पोथी परख / मोहन थानवी / दैनिक युगपक्ष 26-03-19

Neeraj Daiyaराजस्थानी कथा-यात्रा को उत्तर आधुनिक मार्ग पर अग्रसर कर रही प्रतिनिधि कहानियों का खजाना / मोहन थानवी
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आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन के साथ-साथ हिंदी-राजस्थानी के मध्य सेतु के रूप में साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त डॉ नीरज दइया का नाम ही उनका परिचय है। डॉ दइया को अब क्षेत्रीय भाषाओं के कथा-साहित्य जगत में संकलन, संपादन और अनुवाद का एक ऐसा कोष देने के लिए पहचाना जाएगा जिसका नाम 101 राजस्थानी कहानियां है। राजस्थानी भाषा साहित्य प्राचीन विपुल निधि के लिए तो अपना कोई सानी नहीं रखता साथ ही तुलनात्मक व विवेचनात्मक दृष्टिकोण से आधुनिक साहित्य के हेतु भी किसी भी क्षेत्रीय भाषा साहित्य से कमतर नहीं है। अब राजस्थानी कहानियों की ऐसी विवेचना में इसे उत्तर आधुनिक साहित्य के प्रति भी निसंकोच किसी से पीछे नहीं, आगे ही कहा जाएगा। ऐसी धारणा व्यक्त करने के कारणों में से एक मुख्य कारण है 101 राजस्थानी कहानियां संग्रह। संग्रह में जहां दशकों पहले लिखी गई और माइलस्टोन सिद्ध हुई कहानियां संकलित हैं, वहीं 21वीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम सौपान के चलते लिखी जा रही कहानियों का प्रतिनिधित्व करती राजस्थानी कथा-यात्रा को उत्तर आधुनिक मार्ग पर अग्रसर कर रही कहानियां शामिल की गई हैं। इस संग्रह की कहानियों का संकलन एवं संपादन डॉ नीरज दइया ने किया है । सभी कहानियां अपने में अनेक विशेषताएं रखती हैं। इस संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि निर्बाध रूप से केवल कहानी को ही प्रस्तुत किया गया है । कहानीकार और कथा-सार या कथा-विषय के प्रति डॉक्टर दइया ने 20 से अधिक पृष्ठीय संपादकीय में अपने पूरे अध्ययन को सार संक्षेप में प्रस्तुत करने का एक नवाचार भी रखा है। हालांकि ऐसा नवाचार पूर्व में संकलित रचनाओं के संग्रहों में किया जा चुका है किंतु यहां नवाचार इस मायने महत्ता रखता है कि डॉ दइया ने अपनी लेखनी के जादूभरे आलेख में भाषाई कहानियों के इतिहास के साथ-साथ विहंगम दृष्टिपात हिंदी की मुख्य धारा के कथा साहित्य पर भी किया है।
संग्रह की कहानियों की शुरुआत ही केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अतुल कनक की “काचू की साइकिल” कहानी से की गई है। अतुल कनक एक लोहनिर्मित और रबड़-टायर चालित साइकिल में प्राण प्रतिष्ठा करने में तो सफल हुए ही हैं साथ ही उसकी संवेदनाओं के ज्वार में भीगी मन की बात को अपनी कलम से कागज पर उकेर लाए हैं। ऐसा ही आलम अतुल कनक की मूल राजस्थानी रचना पर छाया हुआ है। ऐसी ही प्रवृत्ति और मनोरंगों को देखने वाली आंख और श्रवण करते कर्ण छिद्रों से गहरे तक उतार देने वाली दिखने छोटी मगर गंभीर घाव कर देने वाली निशांत की कहानी है – “अखबार की चोरी”। पात्र इस कहानी को स्वयं बता रहा है । वह यात्रा कर रहा है और सहयात्री के पास मौजूद एक अखबार में अपनी फोटो छपी देख कर अखबार के पन्ने को घर ले जाने के लिए छुपा लेता है । सहयात्री अखबार के उसी पन्ने को किसी और खबर के कारण सहेज कर घर ले जाना चाहता है । वह पन्ना ना मिलने पर ढूंढता है । इसी घटना पर पाठक रोचकता से, उत्सुकता से लबरेज हो कहानी को पढ़ रहा है। अंततः पात्र स्वयं यह स्वीकारता है कि अखबार की चोरी करने का उसे पछतावा तो है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती बल्कि पाठकों को एक द्वंद्व से निकलने को मनन मंथन के लिए नई कहानियों को जन्म देती है। संग्रह की सभी 101 कहानियों पर सम्मति प्रकट की जाए तो इस 504 पृष्ठीय संग्रह से अधिक पृष्ठों का एक और ग्रंथ का सृजन हो जाएगा। कहानियों को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को पात्रों का अंतरंग मित्र अनुभूत करता है। पाठक को ऐसा पूरा एक संसार मिलता है जो उसे अपना-सा लगता है। इस संसार की नजीर देती ऐसी कहानियों में राजस्थानी ग्रामीण अंचल को पाठक के समक्ष जीवंत उपस्थित कर देने वाले अन्नाराम सुदामा की कहानी “सूझती दीठ”, भोगे हुए यथार्थ को दृश्य दर दृश्य अनुभूत करवा देने में महारत हासिल कन्हैयालाल भाटी की कहानी “छलावा”, पात्रों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को कथा में सूक्ष्मता से पिरो कर पाठक को मनन-मंथन करने की ओर अग्रसर कर देने वाली रचनाओं के रचयिता चंद्र प्रकाश देवल की कहानी “कोड़ा”, परंपराओं और आधुनिक परिवेश में अंतर को रेखांकित करते अपनी जड़ों से जकड़े रहने का संदेश देने वाले जनकराज पारीक की कहानी “नाम” इत्यादि कहांनियों का संगम है – 101 राजस्थानी कहानियां संग्रह । ओम प्रकाश भाटिया की कहानी “हाथ से निकला सुख” का आरंभ और शीर्षक पाठक को जो आभास देता है उससे ठीक उलट कहानी का विराम-स्थल है, जहां से इस दौर में जीवन की आपाधापी में मां-बाप से दूर जाते बच्चों को रोकने की पुकार सुनाई देती है तो साथ ही अनजान सेवक-चाकरों के प्रति अविश्वास पनपने हेतु घटित घटनाओं की गूंज भी पाठक को सचेत करती है। संग्रह की एक कहानी है, “आसान नहीं है रास्ता”। नंद भारद्वाज ने इस कहानी में अपनी शैली से कई रंग भर दिए हैं। पात्रों की मनोस्थिति को सांकेतिक संवादों से उकेरने की कला को नवांकुरों द्वारा सीखने का प्रयास नंद भारद्वाज की इस कहानी से किया जा सकता है। नजीर देखिए – ‘आपको गांव में आते ही यह बधाई किसने दे दी कि मैं किसी अनचाहे विवाद में उलझ गई हूं’ ।
साथ ही जेबा रशीद, दुलाराम सहारण, देवकिशन राजपुरोहित, देवदास रांकावत, नानूराम संस्कर्ता, बी.एल. माली अशांत, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मंगत बादल, डॉ. मदन केवलिया, मदन गोपाल लढ़ा, मदन सैनी, मालचंद तिवाड़ी, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, राजेश कुमार व्यास, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, रामस्वरूप किसान, विजय दान देथा, श्रीलाल जोशी, श्रीलाल नथमल जोशी, सांवर दइया, सावित्री चौधरी ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनकी कहानियों का जादू सिर पर चढ़कर बोलता है। राजस्थानी की ऐसी 101 कहानियां संकलित कर उनका अनुवाद पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक डॉ नीरज दइया ने उपलब्ध करवाया है । डॉ नीरज दइया का यह सृजन हिंदी-राजस्थानी ही नहीं वरन् तमाम भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य जगत में मील का पत्थर सिद्ध होने जा रहा है। क्योंकि डॉ दइया राज्याश्रित निकायों अथवा पूंजीपतियों के शगल स्वरूप पनपी निजी साहित्यिक संस्थाओं के मुकाबले स्व-इकाई होते हुए भी बेमिसाल नजीर के स्वरूप में इस संकलन के संपादक के रूप में अध्ययन-लेखन-परिश्रम के परिचायक एक कालजयी-सृजन को समकालीन-साहित्यिक जगत के पटल पर प्रतिष्ठित करने में सफलता अर्जित कर चुके हैं। यह सृजन इसलिए भी श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है कि संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष कर रही राजस्थानी भाषा की कहानियों की वृहद निधि में से प्रतिनिधि कहानियों का चयन करना आसान कार्य नहीं है। इस पर और भी अधिक महती कार्य यह कि इस चयनित-संकलित भंडार को अनूदित करने-करवाने का दायित्व भी डॉ. दइया ने बखूबी निर्वहन किया है। डॉ. नीरज दइया को साधुवाद । यह ठीक है कि ये सम्मति मुझ अल्पज्ञानी की है मगर यह भी विश्वास है कि निजी प्रयासों से क्षेत्रीय भाषा कथा-साहित्य जगत में संकलन, संपादन और अनुवाद का ऐसा कोष एकमेव है। मायड़ भाषा मान्यता के संघर्ष को इससे बल मिलेगा।
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पुस्तक एक नजर में-
पुस्तक का नाम : 101 राजस्थानी कहानियां (कहानी-संग्रह) संपादक- डॉ. नीरज दइया ; प्रथम संस्करण : 2019; पृष्ठ : 504 ; मूल्य-1100/-
प्रकाशक :के. एल. पचौरी प्रकाशन, डी-8, इन्द्रापुरी, लोनी, गाजियाबाद

