Category Archives: आलोचना

अनुसिरजण में मूळ कवितावां रौ स्वाद

Manka Jodhpur 2016

पोथी : ऊंडै अंधारै कठैई  / विधा : अनुवाद (काव्य) / मूळ : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया / संस्करण : 2016, पैलौ /  पृष्ठ : 120, मोल : 200 रुपया / प्रकासक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005

‘ऊंडै अंधारै कठैई’ नीरज दइया रौ करियोड़ौ अनुसिरजण है, जिकौ पढतां बगत मूळ कवितावां रौ स्वाद चखावै। हिंदी रा चावा-ठावा कवि नंदकिशोर आचार्य री कवितावां, जिकै वां रै चवदै काव्य संकलनां में पसरियोड़ी ही, दइया आपरी दीठ सूं उण मांय सूं टाळ’र वां री टाळवीं कवितावां राजस्थानी में पाठकां तांई पुगाई है। वै इण किताब में कैयौ है के- “अनुसिरजण मूळ कविता रौ भावाभिनय व्हिया करै।” आपरी बात नै आगै बधावता वै कैवै- “औ अनुसिरजण करतां दोय बातां म्हैं खास ध्यान राखी। एक तौ आ के चावी-ठावी अर न्यारै-न्यारै पोत री कवितावां बानगी रूप ली जावै, दूजी बात के बै कवितावां ली जावै जिकी आपाणी भासा र इण धरा री मनगत सूं जुड्योड़ी है।” नीरज दइया इण अनुसिरजण में इण दोनूं बातां नै पोखी है अर आचार्य जी री कवितावां रै मरम तक पूग’र वां री सौरम पाठकां तक पुगावाण में सफळ व्हिया है। अज्ञेय रै चौथा सप्तक रा कवि नंदकिशोर आचार्य राजस्थान री हिंदी कविता रौ आगीवाण नाम है अर राजस्थानी आंचलिकता री सौरम हिंदी रै माध्यम सूं वां देस-परदेस में बिखेरी है। इण सौरम नै राजस्थानी पाठकां तक पुगावण रौ ठावकौ अर अजरौ काम भाई नीरज दइया कीनौ है जिण री किरणां ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ में रूपास रै साथै पळकै है। अनुसिरजण में अबखौ काम व्है मूळ आतमा रौ संवेदन पकड़णौ अर दूजी भासा में लावणौ, साखकर कविता में तौ घणौ अबखौ। पण नीरज दइया इण काम नै पूरी कूंत साथै पूरौ कीनौ है। राजस्थानी रै टकसाळी सबदां अर राजस्थानी रै मुहावरै नै परोट’र वां इण काम नै सांस्कृतिक रूप सूं पूरौ कीनौ है। आंचळिकता रै सागै पौराणिक चरित्रां री कवितावां रा भाव अर विचारबिंब साधण रौ अजरौ अनुसिरजण राजस्थानी पाठकां नै एक हिंदी कविता रौ स्वाद चाखण री निछरावळ भर है। म्हनै आ निछरावळ इण गत दीखी है- “नीं हुवै कवि रौ कोई घर/ बस जोवतौ इज रैवै घर/ बिंया बौ दीसतौ रैवै भासा मांय/ पण जिंया आभै मांय/ रैवै पंखेरू/” अर पंखेरू ज्यूं उठतै कवि रै एक घर नै, धरती माथै उतार’र दूजी भासा रै खोलियै बसावण रौ ठावकौ जतन नीरज दइया कीनौ है। इण जतन नै भाई मोहन आलोक इण गत सरायौ है- “ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री श्रेष्ठता ई कही जावैला के औ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै, बठै ई केई कवितावां रौ शब्दशः अनुवाद ई पाठकां साम्हीं राखै।” आचार्यजी री कलम अर नीरज नै बधाई।
आईदानसिंह भाटी, 8 बी-47, तिरुपति नगर, नांदड़ी, जोधपुर
(‘माणक’ मासिक जोधपुर / मई 2016)

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डॉ. आचार्य की रचनाओं का मनमोहक कॉलाज

