Category Archives: आलोचना

ओम पुरोहित ‘कागद’ फाउण्डेशन द्वारा सम्मान

Kagad samman (1)Kagad samman (2)

Advertisements

इन दिनों

दुनिया इन दिनों में डॉ. मदन गोपाल लढ़ा द्वारा आलेख
० 30 जुलाई, 2017 सांवर दइया की 25वीं पुण्यतिथि पर दो व्यंग्य संग्रह लोकार्पित
० 23 जुलाई, 2017 श्रीगंगानर में सृजन सेवा संस्थान द्वारा सुरजाराम जालीवाल पुरस्कार
० 16 जुलाई, 2017 दिल्ली में राजस्थान रत्नाकर द्वारा ‘श्री दीपचंद जैन साहित्य पुरस्कार’
० 13 मई, 2017 मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार लोकार्पित
० 01 मई, 2017 बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार लोकार्पित
० 21 जनवरी, 2017 जयपुर साहित्योत्सव JLF में कविता पाठ

परिचय : डॉ. नीरज दइया

This slideshow requires JavaScript.

‘राजस्थानी डाइजेस्ट’ आलोचना वेब-पत्रिका

10-10-2016 NEWS (2).jpgबीकानेर/ 10 अक्टूबर 2016/ राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार स्व. सांवर दइया की जयंती के अवसर पर ‘राजस्थानी डाइजेस्ट’ आलोचना केंद्रित वेब-पत्रिका का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार मारवाड़ रत्न देवकिशन राजपुरोहित ने किया। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘सरोकार’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में राजपुरोहित ने कहा कि मुझे बेहद खुशी है आज राजस्थानी आलोचना को समर्पित ‘राजस्थानी डाइजेस्ट’ का लोकार्पण कर रहा हूं। किसी भी भाषा के साहित्य के लिए आलोचना-साहित्य अनिवार्य होता है और राजस्थानी के सिलसिले में यह कहा जाता है कि आलोचना डाइजेस्ट नहीं होती ऐसे में उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि ‘राजस्थानी डाइजेस्ट’ से आलोचना को स्वीकार करने का स्वभाव साहित्यकारों और पाठकों में विकसित होगा।

कार्यक्रम में प्रख्यात रंगकर्मी और साहित्यकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि सांवर दइया का अवदान आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कविता, कहानी और व्यंग्य के क्षेत्र में अविस्मरणीय है। उनकी रचनाओं के द्वारा राजस्थानी में आधुनिक कहानी का आरंभ माना जाता और कविताओं में उन्होंने अनेक प्रयोग किए। राजस्थानी में व्यंग्य विधा की स्थापना के लिए उनकी बेजोड़ कृति ‘इक्यावन व्यंग्य’ आज भी प्रासंगिक और समसामयिक मानी जाती है। ‘राजस्थानी डाइजेस्ट’ के संदर्भ में आशावादी ने कहा कि इससे राजस्थानी साहित्य का व्यापक प्रचार प्रसार होगा वहीं पुस्तकों को नए पाठक मिलेंगे और पाठकों को चयन के विकल्प भी मिल सकेंगे।

सरोकार के अध्यक्ष वरिष्ठ व्यंग्यकार-कहानीकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि राजस्थानी में पुस्तकों पर बहुत कम चर्चा और आलोचना-सामालोचना के दौर में डाइजेस्ट द्वारा महत्त्वपूर्ण काम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि वेब-पत्रिका जैसे त्वरित प्रसार प्रसार के माध्यम में ऐसा अनुपम आलोचकीय आयोजन के लिए डॉ. नीरज दइया निश्चय ही बधाई के पात्र है।

सरोकार के सचिव कवि-कहानीकार नवनीत पाण्डे ने साहित्यकार सांवर दइया के सृजन पर चर्चा करते हुए बताया कि वे मात्र चवालिस बरस की उम्र में हमें छोड़ कर चले गए किंतु उनके विपुल लेखन को देख कर आज भी आश्चर्य होता है कि इतना अधिक काम वे अल्पायु के कर के गए। पाण्डे ने कहा कि सांवर दइया आधुनिक राजस्थानी साहित्य के सिरमौर लेखक के रूप में याद किए जाते रहेंगे। पाण्डे ने कहा कि एक सच्चे और खरे मिनख सांवर दइया को उनकी जयंती पर उनके योग्य पुत्र कवि आलोचक डॉ. नीरज द्वारा संचालित राजस्थानी आलोचना को समर्पित वेब-पत्रिका ‘राजस्थानी डाइजेस्ट’ के माध्यम से हम सदा स्मरण करते रहेंगे।

इस अवसर पर कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने बताया कि राजस्थानी डाइजेस्ट को निशुल्क www.rajasthanidigest.blogspot.in पते पर इंटरनेट के माध्यम से देखा और पढ़ा जा सकता है। यह आयोजन हिंदी पाठकों के लिए राजस्थानी पुस्तकों पर हिंदी में चर्चा का सतत बनाए रखा जाएगा। डाइजेस्ट के इस आयोजन में हर किताब पर अलग-अलग दृष्टियों से विचार और चर्चा से पाठक अपनी पसंद की किताबों तक पहुंच सकेंगे।

