देसूंटो (लांबी कविता)

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देसूंटो (लांबी कविता)

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पारसमल पांडया स्मृति राजस्थानी साहित्य पुरस्कार

news 08012019पारसमल पांडया स्मृति राजस्थानी साहित्य पुरस्कार हेतु नेम प्रकासण, डेह (नागौर) का आभार।


कवि-आलोचक डॉ.नीरज दइया को उनके राजस्थानी काव्य संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ के लिए नेम प्रकासण डेह नागौर द्वारा पारसमल पांडया स्मृति राजस्थानी साहित्य पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। संस्थान के पवन पहाड़िया ने बताया कि पुरस्कार के तहत डॉ.दइया को 11 हजार रुपए और प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर पुरस्कृत किया जाएगा। संयोजक लक्ष्मणदान कविया ने बताया कि 3 फरवरी को डेह गांव स्थित कुंजल माता मंदिर सभागार में सुबह 10 बजे आयोजित समारोह में डॉ.नीरज को पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।

101 राजस्थानी कहानियाँ (संपादक : नीरज दइया)

101 राजस्थानी कहानियाँ (संपादक : डॉ. नीरज दइया)ISBN : 978-81-938976-8-3
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
प्रकाशन वर्ष : 2018 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-

101 Rajsthani Kahaniya Cover

डॉ. नीरज दइया हिंदी और राजस्थानी के समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार हैं। सृजन और अनुसृजन में उनकी समान गति है। इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर में वह मौलिक लेखन के सशक्त हस्ताक्षर के साथ-साथ सहोदरा भाषाओं- हिंदी और राजस्थानी के मध्य सेतु बनकर उभरे हैं।
नीरज ऐसे आलोचक हैं, जो संकोच या लिहाज में यकीन नहीं रखते। वह खूबियां गिनाते हैं, तो खामियां भी बताते हैं। उनका यकीन खरी-खरी अथवा दो टूक है। उनके लिए ‘थीम’ भी मायने रखती है और सलूक भी। वह रचनाकार के सलीके को भी नजरअंदाज नहीं करते। वह अपनी बीनाई (दृष्टि) से चीजों को परखते हैं। उनके लिए शिल्प और संवेदना मायने रखते हैं, तो प्रयोगधर्मिता भी समय के यथार्थ से जुड़ना और उससे मुठभेड़ के साथ-साथ प्रासंगिकता को वे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। गौरतलब है कि हिंदी की पहली और राजस्थानी की प्रथम कहानी लगभग असपास ही लिखी गई। शिवचंद भरतिया की 1904 में लिखी पहली कहानी के बाद लगभग एक सदी में राजस्थानी की कहानी ने बहुत कुछ सार्थक अर्जित किया है। सरकारी या गैर सरकारी संरक्षण की न्यूनता के बावजूद उसने गतिरोधों से उबरकर अपना रास्ता तलाशा और पहचान अर्जित की।
नीरज दइया की यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थगर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी माटी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और श्लाघ्य उपक्रम किया है।

-डॉ.सुधीर सक्सेना
प्रधान संपादक, दुनिया इन दिनों, दिल्ली
sudhirsaxena54@gmail.com
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डॉ. नीरज दइया (1968) हिंदी और राजस्थानी में विगत तीन दशकों से निरंतर सृजनरत हैं। आप कविता, व्यंग्य, आलोचना, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखते हैं। अब तक आपकी दो दर्जन से अधिक कृतियां विविध विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा में मुख्य पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. दइया को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. नीरज दइया की प्रमुख कृतियां हैं- आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन, कागला अर काळो पाणी, मंडाण, पाछो कुण आसी (राजस्थानी), राजस्थानी कहानी का वर्तमान, उचटी हुई नींद, पंच काका के जेबी बच्चे, टांट टांय फिस्स, आधुनिक लघुकथाएं, कागद की कविताई (हिंदी) आदि।
वर्तमान में आप केंद्रीय विद्यालय, क्रमांक-1, बीकानेर में पी.जी.टी. (हिंदी) के पद पर सेवारत हैं।
मो. : 9461375668
ई-मेल : drneerajdaiya@gmail.com
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101 राजस्थानी कहानियाँ (संपादक : नीरज दइया)
प्रकाशन वर्ष : 2018 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102 ISBN : 978-81-938976-8-3
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अलोचना रूसणा-मनावणा री गिनार कोनी करै – डॉ. दइया

साहित्य अकादेमी पुरस्कार सूं सम्मानित डॉ.नीरज दइया सूं बंतळ
Neeraj Daiya se bat Rajuram b

Neeraj Daiya se bat Rajuram b 02◆ आपरै साहित्य में राजस्थानी समाज रौ बहुवर्णी अंकन निगै आवै। समाज रै ढंग-ढाळै रौ इसौ लूंठौ अर ऊंडौ अनुभव किंया पायौ?
● देखौ सा, हरेक लेखक रा अनुभव दोय भांत रा हुया करै। अेक तौ वौ जिण घर-समाज मांय वौ रैवै उण रौ सीधौ-सीधौ असर उण माथै हुवै, दूजौ लेखक री आपरी सोचा-विचारी अर लगौलग अध्ययन ई अनुभवां री सींव मांय बधापौ करिया करै। हरेक लेखक री आपरी अेक दुनिया हुवै अर उण दुनिया री ओळखण वौ साहित्य मांय करावै। बाळपणै मांय म्हारौ साबकौ साहित्य री दुनिया सूं म्हारै जीसा कवि-कहाणीकार सांवर दइया रै कारण हुयौ। हौळै-हौळै जियां-जियां साहित्य सूं सैंध बधी, म्हारी दुनिया रौ दायरौ बधतौ गयौ। म्हारी पैली कहाणी ‘माणक’ मांय बरस 1987 मांय छपी, तद डूंगर कॉलेज में बी.एससी. रौ तीजौ बरस चालै हौ। फेर तौ म्हारी केई लघुकथावां अर बाल कथावां ई ‘माणक’ अर दूजी पत्रिकावां मांय छपी।