DY 18-09-2016

कविताओं की मार्मिक अनुभूति

DNJ 31-07-2016

अनुवाद के आंगन में गूंजती रेत-राग

RP 06-08-2017

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डेली न्यूज़ में

01052016

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचयन : डॉ. नीरज दइया) ; संस्करण 2017 ; कीमत 100/-  ;  पृष्ठ- 96 : प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट, जोधपुर (राजस्थान)    

    
DKR PS Yugpaksha
मोहन थानवी, बीकानेर

कथा-धरोहर

dkr-ri-t-k-neeraj-daiyaमनोहर सिंह राठौड़

राजस्थान के गणमान्य साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित साहित्य जगत में एक जाना-पहचाना नाम है। इन्होंने साहित्य की प्रत्येक विधा में अपनी लेखनी चलाई है और हिंदी-राजस्थानी भाषा में समान रूप से सक्रिय राजपुरोहितजी आयु के 70 वें पायदान पर पैर जमाते हुए अभी भी लेखन में सक्रिय हैं। उनकी 70 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी सद्य प्रकाशित कृति ‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ राजस्थानी भाषा की इनकी कहानियों में से चयनित कहानियों का संचयन है। जो राजस्थान के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नीरज दइया द्वारा किया गया है। इस कथा-कृति में कुल 23 कहानियां सम्मिलित हैं। इन कहानियों में कुछ कहानियां 3-4 पृष्ठों की हैं, बाकी लघुकथाएं हैं। आधे पृष्ठ या एक पृष्ठ की ये लघुकथाएं जीवन के किसी एक पहलू या एक बिंदु को उद्घाटित करती हैं। ये कहानियां मानवीय संवेदनाओं से सराबोर हैं, जिस संवेदना का आज हमारे जीवन में सर्वथा अभाव होता जा रहा है।

‘देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां’ में संकलित कथाओं, लघुकथाओं में लोक-जीवन, लोकरस, लोक-भाषा का आस्वाद मिलता है। इनमें कहानी कहने की कला या बतरस की दैदिप्यमान झलक मिलती है। हमारी लोक संस्कृति, परंपराएं ही हमारी अस्मिता है। उन सभी तत्वों को समेटते हुए, बात कहने की शैली में इनकी प्रस्तुति इन्हें अलग मुकाम पर पहुंचाती हैं। कहानी ने कई पड़ाव पार करते हुए आज जिस स्थान पर पहुंची है वह हमारे गर्व का विषय है। इस विकास यात्रा से नई ऊंचाइयों को छूने की बात की जाती है लेकिन कहानी की पठनीयता पाठक को बांधे रखने की कला भी आवश्यक अंग है। हमारी राजस्थानी लोक-कथाओं में यही गुण प्रचुर मात्रा में था और यह होना आवश्यक है। संचयनकर्त्ता डॉ. नीरज दइया ने अपनी टीप में यह स्पष्ट किया है कि लोक कथाओं के कथारस का संवर्द्धन करने से ही हमारी कहानी विधा पूर्णतया समृद्ध होगी।

राजपुरोहितजी की कहानियों में यह लोककथाओं का कथारस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है इसलिए ये पाठकों को आकर्षित करती हैं। एक बार पढ़ना प्रारंभ करने के पश्चात पुस्तक को आंखों से परे हटाने का मन नहीं करता है। छोटी कहानियां और लघुकथाएं थोड़े समय में पढ़ी जाती हैं। आज की भागमभाग जिंदगी में इनका पढना सहज-सरल है। राजपुरोहितजी राजस्थानी जन जीवन व संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं। इनकी वेशभूषा, भाषा ठेठ राजस्थानी है। मुख्य रूप से राजस्थान की संस्कृति को जीने वाले राजपुरोहितजी ने अपने अनुभवों को कल्पनाओं तथा लोककथाओं के साथ मिलाकर अनूठा प्रभाव पैदा किया है। इससे ये कथाएं सभी को प्रिय लगती हं। इन में स्वयं में राजस्थानी जन जीवन की झलक मिलती है। एक अच्छे साहित्यकार के अनुसार इस में भाषायी सरलता, सादगी, ताजगी, अपनापन झलकता है। दुरुहता नहीं होने से इनका लेखन पाठकों को सरलता से जोड़ लेता है। पाठक में अपने या आसपास के अनुभव से उपजी कहानियां मोहित करती हैं।