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बंतळ / डॉ. नीरज दइया सूं डॉ. नमामीशंकर आचार्य

साहित्य अकादेमी नवी दिल्ली सूं सम्मानित कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया सूं हथाई

आलोचना में ‘हासलपाई’ चालै कोनी : डॉ. नीरज दइया

डॉ. नमामीशंकर आचार्य

Neeraj Daiya se batchit Dr Namami Shankar-1
(22 सितम्बर, 1968 नै चावा-ठावा साहित्यकार सांवर दइया रै आंगणै जल्मिया डॉ. नीरज दइया एम.ए. (हिंदी-राजस्थानी), बी.एड. कर’र ‘निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध’ विषय माथै पीएच.डी. करी। राजस्थानी में लघुकथा संग्रै- भोर सूं आथण तांई, काव्य-संग्रै- साख, देसूंटो, पाछो कुण आसी, बाल-कथावां- जादू रो पेन, समालोचना- आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई रै अलावा अनुवाद- कागद अर कैनवास, कागला अर काळो पाणी, सबद नाद, देवां री घाटी, ऊंडै अंधारै कठैई, अजेस ई रातो है अगूण आद प्रकाशित। आप मोहन आलोक, कन्हैयालाल भाटी अर देवकिशन राजपुरोहित री कहाणियां रो संचै-संपादन ई करियो तो राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर खातर युवा कवियां रो कविता संकलन मंडाण रो ई संपादन करियो। हिंदी में ई आपरी केई पोथ्यां छप्योड़ी है। आपनै साहित्य अकादेमी नई दिल्ली रो बाल साहित्य पुरस्कार बरस 2014 में अर ‘बिना हासलपाई’ खातर 2017 रो मुख्य पुरस्कार टाळ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी बीकानेर सूं बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार 2005 समेत केई मान-सम्मान अर पुरस्कार मिल्योड़ा।)
 