◆ आज तांई रै आपरै लिखारै सारू इसौ कोई अनुभव बताऔ जिण में पाठक रौ अणूतौ हेत-विश्वास सामीं आयौ हुवै?
● लिखण रै हरेक दौर रा अनुभव न्यारा-न्यारा हुया करै, जियां कै म्हैं पैली-पैली लघुकथावां लिख्या करतौ तौ लेखक-समाज री टीप इण भांत रैयी कै म्हारी लघुकथावां म्हारा जीसा सांवर दइया नांव बदळ’र लिख रैया है। जद कै इण ढाळै री कोई बात नीं ही, हां औ जरूरी हौ कै पैली-पैली लघुकथावां नै म्हैं बां सूं पास कराया करतौ हौ। बै सबदां री वर्तनी ठीक करिया करता हा अर विधागत ई केई बातां बतायां सूं म्हनै लगौलग लिखण रौ मारग मिलतौ गयौ अर म्हैं इण मारग सवायौ हुयौ। लेखक-समाज री टीप सूं इण खातर हरखीज सकूं कै उण बगत म्हैं कीं सावळ लिखतौ हौ, तद ई तौ बां इण ढाळै री बात राखी। फेर जद जीसा बरस 1992 में सौ बरस लिया, तद बै चमाळीस अर म्हैं चौबीस बरसां रौ ई हौ। बरस 1993 मांय महाकवि कन्हैयालाल सेठिया आसीस मांय दूहो लिख्यौ- ‘नीरज तू शतदल बणी आ म्हारी आशीष, करूं कामना तू हुई सगळां सूं इक्कीस।’ उमर रा जिता साल म्हैं जीसा भैळै रैयौ, बित्ता सूं बेसी अबै बां बिना निकळग्या। जीसा अर सेठिया जी री भासा पाठकां रै हेत विश्वास सूं ई बचैला।
◆ आप खुद नै आलोचक, अनुवादक, कवि, कहाणीकार, व्यंग्यकार मांय सूं मूळ रूप में खुद नै कांई मानौ?
● मूळ मांय म्हैं खुद नै बस राजस्थानी रौ अेक सिपाही मानूं। राजस्थानी म्हारै रगत रळियौड़ी भासा है अर इण भासा पेटै म्हैं न्यारी-न्यारी विधावां मांय लिख परौ भासा रै पख मांय जीवणौ चावूं। जिण ढाळै मोरियौ नाचौ अर आपरै पगां नै देख’र रौवै, उणी ढाळै न्यारी-न्यारी विधावां मांय म्हारौ सिरजण ई म्हारौ नाच है। इण रंग-रूप अर मीठास साथै लूंठै इतिहास पछै ई राजस्थानी नै संवैधानिक मान्यता कोनी औ म्हारै रोवणै रौ मोटौ कारण है।
◆ अेक लिखारै रै रूप में आप किण सूं प्रभावित हुया हौ?
● सगळा सूं पैली तौ म्हैं म्हारै जीसा सांवर दइया सूं घणौ प्रभावित हुयौ कै बै छौटी ऊमर लिखा’र लाया पण खूब लिख्यौ अर जिकौ लिख्यौ आधुनिक साहित्य मांय घणौ महतावूं मानीजै। बां सूं म्हैं सीख्यौ कै लगौलग लिखण रै साथै-साथै राजस्थानी-हिंदी रै अलावा देसी-विदेसी लेखकां-कवियां नै बांचणां ई जरूरी है। अनुवाद रै मारफत आपां घणा सूं घणा रचनाकारां नै सैंधां कर सकां तौ खुद अनुवाद कर’र आपां भासा रौ करजौ उतारण री प्रेरणा ई बां सूं लेय सकां।

◆ ‘मंडाण’ रौ संपादन करता थकां आप केई युवा लिखारां में ऊरमा भरी, सरावणजोग.! पण उण पछै आप युवा लिखारां नै आगै लावण सारू कांई जतन करिया?
● राजस्थानी रै 55 युवा कवियां री कवितावां नै अेकठ देखण-परखण रौ ‘मंडाण’ अेक जरियौ बण्यौ। इणी ढाळै कहाणी अर दूजी विधावां माथै काम हुयां युवा लिखारां नै विगसाव रा मारग मिलैला। प्रकाशन री अखबायां रै कारण काम नीं हुय सक्या। फेर ई अलोचना पेटै म्हैं युवा लिखरां माथै घणौ काम करियौ अर केई कवियां री रचनावां रौ हिंदी अनुवाद ई करियौ है।

◆ लगौलग लिखणियां अर अनुवाद करणियां में आप सिरैनांव गिणीजौ हौ। अनुवाद अर मूळ लेखन में कित्तौ’क फरक मानौ?
● अनुवाद अर मूळ लेखन रै सवाल माथै म्हनै लोककथावां री दुनिया चेतै आवै। लोककथावां मांय जिण ढाळै परकाया प्रवेस री घणी कथावां मिलै उणी ढाळै लेखन अर अनुवाद परकाया प्रवेस ई हुया करै। आपां देखा कै जियां अभिनय करतौ कोई कलाकार उण चरित्र मांय रम जावै उणी ढाळै सिरजण अर अनुसिरजण मांय लेखक नै रम जावणौ चाइजै। अनुवाद मांय छूट री अेक सींव हुया करै जद कै मूळ लेखन मांय आभौ अणमाप हुवै।

