन रचनाओं में निहित है।
संग्रह में विषय-विविधता के साथ समसामयिक स्थितियों से गहरी मुठभेड है। साहित्य और समाज के पतन पर पाण्डेय जी चिंतित हैं। जनमानस की बदलती प्रवृतियों और लोक व्यवहार को रेखांकित करते हुए वे कुछ ऐसे संकेत छोड़ते हैं जिन्हें पाठकों को पकड़ना है। उनका हर मजाक अहिंसक है। लालित्य ललित अपने गद्य-कौशल से किसी उद्घोषक की भांति किसी भी विषय पर आस-पास के बिम्ब-विधानों से नए रूपकों को निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। पाण्डेय जी उनके और हमारे लिए सम्मानित नागरिक है और होने भी चाहिए। वे यत्र-तत्र ‘नत्थू’ बनने की प्रविधियों से बचाते हुए सम्मानित जीवन जीना चाहते हैं। वे परंपरागत उपमानों के स्थान पर नए और ताजे उपमान प्रयुक्त करते हैं। बाजार की बदलती भाषा और रुचियों से उनके व्यंग्य पोषित हैं।
लालित्य ललित के व्यंग्य अपनी समग्रता और एकाग्रता में जो प्रभाव रचते हैं, वह प्रभावशाली है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे पृथक-पृथक अपनी व्यंजनाओं से हमें उतना प्रभावित न भी करते हो, किंतु समग्र पाठ और सामूहिकता में निःसंदेह पाण्डेय जी एक यादगार बनकर स्थाई प्रभाव पैदा करते हैं। विविध जीवन-स्थितियों से हंसते-हंसाते मुठभेड करने वाले एक स्थाई और यादगार पात्र पाण्डेय जी हर मौसम हर रंग में सक्रिय है और उनको हम नहीं भूल सकेंगे। अंत में बधाई और शुभकामनाएं।

डॉ. नीरज दइया

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ढीला ढक्कन / डॉ. नीरज दइया

क लड़का परीक्षा में नकल करवा रहा था। वह अपनी उत्तर-पुस्तिका खोल कर टेढ़ा बैठा था। उसे उसके पीछे वाली लड़की पढ़ रही थी। मैंने गौर से देखा। अरे यह लड़का तो हमारे ही विद्यालय के अंग्रेजी सर का लड़का है। उसे मैं सूरत से पहचानता था। मैं तुरंत उस लड़की के पास पहुंचा और बोला- ‘क्या कर रही हो?’
वह मुझे देख कर डर गई और बोली- ‘सर, कुछ नहीं।’
– ‘इस लड़के से नकल कर रही हो?’
वह घबरा गई और जल्दी से बोली- ‘नहीं सर, मैं नकल नहीं कर रही थी।’
मैंने लड़के को बोला- ‘तुमने पेपर पूरा कर लिया?’
वह भी सकपकाया हुआ था। वह हकलाते हुए बोला- ‘हां सर, मैंने कर लिया है।’
– ‘कर लिया तो इसका मतलब तुम दूसरों को नकल….’ मैं अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया कि लड़का बीच में अपनी सफाई देने लगा ‘नो सर….. मैं…. मैं…. मैं…. नकल… नहीं।’
– ‘चुप। क्या नाम है तुम्हारा?’
– ‘प्रिंस।’
– ‘प्रिंस, सीधे बैठो और अपनी कॉपी को ढंग से रखा करो कि दूसरा कोई देखे नही।’
प्रिंस सीधा बैठ गया। उसके चेहरे पर भय दिखाई दे रहा था। शायद वह यह सोच कर डर रहा होगा कि उसके बारे में मैंने उसके पापा को बताया तो क्या होगा?
मैंने गौर किया एक बार मना करने के बाद वह स्थिर बैठे रहा। थोड़े समय में बेल बजने वाली थी, बेल बज गई।
नकल करवाने की बात मैंने प्रिंस के पापा को नहीं बताई। उस दिन के बाद एक दिन स्कूल में फिर प्रिंस मुझे सामने से आता दिखाई दिया। मुझे देख कर वह मुस्कुराया और बोला- ‘नमस्ते सर।’ मैं भी मुस्कुराया। मैंने गौर किया वह परीक्षा वाले दिन की भांति अब भी थोड़ा अटकते हुए बोल रहा था।
हिंदी शिक्षक के नाते मुझे लगा कि बच्चे को बोलने में समस्या है। मैंने अपने साथी अध्यापक से इस बारे में अपना संदेह जाहिर किया तो वे हंसते हुए बोले- ‘अरे उसको छोड़ो, वह ढीला ढक्कन है।’
मैं उनके चेहरे की तरफ देखने लगा। मैंने पूछा- ‘ढीला ढक्कन माने?’
– ‘ढीला ढक्कन माने ढीला ढक्कन।’ वे हंसने लगे और मैंने भी इस बात को विराम लगा दिया।