नाटकों, फिल्मों, टी.वी. धारावाहिकों में काम कर चुके मूर्धन्य साहित्यकार राजपुरोहितजी के राजस्थानी कथा साहित्य में से बानगी के रूप में ये कथाएं प्रस्तुत करते हुए डॉ. नीरज दइया ने स्तुत्य कार्य किया है। राजस्थान की समृद्ध लोक कथाओं की याद दिलाने वाली इस पुस्तक में बतरस का आनंद व प्राचीन बातपोश शैली की याद ताजा हो जाती है। हास्य व्यंग्य का पुट इन में चमत्कार भर देता है। इन में पुराने गांव व लोक विश्वास की ओर भी इंगित किया गया है। अशुद्धि रहित, साफ छपाई से अच्छी बनी पुस्तक का मुख पृष्ठ भी सादगी लिए आकर्षक है।


देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचयन : डॉ. नीरज दइया) ; संस्करण 2017 ; कीमत 100/-  ;  पृष्ठ- 96 : प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, प्रथम माला, गणेश मंदिर के पास, सोजती गेट, जोधपुर (राजस्थान)          


संपर्क : 421- ए, हनुवंत-ए, मार्ग-3, बी.जे.एस. कॉलोनी, जोधपुर-342006 

ओम पुरोहित कागद पोथी सुरंगी संस्कृति

surangi sanskriti (om purohit kagad)