◆ अनुवाद सारू आप कोई रचना नै कींकर टाळौ?
● म्हनै लखावै कै जद कोई मूळ रचना अंतस मांय असर करै तद वा अनुसिरजण खातर विवस करै। केई बार भासा री जरूरतां नै देखता ई अनुवाद करीजै पण अनुवादक नै किणी मसीन दांई अनुसिरजण रौ काम नीं करणौ चाइजै। अनुसिरजण मांय तौ मूळ रचनाकार री आतमा जद अनुवादक मांय घुस जावै का कैवां कै आतमा सूं आतमा रमण लागै तद अनुसिरजण सांतरौ रचीजै, अर बौ ई बेजोड़ हुय सकै। म्हैं अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य का सुधीर सक्सेना आद रा अनुवाद इणी ढंग-ढाळै करिया है। ‘सबद-नाद’ मांय 24 भारतीय भासावां रै कवियां री कवितावां नै राजस्थानी मांय करियां भारतीय कविता रौ अेक दीठाव सामीं आयौ।

◆ रचना सारू भाषा रौ चयन किण आधार माथै करौ?
● रचना पेटै भासा अर विधा रौ चुनाव लिखण री मनगत सूं हाफी-हाफी हुया करै। केई बार जीव मांय घणी आवै कै इयां लिखलां बियां लिखलां पण सदा लिखीजणौ हाथ री बात कोनी। जे लिखणौ अर भासा-विधा रौ चयन म्हारै हाथ मांय हुवै तौ म्हैं फगत कवितावां ई लिखणी चावूं, पण कवितावां तौ बिनमौसम रै फूल दांई ठाह नीं कद हियै मांय खिलै अर टैमसर उण नै सबदां नीं ढाळूं तौ खिर जावै, फेर बा हाथ नीं आवै। म्हैं किणी री फरमाइस माथै अलोचना ई नीं लिख सकूं, लेखन खातर मनगत हुवणी जरूरी है। इण बात सूं केई मित्र बेराजी ई हुया है।

◆ बरस 2017 रा घणखरा पुरस्कार अर सम्मान आपरै नांव रैया। पुरस्कारां रौ आपरै लेखन में कांई मायनौ मानौ?
● पुरस्कार बस अेक संयोग है। लेखक रै जीवण मांय पुरस्कार सूं उछाव जरूर हुवै पण मूळ लेखन मांय पुरस्कारां सूं गुणवत्ता मांय कीं बधापौ हुवतौ हुवै इसौ म्हैं कोनी मानू। जे हाथ मांय तलवार लिया ई कोई जूझारू जोधा बण जावतौ तो जूनै बगत मांय तलवारां री कमी थोड़ी ही। किणी खातर तलवार तो किणी खातर कलम बणी ही। कलम सूं लिख्योड़ा सगळा लिकलिकोळिया का अखबारां री खबरां साहित्य लेखन रै सीगै नीं आवै। साहित्य पेटै लेखक री जूण खातर घणौ खटणौ पड़ै। सबद-साधना तौ जूण मांय सांस चालै जियां चालै तद फळापै। म्हनै लखावै कै पुरस्कारां अर सम्मानां सूं म्हारी जिम्मेदारी बधगी है, म्हैं म्हारै पाठकां रौ पतियारौ सवायौ राखण रा जतन करतौ रैवूंला।

◆ आपनै बाल-साहित्य पेटै साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल्यौ। टाबरां सारू लिखणै सूं लेय ‘बिना हासलपाई’ रै लेखण रा पांवडा बिचाळै, कांई फरक मानौ?
● ‘जादू रो पेन’ री कहाणियां म्हैं घणै बरसां पैली लिखी, पण पोथी रूप आवण मांय खासा टैम लाग्यौ। लेखन अर प्रकासण रौ आपरौ अेक क्रम हुया करै। आ जातरा लगौलग चालती रैवणी चाइजै। म्हैं लगौलग लिखतौ, बांचतौ रैयौ अर साथै-साथै अलोचना-अनुवाद रै काम मांय घणौ बगत दियौ। अलोचना पेटै ‘अलोचना रै आंगणै’ मांय न्यारी न्यारी विधावां पेटै बानगी आलेख हा। दूजै कानी आप देखौ कै कहाणी अलोचना रौ विगतवार श्रीगणेस बरस 1998 मांय कवि-आलोचक-नाटककार डॉ. अर्जुनदेव चारण आपरी पोथी ‘राजस्थानी काहणी रू परंपरा विकास’ सूं करियौ, इण पछै बरसां सूनवाड़ रैयी। म्हैं बरस 2014 मांय 25 कहाणीकारां माथै विगतवार कहाणी-अलोचना री पोथी ‘बिना हासलपाई’ सामीं लायौ। इण दिस अजेस खासा काम हुवणा बाकी है।

◆ आप ‘नेगचार’ जैड़ी सांतरी पत्रिका काढ़ी। फेर नेगचार रौ प्रकाशन बंद क्यूं करणौ पड़्यौ? राजस्थानी में पत्रिकावां अर संपादक रै पेटै कांई चुनौतियां मानौ?
● नेगचार आपरै समै री मांग ही। उण सूं केई बडेरां रा पोत सामीं आया। पत्रिका काढणौ घणौ ओखौ काम मानूं। जिका काढै बां रौ जीव जाणै कै कित्ती-कित्ती अबखायां रैवै। संपादन रौ काम रचनावां नै भैळी कर’र प्रकाशित करणौ नीं हुया करै, उण खातर घणी समझ अर सोचा-विचारी जरूरी हुया करै। दो हाथां सूं आपां चावां कै च्यार काम करां तौ मौटी बात, पण चाळीस काम पोळायां नतीजौ कांई हुवैला! पत्रिका खातर पूरी टीम री दरकार हुया करै। संजोग सज्यौ तो नेगचार का दूजी पत्रिका फेर निकाळसूं। आज रै दिन सगळा सूं लांठी बात पाठकां री संख्या बधावणी मानूं। नुवीं पीढी जे जुड़ी रैसी तो आपाणौ भाग सवायौ आसी।