  • ‘जादू रो पेन’ माथै साहित्य अकादेमी रो बाल साहित्य पुरस्कार मिल्यो अर अबै ‘बिना हासलपाई’ माथै मुख्य पुरस्कार री घोषणा सूं कियां लाग रैयो है?
  • पुरस्कार किण नै आछो नीं लागै। म्हनै चोखो लाग रैयो है पण म्हैं घणै अचूंभै मांय हूं कै ओ इयां कियां हुयो? साहित्य अकादेमी रा भाषा संयोजक डॉ. अर्जुनदेव चारण अर निर्णायकां रो गुण मानूं कै बां बिना किणी आस-उम्मीद रै आ घोषणा कर’र पोथी रो सम्मान करियो। बीकानेर मांय मधु आचार्य ‘आशावादी’ अर बुलाकी शर्मा पछै म्हारै नांव ओ पुरस्कार लिखणो मोटी बात है अर इण बात सूं साफ हुवै कै अकादेमी री निजर फगत पोथी माथै रैया करै।
  • कांई ‘विना हासलपाई’ माथै साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै आप एक आलोचकीय दीठ सूं खरो फैसलो मानो?
  • लेखकां मांय घणी बार इयां हुया करै कै कोई पुरस्कार खुद नै मिलै तद बो खरो लखावै अर दूजै नै मिल्यां खोटो। दौड़ मांय दौड़ै तो सगळा ई है पण जीत हरेक री नीं हुय सकै। जियां कै म्हैं आपनै बतायो कै म्हनै घणो अचूंभो हुयो…. इण घोषणा री म्हनै का म्हारै किणी संगी-साथी नै खबर नीं ही। म्हारी आलोचकीय दीठ जे उण नै आप स्वीकारो तो ओ फैसलो फगत इत्तो है कै निर्णयाकां री निजर मांय बरस 2011 सूं 2015 तांई छपी पोथ्यां मांय ‘बिना हासलपाई’ पोथी बां नै सिरै लखावै है। आ पोथी तो पैली ही जिसी ई अबै है, पण अबै देखण-परखण रै नजरियै मांय फरक पड़ैला। बात बस इत्ती है कै जिका पोथी बांची कोनी का सरसरी बांची बै अबै सावळ बांचैला।
  • आपरै जीवण रा बै किसा खिण रैया जिका आपनै साहित्य-रचाव कानी लेयग्या?
  • म्हनै ठाह ई नीं लाग्यो कै कद ओ मारग म्हनै झाल लियो। बाळपणै मांय म्हैं म्हारै जीसा सांवर दइया नै नोखा मांय रावत सारस्वत चलाई जिकी राजस्थानी परीक्षावां करावतां देख्या, तद म्हैं ई बां परीक्षावां मांय बैठ्यो। घर घणी पोथ्यां ही अर जीसा नै लिखतो देख्या करतो हो। एक दिन बाबा छोटूनाथ स्कूल रै प्रार्थना सभा कार्यक्रम मांय राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी रै पुरस्कार मिलण री घोषणा हुई तद म्हनै लखायो कै लेखन घणो लूंठो काम हुया करै। म्हैं बां दिनां कवितावां लिखी, जिकी अबै चेतै कोनी। फेर जद 1985 में जीसा नै ‘एक दुनिया म्हारी’ माथै साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल्यो तद बाबै रा बेटा म्हारा भाई ‘बालराही’ नांव री पत्रिका काढी अर उण मांय म्हारी कविता प्रकाशित करी। फेर तो म्हैं युगपक्ष, मरवण, जागती जोत अर माणक आद केई पत्र-पत्रिकावां मांय छपण लाग्यो अर आकाशवाणी रै युववाणी मांय कविता-कहाणियां ई बांचण लागग्यो हो।
  • आपरी साहित्य-जातरा माथै आपनै किण रो प्रभाव लखावै?
  • जीसा सांवर दइया अर बां रै समकालीन केई लेखकां रो प्रभाव म्हैं मानूं। बाळपणै मांय म्हैं हरदर्शन सहगल अर महेशचंद्र जोशी आद नै जीसा सूं चुन्नीलालजी री होटल माथै मिलता देख्या करतो हो। सहगल साहब नै म्हैं साईकिल साब कैया करतो हो अर बां कोई बाल पोथी ई टाबरपणै मांय म्हनै भेंट करी तो महेशचंद्र जोशी म्हनै ‘मोम का घोड़ा’ उपन्यास बाळपणै मांय म्हनैं अर म्हारै भाई नै नांव लिख’र भेंट करियो हो। म्हारै घर मांय लगैटगै सगळा लेखकां री पोथ्यां ही जिण मांय सूं केई पोथ्यां म्हैं बांची। रूसी साहित्य अर हिंदी साहित्य तो हो ई राजस्थानी साहित्य मांय हरावळ, हेलो, राष्ट्रपूजा, ओळमो आद केई पत्रिकावां अर लेखकां सूं म्हैं साहित्य नै देखण-समझण री कोसीस करी जिकी आजैलग पोळा राखी है।
  • आप लगैटगै सगळी विधावां मांय रचाव करियो पण फेर ई आपरी पिछाण एक आलोचक री रैयी है। इणरो कांई कारण है?
  • पिछाण तो आंख मांय हुया करै। जे आपरी आंख आगूंच म्हनै आलोचक रूप देखणी चावै तो म्हैं आपनै आलोचक रूप ई दिखूंला। बियां म्हैं जित्ती ई विधावां मांय काम करियो है मन सूं करियो है। आलोचक बेसी मानीजण रो कारण स्यात ओ हुय सकै कै इण विधा मांय काम कमती हुयो है।
  • आपरो झुकाव आलोचना कानी बेसी क्यूं रैयो?
  • आलोचना लिखणो हरेक रै बस री बात कोनी हुया करै। आलोचक री आपरी दीठ हुया करै। किणी रचना रो सार बतावणो का गुण गावणा आलोचना नीं मानीजै। आलोचना रै नांव माथै अपाणै अठै खींचताण ई हुवती म्हैं देखी है। म्हनै लखावै कै आलोचना मांय जिकी धीजो अर नेठाव दोनूं कानी हुवणो चाइजै उण री आपां रै अठै कमी रैयी है। आलोचना छाती रो काम है। घणा घमीड़ा सैवणा पड़ै। लेखकां री नाराजगी आलोचकां सूं बेगी हुवै। फेर ई कोई नै तो ऐ काम करणा ई पड़ैला। आप इयां जाणै कै म्हैं आ हिम्मत करी अर अबै साहित्य अकादेमी इण हिम्मत नै बधा रैयी है।