समाचार बेव पर ओम एक्सप्रेस ; अजमेरनामा

 

आधुनिक लघुकथाएं

Aadhunik Ladhukathayen Neeraj Daiya
आधुनिक लघुकथाएं (संपादक- डॉ. नीरज दइया, राजेन्द्र जोशी) ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर- 334003, पृष्ठ : 96, मूल्य : 100/- ;ई-मेल : suryaprakashan01@gmail.com, bissa.prashant@gmail.com ; मोबाइल : 9829280717

अनुसिरजण में मूळ कवितावां रौ स्वाद

Manka Jodhpur 2016

पोथी : ऊंडै अंधारै कठैई  / विधा : अनुवाद (काव्य) / मूळ : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया / संस्करण : 2016, पैलौ /  पृष्ठ : 120, मोल : 200 रुपया / प्रकासक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005

‘ऊंडै अंधारै कठैई’ नीरज दइया रौ करियोड़ौ अनुसिरजण है, जिकौ पढतां बगत मूळ कवितावां रौ स्वाद चखावै। हिंदी रा चावा-ठावा कवि नंदकिशोर आचार्य री कवितावां, जिकै वां रै चवदै काव्य संकलनां में पसरियोड़ी ही, दइया आपरी दीठ सूं उण मांय सूं टाळ’र वां री टाळवीं कवितावां राजस्थानी में पाठकां तांई पुगाई है। वै इण किताब में कैयौ है के- “अनुसिरजण मूळ कविता रौ भावाभिनय व्हिया करै।” आपरी बात नै आगै बधावता वै कैवै- “औ अनुसिरजण करतां दोय बातां म्हैं खास ध्यान राखी। एक तौ आ के चावी-ठावी अर न्यारै-न्यारै पोत री कवितावां बानगी रूप ली जावै, दूजी बात के बै कवितावां ली जावै जिकी आपाणी भासा र इण धरा री मनगत सूं जुड्योड़ी है।” नीरज दइया इण अनुसिरजण में इण दोनूं बातां नै पोखी है अर आचार्य जी री कवितावां रै मरम तक पूग’र वां री सौरम पाठकां तक पुगावाण में सफळ व्हिया है। अज्ञेय रै चौथा सप्तक रा कवि नंदकिशोर आचार्य राजस्थान री हिंदी कविता रौ आगीवाण नाम है अर राजस्थानी आंचलिकता री सौरम हिंदी रै माध्यम सूं वां देस-परदेस में बिखेरी है। इण सौरम नै राजस्थानी पाठकां तक पुगावण रौ ठावकौ अर अजरौ काम भाई नीरज दइया कीनौ है जिण री किरणां ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ में रूपास रै साथै पळकै है। अनुसिरजण में अबखौ काम व्है मूळ आतमा रौ संवेदन पकड़णौ अर दूजी भासा में लावणौ, साखकर कविता में तौ घणौ अबखौ। पण नीरज दइया इण काम नै पूरी कूंत साथै पूरौ कीनौ है। राजस्थानी रै टकसाळी सबदां अर राजस्थानी रै मुहावरै नै परोट’र वां इण काम नै सांस्कृतिक रूप सूं पूरौ कीनौ है। आंचळिकता रै सागै पौराणिक चरित्रां री कवितावां रा भाव अर विचारबिंब साधण रौ अजरौ अनुसिरजण राजस्थानी पाठकां नै एक हिंदी कविता रौ स्वाद चाखण री निछरावळ भर है। म्हनै आ निछरावळ इण गत दीखी है- “नीं हुवै कवि रौ कोई घर/ बस जोवतौ इज रैवै घर/ बिंया बौ दीसतौ रैवै भासा मांय/ पण जिंया आभै मांय/ रैवै पंखेरू/” अर पंखेरू ज्यूं उठतै कवि रै एक घर नै, धरती माथै उतार’र दूजी भासा रै खोलियै बसावण रौ ठावकौ जतन नीरज दइया कीनौ है। इण जतन नै भाई मोहन आलोक इण गत सरायौ है- “ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री श्रेष्ठता ई कही जावैला के औ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै, बठै ई केई कवितावां रौ शब्दशः अनुवाद ई पाठकां साम्हीं राखै।” आचार्यजी री कलम अर नीरज नै बधाई।
आईदानसिंह भाटी, 8 बी-47, तिरुपति नगर, नांदड़ी, जोधपुर
(‘माणक’ मासिक जोधपुर / मई 2016)

डॉ. आचार्य की रचनाओं का मनमोहक कॉलाज

DY 18-09-2016

कविताओं की मार्मिक अनुभूति

DNJ 31-07-2016

अनुवाद के आंगन में गूंजती रेत-राग

RP 06-08-2017

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डेली न्यूज़ में

01052016

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचयन : डॉ. नीरज दइया) ; संस्करण 2017 ; कीमत 100/-  ;  पृष्ठ- 96 : प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट, जोधपुर (राजस्थान)    

    
DKR PS Yugpaksha
मोहन थानवी, बीकानेर