काफी अंतराल बाद एक दिन मुझे संयोग से प्रिंस की कक्षा में जाने का अवसर मिला। मैंने उसे गौर से देखा और उसकी तरफ संकेत कर पूछा- ‘क्या नाम है तुम्हारा।’
– ‘सर, प्रिंस… ।’ वह बोला तो मुझे उसके पापा के कहे शब्द स्मरण हो आए ‘ढीला ढक्कन’।
मैंने संवाद का सिलसिला आगे बढ़ाया- ‘अच्छा, बताओ प्रिंस का मतलब क्या होता है?’
कुछ बच्चे जैसे मेरे सवाल के इंतजार में ही बैठे थे, एक साथ बोले- ‘राजकुमार।’
मैं हल्की सी नाराजगी जाहिर करते हुए बोला- ‘अरे मैंने तो राजकुमार से पूछा था और बीच में सारी जनता कैसे बोल पड़ी।’
– ‘सर, प्रिंस माने राजकुमार।’ इस बार प्रिंस बोला।
– ‘तो फिर तुम्हारे दो-दो नाम है? एक अंग्रेजी में और एक हिंदी में।’
– ‘नो सर, नाम तो एक ही है।’ वह अटक अटक कर बोला।
– ‘फिर इतना अच्छा नाम है तो अटक-अटक कर क्यों बोलते हो?’
– ‘सर, प्रोब्लम है।’
– ‘कोई प्रोब्लम नहीं है। खुल कर बोला करो। डर लगता है किसी से?’
– ‘नो सर।’
– ‘चलिए बैठ जाओ।’
मैंने चॉक के तीन टुकड़े किए और संकेत से दो लड़कों को बुलाया। एक से कहा लिखो- ‘ढीला।’ और दूसरे को बोला- ‘ढक्कन।’
क्लास में एक हंसी बिखर गई। मैंने पूछा- ‘क्या हुआ?’ तो सारे चुप। मॉनिटर बोला- ‘सर कुछ क्लासमेट प्रिंस को ढीला ढक्कन कह कर परेशान करते हैं।’
मुझे लगा मैंने गलत प्रकरण छेड़ दिया है। स्थिति को नोर्मल करते हुए मैं बोला- ‘देखिए, आपके दोस्त ने गलत लिखा है। इनको शुद्ध शब्द लिखना नहीं आया। दोनों बैठ जाएं।’
इतने में एक दो बच्चों ने हाथ खड़े किए और सर मैं सर मैं की आवाज निकाली। मैंने उन्हें प्रोत्साहित किया तो श्यापपट्ट पर ढिला के आगे उस लड़की ने ढीला शब्द ठीक लिख दिया। तो एक दूसरा लड़का बोला- ‘गलत है।’ मैंने उसे बुलाया तो उसने ढ़ीला लिखा। यही हाल ढक्कन का हुआ।
मैंने बच्चों को बताया कि ढ़ से जब कोई शब्द आरंभ होता है तो उसने नीच का बिंदु नहीं लगाया जाता। जैसे ढीला, ढंग, ढक्कन आदि शब्द और अगर ढ़ शब्द के बीच में अथवा अंत में आता है वहा बिंदु लगता है। उदाहरण लिखे- कढ़ाई, पढ़ो। इसके बाद क्लास वर्क के रूप में उन्हें ऐसे शब्द लिखने दे दिए और प्रिंस को अपने पास बुलाया।
जब वह आया तो मैंने पूछा- ‘क्या सीखा?’
वह बोला- ‘ढीला ढक्कन में बिंदु नहीं आता है।’
– ‘तुम डरते-डरते नहीं पूरे मन से बिना डरे बोला करो। अगर तुम आत्मविश्वास के साथ बोलोगे तो कोई दिक्कत नहीं आएगी। घबराना छोड़ो। सभी बोलते हैं वैसे बोला करो। इस बात को भूल जाओ कि तुम अटकते हो।’
– ‘यस सर।’
– ‘कल तुमको प्रार्थना सभा में एक कविता बोलनी है।’
– ‘नो सर।’
– ‘नो क्यों? सोच लो। मैंने वो वाली बात तुम्हारे पापा को नहीं बताई है।’
– ‘यस सर।’
– ‘तो पक्का रहा, तुम बोलोगे।’
– ‘नो सर।’
– ‘फिर नोर सर कैसे आए। तुमको बोलना है। छोटी सी कविता हो तो भी चलेगा। पर बोलना ही है। जैसी आए बोलना, बिना घबराए। और हां आज घर जाकर अपने पापा को बीस बार कविता सुनाना।’
वह कुछ सोच कर बोला – ‘यस सर।’
शाम को मेरे साथी अध्यापक का फोन आ गया। बोले- ‘सर, यह क्या प्रोब्लम कर दी।’
मैंने पूछा – ‘क्या हुआ?’
– ‘मेरा बेटा मुझे कविता सुनाए जा रहा है और कह रहा है कि सर ने बोला कि बीस बार सुनानी है।’
मैंने कहा- ‘हां तो सुनिए ना। क्या प्रोब्लम है।’
– ‘यार, ये ढीला ढक्कन….।’
मैंने सर को बीच में टोक दिया- ‘प्लीज सर, उसे ढीला ढक्कन कहना बंद करें। कल वह अच्छे से कविता सुनाएगा। सॉरी।’
– ‘ओ के सर।’ और उन्होंने फोन काट दिया।
अगले दिन प्रार्थना-सभा में प्रिंस ने कविता बोली। स्टेज पर जा कर मैंने बच्चों को जोरदार तालियों से प्रिंस का उत्साह-वर्द्धन करवा दिया। प्रिंस के चेहरे पर एक नई चमक आ चुकी थी।
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स्नेक चार्मर / नीरज दइया