मूळ कवितावां रो साखीणो अनुसिरजण

DY 20-09-2016dr madan sainiडॉ. मदन सैनी
‘ऊंडै अंधारै कठैई’ संग्रै मांय मनीसी कवि नंदकिशोर आचार्य री चवदै काव्य-पोथ्यां मांय सूं चारबीसी-तीन टाळवीं कवितावां रो अनुसिरजण, ऊरमावान कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया घणै मनोग्यान सूं करियो है। आपां मांय सूं घणा-सारा पाठक नंदकिशोर आचार्य री थोड़ी-भोत कवितावां जरूर पढ़ी है, पण बांरै सांवठै सिरजण री सांवठी बानगी सूं रू-ब-रू होवण वाळा भोत कम ई पाठक मिलैला। आं पाठकां मांय गीरबैजोग अेक नाम डॉ. नीरज दइया रो भी है, जका नंदकिशोरजी री सैंग काव्य-पोथ्यां री कवितावां नै नीं फगत पढी, पण पढणै रै सागै-सागै मूळ कवितावां रै मर्म नैं भावाभिनय रै समचै सहेज्यो, अंवेरियो अर आत्मसात ई करियो। ओ ईज कारण रैयो कै अनुसिरजक आपरी दीठ सूं आं कवितावां मांय अेक-सूं-अेक इधकी कवितावां इण संग्रै मांय पाठकां सारू संजोई है।
संग्रै रै ‘आमुख’ मांय अनुसिरजण नैं मूळ कविता रो भावाभिनय बतावता थकां अनुसिरजक लिखै- ‘आचार्यजी री नाटक माथै लिखी कवितावां बांचता म्हनै लखायो जाणै अनुसिरजण ई अेक भांत रो भावाभिनय हुवै। जिण ढाळै नाटक मांय कलाकार आपरै अभिनय सूं मूळ पात्र अर मूळ रचाव नै जीवै, ठीक बियां ई अनुसिरजण मांय म्हैं मूळ कवि अर कविता नै जीवण री पूरी-पूरी कोसीस करतो रैवूं।’ हरख री बात है कै डॉ. दइया इण कोसीस मांय भरोसैजोग भावाभिनय करियो है। ‘आमुख’ मांय बै लिखै- ‘कवि री मौलिकता इण मांय हुवै कै बो घणी कवितावां बांचै। किणी कविता पेटै म्हनै लागै कै आ म्हारी भासा में आवणी चाइजै तो अेक तरीको तो ओ है कै उण जोड़ री कविता रचूं। कोई कवि किणी कवि जिसी कोई रचना रचै, तो मौलिकता कांई हुवै?’ अैड़ी सैंग जिग्यासावां रा समाधान इण कवितावां मांय ईज मिल जावै।
‘मूळ’ कविता री बानगी देखो- ‘रचूं थन्नै/ कित्ती भासावां मांय/ मूळ है हरेक भासा मांय/ कठैई थूं अनुसिरजण कोनी। बसंत री हुवै का पतझड़ री/ पंखेरूवां री का पानड़ा री/ भाखरां री का झरणां री/ काळ री का बिरखा री।
मरुथळ रै बुगलां री हुवो/ समदर रै तूफानां री/ लुकोवण री, का भेद खुल जावण री/ मून री हुवो का बंतळ री/ रोवण री, मुळकण री/ मिलण री, का मिलण सूं ईज/ आंती आय जावण री।
हरेक मौलिकता/ आपोआप मांय निरवाळी–/ म्हारी हरेक कविता/ भासा नै नवी करती थकी।’
इण कविता नैं प्रस्थान-बिंदु मानता थकां जठै मौलिकता, मूळ कविता अर अनुसिरजण रो जथारथ पाठकां साम्हीं आवै बठै ईज संग्रै री हरेक कविता भासा नै नवी करती लखावै। किणी अेक भासा री भावभोम रो बीजी भासा में हू-ब-हू रचाव, अनुसिरजण रै सीगै, अेक लोक सूं बीजै लोक री जातरा दांई लखावै। डॉ. दइया रै सबदां में- ‘म्हारी दीठ मांय नंदकिशोर आचार्य री पूरी काव्य-जातरा री असल कामाई किणी अरथ मांय ऊंडै अंधारै कठैई पूग’र आपरै बांचणियां साम्हीं अबोट साच लावणो मानी जावैला। इण ओळी नै दूजै सबदां मांय इण ढाळै कैय सकां कै बै ऊंडै अंधारै कठैई फगत पूगै ई कोनी, आप भेळै बांचणियां नै उण अंधारै रै लखाव मांय लेय’र जावै। आ अेक लोक सूं दूजै लोक री जातरा कैयी जाय सकै। जूनै रंगां साम्हीं नवा रंग, नवा दीठाव। आज पळपळाट करती इण दुनिया मांय कोई पण दीठाव सावळ-सावळ आपां अंधारै री दिसाअ सूं ईज देख-परख सकां।’ आ बात खरी है, अंधारै बिना उजाळै रो कांई अरथ? तमसोमाज्योतिर्गमय रै मारग बगती अै कवितावां ‘बगत’ मांय आपरै होवणै नैं अरथावै। ‘बगत’ कविता री अै ओळियां देखो- ‘बगत सूंप्यो-/ खुद नै/ म्हनै/ कीं ताळ तांई/ कै कीं बगत खातर/ बगत हुयग्यो हूं म्हैं।/ टिपग्यो सगळो बगत/ इणी दुविधा मांय।/ नीं बगत बणायो/ म्हारो कीं/ नीं बणा सक्यो म्हैं ईज/ बगत रो कीं।’ (पृ.68)