◆ अेक आलोचक रै रूप में आपरा मापिणा कांई हुवै? किणी पोथी री कूंत करतां आपरौ खास जोर किण माथै रैवै?
● म्हैं किणी बंधै-बधायै वाद अर बण्यै-बण्या सीगा सूं रचनावां री परख करण रै पख में नीं हूं। म्हारौ मानणौ है कै हरेक नुवीं रचना अेक नुवीं खोज हुया करै, इणी खातर अलोचना नै ई निता-नुवां मापिणा खोजणा चाइजै। जूनी अलोचनात्मक दीठ सूं जरूरी कोनी कै हरेक नुवीं रचना पकड़ मांय आय सकै। म्हैं कूंत रै मिस पोथी रौ सार लिखण रै पख मांय कोनी। पोथी सूं मिनख रै मन मांय हुवण वाळै बदळावां री बातां भेळै हरेक पोथी नै परंपरा अर आधुनिकता नै अवदान पेटै देखण रौ म्हैं हिमायती हूं।

◆ अेक सम्पादक अर प्रकाशक रै रूप में आप राजस्थानी साहित्य रै छपणै अर बिकणै पेटै केड़ा अनुभव हासल करिया?
● म्हैं तौ मूढै रौ मांग्यौड़ौ हूं, किणी सूं कीं कोनी कैय सकूं। दुष्यंत कुमार रै सबदां मांय कैवां तौ ‘न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब है इस सफ़र के लिए’। बिना कीं कैया कोई पोथी कियां खरीदै। बाजार रा आपरा मोल-भाव अर मनगत हुया करै। म्हैं ओ खेल नीं जाण सक्यौ सौ संपादक अर प्रकाशक रौ काम ताबै कोनी आयौ।

◆ आपरी पैली पोथी लघुकथा री ही। पण लारलै केई बरसां में नुवी लघुकथावां बांचणै सारू निगै नीं आई। क्यूं?
● लघुकथावां री पैली पोथी पेटै ई चोट हुयगी। ‘भोर सूं आथण तांई’ पोथी छपी जिण री ई आपरी कथा है। नुवी लघुकथावां कीं लिखी अर कीं लिखणी ई चावूं, पण म्हारै फगत चावण सूं कीं नीं हुवै। रामजी सुवां दिन देसी अर जे लघुकथवां पोथी जित्ती लिखीजी तौ जरूर पोथी काढसूं।

◆ ‘बिना हासलपाई’ में पच्चीस कहाणीकार सामल हुया है, आं रौ चयन किण विध करीज्यौ?
● अलोचना मांय चयन किणी सरकारी नौकरी दांई फारम भरा’र तौ हुय कोनी सकै। आधुनिक कहाणी रै विकास पेटै जिका कहाणीकारां री चरचा कमती रैयी का फेर जिका माथै ध्यान नीं देय सक्या उणां नै लेवण साथै खास-खास सगळा कहाणीकारां नै म्हैं लेवण रा जतन करिया। जिका छूटग्या का जिका नै छोड़ दिया उण पेटै पोथी मांय दोय आलेख है। म्हारौ मानणौ है कै अलोचना रुसणा-मनावणा री गिनार कोनी करै। फेर छब्बीस नंबर सूं लेय’र आगै जित्ता रै ई कहाणीकार है बां माथै बगत आया काम करूंला। लिखण मांय गिणती कोनी राखूं, हुय सकै आपरै साठ नंबर माथै जिकौ कहाणीकार हौ उण माथै म्हैं लिख दियौ हुवै।

◆ चावा कवि, कहाणीकार सांवर दइया जी रै लाडेसर सूं, चावा कवि, आलोचक नीरज दइया रै नांव री ओळखाण री जातरा रा खास पड़ाव कांई मानौ?
● जीसा रै नांव री ओळखाण तौ आखी जूण साथै रैवैला। बां बरस 1992 में सौ बरस लिया। तद म्हैं बां रै अणछप्यै साहित्य नै सामीं लावण पेटै लगैटगै पांच बरसां काम करियौ। ‘नेगचार’ पत्रिका ई निकाळी। नेगचार प्रकाशन सूं पोथ्यां ई छापी। बां रै रैवतां म्हारी फगत अेक पोथी लघुकथावां री छपी ही अर कविता संग्रै 1997 में ‘साख’ लगैटगै सगळा काम करियां पछै आयौ। पोथ्यां री गिणती करां तौ बां थकां जिकी गिणती अेक सूं चालू करी बा अबै तीस नैड़ै पूग रैयी है। केई पुरस्कारां, मान-सम्मान पछै ई म्हैं मानूं कै म्हारी साची ओळखाण तौ राजस्थानी री संवैधानिक मान्यता सूं ई हुवैला।

◆ अेक आलोचक माथै पखापखी रौ आरोप नुवादी बात कोनी। आप रै आलोचक साम्ही अेड़ै सवाल रौ कांई पड़ूतर हुवैला?
● म्हारी अलोचना सूं सहमति-असहमति राखणौ आपरौ अधिकार है। इण पेटै फगत इत्तौ कैय सकूं कै म्हैं बिना हासलपाई म्हारी बात करण रै पख मांय हूं। जियां कै जे म्हारा जीसा अर कहाणीकार सांवर दइया री कहाणियां माथै लिखण रौ मन करूं तौ बां री सगळी अपणायत अर संबंधां नै बिसराय, बां नै फगत अेक कहाणीकार रूप मांय ई देखूं। म्हारौ आलोचक म्हनै औ हक कोनी देवै कै बां नै प्रेमचंद का गुलेरी रै बरौबर साबित करण री अणचाइजती खेचळ करूं। बै जियां है, जिसा है म्हैं खुद री दीठ सूं बां नै जियां परख सक्यौ उणी ढाळै लिख्यौ है। दाखलै रूप बतावूं बां री कहाणियां पेटै प्रयोग रै नांव माथै विषयगत अर शैलीगत रूढ़ता नै म्हैं खासियत भेळै कमजोरी ई मानी है। इणी ढाळै संपादित कहाणी-संग्रै ‘उकरास’ री अलोचना में बां जिकी कहाणीकारां री उमर सूं विगत बाणाई उण पेटै लिख्यौ कै कहाणीकारां री रचनात्मकता अर कहाणी-लेखन ग्राफ नै विगत रौ आधार बणावणौ हौ। परंपरा सूं आधुनिकता की अेक जातरा नै विगतवार म्हैं देख-परख’र रचनाकारां री विगत पेटै ‘बिना हासलपाई’ मांय जतन करियौ है।