जैसे-जैसे जन्मदिन नजदीक आता जा रहा था, वैसे-वैसे उस दिन को लेकर अनेक बातें ध्यान में आ रही थी। पहली तो यही कि मोहन काफी दिनों से उधेड़-बुन में था कि जब वह स्टेज से थैंक्यू बोलेगा, तब क्या कहेगा। जिसका भी जन्मदिन होता है, वह स्टेज पर रहता है और बर्थ-डे सोंग के बाद थैंक्यू के साथ ही उसे बताना होता हैं कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। उसे याद है कि उसके जिगरी दोस्त हरिप्रसाद ने इंजिनियर बनने का कहा था। और संगीता जो उसके पड़ोस में रहती है, उसने डॉक्टर बनने का सपना बताया था। मोनिटर रवि ने टीचर बनने की बात कही थी। इन सब के बीच मोहन सोच रहा था कि वह क्या कहेगा?
उसने पापा से इस बारे में बात की तो पापा ने कहा उन्हें तो इंजिनियर बनना अच्छा लगता है। उसने एक बार सोच लिया कि अगर पापा को इंजिनियर बनना अच्छा लगता है तो वह अपने बर्थ-डे के दिन स्टेज से बोलेगा कि वह इंजिनियर बनना चाहता है। समस्या तब बढ़ गई जब मम्मी ने उसे एक नया ही सुझाव दे दिया। मम्मी ने कहा- ‘देश-सेवा के लिए आर्मी ऑफिसर बनाना सबसे अच्छा है।’ मोहन को यह बात भी अच्छी लगी। अब उसके मन में इंजिनियर और आर्मी ऑफिसर के बीच एक जंग होने लगी। दोनों में से किसे चुना जाए, किसे छोड़ा जाए। मम्मी की बात का मान रखे या पापा की।
इसी बीच मोहन अपनी यह दुविधा बताए बिना आपने दादाजी से पूछ बैठा- ‘दादाजी-दादाजी, एक बात तो बताओ..।’
दादाजी बोले- ‘पूछो एक क्यों, दो बातें पूछो।’
– ‘दादाजी हमारे स्कूल में जब मेरा जन्मदिन मनाएंगे, तब मुझे थैंक्यू के साथ माइक पर बताना होगा कि मैं बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूं। आप बताओ मैं क्या बनूं?’
दादाजी हंसने लगे और जब उनकी हंसी थमी तब वे बोले- ‘इतनी सी बात थी? अरे, मैंने सोचा ना जाने क्या पूछने वाला है। इसमें सोचने जैसी कोई बात ही नहीं है रे। तू मेरा पोता है और बड़ा होकर बिजनेस करना। नौकरी में जितना पैसा है, उससे कई गुना पैसा और फायदा बिजनेस में है। अब देख तेरे पापा को, छोटी-सी नौकरी है और आए दिन इधर-उधर बदली होती रहती है। हमने कितने शहर बदल लिए। अब तो एक ही इच्छा है कि तू बड़ा होकर बिजनेस खोल ले और खूब कमाई करे। यह शहर-शहर भटकना अब मुझे अच्छा नहीं लगता।
मोहन को बिजनेस का कुछ भी समझ नहीं आया। उसे यह देखकर अच्छा लगा कि दादाजी खुश हो गए हैं। उसने मुस्कुराते हुए सोचा कि मेरे जन्मदिन वाले दिन जो होगा, देखा जाएगा। इस जरा-सी बात के लिए अभी से परेशान नहीं होना है। फिर ऐसा भी तो नहीं है कि जो बोल दिया वही एकदम पक्का है। उसे बदला भी तो जा सकता है। उसे उन बच्चों के नाम याद आ गए, जिन्होंने अपने पिछले जन्मदिन पर जो कुछ बताया था उसे इस बार बदल लिया था। बड़े होकर जो बनना होता है वह अपने आप हो जाता है। पापा भी तो क्रिकेटर बनना चाहते थे, बने क्या? उसे मम्मी का ध्यान आया, मम्मी भी तो अपने स्कूली दिनों में कुछ बनना चाहती थी। अब तो वह केवल मम्मी ही बनी हुई है। फिर दादीजी का भी तो यही हाल हुआ है। वे भी तो घर ही रहतीं हैं। दादाजी का ख्याल आते ही मोहन सीधा उनकी तरफ चल दिया।
दादीजी अपने कमरे में दादाजी के कुर्ते के टूटे बटन लगा रही थीं। वे अकेली थीं और मोहन को मौका अच्छा मिल गया। उसने जो बातें अब तक किसी से नहीं बताई, वे सारी की सारी अपनी दादीजी को दिल खोल कर बता दी। दादीजी जितने ध्यान से मोहन की बातें सुनती है, उतना ध्यान कोई दूसरा कहां देता है। दादीजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- ‘बेटा तू वह बनाना, जो तेरा मन कहता है। दूसरों की नहीं, बस अपने मन की आवाज सुनना सीखो।’
मोहन हंसने लगा और बोला- ‘दादीजी मेरा मन तो गूंगा है, कभी बोलता ही नहीं।’
दादीजी फिर उतने ही दुलार से बोली- ‘बोलेगा, जरूर बोलेगा। सारे मन बोलता हैं। मन ही सारे भेद खोलता है। ध्यान से सुनना अपने मन की बात, देखना कि वह क्या कहता है।’
अगले दिन मोहन की सहपाठी प्रांजल ने अपने जन्मदिन पर नर्स बनने की बात कही। मोहन ने प्रार्थना से लौटते समय प्रांजल से पूछा कि उसने नर्स बनने की कैसे ठानी। उसने बताया कि उसकी मम्मी नर्स है, इसलिए उसे भी नर्स बनना पसंद है। मोहन को नर्स बनने की बात पर अपना भाई याद आ गया। काफी पुरानी बात है, वे छुट्टियों में ननिहाल गए हुए थे। वह एक छोटा-सा गांव था और वहां उसके नानाजी के बड़े-बड़े खेत थे। उन बड़े-बड़े खेतों में उसे गए काफी साल हो गए, अब वह वहां जाना ही नहीं चाहता। अगर जाना चाहे तो भी उन्हें अब पापा वहां नहीं भेजेंगे। मोहन की आंखों से आंसुओं की बहती धारा को देखकर प्रांजल ने पूछा- ‘क्या हुआ, रो क्यों रहे हो?’
मोहन ने प्रांजल को रोते-रोते बताया कि उसके भाई को गांव में सांप ने काट लिया था और गांव में डॉक्टर नहीं बस नर्स थी, जो उसके भाई को बचा नहीं सकी। उसका भाई भगवानजी के घर चला गया।
मोहन सोचने लगा- माना यह स्कूल है और यहां उसे रोना नहीं चाहिए। क्या उसे उसका भाई याद आए, तब भी रोना नहीं चाहिए? प्रांजल ने मोहन से कहा- ‘सॉरी मोहन, मैं बड़ी होकर नर्स नहीं डॉक्टर बनूंगी। बस तेरे लिए। सच्ची मैं डॉक्टर बनूंगी।’ मोहन ने इस पर भी कुछ नहीं कहा तो प्रांजल फिर बोली- ‘अब भी खुश नहीं है क्या, मैंने कह तो दिया ना कि मैं डॉक्टर बनूंगी।’
मोहन ने अपने को कुछ संभला और बोला- ‘डॉक्टर बनने से कुछ नहीं होगा। बनना ही है तो वह बन जो सांपों को पकड़ते हैं ना।’
इस पर प्रांजल हंसने लगी और बोली- ‘पागल लड़कियां कभी सांपों को पकड़ती है क्या, अगर तुझ में हिम्मत है तो तू ही बन जा सपेरा।’
‘हां मैं सपेरा ही बनूंगा। पर मुझे यह पता नहीं है कि सपेरे को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?’
‘स्नेक चार्मर।’
‘ओके, मैं स्नेक चार्मर बनूंगा। पर तुझे यह नाम कैसे पता है?’
‘अरे बुद्धू मैं डिस्कवरी चैनल जो देखती हूं, उसमें बहुत बार यह सब आता है।’
यह रहस्य मोहन ने किसी को नहीं बताया कि उसे अपने मन की आवाज सुनाई देने लगी है। उसका मन कह रहा है कि उसे स्नेक चार्मर ही बनना चाहिए।
जन्मदिन वाले दिन स्टेज पर मोहन की आवाज में उत्साह था, पर यह क्या उसी की कक्षा के दो-तीन दोस्त उस पर हंस रहे थे। उन्हें मोहन समझा रहा था कि इस में हंसने जैसी भला क्या बात है। मैं स्नेक चार्मर नहीं बन सकता क्या? मैं दुनिया के बड़े-बड़े सांपों को पकड़ कर लोगों की जिंदगी बचा लूंगा। वे बदमाश दोस्त जैसे पहले से ही ठाने बैठे थे कि उन्हें तो उसका मजाक ही बनाना है।
प्रभा मेडम को पता नहीं किसने सारी बातें बता दी और वे बच्चों को समझाने लगी। किसी की बात पर हंसना और मजाक बनाना गलत बात है। लड़कों की बातें सुनकर मोहन को पहले लगा कि उसने गलत फैसला कर लिया है और वह अपने फैसले पर फिर से विचार भी करने लगा था पर उसे अब लगने लगा जैसे उसने जो कुछ सोचा है वह ठीक सोचा है। यह उसके मन की आवाज है। उसने पक्का ठान लिया कि उसे क्या बनना है। कोई कुछ भी कहे उसे तो स्नेक चार्मर ही बनना है।
मेडम भी तो यही कह रही थी- ‘लोग भले कुछ भी कहे, कहते रहे। हमें वही करना चाहिए जो हमारा मन हमें करने को कहता है।’
स्कूल से घर लौटते ही मोहन ने उस दिन दादीजी के चरण स्पर्श करते हुए कहा- ‘दादीजी आपने ठीक कहा था, मेरा मन बोलने लगा है। उसने मुझे बता दिया कि मुझे बड़ा होकर क्या बनना है।’
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गुलाब जामुन का पेड़ / नीरज दइया