  • ‘बिना हासलपाई’ में आप माथै आरोप लागै कै आप आपरा चावा कहाणीकारां नै ई लिया हो?
  • राजस्थानी रा सगळा कहाणीकार म्हारा चावा है। म्हैं आलोचना लिखती वेळा खुद म्हारै जीसा नै ई फगत एक कहाणीकार रूप देखणो-परखणो चावूं तद दूजा री बात तो छोड़ ई दो। ‘बिना हासलपाई’ मांय आधुनिक राजस्थानी कहाणी रै विगसाव नै पच्चीस खास कहाणीकारां रै दाखलै सूं देखण-परखण री कोसीस करीजी है। इण रो ओ अरथाव कोनी कै बाकी रा कहाणीकार चावा कोनी। म्हैं कैवणो चावूं कै आप साधन नै देख रैयो है, जद कै आपनै साध्य नै देखण री जरूरत है।
  • बिना हासलपाई रै आलेखां रा शीर्षक कहाणीकारां री लूंठी रचनावां नै आधार राखता बणावण री बात किण ढाळै सोच मांय आई?
  • ओ कोई आगूंच सोचा-विचारी को काम नीं हो। इण पोथी रो असल रूप मानीता नंद भारद्वाज सूं बंतळ करता साफ हुयो। बां इण पोथी माथै फ्लैप ई लिख्यो। बिना हासलपाई मांय बां कहाणीकारां नै सामिल करण रो जतन बेसी करीज्यो जिणां री चरचा कीं कमती हुई ही। उण बगत म्हारै ध्यान मांय राजस्थानी आलोचना रो बो पख ई रैयो कै जिण रै कारण केई कहाणीकारां रो बगतसर मूल्यांकन कोनी करीज्यो हो। टैमसर आलोचना नीं हुयां लेखन-जातरा तर तर मोळी पड़ती जावै। आलोचना नै टैमसर नवी रचनावां रो वाजिब तोल-मोल अर कूंत करणो चाइजै। आलोचना सूं रचनाकार अर रचना नै पुखता मारग मिलै। हुयै काम अर नवी दीठ री बगतसर गिनार जरूरी है।
  • कांई कारण है कै आज री कहाण्यां बातपोसी अर कथात्मकता सूं अळधी हुवती जाय रैयी है?
  • बातपोसी लोककथावां मांय जिण ढाळै मिलै बो एक जुग हो जिको इतिहास री बात है। कहाणी मांय कथात्मक स्तर माथै प्रयोग हुवतां रैया है। आप भंवरलाल ‘भ्रमर’ री बातां नै देखो जिकी बरसां पैली लिखी पण चरचा मांय ‘उकरास’ रै मारफत आई। जूनी लोककथावां दांई राजा अर मैल-माळिया तो आज री कहाणी मांय कोनी मिलै पण बगत परवाण लोक रो बदळतो रूप आपां देख सकां। हरेक नवी कहाणी आपरी नवी कथात्मकता रै साथै आवणी चाइजै।
  • आपनै बालकथावां री पोथी माथै साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल्यो अर उण पछै कोई बाल साहित्य री रचना कोनी आई, कांई अबै इण पुरस्कार पछै आलोचना लिखणी बंद समझां?
  • बाल कहाणियां म्हैं बरसां पैली लिख्या करतो हो। माणक मांय केई बाल कहाणियां प्रकाशित हुई। ‘जादू रो पैन’ पोथी प्रकाशित हुवण मांय प्रकाशक घणो टैम लियो। मानूं कै बाल साहित्य पेटै काम हुवणो चाइजै अर म्हैं काम करूंला ई पण देखो कद हुवै। किणी री फरमाइस सूं नीं लिख सकूं। म्हनै म्हारै कविता संग्रै ‘साख’ री कविता चेतै आवै- ‘कसमसीजतो-कसमसीजतो सीझ परो / फगत लिखूं कीं ओळ्यां / अर मुगती पाऊं / उमर री पीड़ सूं / काढूं कांटा डील सूं / अर उण पीड़ पाछलै / सुख नै / जद जद भोगूं / लोग कैवै- / लिखी है कविता।’ पुरस्कार पछै आलोचना लिखणी बंद मत समझो, म्हैं बाल साहित्य अर आलोचना दोनूं पेटै घणो कीं करण री मन मांय राखूं।
  • आप आलोचना रो विषय पोथी मांय फगत कहाणियां क्यूं राख्यो, दूजी विधावां ई घणी है नीं?
  • ‘बिना हासलपाई’ सूं पैली जिकी पोथी ‘आलोचन रै आंगणै’ साम्हीं आई उण मांय केई विधावां वाबत काम है। म्हैं आलोचना बरसां सूं मांडतो रैयो अर उण मांय सूं की टाळवां आलेख पैली पोथी मांय हा। म्हारो मानणो है कै हरेक विधा माथै न्यारी न्यारी आलोचना पोथी हुया ई बात बणैला। भेळ-सेळ अठीनै-बठीनै लिख्योड़ा आलेख भेळा कर’र पोथी रूप राखणा बियां तो ठीक है पण उण सूं बेसी मेहतावू काम विधागत करिया ई हुवैला।
  • राजस्थानी कहाणी री अबार री दसा-दिसा बाबत आपरो कांई कैवणो है?
  • आप डॉ. अर्जुनदेव चारण अर म्हारी कहाणी-आलोचना री पोथी बांच’र अबार तांई री कहाणी री दसा-दिसा बाबत कर जाणकारी लेय सको। जे एक ओळी मांय बात कैवणी हुवै तो कैयो जाय सकै कै कहाणी पेटै खासा ढंगसर काम हुयो है।
  • क्यूं आज ई राजस्थानी कहाणी दूजी भारतीय भाषावां साम्हीं टिकती कोनी लखावै?
  • राजस्थानी कहाणी रै टिकण अर नीं टिकण रो आपरो आधार कांई है? जे राजस्थानी कहाणी नै बीजी भारतीय भाषावां री कहाणी सूं आप तुलनात्मक रूप सूं देखोला तो ठाह लागैला कै आपणी कहाणियां खासा दमदार है। इण बात डॉ. कृष्णा जाखड़ री पोथी ‘नापीजतौ आभौ’ ई पुखता करै। आप माणक अर दूजी पत्रिकावां मांय भारतीय भाषावां सूं अनूदित छप्योड़ी कहाणियां देखो-बांचो। राजस्थानी नवी कविता री इणी ढाळै री परख खातर म्हैं ‘सबद-नाद’ पोथी मांय भारतीय कवितावां रो राजस्थानी अनुवाद करियो हो।