◆ आपरी ‘आंगळी-सीध’ बीजां री आंगळी सीध सूं न्यारी कींकर है?
● आंगळी सीध राजस्थानी उपन्यासां माथै किताब है जिकी केई बरसां सूं चाल रैयी है। म्हारौ मानणौ है कै उपन्यास रौ कैनवास घणौ मोटौ हुवै अर अलोचना फगत कीं आंगळी सीध ई कैय सकै। किणी रचना मांय आलोचक रै रूप मांय म्हैं पाठकां अर लेखकां वास्तै आंगळी सीध ई कर सकूं, हुय सकै कै म्हैं खुद जे म्हारी ई आंगळी सीध करियौड़ी बातां माथै चालणौ चावूं तौ नीं चाल सकूं, पण बात जिकी है सौ तौ कैयां ई सरै। म्हारै कौठै हुवै जिसी ई म्हैं होठै राखण रौ हिमायती हूं, इयां कोनी कै थूक गिटतौ पेट मांयली बातां पेट मांय ई पचा लेवूं। अलोचना तौ ताकड़ी दांई हुवणी चाइजै, जिण मांय काण राख्या खरौ तोल नीं हुय सकै।

◆ आप भाषा री मानता संघर्ष रा भागीदार हौ.! राजस्थानी री संवैधानिक मानता सारू आपरी दीठ सूं कांई जतन जरूरी है?
● मानता तौ आज नीं तौ काल मिलणी ई है। म्हारी दीठ सूं आपां नै सावळ राजस्थानी सीखणी ई चाइजै। भासा री केई-केई बातां सूं आपां अणजाण रैसां तौ आ हेमाणी धूड़ हुय जावैला। जियां बात करां कै ल अर ळ मांय फरक है। दाखलौ- बल अर वळ सामीं है। इणी ढाळै राजस्थानी नै आगै बढ़वण वाळा नै कुण समझावै कै बढ़ावण री ठौड़ मालकां बधावाण री जरूरत है। भासा री मानता नीं हुवण सूं आपां आपां री जड़ा सूं कटाता जाय रैया हां। राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति री विरासत नै आगै री पीढियां तांई सावळ नीं पूग्यां घणौ बिगाड़ौ हुय जावैला।