र्मी की छुट्टियां होते ही अंशज अपने ननिहाल बीकानेर आ गया। पिछली बार जब वह आया था तब छोटा था और इस बार कुछ बड़ा और समझदार हो गया है। छोटा था तब उसे हर काम कहना पड़ता था अब कुछ जरूरी काम वह बिना कहे ही करने लगा है। ननिहाल में पहुंचते ही उसने नाना-नानी के चरण-स्पर्श किए और अपनी मम्मी से वोला- देखा, मैंने बिना कहें ही नानाजी और नानीजी को प्रणाम किया है। मम्मी हंसकर बोली- अब तुम बड़े हो गए हो ना।

अंशज को बहुत अच्छा लगता है जब उसे बड़ा माना जाता है। सफर बहुत लंबा नहीं था फिर भी उसे भूख लग गई थी। वह सोचने लगा कि उसे क्या कहना चाहिए और किसे कहना चाहिए। बड़े जो होते हैं वे सीधे-सीधे कभी किसी से भूख लगी है कहते नहीं हैं। उसने सोचा कि वह बड़ा तो जरूर हो गया है पर इतना बड़ा भी नहीं हुआ है जितने बड़े उसके पापा और मम्मी है। नानाजी और नानीजी तो पापा और मम्मी से भी बड़े है। पापा ने ही उसे सीखाया था कि बड़ों के नाम के आगे हमेशा जी लगाना चाहिए। उसने उसी दिन बोल दिया था कि पापा और मम्मी के आगे जी लगाना उसे ठीक नहीं लगता। हां जब वह नाना के घर जाएगा तब नाना और नानी को नानाजी और नानीजी ही कहेगा। पिछली बार वह छोटा था और छोटे कुछ गलतियां कर सकते हैं, पर बड़ों को गलतियां नहीं करनी चाहिए।
अंशज ने अपनी मम्मी से पूछा- ‘मम्मी मैं बड़ा हूं या छोटा?’
मम्मी ने कहा- ‘क्यों? ऐसा क्यों पूछ रहा है।’
अंशज ने अपने मम्मी के गले में बाहें डाल दी और उनके कान के करीब जाकर धीरे से बोला- ‘मुझे भूख लगी है और मैं छोटा हूं। बड़े तो ऐसा बोलते नहीं ना कि भूख लगी है।’
मम्मी हंसने लगी और बोली- ‘अंशी कमाल करते हो, तुम इतने भी बड़े नहीं हुए हो कि….. बस। माई स्वीट बेबी। चल मैं तेरे खाने को कुछ लाती हूं।’ अंशज को उसकी मम्मी प्यार से अंशी कहती थी।
नाना और नानी को अंशी की बात जब उसकी मम्मी ने बताई तो वे भी हंसने लगे।
नानाजी हाथ में मिठाई का डिब्बा लाए और बोले- ‘ले अंशी, तेरे लिए।’
अंशज ने जैसे ही नानाजी के हाथ में रसगुल्लों का डिब्बा देखा उछल पड़ा।
‘अरे नानाजी, रसगुल्ले। मैं सारे खा जाऊंगा। वैसे तो मुझे गुलाब जामुन बहुत पसंद है। आज रसगुल्ले ही ठीक है।’
अंशज डिब्बा नानाजी के हाथ से लेने लगा तो मम्मी ने उसे टोका- ‘नहीं अंशी ऐसे तुम कपड़े गंदे कर लोगो। मैं तुम्हें खिलाती हूं।’
अंशज तो यही चाहता था। उसकी तो नानाजी के घर आते ही मौज लग गई। अंशज ने बड़े बड़े तीन स्पंजी रसगुल्ले खाए। वह तो चार भी खा सकता था, पर मम्मी ने बीच में ही कह दिया- ‘अभी बस इतने ही, बाकी बाद में। ये कहीं भागे नहीं जा रहे हैं।’
नानीजी बोलीं- ‘बीकानेर के तो रसगुल्ले और भुजिया नमकीन बहुत प्रसिद्ध है।’
अंशज तुरंत बोला- ‘देखो नानीजी मैं छोटा हूं और कह सकता हूं, रसगुल्ले तो खा लिए पर भुजिया-नमकीन कहां है?’
नानीजी ने कहा- ‘अरे भुजिया और नमकीन सब मिलेगा। मैं तुम्हारे मामा से कह दूंगी वह आता हुआ तुम्हारे लिए गुलाब जामुन भी ले आएगा। अब तो खुश।’
अंशज बड़े उत्साह से बोला- ‘नानीजी जिंदाबाद, मैं तो यहां आते ही एकदम खुश हो गया हूं।’
अंशज के भुजिया और नमकीन का भी आनंद लिया।
शाम को घर लौटते हुए उसके मामा गुलाब जामुन लाना नहीं भूले।
मामाजी से अंशज ने पहला सवाल किया- ‘मामाजी आप गुलाब जामुन कहां से लाए।’
मामाजी ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘अरे, तुमको नहीं पता मेरे दफ्तर में गुलाब जामुन का पेड़ है। साहब से पूछो और जितने चाहे तोड़ के घर ले आओ।’
अंशज हैरान हुआ, ऐसा कैसे हो सकता है। उसने अपनी हैरानी में दूसरा सवाल किया- ‘मामाजी जी आपके साहब अच्छे हैं, वे आपको गुलाब जामुन लाने देते हैं?’
– ‘हां, मेरे साहब बहुत अच्छे हैं। उन्होंने तो यहां तक बोला है कि तुम अपने भांजे के लिए गुलाब जामुन बीज ले जाना और उसके घर लगवा देना।’
– ‘सच्ची ! पर उन्हें कैसे पता चला कि मुझे गुलाब जामुन पसंद है?’