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा पेटै आपरा कांई विचार है?
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा अबै आपरै ठावै मुकाम माथै है। उपन्यास री बात करां तद आपां नै ओ ई विचार करणो चाइजै कै राजस्थानी मान्यता अर प्रकाशन रै संकट बिचाळै इण विधा मांय करणो घणो अबखो है। फेर ई लखदाद है उपन्यासकारां री छाती नै बां खासो काम करियो है।
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा आलोचना पेटै आप कांई कर रैया हो?
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा पेटै आलोचना पोथी ‘आंगळी-सीध’ बेगी ई आप बांच सकोला।
  • थे आलोचक रूप कथा विधा रै मरम नै ओळखो तद खुद कहाणियां का उपन्यास लेखन क्यूं नीं करियो?
  • किणी साग रो स्वाद बतावणो अर साग बणावणो दोनूं जुदा बातां है। फेर पाक कला दांई लेखन मांय किणी सूत्र का फार्मूला सूं कोई सफल रचना लिखीजती हुवती तो कमी ई किण बात री ही। आपनै बता देवूं कै म्हैं केई कहाणियां ई लिखी अर ‘फफूंदी’ नांव सूं कहाणी माणक मांय बरसां पैली जद म्हैं डूंगर कॉलेज में पढ़तो हो तद छपी। कहाणियां रो संग्रै नीं आयो पण लघुकथा संग्रै छप्यो। म्हैं कहाणी लेखन मांय लगोलग नीं रैय सक्यो। मन री तो बात आ है कै उपन्यास लिखण री ई जीव मांय घणी बार आवै। एक’र लिखणो चालू ई करियो पण कीं पानां पछै बो अटकग्यो।
  • कैयो जावै कै आलोचना रै काम मांय ओळमा बेसी शाबासी कमती मिलै, आपरो कांई मानणो है?
  • आलोचना में ‘हासलपाई’ चालै कोनी। म्हैं किणी रै ओळमै का शावासी री परवाह कोनी करूं। म्हनै जिकी बात ठीक लागै म्हैं उण नै लिखण रो प्रयास करूं। किणी रचना री खोज-खबर लेवतां आलोचना नै ई रचना रूप थापित करण रो म्हैं हिमायती हूं।
  • कांई आपनै नीं लागै कै आपरो आलोचक रूप आपरै कवि रूप नै खायग्यो है?
  • अलोचक हुवण सूं म्हारै कवि रो कवळास जरूर कीं कमती हुयो है। कविता मांय जिकी अबोट दीठ हुया करै उण माथै जांचण-परखण रा सवाल बधग्या है। आलोचक रूप कवि नै खायग्यो आ बात कोनी मानूं पण हां आ कैय सकां कै म्हारै कवि री भावुकता कमती हुयगी।
  • आप मौलिक लेखन साथै अनुवाद ई करता रैवो, इण रो कांई कारण है? इयां तो नीं कै जद मूळ नीं लिखीजै तद अनुवाद करिया करो हो?
  • मूळ लेखन साथै अनुवाद ई जरूरी है। अनुवाद रै पाण आपां दोय भाषावां बिचाळै पुळ बणावां बो लेखन अर दीठ नै मजबूत करै। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना आद नै राजस्थानी मांय लावण सूं म्हारै लेखक-आलोचक नै नवी दीठ मिली। भासा अर भावां री बारीकी नै आपां अनुवाद सूं ई सीख सकां। म्हारै खातर अनुवाद असल मांय अनुसिरजण है, जिण मांय सिरजण पछै रो एक दूजो सिरजण ई सुख देवणियो है। जियां नाटक मांय आपां अभिनय करां ठीक बियां ई अनुसिरजण मांय उण मूळ सिरजण-सुख नै भोगण रो जतन करा।
  • आलोचक रूप आप आपरै अनुवाद मांय सगळा सूं चावी अर मेहतावूं पोथी किसी मानो?
  • आलोचक रूप राजस्थानी मांय म्हैं म्हारै अर बीजा रै सगळै काम नै मेहतावूं मानूं। इण मांय बात उगणीस-इक्कीस री हुय सकै। कोई काम मन सूं करियोड़ो है तो उण नै कमती नीं समझणो चाइजै। फेर ई म्हारो मानणो है कै कविता पेटै ‘सबद-नाद’, ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ अर ‘अजेस ई रातो है अगूंण’ म्हारी महतावूं पोथ्यां है जिण री परख हुवणी चाइजै। डॉ. नंदकिशोर आचार्य अर सुधीर सक्सेना री टाळवीं कवितावां रो अनुसिरजण करियो उण मांय नंदकिशोर जी तो पूरी राजस्थानी जाणै-समझै, छप्यां पैली बां अनुसिरजण नै आंख्यां मांय सूं काढ’र पास कर दियो तद म्हैं समझूं राजस्थानी कविता पेटै बा पोथी मेहतावूं हुयगी है। बाकी पोथ्यां ई कम मेहतावूं कोनी।
  • केई कहाणीकारां री कहाणियां रो संचै-संपादन री योजना कियां बणी?
  • आधुनिक रास्थानी कहाणी विकास जातरा देखता म्हनै लखायो कै कहाणीकार मोहन आलोक रो संग्रै नीं आयां बै फगत कवि रूप ई ओळखीज रैया है, इणी ढाळै कन्हैयालाल भाटी अनुवाद रूप ई जाणीज रैया है। मोहन आलोक री कहाणियां अर पछै कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां पोथ्यां प्रकाशित हुयां आं दोनूं रै बिसर चुक्यै कहाणीकार नै आलोचना चेतै करियो। देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां रो संचै ई लारलै बरस साम्हीं आयो है। भळै ई केई काम करण री जीव मांय है। कैवण नै तो कैय दूं कै ‘सांवर दइया री टाळवीं कहाणियां’ कर रैयो हूं पण कोई काम प्रकाशित हुयां ई उण पेटै चरचा करणी चाइजै। केई बातां मन मांय है, पूरी हुयां देखो।