बगत बीततो जावै अर जीयाजूण री जातरा ई मजल कानी बधती जावै। इण जातरा में खथावळ री ठौड़ मारग रै चप्पै-चप्पै सूं हेत दरसांवता थकां कवि कैवै- ‘रैयग्या दीठावां मांय’ – इण छेहलै पड़ाव माथै/ आंख्यां साम्हीं आवै/ बै सगळा दीठाव/ निरांयत सूं मिलणो नीं हुयो/ बेगो पूगण री खथावळ मांय-/ मजल पूग्यां ई/ अधूरी ईज रैयी जातरा।/ मजल माथै पूगणो जातरा कोनी/ मारग सूं प्रेम पाळणो पड़ै। – भटकूं छूटियोड़ा दीठावां मांय/ कर रैयो हूं अबै जातरा। (पृ.79)
इण संग्रै री कवितावां मांय जीयाजूण रा बहुआयामी दीठाव आपां साम्हीं आवै, जठै प्रकृति-प्रेम रा दीठाव है, आतमा-परमातमा अर फेर- जलम रै भरोसै रा दीठाव है। अेक ठौड़ कवि कैवै- ‘फेरूं जलमण खातर’- किणी नै ठाह कोनी/ म्हारै आतमघात बाबत/ म्हनै खुद नै कठै ठाह हो/ खुद म्हैं टूंपो दियो/ आतमा नैं खुद री/ अर ओ जिको दीसूं आपानै/ हूं लोथ उण री/ पण आज/ अै आंख्यां/ जिकी कीं आली हुयगी-/ स्यात उणी रो दरद है/ फेरूं जलमण खातर म्हारै मांय। (पृ.78)
अठै परायै दुख दूबळो नीं हुवण री मनगत मांय परदुख-कातरता रा दीठाव भी है। ‘पण आपां नै कांई’ कविता में कवि कैवै- ‘देखो/ मोरियै नै देखो/ जिकी पांख्यां सूं आपां नै/ बो दीसै रूपाळो/ पण कोनी भरीजै उडार/ बां रै पाण-/ लांबी अर ऊंधी।/ पण आपां नै कांई/ बस आपां तो राजी हां/ देख’र उण रो नाच। (पृ.91)
आं ओळ्यां मांय हर किणी रै दुख-दरद नै देखण-परखण री दीठ रो दीठाव हुवै, बठै ई सबद रै सीगै जीवण मांय औचित्य री अंवेर रा दीठाव भी है। ‘आसरै फगत ठौड़ माथै’ कविता री अै ओळियां इणी बात री साख भरै- ‘अेक सबद री ठौड़/ बदळियां/ बदळ जावै जाणै/ कविता री आखी दुनिया/ ठीक बियां ईज बदळ जावै/ सबद रो ई आखो-संसार।/ कांई किणी खुद रो/ कोनी कोई अरथ/ स्सौ-कीं है आसरै/ फगत ठौड़ माथै।’ (पृ.95)
जाणै ऊंडै अंधारै कठैई अै दीठाव दीठाव जीयाजूण रा महताऊ पड़ावां माथै पळका नाखता थकां आपां नै मांयली-बारली दुनिया री नवी ओळखाण करावै। जठै जीयाजूण रा फीका पड़ियोड़ा रंग फेरूं खिल जावै। ‘जीयग्या’ कविता मांय अैड़ो अेक दीठाव देखो- ‘रंग/ जिका हुयग्या हा/ ठाडी ओस मांय/ गूंगा-/ अेक चिड़कली रै सुर में/ सगळा पाछा खिलग्या।’ (पृ.94)
अंधेरे मांय सगळा रंग अेकमेक हुय जावै। किणी री अळगी ओळखाण री कल्पना तकात नीं करी जाय सकै। अैड़ै में ‘अंधारै ई ठीक’ कविता मांय नीं होवणै रो होवणो सबळाई सूं प्रगट हुवै- ‘भलांई कोनी/ म्हैं कठैई/ थारै दीठाव मांय/ अंधारै ई ठीक हूं।/ दीठाव सूं थाक’र/ जद-जद मींचीजैला आंख्यां/ लाधूंला म्हैं बठैई।’ (पृ.88)