◆ साहित्यकार री हैसियत सूं राजस्थानी साहित्य नै आम लोगां तांई पूगावण सारू आप कांई जतन जरूरी समझौ?
● राजस्थानी खातर आपां नै जिता मौरचा संभाळ सकां संभाळणा चाइजै। राजस्थानी साहित्य नै हिंदी अर अंग्रेजी मांय अलोचना रै मारफत राजस्थान री सीवां सूं बारै निकाळां, तद ई आपां नै आपां रौ वाजिब हक आपां नै मिलैला। जनता भेळै जन-चेतना पेटै साहित्यकार ई काम कर रैया है, उण नै घणै उछाव सूं नुंवी पीढ़ी नै जोड़ता थका चालू राखणौ है। कोई काम हियै उकळै जद ई पूरौ हुवै। सगळा नै भासा-साहित्य पेटै आपौ- आप री जिम्मेदारी समझणी चाइजै।
___________________
० राजूराम बिजारणियां
(साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित)
लक्ष्मी फोटौ स्टेट, लूनकरनसर (बीकानेर)
e-mail : rrbijarnia@gmail.com
Blog : raj bijarnia.blogspot.com
9414449939
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डॉ. नीरज दइया : परिचै
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कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक अर संपादक रै रूप में ओळखाण।
जलम : 22 सितम्बर, 1968 रतनगढ़ (चूरू) राजस्थान
जीसा : श्री सांवर दइया (चावा-ठावा राजस्थानी कवि-कहाणीकार)
भणाई : बी.एससी., एम.ए.(हिंदी साहित्य, राजस्थानी साहित्य), बी.एड., नेट, स्लेट, पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक पाठ्यक्रम (स्वर्ण पदक) “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर पीएच.डी.(2007)
प्रकाशित साहित्य
मौलिक पोथ्यां –
• भोर सूं आथण तांई (लघुकथा संग्रह) 1989 मुन्ना प्रकाशन, बीकानेर
• साख (कविता संग्रह) 1997 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• देसूंटो (लांबी कविता) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• आलोचना रै आंगणै (आलोचनात्मक निबंध) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• जादू रो पेन (बाल साहित्य) 2012 शशि प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
• उचटी हुई नींद (हिंदी कविता संग्रह) 2013 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• बिना हासलपाई (आधुनिक कहाणी आलोचना) 2014 सर्जना, बीकानेर
• पाछो कुण आसी (कविता संग्रह) 2015 सर्जना, बीकानेर
• मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• पंच काका के जेबी-बच्चे (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
अनूदित पोथ्यां –
• कागद अर कैनवास (अमृता प्रीतम री पंजाबी काव्य-कृति रौ अनुवाद) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• कागला अर काळो पाणी (निर्मल वर्मा रै हिंदी कहाणी संग्रह रौ अनुवाद) 2002 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ग-गीत (मोहन आलोक रै कविता संग्रै रौ हिंदी अनुवाद) 2004 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• सबद नाद (भारतीय भाषाओं री कवितावां) 2012 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवां री घाटी (भोलाभाई पटेल रै गुजराती यात्रा-वृत रौ अनुवाद) 2013 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ऊंडै अंधारै कठैई (डॉ. नन्दकिशोर आचार्य री चयनित कवितावां) 2016 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• अजेस ई रातो है अगूण (सुधीर सक्सेना री चयनित कविताबां रौ राजस्थानी अनुवाद) 2016 लोकमित्र, दिल्ली
संपादित पोथ्यां –
• राजस्थानी कहानी का वर्तमान (आलोचना) डॉ. नीरज दइया, 2018 अनंग प्रकाशन, दिल्ली
• मंडाण (युवा कविता) संपादक : नीरज दइया 2012 राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
• मोहन आलोक री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2010 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2017 राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर
• राजस्थानी कहानी का वर्तमान (आलोचना, संपादन) डॉ. नीरज दइया, अनंग प्रकाशन, दिल्ली 2018
• नेशनल बिब्लियोग्राफी ऑफ इंडियन लिटरेचर (राजस्थानी : 1981-2000) साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• आधुनिक लघुकथाएं (संपादन) प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग, बीकानेर- 334003
• नेगचार (तीन अंक)
• बिणजारो (बरस 2000)
• “जागती जोत” राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी री पत्रिका (सितम्बर,02 सूं सितम्बर,03 तांई)
• राजस्थानी पद्य संग्रह (कक्षा- 12 खातर) माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर सूं प्रकाशित।
• अपरंच (सं. पारस अरोड़ा) बीकाने-अंक संपादित
• कविता कोश (राजस्थानी-विभाग) रा सहायक सम्पादक 12 मार्च 2008 सूं सक्रिय।
सम्मान अर पुरस्कार
• साहित्य अकादेमी मुख्य पुरस्कार 2017
• साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार 2014
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर सूं भत्तमाल जोशी पुरस्कार
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर सूं “बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार”
• नगर विकास निगम सूं “पीथळ पुरस्कार” ।
• नगर निगम बीकानेर सूं 2014 में सम्मान
• अखिल भारतीय पीपा क्षत्रिय महासभा युवा प्रकोष्ठ बीकानेर द्वारा सम्मान- 2014
• सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर सूं तैस्सितोरी अवार्ड- 2015
• रोटरी क्लब, बीकानेर द्वारा “खींव राज मुन्नीलाल सोनी” पुरस्कार-2016
• कालू बीकानेर द्वारा नानूराम संस्कर्ता राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• कांकरोली उदयपुर द्वारा मनोहर मेवाड़ राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• फ्रेंड्स एकता संस्थान बीकानेर द्वारा साहित्य सम्मान-2016
• दैनिक भास्कर बीकानेर द्वारा शिक्षक सम्मान- 2016
• सृजन साहित्य संस्थान, श्रीगंगानगर द्वारा सुरजाराम जालीवाला सृजन पुरस्कार-2017
• राजस्थानी रत्नाकर, दिल्ली द्वारा श्री दीपचंद जैन साहित्य पुरस्कार’- 2017
• ओम पुरोहित ‘कागद’ फाउण्डेशन हनुमानगढ़ द्वारा कागद सम्मान- 2017
• साहित्य कला एवं संस्कृति संस्थान नाथद्वारा द्वारा हल्दीघाटी में साहित्य रत्न सम्मान- 2017
• जिला लोक शिक्षा समिति, बीकानेर द्वारा साक्षरता दिवस पर सम्मान- 2017
• मावली प्रसाद श्रीवास्तव सम्मान 2017 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन द्वारा
• अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा सीताराम रूंगटा सीताराम रूंगटा राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 2017
• KVS Regional Incentive Award, 2017
• गौरीशंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार- 2017
• डॉ. नारायणसिंह भाटी अनुवाद सम्मान 2018
अन्य-
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर री राजस्थानी पाठ्यक्रम विषय-समिति रा पूर्व-संयोजक।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर री कार्यकारणी अर सामान्य सभा रा सदस्य।
“कविता कोश” राजस्थानी विभाग सहायक-संपादक।
समन्वयक : राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति विभाग, हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली

अबार : केंद्रीय विद्यालय, क्रमांक- एक, बीकानेर में पी.जी.टी. (हिंदी) रै पद माथै सेवारत।
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संपर्क : डॉ. नीरज दइया, सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर (राज.) 334003
E-mail : drneerajdaiya@gmail.com Mob.9461375668

गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) अनुवाद : नीरज दइया

Gavad Hindi Tr by Neeraj Daiya

गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) राजस्थानी से हिंदी अनुवाद : नीरज दइया
प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ; 2018 ; 150/-
ISBN : 9788126053780

लोकार्पण-कार्यक्रम के कुछ फोटोग्राफ

सुधीर सक्सेना री टाळवी कवितावां
पोथी : अजेस ई रातो है अगूण (2016) संचै-अनुसिरजण : नीरज दइया
प्रकाशक : लोकमित्र, 1/6588, रोहतास नगर (पूर्व), शाहदरा, दिल्ली-110032
ISBN : 978-93-80347-59-2, पाना : 144, मोल : 295/-

कागद की कविताई

KAGAD KI KAVITAI Dr Neeraj Daiya
कागद की कविताई (डॉ. नीरज दइया) 2018 विकास प्रकाशन, बीकानेर Book Pdf Kagad Ki Kavitai
05-07-2018 ‘कागद की कविताई’ सूरतगढ़ में कार्यक्रम
दैनिक युगपक्ष में प्रकाशित आलेख
एक : ना जाने कैसी ऊहापोह / डॉ. नीरज दइया
दो : कागद हो तो हर कोई बांचे / डॉ. नीरज दइया