  • ‘मंडाण’ अर ‘जागती जोत’ रै संपादन रा आपरा अनुभव कांई रैया?
  • ‘मंडाण’ रै मारफत राजस्थानी मांय पैली बार 55 युवा कवियां री कवितावां री ओळख करीजी। अकादमी नै घणा घणा रंग कै बा म्हनै ओ मौको दियो। जागती जोत रो ई लगैटगै साल खंड संपादन करियो अर म्हारो मानणो है कै संपादन रो काम घणो बगत मांगै। फगत आयोड़ी रचनावां नै भेळी कर’र छापण नै देवणो संपादन नीं हुवै। संपादक री जिम्मेदारी केई केई मोरचा माथै हुवणी चाइजै।
  • आप एक पत्रिका ई काढ़ी- ‘नेगचार’। बा बंद क्यूं हुयगी?
  • ‘नेगचार’ पत्रिका रा तीन अंक निकाळ्या हा। फेर राज री नौकरी मांय अठी-उठी हुयग्यो। पत्रिका निकाळण रा पुखता साधन अर टीम हुयां ई ओ काम पार पड़ै।
  • राजस्थानी मांय नवा लिखारा कमती देखण नै मिलै का कैवा कै युवा वर्ग साहित्य सूं अळगा हुवतो जाय रैयो है? इणरो कारण आप कांई मानो?
  • मोटो कारण रोजगार सूं राजस्थानी जुड़्योड़ी कोनी। भाषा अर साहित्य मिनख नै संस्कार देवै अर आज रै दिन युवावां री चावना संस्कार सूं बेसी कार नै लेय’र देख सकां। जिण दिन राजस्थानी पेट रै सावाल नै परोटैला उणी दिन सूं युवा वर्ग इण दिस ध्यान देवैला। लोक सेवा आयोग मांय राजस्थानी नै कणाई लगावै अर कणाई हटावै। राजस्थान री जनता नै आपरी भाषा साहित्य अर संस्कृति पेटै ऊभो हुवणो पड़सी। राजस्थानी मांय घर फूंक तमासा देखणा पड़ै इण अबखै बगत आ जातरा अठै तांई पूगी अर आगै चालती जाय रैयी है आ घणी मोटी बात है।
  • राजस्थानी मानता री बात माथै कांई फगत राजनेता ई दोसी है?
  • राजनेता ई तो आपां मांय सूं ई बण्या है। बां मांय इच्छा सगती हुयां ओ काम कणाई हुय जावतो। फेर राजनेता तो फगत निमित है, असल दोस आपणै अठै री जनता रो है। राजस्थानी रो मुद्दो जन आंदोलन बणयो है, पण हाल इण दिस भळै चेतना हुयां ई ओ काम पार पड़ैला।
  • मानता खातर साहित्यकार अर आप कांई कर रैयो हो?
  • मानता खातर एक तरीको मरणो मांडणो हुवै तो दूजो तरीको आपरै ढंग सूं साहित्य रो विगसाव ई हुया करै। साहित्यकार जनता नै जगावण रो काम कर रैया है। म्हैं राजस्थानी साहित्य मांय इण ढाळै रो काम करणो चावूं कै आपां सगळा रो काम ई बोलण लाग जावै। थोथी बातां मांय सार कोनी हुया करै। अंत पंत काम ई बोलैला। मानता री माळा फेरियां ई जे मानता मिलती हुवती तो कदैई मिल जावती। राजस्थानी आपां खातर आत्मा रो सवाल है।
  • अकादमी मांय अध्यक्ष अर दूजा पद खाली हुवण सूं काम-काज बंद सो है। इण सारू आपां नै कांई करणो चाइजै?
  • कला, साहित्य अर संस्कृति नै सरकार प्राथमिकता मांय लेवै तो इण ढाळै री समस्यावां कोनी आवै। आपां फगत इण पेटै सामूहिक रूप सूं आपां री मांग राख सकां। दूजो तरीको ओ है कै आपां खुद आपां रै समाज नै इत्तो सक्षम बणावां कै बो कला, साहित्य अर संस्कृति रै कामां नै बधावण मांय सैयोग करै।
  • बीकानेर मांय विश्वविद्यालय तो खुल्यो पण अजेस राजस्थानी विभाग नीं खुलियो, इण पेटै आप कांई कैवोला?
  • राजस्थान मांय बीकानेर-जोधपुर साहित्य रा गढ मानीजै। बीकानेर विश्वविद्यालय मांय राजस्थानी विभाग खुलणो ई चाइजै। आपां रै अठै रा संगठन अर आपां सगळा मिल’र इण मांग नै पुखता ढंग सूं राखालां तो म्हनै पतियारो है कै ओ काम बेगो ई हुवैला।
  • राजस्थानी विभाग मांय साहित्य अर शोध रा काम हुवैला फेर ई आ सून कियां है?
  • हरेक काम रो आपरो एक तरीको हुवै। कोई काम चायै बो सरकारी हुवो का गौर सरकारी उण नै ढंग रै लोगां रो सैयोग मिल्यां बेगो हुय जावै। साहित्य अर शोध रो घणो मेहतावू काम असल में मानता मिल्या कीं गति पकड़ैला। आपां नै इण अबखै बगत मांय एकठ रैवणो है। राजस्थानी रो कोई काम किणी रै रोक्या अबै रुक नीं सकैला।
  • आप खुद नै राजस्थानी लेखक मानो का हिंदी लेखक? आपनै घणो मान-सम्मान राजस्थानी मांय मिल्यो, फेर हिंदी में क्यूं लिखो?
  • म्हैं खुद नै राजस्थानी लेखक मानण मांय गुमेज करूं। हिंदी मांय लिखणो म्हारो अपराध कोनी। राजभाषा हिंदी रो म्हैं सम्मान करूं अर अबार हिंदी म्हारै रोजगार री भासा है।
  • लेखन मांय आपरी आगै री कांई-कांई योजनावां है?
  • ख्याली पुलाव दांई योजनावां तो घणी है। बस आप ओ भरोसो राखो कै म्हैं योजनावां नै बगत परवाण पूरी करूंला। म्हारी योजना है म्हारी योजनावां नै पूरी कर सकूं।