– ‘इसमें सोचने वाले क्या बात है, जब तुम्हारी नानी मुझे गुलाब जामुन लाने का कह रही थी तब इतने जोर से बोल रही थी कि मेरे पास बैठे साहब ने भी सुन लिया था।’
अब अंशज अपनी नानीजी की तरफ मुड़ा और जोर से बोला- ‘नानाजी आप बहुत जोर से बोलती हो, धीरे बोलना चाहिए। देखो मामाजी के साहब ने सुन लिया ना कि मुझे गुलाब जामुन पसंद है।’
अब बीच में मम्मी बोली- ‘सुन लिया तो अच्छा है ना, वे तुम्हारे लिए गुलाब जामुन के बीज देंगे फिर तुम भी गुलाब जामुन का पेड़ लगा लेना।’
‘हां मम्मी, कितना अच्छा होगा। फिर जब मेरी इच्छा होगी तब फटाक से गुलाब जामुन तोड़ा और मुंह में। कितना मजा आएगा।’
मामाजी बोले- ‘वो मजा तो जब आएगा तब आएगा, अभी तो मजा लो। यह खाओ गुलाब जामुन।’
अंशज बोला- ‘मामाजी ये गुलाब जामुन तो छोटे-छोटे हैं। क्या आप बड़े-बड़े नहीं तोड़ सकते थे।’
– ‘अरे तुझे नहीं पता, हमारे साहब बोले कि तुम अपने भांजे के मुंह का नाप बताओ। मैंने कहा वह तो अभी छोटा है। बस फिर क्या था मुझे छोटे-छोटे गुलाब जामुन तोड़ने की इजाजत मिल गई।’
अंशज गुलाब जामुन खाने लगा और अब वह बड़ा हो गया है इसलिए उसने समझदारी दिखाई। रात को सोने से पहले उसने अपने मामाजी से कहा कि वे अपने साहब से कल कहें तो भांजे के साथ बड़ी बहन भी आई है और उसका मुंह बहुत बड़ा है उसके लिए गुलाब जामुन चाहिए। इस पर अगर साहब मान जाएं तो कम से कम दस बड़े बड़े गुलाब जामुन लाएं और नहीं माने तो भांजे के लिए छोटे वाले गुलाब जामुन फिर से देंने का कहें। साथ ही उसने कहा कि वे अपने साहब को थैंक्यू भी जरूर बोलें। गुलाब जामुन नहीं भी दे तो आज दिए उसका थैंक्यू तो बोल ही देना और बाजार से गुलाब जामुन लेते आना।
अगले दिन नानाजी ने अंशज को बताया कि कल सब उसके साथ मजाक कर रहे थे। असल में गुलाब जामुन का कोई पेड़ होता ही नहीं। हां गुलाब का पौधा और जामुन का पेड़ जरूर लगया जाता है।
अंशज ने नानाजी से कहा- ‘नानाजी फिर तो हो गया काम। हम गुलाब का पौधा और जामुन का पेड़ एक साथ लगा देंगे फिर तो गुलाब-जामुन हो जाएंगे ना?’
नानाजी हंसने लगे और नानाजी ने अपनी गर्दन हिला कर कहा- ‘नहीं, नहीं।’
अंशज बोला- ‘कोई बात नहीं नानाजी, और सुन रही हो नानीजी…. मैं जब पूरा बड़ा हो जाऊंगा तब गुलाब-जामुन के पेड़ का आविष्कार करूंगा।’
अंशज की मम्मी बोली- ‘हां यह हुई ना बात। तुम अभी से इसके बारे सोचने लग जाओ। सोचना यह है कि क्या हो सकता है और क्या नहीं हो सकता है।’
नानाजी हंसते हुए बोले- ‘दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जो नहीं हो सकता है। सब कुछ हो सकता है।’
नानीजी कहां चुप रहने वाली थी, वे भी बोली- ‘जरूर हो सकता है बेटा। असंभव भी संभव हो सकता है।’
अंशज ने बस इतना कहा- ‘देखना, मैं हर असंभव को संभव करूंगा। मुझे पूरा बड़ा होने दो।’
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https://www.livehindustan.com/nandan/story-gulab-jamun-tree-3133629.html

Neeraj Daiya Bal kahani 01 (1)

पांच लघुकथावां / डॉ. नीरज दइया

7mayarनौकर

अरे सुणै है कांई, पाणी रो लोटो तो झिला।

रामलाल आपरी लुगाई सूं बोल्यो तो बा सूती-सूती पडूत्तर दियो- आज तो डागळै पाणी लावणो ई भूलगी। फेर बा अपारै बड़ै छोरै नै कैयो- अरे टीकूड़ा, हेठै जाय’र पाणी भर’र लाव देखाण।

टीकूड़ो आपरै छोटियै भाई कानी काम सिरकायो- खेमला ! जीसा खातर हेठै जाय’र पाणी भर’र लाव रे लाडी। खेमलो ई कुणकैयो हो, हाथूहाथ जबाब दियो- म्हनै तो डर लागै.  ओ काम तो मुकनी करसी।

अर बैन ई भायां रै माथै बांधै जिसी ही, बोली- म्हनै तो नींद आयगी, भाई थन्नै कैयो थन्नै ई भर’र लावणो पड़सी।

आ गंगरथ सुण’र रामलाल नै रीस आयगी। बो हड़ देणी खुद उठियो अर पगोथियां उतरतो बडबडावण लाग्यो- ओ घर कदैई तरक्की कोनी कर सकै। सगळा रा हाड हराम हुयग्या। सगळा नै बैठा-बैठा खावण नै चाइजै… राम जाणै इण घर रो आगै कांई हुसी…।

इत्तै रामलाल रै कानां में बडगर रा बोल पूग्या- जीसा… मा कैवै- थे उठ तो गिया ई हो तो आवतां जग ई भर’र लाया।