ओळूं, सपनां अर जूझ रो सांगोपांग मंडाण

GHIR_GHIR_CHETE_AAUVLA_MEN_NEERAJ_DAIYAहवा, पाणी अर धरती दांई जिकी चीजां नैं बचावण री दरकार लखावै बां मांय ‘कविता’ ई सामल है। साहित्य री सगळा सूं जूनी अर चावी विधा कविता रो इतिहास मिनखपणै री हिमायत रै दाखलां सूं भरियो-पूरो है। जुगां सूं कविता मिनख रै अंतस सूं घणी नैड़ी विधा रैयी है। मानखै रा सुख-दुख अर जीयाजूण री जूझ रो मंडाण कविता मांय हुयो है। जोर-जुलम अर सामाजिक बिडरूपतावां रै खिलाफ कविता सगळा सूं पैली गूंजीM G Ladha है। साचाणी कविता इण जगती नैं सोवणी बणावण री आफळ है। कविता नैं बचावण रो मतळब है मिनखपणै नैं बचावणो।
देस रा चावा हिंदी कवि डॉ. संजीव कुमार री कवितावां मांय आपां इण आफळ नैं पड़तख देख सकां। डॉ. संजीव कुमार री लांबी कविता जातरा सूं टाळवीं कवितावां रै डॉ. नीरज दइया रै राजस्थानी अनुवाद नैं बांचतां आ बात सुभट प्रगट हुवै कै बै कविता माथै कित्तो पतियारो राखै। आं कवितावां मांय कवि रै लूंठै अनुभव री ओप प्रगटै बठै ई ओळूं, सुपनां अर जूझ रो बिसवासू अर सांगोपांग मंडाण ई ध्यान खींचै।

‘खिड़की सूं आवतो उजास / आपां नैं जोड़ै दुनिया सूं’ (किंवाड़) ओळी सूं कवि री मनगत ठाह पड़ जावै। अेकलपा री त्रासदी नैं भोगतो आज रो मिनख आप रै आखती-पाखती रै परिवेश सूं जाबक कटग्यो। महानगरीय जूण मांय आ समस्या घणी विकराळ हुयगी जठै बारणां बंद कर जीवणियो मिनख आपरै ओळै-दोळै सूं कोई तल्लो-मल्लो नीं राखै। अर्थप्रमुख जूण मांय भाजतो आदमी मसीन दांई जीवै। भोर सूं आथण दांई धन कमावण री लालसा इत्ती बधगी कै समंध-सगपण ई खूंटी टंगग्या। ‘आपणा घर’ सिरैनांव री कविता में कवि लिखै- ‘लोग घर री च्यार भींतां मांय / जोवै सुख / आपसदारी रो निकळग्यो दम / मिल’र कोनी बांटै / सरदी, गरमी अर बसंत।’

प्रकृति सागै बेलीपै रै पाण ई संवेदणा री बेल पळै-पनपै। धरती, दरखतां, पंखेरूवां सूं हेत-अपणायत राख्यां ई मिनख रो तन-मन नीरोग रैवै। प्रकृति माइत दांई आखी मिनखाजूण नै पाळै। हरियळ धरती रो दरसाव ई मन नैं मोद सूं भर देवै। आं कवितावां मांय कवि प्रकृति नैं केई-केई रूपां मांय देखै-परखै अर आपरै ढंग-ढाळै परोटै। ‘फूल’ कविता री बानगी बांचण जोग है- ‘नित लगावूं / खुद रै घर-आंगणै / अेक नुंवै फूल री बेल / जिण सूं थूं रैय सकै / म्हारै पाखती / किणी पण रूप मांय।’

ओळूं री अंवेर इण संग्रै ‘घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं’ रो मूळ सुर कथीज सकै। कवि आपरै जीवण री खटमीठी ओळूं-गांठड़ी नैं घणी सुथराई सूं आं कवितावां मांय राखै। असल मांय कोई कवि-मन ओळूं सूं अळघो रैय ई नीं सकै। कवि सारू तो ओळूं रचाव री प्रेरणा बणै। चोखो-माड़ो भुगतेड़ो बगत ओळूं रै मिस कवितावां मांय सरजीवण हुय जावै, जिणरो पाठ कविता बांचणियां नैं ई नवो अनुभव सूंपै। आं कवितावां री अनुगूंज लांबै बगत तांई आपां रै मन-मगज मांय बणी रैवै। ‘दिल रै खुणै मांय / अंधारै रै ओलै बैठी / कीं ओळूं / चाणचकै ही / हुय जावै आम्हीं-साम्हीं / अर मन रै अंधारै सूं / निकळ’र बैठ जावै / जियां साम्हीं आरसी मांय।’ (अंधारै रै ओलै बैठी ओळूं)

अेक संवेदनशील कवि लुगाई जात री जूझ नै कींकर बिसरा सकै। असल में लुगाई री आखी जूण ई जगती रै फूटरापै अर भलै सारू अरपण हुवती रैवै। घर-गवाड़ी री धुरी लुगाई टाळ भळै दूजो कुण हुवै? मा, जोड़ायत, बैन-बेटी जैड़ै न्यारै-न्यारै रूपां मांय लुगाई परिवार सारू आपरो आखी जूण होम देवै। आखै दिन खटतां थकां ई बा सदीव मुळकती रैवै अर ओळमो देवण सारू जबान कोनी खोलै। ‘पैंताळीस पार री लुगायां’ कविता मांय कवि लुगाई जात री जूझ नै इण आखरां मांडै- ‘टाबर जणै / टाबर पाळै / खुद री इंछावां नैं / आगीनै न्हाखै / अस्टपौर खटती रैवै / सगळा नैं संजोरा बणावण मांय।’

जे कोई इण धरती माथै भगवान सोधणा चावै तो मा रै रूप मांय मिलैला। मा री ओळूं नैं अंवेरती केई कवितावां इण पोथी मांय सामल करीजी है जिकी सीधी अंतस मांय बस जावै। ‘म्हारै घरै / अजेस ई है / सबद-कोस / जिण नैं म्हारी मा मोलायो।’ (सबद-कोस) अर ‘मा री फोटू / अबै पूजाघर मांय है- / अर ओळूं-आरसी माथै / छप्योड़ी / ठाह नीं कितरा चितराम / चेतना मांय अर / अबै चेतना मांय / बा रैवै सदीव।’ (मा रो रूप) जैड़ी ओळ्यां दाखलै रूप देख सकां।