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डॉ. नीरज दइया, सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर (राज.) 334003 मो. 9461375668
डॉ. नमामीशंकर आचार्य, कोटगेट रै मांय, जोसीवाड़ो, बीकानेर (राज.) 334001 मो. 9829321692

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पारसमल पांडया स्मृति राजस्थानी साहित्य पुरस्कार

news 08012019पारसमल पांडया स्मृति राजस्थानी साहित्य पुरस्कार हेतु नेम प्रकासण, डेह (नागौर) का आभार।


कवि-आलोचक डॉ.नीरज दइया को उनके राजस्थानी काव्य संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ के लिए नेम प्रकासण डेह नागौर द्वारा पारसमल पांडया स्मृति राजस्थानी साहित्य पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। संस्थान के पवन पहाड़िया ने बताया कि पुरस्कार के तहत डॉ.दइया को 11 हजार रुपए और प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर पुरस्कृत किया जाएगा। संयोजक लक्ष्मणदान कविया ने बताया कि 3 फरवरी को डेह गांव स्थित कुंजल माता मंदिर सभागार में सुबह 10 बजे आयोजित समारोह में डॉ.नीरज को पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।

101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : नीरज दइया)

101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)ISBN : 978-81-938976-8-3
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
प्रकाशन वर्ष : 2019 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-