रामलाल पाणी पी परो जग भरियो। पैलो पगोथियो चढ़’र पाछो हेठै उतरियो अर गाळ काढतो जग पाछो ऊंधो कर दियो- म्हैं आं रै बाप रो नौकर थोड़ी लागग्योड़ो हूं…।

आंतरो

म्हैं जियां ई हैडमास्टर साब रै कमरै सूं बारै निकळियो निजरां साम्हीं एक नुवो चैरो आयग्यो। धोळी धोती-चोळै अर मुरकिया पैरियां एक गबरू जवान मुळकै हो। इण स्कूल में आज म्हारो पैलो दिन हो। सगळा सूं मेल-मुलाकात अर सैंध करण रो दिन। म्हैं म्हारो हाथ उण सूं मिलावण नै आगै करियो- म्हैं मास्टर मगनीराम। आज ई अठै जोइन करियो है।

बो गबरू दोय पग लारै खिसकग्यो अर म्हारै साम्हीं हाथ जोड़’र की हरफ मूढै सूं बारै काढै ई हो कै इत्तै में एक बीजो मास्टर जिको म्हारै लारै ई ऊभो हो, बोल्यो- ओ आपणै अठै फोर्थ क्लास है, तोळाराम।

म्हैं मनां ऊंडै मांय रो मांय घसग्यो। च्यारू कानी निजरां कर’र जायजो लियो कै उण दीठाव नै कुण कुण देख्यो। कांई बा म्हारी मूरखता ही जिण रो फगत एक चसमदीठ गवाह हो? म्हारै मांय एक पढियो-लिख्यो मास्टर हो जिको म्हनै कैवै हो- कित्तो मूरख है थूं कै आदमी री सावळ ओळख ई नीं कर सकै। बिना जाणिया-समझिया जणै-जणै साम्हीं हाथ आगै करण री कांई दरकार है? म्हनैं ठाह ई नीं लाग्यो कै कद म्हैं तोळाराम नै कैय दियो हो कै अबै अठै घोड़ै दांई कांई ऊभो है, जाय’र पाणी रो लोटो भर’र लाव।

उतर-पातर

बो जियां ई घरै पूग्यो, देख्यो- जीसा भदर हुयोड़ा है। उण रो काळजो बैठण लाग्यो। बो साव होळै सी’क पूछियो- कुण चालतो रैयो…?

– रामू काका..।

– कांई रामू काका कोनी रैया… ? उण नै अचरज हुयो पण अचरज राम काका रै जावण रो नीं हो। जीसा सूं बात पुखता हुयां उण रै मांय झाल रो गोट उठियो। काल तांई जिकै आदमी सूं राम-राम ई कोनी ही, उण सूं एका-एक इत्ती प्रीत कियां उपजगी..!

उण रै सुर में तेजी ही- गजब करो, जद आपां होळी-दियाळी अर रामा-स्यामां ई तोड़ राख्या हा तद आज पाछी सांधण रो कांई तुक… थांरै भदर हुवण री अर बठै जावण री बात म्हारै समझ कोनी आई। थानै कीं करणो हो तो पैली घरै बात तो करता…

उण रै जीसा नै ई तेजी आयगी, पण तो ई बां नरमाई सूं कैयो- थन्नै ठाह है कै थारै दादोसा रै लारै कुण कुण भदर हुया..?

जवान खून अर नवी हवा रो टाबर आ बात सुण’र भड़कग्यो- आ ई कोई उधारी हांती है, जिकी आपां चूकत करां। ओ लोक देखापो म्हनै फालतू अर अणखावणो लागै।

जीसा समझावणी रै सुर में बोल्या- जे आज रै दिन म्हैं माथै राख न्हाख लेवतो तो लोगां साम्हीं कांई इज्जत रैवती… सामूंडै नीं तो परपूठ बातां बणती…

जीसा बोल्यां जावै हा अर उण रै कानां रै जाणै डाटा लागग्य हा। बो ठाह नीं किसै हिसाब-किताब में लगोलग भुसळीजतो जावै हो।

आंटियो

बै दोनूं बाथम-बाथ हुया। सेवट दोनू आपो-आप रा गाभा पैर लिया तो बा जोर जोर सूं हंसण लागी। उण नै इण ढाळै गैली दांई हंसती देख’र उण बरजियो- बावळी इत्ती जोर-जोर सूं क्यूं हांसै?

बा बोली– आज थारी करड भांग दी.. इण खातर मोदीजू….

– करड … क्यां री करड ?

– आ ई कै थे जात-पांत अर ऊंच-नीच नै पोखण वाळा आज अठै पोखीजग्या। आज कठै गयो थांरो भींटीजणो …. आज तो ऐडी सूं चोटी तांई भींटीजग्या !

– गैली है कांई.. देखो ओ आंटियो कर राख्यो हो। उण बीं नै आपरो हाथ ऊंचो कर दिखायो जिण में बीचली आंगळी माथै बीजी आंगळी चढा राखी ही।

बा उण रै हाथ रै लमूटगी अर छेकड़ खासी खेचळ पछै आंटियै नै तोड़ा दियो। भळै गुमान करती हंसण लागी अर उण री आंख्यां में सवाल हो- अबै ?

– गैली सदा गैली रैसी.. अठीनै देख ओ कांई है.. उण दूजो हाथ दिखायो जिण मांय आंटियो कर राख्यो हो। आंटियो देखतां ई उण री हंसी रै ब्रेक लागग्यो।

लाडू

जिण बस सूं म्हनैं मुसाफिरी करणी ही सेवट उडीकतां-उडीकतां बा आई। संजोग कै बस भरियोड़ी ही। म्हैं बस में चढियां खाली सीट खातर निजर दौड़ाई। सीटो-सीट लोग बैठा हा अर केई जणा ऊभा हा। म्हैं सोच्यो इण भरी बस मांय लारै कोई आधी-पड़दी सीट खाली मिल जावैला। मारग ऊभी भीड मांय पजतो म्हैं लारै पासी निकळयो। म्हारो अंदाजो ठीक निकळियो, लारै एक सीट खाली दीसगी। म्हैं पूग’र उण सीट माथै कबजो करूं कै पाडौसी बोल्यो- “रुध्योड़ी है, आवै।“ अर उण सीट माथै राख्योड़ै रूमाल कानी आंगळी करी।