जीयाजूण मांय मोकळी अंवळायां-अबखायां है, पण जको सुख ‘सम’ माथै आयां मिलै, बो भाग-दौड़ मांय कठै है? ‘दिनूगै-सिंझ्या’ कविता मांय कवि कैवै- ‘आखै दिन/ खीरा उछाळतो जिको सूरज/ दिनूगै-सिंझ्या/ जद-जद धरती रै/ साथै हुवै/ हुय जावै कित्तो कंवळो/ कित्तो ऊजळो।’ (पृ.89) इण कविता नैं बांचती वेळा म्हनै लाग्यो, जाणै ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ री ठौड़ इण संग्रै रो नाम ‘मुंअंधारै कठैई’ भी राख्यो जाय सकै हो। दिनूगै सूं पैलां अर दिन आथमती वेळा ‘मुंअंधारै’ री संग्या सूं जाणी जावै। पण ऊंडै अरथ मांय ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ शीर्षक सारथक लखावै। इण कविता मांय कवि कैवै- ‘जिका दिखावणो चावै खुद नै/ बै जावै/ अंधारै सूं उजास कानी/ म्हैं जिको/ मन-आंगणै थारै/ लेवणी चावूं कठैई नींद/ ऊंडै अंधारै/ क्यूं भटकूं उजास खातर/ जिको कर देवै म्हनै थारै सूं अळगो।’ (पृ.63)
‘अभिनय कांई आतमघात हुवै’ अर ‘होकड़ो’ कवितावां मांय भी जीयाजूण रै मंच माथै आपरै होवणै अर आतम-ओळखाण रा दीठाव है। इण होवणै मांय कवि होवणो तो और ई अरथाऊ बात है। ‘कवि ईश्वर हुवै’ कविता मांय कवि कैवै- ‘जद कुमळावै फूल/ -खिलै जिको कुमळावै ईज-/ बसा लेवै उणां नै/ सबदां मांय आपां रै गुण मानता थकां/ खिल जावैला कुमळायोड़ा बै\ आ कविता ईज है/ कुमळायोड़ा नै ई खिला देवै-/ कवि इणी खातर ईश्वर मानीजै।’ (पृ.71)
बारै री दांई अेक स्रिस्टि कवि रै मांयनै पण हुवै। जिकी बारै री स्रिस्टि सूं संवाद करणो चावै। “खोलै कोनी किंवाड़’ कविता मांय कवि कैवै- ‘अेक दुनिया बारै/ अर अेक मांय म्हारै।/ बा जिकी बारै है/ मिलणो चावै/ आय’र मांयली सूं/ इणी खातर खड़कांवती रैवै/ जद-कद उण रो कूंटो। (पृ.97) इंसान मांय भगवान भी हुवै अर सैतान भी। दोनूं अेक-बीजै बाबत सोधै। अैड़ै में मानखै री मनगत रो भूंडो हाल हुंवतो लखावै। ‘कुटीजूं म्हैं’ कविता री अै ओळियां निजर है- ‘सैतान सोधै ईश्वर बाबत, सदीव/ अर सैतान बाबत ईश्वर।/ कूटीजूं म्हैं/ दोनूं बिचाळै/ दोनूं बसै मांय म्हारै/ सोचै–/ अेक-दूजै बाबत।’ (पृ.96)
इणी भांत जीयाजूण रै अंधारै-ऊजळै पखां नैं पड़तख करती आं कवितावां मांय ‘बरबरीक’ अर ‘पांचाली’ रा पौराणिक दाखलां रा दीठाव ई देखणजोग है। ‘बरबरीक’ में महाभारत रै जुद्ध में चतुर्भुजधारी री बाजीगरी बतावता थकां बरबरीक रै मूंढै सूं कवि कैवावै- ‘साम्हीं दीठाव भिड़ती हुवै/ छियावां कठपूतळियां री जियां।/ साच है, हां/ कठपूतळियां ई हा सगळा बै–/ जिकी नै डोर सूं झल्यां आभै मांय/ बो दीसै हो म्हनै/ चतुर्भुजधारी अेक बाजीगर/ खुद रै खेल सूं राजी/ – बो भयानक जुद्ध उण रो खेल ईज तो हो।’
बीजै कानी ‘पांचाळी’ मांय द्रौपदी री मनगत केई ऊंडा अरथ उघाड़ती लखावै। भीष्म जद कैयो कै- ‘दुष्टां रो अन्न मति बिगाड़ दी ही।’ तद द्रौपदी रा अै बोल- ‘ना, पितामह/ अन्न तो बो सागी ई खावतो हो विकर्ण ई।’ सामाजिक नै नवी दीठ देवै। अै कवितावां धरम, अरथ, काम अर मोक्ष जैड़ा समाजू सरोकारां सूं जुड़िया सवाल उठावै अर राग-विराग सूं जुड़ी लोकमानसिक वृत्तियां रो ऊंडो जथारथ उघाड़ती थकी ‘दिन रो ई दिन’ दिखावण री आफळ करती ई लखावै। कवि कैवै- ‘कित्ता’क दिन रैवैला/ रात?/ कदैई तो आसी/ दिन रो ई दिन/ कोई तो।’ (पृ.51)
म्हैं इण सांतरै अनुसिरजण सारू अनुसिरजक अर प्रकाशक नै हियैतणी बधाई देवूं। मूळ सिरजक री आसीस बिना तो ओ अनुसिरजण संभव ई नीं हो, बांनैं घणा-घणा रंग। प्रणाम”