कवि प्रीत रै रंगा नैं केई रूपां मांय ढाळै। त्याग अर समर्पण सूं आं रंगां री ओपमा केई गुणा बध जावै। अठै फगत देह रै भूगोल रो बखाण कोनी, आतमा रो उजास है, जिण नैं चावतां ई कोनी बिसरा सकां। संग्रै री सिरैनांव कविता ‘घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं’ री बानगी सबळी-सांतरी है- ‘जद कद ई थूं / दिनूंगै री ताजगी मांय / करैला फिरा-घिरी / किणी घास रै मैदान मांय / तद बण’र ओस रो टोपो / चिप जासूं / थारै पगां रै / अर थूं मैसूस करैला / खुद रै डील मांय झुरझुरी दांई।’ कैवण री दरकार कोनी कै अैड़ी कविता रै आत्मीय पाठ सूं बांचणियां रै मन मांय ई झुरझुरी हुयां बिना कोनी रैवै। कविता रै नांव माथै नारां अर मोटा-मोटा बोलां रै हाकै बिचाळै अैड़ो अपणायत सूं हबोळा लेवतो सुर जीव नै थावस देवै।

नामी कवि अर आलोचक सागै डॉ. नीरज दइया अेक संजोरै अनुवादक री ओळखाण ई लारलै बीस बरसां सूं लगोलग करावतां रैया है। अमृता प्रीतम री पंजाबी काव्य-कृति ‘कागद अर कैनवास’ (2000), निर्मल वर्मा रै हिंदी कहाणी संग्रै ‘कागला अर काळो पाणी’ (2002) मोहन आलोक रै कविता-संग्रै रो हिंदी अनुवाद ‘ग-गीत’ (2004) पछै चौबीस भारतीय भासावां री कवितावां ‘सबद-नाद’ (2012) आपरै जस नैं बधावै। भोलाभाई पटेल रै गुजराती यात्रा-वृत ‘देवां री घाटी’ (2013), डॉ. नन्दकिशोर आचार्य री टाळवी कवितावां ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ (2016) अर सुधीर सक्सेना री टाळवी कवितावां रो राजस्थानी अनुसिरजण ‘अजेस ई रातो है अगूण’ (2016) जैड़ी पोथ्यां डॉ. नीरज दइया रै अनुवाद कारज रा लाखीणा मोती है। आप भारतीय भासावां री रचनावां री सौरम नैं जठै मायड़ भासा मांय लावण रो जसजोग जतन करियो बठै ई राजस्थानी री रचनवां नैं हिंदी मांय लेय जावण पेटै कारज ई सरावणजोग कैया जावैला।

‘घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं’ पोथी री कवितावां नैं बांचता थकां भळै आ बात पुखता हुवै कै अेक कवि ई कवितावां रै अनुवाद मांय न्याव कर सकै। कविता री ऊंडी समझ अर भासा माथै सबळी पकड़ रै कारण अै कवितावां सांचाणी मूळ कवितावां जिसो आनंद देवै। डॉ. संजीव कुमार री कवितावां अनुसिरजण रै मारफत राजस्थानी मांय आवणो किणी खिड़की सूं उजास रै आवण जिसो है। इण खेचळ सारू कवि डॉ. संजीव कुमार अर अनुसिरजक डॉ. नीरज दइया नै घणा रंग।

-डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
madanrajasthani@gmail. com

घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं

GHIR GHIR CHETE AAUVLA MEN Dr Neeraj Daiya

घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं (2018) डॉ. संजीव कुमार री टाळवीं कवितावां / संचै-अनुसिरजण : नीरज दइया / प्रकाशक : ज्योति प्रकाशन, बीकानेर / पाना : 96 / कीमत : 150/-
BOOK Pdf  Ghir Ghir Chetai Avoonla Mhain

फ्लैप : डॉ. मंगत बादल

Mangat Badalअनुवाद विग्यान रै साथै अेक कला भी है। इण सारू अनुवादक री दोनूं भासावां माथै गैरी पकड़ होवणी लाजमी मानीजै। अनुवाद फगत सबदां रो नीं विसय-वस्तु री आतमा रो हुया करै। अनुवादक नै मूळ री गैराई में उतरनै उण री आतमा मांय पैठ’र जायजो लेवणो हुवै, जद ई खरोखरी कोई अनुवाद सफळ हुवै। कवि संजीव कुमार री हिंदी कवितावां री पोथ्यां सूं आं टाळवीं कवितावां रो ‘घिर घिर चेतै आवूंला म्हैं’ सिरैनांव सूं अनुवाद करता थकां डॉ. नीरज दइया आं कवितावां री आतमा तांई ऊंडा पूग्या है। डॉ. नीरज दइया कवि री कवितावां रै मारफत उण री आतमा मांय उतर’र उणां रै भावां नै राजस्थानी सबद दिया अर वां री निजू लकब सूं अै कवितावां खास बणगी है। केई बार अनुवादक जाणकारी रै अभाव मांय मूळ भासा रै सबद रो प्रयोग कर लेवै। इण सूं पाठक साथै जाड़ हेठै आयोड़ै कांकरै सरीखी हुवै। अनुवादक डॉ. नीरज दइया इण बात रो बरोबर ध्यान राख्यो है कै कवितावां साथै पूरो न्याव हुवै, ओई’ज कारण है कै अै कवितावां अनूदित नीं लाग’र मूळ राजस्थानी सरीखी लागै। आ इण अनुवाद री खासियत है। इण सारू घणा-घणा रंग।
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० भूमिका :डॉ. मदन गोपाल लढ़ा