म्हैं बोल्यो- “वा सा..” अर पसवाड़ै ऊभग्यो। सोच्यो फालतू फोडा देख्या। ऊभण नै तो आगै ई सावळ जागा ही। उण सीट खातर एक-दो बीजा जातरियां रै ई राळा पड़ी, पण बो मिनख पोरैदार पक्को हो। कैवतो रैयो- “रुध्योड़ी है, आवै।“ इत्तै म्हैं देख्यो कै एक रूपाळी छोरी उणी सीट खातर उणी मिनख नै पूछियो- “सीट खाली है क्या?” बो उण नै देखतां मधरो मधरो मुळतां कैयो- “हां, आओ रा…। खाली है।“ बा छोरी आपरै बाबोसा नै हेलो करियो- “बाबोसा ! लारै आओ रा, सीट मिलगी।“ बो मिनख बाको फाड़िया बस में सवार ऊपराथळी रै असवारियां मांय उण छोरी रै बाबोसा नै ओळखण री कोसीस करण लाग्यो।

म्हनै लाग्यो उण मिनख रा सुपना तूटण सूं उण रो बाको फाटियो अर जाणै कोई लाडू बाकै में आवतो-आवतो रैयग्यो हुवै। बो बाको फाडियां उण छोरी रै बाबोसा नै देखतो-देखतो जियां ई म्हारै पासी देख्यो तो तुरत बाको बंद कर लियो। म्हैं मन ई मन कैयो- “लाडी, लेले लाडू।“

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नंद रा छंद (आलोचना)

नंद रा छंद (आलोचना) डॉ. नीरज दइया

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अगनसिनान / डॉ. अर्जुन देव चारण / अनुवाद : डॉ. नीरज दइया

चुनौतिओं का काव्य-रूपक
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अर्जुन देव चारण मुझे हर मुलाकात में एक नयी जिज्ञासा, नयी समस्या और नये शब्दान्वेषित उच्चारण की तरह लगते हैं। एक ओर अनुसंधान दूसरी ओर हमारे समय के महान कथाकार विजयदान देथा की तरह प्रयोगशील लगते हैं। वे राजस्थान में पैदा हुए लेकिन शैलाधिराज तनया के जीवन को अपनी कविता का लक्ष्य बनाया। संबंधों की मर्यादा और सभ्यता का तकाजा सब कुछ सती के चरित्र में उजागर हुआ है। लेकिन समस्या महिलामुखी नहीं पुरुषमुखी ज्यादा है। खड़ी बोली हिंदी के अनुरूप राजस्थानी का मिश्रण, कविता के प्रवाह को एक उक्ति वैशिष्ठ्य प्रदान करता है। अपना मूल्यांकन करते हुए राजपुत्री पार्वती कहती है कि- ‘याद रखना था मुझे कि बेटी को विदा करने के बाद/ गरीबों की झोंपड़ियां आंसू बहाती होंगी/ …. किंतु राजमहलों के कठोर कपाट/ काठ बने/ अधिक कठोर हो जाते हैं।’ यहीं नदियों के स्वभाव से बेटियों के स्वभाव की तुलना करते हुए सती कहती है- ‘पहाड़ों से निकली नदियां कभी लौटकर पहाड़ों की तरफ नहीं आतीं…।’

स्त्री का संघर्ष और उसका अपमानित जीवन भगवान कहलाने वाले राम के यहां भी न्याय नहीं पाता है। हर बार स्त्री को ही अग्नि परीक्षा देनी होती है। हर बार उसे ही संवेदनहीन पत्थर की तरह ठुकराया जाता है। जैसे सचमुच वह देह में होते हुए भी विदेह हो।

सती, सीता, अंबा, पद्मनी, मीरा, मारवाड़ की रूठी रानी उमादे (पता नहीं इस काव्य नाटक में अहल्या कैसे छूट गयी? उदयपुर की राजकुमारी कृष्णा तक तो इस में शामिल है। शायद अहल्या की कहानी तो बनती है, भूगोल नहीं बनता, अहल्या कहीं की भी हो सकती है।) सबको तरह-तरह से अग्निस्नान करने पड़े हैं।

इन कव्य रूपकों में अर्जुन देव चारण ने स्त्री के साथ घटित विवशताओं और अन्यायों को आख्यान का विषय बनाया है। इधर हिंदी में कव्य रूपकों का अभाव दिखाई देता है। खासकर धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ के बाद। चारण ने इन थीमों को एक जगह संग्रहीत कर उस अभाव की ओर भी ध्यान दिलाया है। पौराणिक प्रसंगों के वे अच्छे अध्येता और ज्ञाता हैं। दुर्गा देवी को जो ईश्वरीय गरिमा दी गयी है असल में, उस  कथा में भी स्त्री को भोग्या समझने का तिरस्कार भाव शामिल है। लेकिन स्त्री की आत्मिक शक्तियों का पुनरोदय भी दुर्गासप्तशती में दिखायी देता है। मुझे उम्मीद है कि इस जटिल विषय पर भी नाटककार अपनी मति और बैद्धिक गति को आजमायेंगे। नीरज दइया को अच्छे अनुवाद के लिए बधाई।

– लीलाधर जगूड़ी

राजस्थानी मिट्टी की सौंधी महक / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