कविता की बदलती तासीर

कविता का फ़लक उतना ही व्यापक है जितना जीवन। जीवन के तमाम रंगों को कविता के विहंगम आकाश में खिलता हुआ देखा जा सकता है। नीरज दइया की राजस्थानी कविताओं के नए संग्रह “पाछो कुण आसी” को पढते हुए इस कथन की पुष्टि होती है।
किताब की कविताएं व्यष्टि जीवन व समष्टि जीवन के मध्य सेतु रचती हैं। प्रेम कविताओं की भरी-पूरी मौजूदगी जहां कवि को राजस्थानी कविता की समृद्ध परम्परा से जोड़ती हैं वहीं सामयिक चिंताओं की सूक्ष्म अभिव्यक्ति इस संग्रह को अपने समय-समाज का प्रामाणिक दस्तावेज बना देता है। इन कविताओं में मरुभूमि खासकर बीकानेर के परिवेश का जो अंकन हुआ है, वह सजावटी नहीं, बल्कि जिया हुआ है। तकनीक का बढ़ता दायरा, अर्थप्रमुख जीवन शैली, रिश्तों में आया ठंडापन, दम तोड़ती संवेदना एवं व्यवस्था की विसंगतियों को पूरी विश्वनीयता से उजागर करने वाली इन कविताओं में मानव मन के ओनों-कोनों की बारीकी से पड़ताल हुई है। ये कविताएं पाठकों से संवाद तो करती ही है, सवाल भी उठाती है। कहना न होगा, इन सवालों की अनुगूंज ही बदलाव की जमीन तैयार करती है। “भळै जोवां बै सबद/ जिण मांय कथीज्यो/ दुनिया रो पैलो साच/ जिण बीज्या मानखै मांय/ बदलाव रा बीज” जैसी पंक्तियों में करवट लेते वक्त को महसूस किया जा सकता है। संवैधानिक मान्यता का इंतजार करती राजस्थानी भाषा की पीड़ा को प्रकट करने वाली करीब आधा दर्जन कविताएं किताब का हिस्सा बनी हैं। “बिना भासा रै/घूमा म्हे उभराणा” उस समाज के दर्द की अभिव्यक्ति है, जिसकी भाषा-संजीवनी सियासी समीकरणों की शिकार होकर रह गई है। किताब के आखिर में गद्य कविताओं की एक शृंखला शामिल हुई है जिनमें जीवन के विविध रंग प्रकाशित हुए हैं। आंतरिक लय को कलात्मक ढंग से साधती ये कविताएं शिल्पगत वैशिष्ट्य से ध्यान खींचती है। राजस्थानी कविता की बदलती तासीर को जानने के लिए यह एक जरूरी किताब मानी जा सकती है।

-मदन गोपाल लढ़ा
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पाछो कुण आसी, कवि- नीरज दइया, प्रकाशक- सर्जना, बीकानेर, पृ. 96, मूल्य 140 रु., फोन:0151 224 2023

Rajasathan-Patrika-27032016(राजस्थान पत्रिका ; रविवार 27 मार्च 2016)