कहानी सुनना एक बच्चे की इच्छा भर नहीं है, मूल मानवीय-स्वभाव है। कहानी की शुरुआत संभवत: तब से हुई जब आदमी ने बोलना सीखा। लोककथाओं के रूप में एक समृद्ध विरासत विश्व भाषाओं की धरोहर है जिसे हम कहानी के प्रति हजारों सालों से इंसानी प्रेम का प्रमाण मान सकते हैं। इस मामले में राजस्थानी भाषा की संपन्नता सर्वविदित है। राजस्थानी लोक-साहित्य में हजारों लोककथाएं मौजूद हैं, जिनमें परंपरा, इतिहास, भूगोल और धर्म सहित जीवन के तमाम पक्षों का अंकन मिलता है। सदियों से श्रुति परंपरा से लोग के कंठों में रची-बसी ये कथाएं अपने समय-समाज की आकांक्षाओं एवं अवरोधों का प्रमाणिक दस्तावेज है। यह कहना तर्कसंगत नहीं होगा कि राजस्थानी की आधुनिक कहानी का विकास सीधे तौर पर लोककथाओं से हुआ है, मगर आधुनिक कहानी के बीज को पुष्पित-पल्लवित होने के लिए लोककथाओं ने उर्वर जमीन अवश्य तैयार की है। राजस्थानी कहानी का इतिहास मोटे तौर पर सौ साल से ज्यादा पुराना है। राजस्थानी की पहली कहानी का श्रेय शिवचंद्र भरतिया की ‘विश्रांत प्रवासी’ को दिया जाता है। आधुनिक कहानी के विकास के पीछे कमोबेश वही कारण रहे हैं जिनसे विदेशी व देशी साहित्य में शार्ट स्टोरी विधा का विकास हुआ। राजस्थानी कहानी का वर्तमान स्वरूप तो आजादी के बाद उन्नीसवीं सदी के छठे-सातवें दशक में ही बन पाया जब मुरलीधर व्यास व नानूराम संस्कर्ता के कहानी-संग्रह प्रकाश में आए।
विगत छह-सात दशकों की यात्रा के बाद राजस्थानी कहानी जगत आज भरा-पूरा है। प्रदेश के विस्तृत भूभाग में सैकड़ों कहानीकार जग-जीवन के सच को कहानियों में विविध रूपों में ढाल रहे हैं। वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ “101 राजस्थानी कहानियां” कहानी विधा के सामर्थ्य का प्रमाण हैं। पांच सौ से ज्यादा पृष्ठों में 101 कहानियों के हिंदी अनुवाद की यह प्रस्तुति हिंदी जगत को राजस्थानी कहानी की विविधता एवं वैभव से साक्षात करवाती है। भूमिका के रूप में विद्वान संपादक का “राजस्थानी कहानी : कदम-दर-कदम” शीर्षक से शोध-आलेख कहानी की दशा-दिशा जाने के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। राजस्थानी की आधुनिक कहानी-यात्रा के विकास को चार काल-खंडों में वर्गीकृत करते हुए डॉ. दइया ने लिखा है कि कहानी के वैश्विक परिदृश्य में राजस्थानी के अनेक हस्ताक्षरों ने भारतीय कहानी को पोषित किया है। राजस्थानी कहानी भी भारतीय कहानी के विकास में कदम-दर-कदम साथ चल रही है। कहना न होगा, भारतीय कहानी का रूप-रंग भारतवर्ष की क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों से ही निर्मित होता है। राजस्थानी सहित देश की अन्यान्य भाषाओं की कथा-यात्रा को जाने समझे बगैर भारतीय कहानी के संप्रत्यय का सही रूप में आकलन करना संभव नहीं है।
इसमें संदेह नहीं है कि अनुवाद-पुल के माध्यम से भाषाओं के मध्य आवाजाही हो सकती है। अनुवाद असल में दो भाषाओं के मार्फत दो विविधतापूर्ण संस्कृतियों को नजदीक लाकर जोड़ता है। राजस्थानी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां हिंदी के माध्यम से देशभर की हिंदी-पट्टी के करोड़ों पाठकों के साथ अन्य भाषाओं के कहानी प्रेमियों को राजस्थानी कहानी के आस्वादन का अवसर एवं मूल्यांकन दृष्ति प्रदान करती है। वरिष्ठ कवि-संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना का इस संग्रह के आरंभ में अभिमत देखा जा सकता है- “यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थ-गर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी मिट्टी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और साध्य उपक्रम किया है।”
संग्रह में शामिल 101 कहानीकारों में राजस्थानी की भौगोलिक विविधता का समुचित प्रतिनिधित्व हुआ है। ये कहानियां राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि की परिचायक तो है ही, राजकीय सरंक्षण के बिना संघर्षरत भाषा के कलमकारों के जीवट का भी प्रमाण है। किताब के रचनाकारों की सूची देखें तो इसमें राजस्थानी कहानी को अपने पैरों पर खड़ा करने वाले यशस्वी कहानीकारों में यथा नानूराम संस्कर्ता, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, विजयदान देथा, करणीदान बारहठ, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, बैजनाथ पंवार, श्रीलाल नथमल जोशी आदि की कहानियां शामिल हैं, वहीं कहानी को आधुनिकता के मार्ग अग्रसर करने वाले प्रमुख कहानीकारों में सांवर दइया, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मनोहर सिंह राठौड़, रामस्वरूप किसान, बुलाकी शर्मा, मालचंद तिवाड़ी आदि की कहानियां संग्रह में संकलित है। राजस्थानी के समकालीन महत्त्वपूर्ण कहानीकारों में चेतन स्वामी, भरत ओला, सत्यनारायण सोनी, मनोज कुमार स्वामी, प्रमोद कुमार शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’ आदि भी पुस्तक का हिस्सा बने हैं तो महिला कहानीकारों में चूंडावत के अलावा जेबा रशीद, बसंती पंवार, सावित्री चौधरी, आनंद कौर व्यास, सुखदा कछवाहा, रीना मेनारिया की चयनित कहानियां किताब में शामिल की गई हैं।
राजस्थानी कहानी के व्यापक और विस्तृत भवबोध को प्रस्तुत करती संग्रह में अनेक यादगार कहानियां देखी जा सकती है। ऐसा नहीं है कि यह राजस्थानी कहानी को हिंदी में ले जाने का पहला प्रयास हो, इससे पूर्व भी राजस्थानी कहानियों के हिंदी अनुवाद हेतु कतिपय प्रयास हुए हैं मगर एकसाथ शताधिक कहानियों को हिंदी जगत के माध्यम से विश्व साहित्य के समक्ष रखने का यह पहला प्रयास है। निश्चय ही इस ग्रंथ से राजस्थानी कहानी की वैश्विक उपस्थिति दर्ज होगी और सेतु भाषा हिंदी के माध्यम से अनूदित होकर राजस्थानी कहानी देश-दुनिया की अन्य भाषाओं में पहुंचेगी। कहना न होगा यह दुष्कर कार्य योग्य संपादक डॉ. नीरज दइया की कुशलता व समर्पित अनुवादकों के सद्प्रयासों का सुफल है। असल में ऐसे प्रयास अकादमियों व अन्य संसाधनों से युक्त संस्थानों को करने चाहिए, क्योंकि ऐसे कामों में अत्यंत श्रम व अर्थ की आवश्यकता होती है। इस ग्रंथ को पाठकों तक पहुंचाने के लिए के. एल. पचौरी प्रकाशन वाकई बधाई के हकदार हैं जिसने राजस्थानी मिट्टी की महक को हिंदी के माध्यम से देश-दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठाया है। कुंवर रवीन्द्र के सुंदर आवरण से सुसज्जित यह संग्रह निश्चय ही कहानी प्रेमियों के लिए संकलन योग्य उपहार है।
डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
144 लढ़ा निवास, महाजन, बीकानेर
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101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102 ; प्रकाशन वर्ष : 2019 ; पृष्ठ : 504 ; मूल्य : 1100/-
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SIVIRA