101 Rajsthani Kahaniya Cover

डॉ. नीरज दइया हिंदी और राजस्थानी के समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार हैं। सृजन और अनुसृजन में उनकी समान गति है। इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर में वह मौलिक लेखन के सशक्त हस्ताक्षर के साथ-साथ सहोदरा भाषाओं- हिंदी और राजस्थानी के मध्य सेतु बनकर उभरे हैं।
नीरज ऐसे आलोचक हैं, जो संकोच या लिहाज में यकीन नहीं रखते। वह खूबियां गिनाते हैं, तो खामियां भी बताते हैं। उनका यकीन खरी-खरी अथवा दो टूक है। उनके लिए ‘थीम’ भी मायने रखती है और सलूक भी। वह रचनाकार के सलीके को भी नजरअंदाज नहीं करते। वह अपनी बीनाई (दृष्टि) से चीजों को परखते हैं। उनके लिए शिल्प और संवेदना मायने रखते हैं, तो प्रयोगधर्मिता भी समय के यथार्थ से जुड़ना और उससे मुठभेड़ के साथ-साथ प्रासंगिकता को वे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। गौरतलब है कि हिंदी की पहली और राजस्थानी की प्रथम कहानी लगभग असपास ही लिखी गई। शिवचंद भरतिया की 1904 में लिखी पहली कहानी के बाद लगभग एक सदी में राजस्थानी की कहानी ने बहुत कुछ सार्थक अर्जित किया है। सरकारी या गैर सरकारी संरक्षण की न्यूनता के बावजूद उसने गतिरोधों से उबरकर अपना रास्ता तलाशा और पहचान अर्जित की।
नीरज दइया की यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थगर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी माटी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और श्लाघ्य उपक्रम किया है।

-डॉ.सुधीर सक्सेना
प्रधान संपादक, दुनिया इन दिनों, दिल्ली
sudhirsaxena54@gmail.com
——
डॉ. नीरज दइया (1968) हिंदी और राजस्थानी में विगत तीन दशकों से निरंतर सृजनरत हैं। आप कविता, व्यंग्य, आलोचना, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखते हैं। अब तक आपकी दो दर्जन से अधिक कृतियां विविध विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा में मुख्य पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. दइया को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. नीरज दइया की प्रमुख कृतियां हैं- आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन, कागला अर काळो पाणी, मंडाण, पाछो कुण आसी (राजस्थानी), राजस्थानी कहानी का वर्तमान, उचटी हुई नींद, पंच काका के जेबी बच्चे, टांट टांय फिस्स, आधुनिक लघुकथाएं, कागद की कविताई (हिंदी) आदि।
वर्तमान में आप केंद्रीय विद्यालय, क्रमांक-1, बीकानेर में पी.जी.टी. (हिंदी) के पद पर सेवारत हैं।
मो. : 9461375668
ई-मेल : drneerajdaiya@gmail.com
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101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : नीरज दइया)
प्रकाशन वर्ष : 2018 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102 ISBN : 978-81-938976-8-3
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पोथी परख / मोहन थानवी / दैनिक युगपक्ष 26-03-19

 

अलोचना रूसणा-मनावणा री गिनार कोनी करै – डॉ. दइया

साहित्य अकादेमी पुरस्कार सूं सम्मानित डॉ.नीरज दइया सूं बंतळ
Neeraj Daiya se bat Rajuram b

Neeraj Daiya se bat Rajuram b 02◆ आपरै साहित्य में राजस्थानी समाज रौ बहुवर्णी अंकन निगै आवै। समाज रै ढंग-ढाळै रौ इसौ लूंठौ अर ऊंडौ अनुभव किंया पायौ?
● देखौ सा, हरेक लेखक रा अनुभव दोय भांत रा हुया करै। अेक तौ वौ जिण घर-समाज मांय वौ रैवै उण रौ सीधौ-सीधौ असर उण माथै हुवै, दूजौ लेखक री आपरी सोचा-विचारी अर लगौलग अध्ययन ई अनुभवां री सींव मांय बधापौ करिया करै। हरेक लेखक री आपरी अेक दुनिया हुवै अर उण दुनिया री ओळखण वौ साहित्य मांय करावै। बाळपणै मांय म्हारौ साबकौ साहित्य री दुनिया सूं म्हारै जीसा कवि-कहाणीकार सांवर दइया रै कारण हुयौ। हौळै-हौळै जियां-जियां साहित्य सूं सैंध बधी, म्हारी दुनिया रौ दायरौ बधतौ गयौ। म्हारी पैली कहाणी ‘माणक’ मांय बरस 1987 मांय छपी, तद डूंगर कॉलेज में बी.एससी. रौ तीजौ बरस चालै हौ। फेर तौ म्हारी केई लघुकथावां अर बाल कथावां ई ‘माणक’ अर दूजी पत्रिकावां मांय छपी।

◆ आज तांई रै आपरै लिखारै सारू इसौ कोई अनुभव बताऔ जिण में पाठक रौ अणूतौ हेत-विश्वास सामीं आयौ हुवै?
● लिखण रै हरेक दौर रा अनुभव न्यारा-न्यारा हुया करै, जियां कै म्हैं पैली-पैली लघुकथावां लिख्या करतौ तौ लेखक-समाज री टीप इण भांत रैयी कै म्हारी लघुकथावां म्हारा जीसा सांवर दइया नांव बदळ’र लिख रैया है। जद कै इण ढाळै री कोई बात नीं ही, हां औ जरूरी हौ कै पैली-पैली लघुकथावां नै म्हैं बां सूं पास कराया करतौ हौ। बै सबदां री वर्तनी ठीक करिया करता हा अर विधागत ई केई बातां बतायां सूं म्हनै लगौलग लिखण रौ मारग मिलतौ गयौ अर म्हैं इण मारग सवायौ हुयौ। लेखक-समाज री टीप सूं इण खातर हरखीज सकूं कै उण बगत म्हैं कीं सावळ लिखतौ हौ, तद ई तौ बां इण ढाळै री बात राखी। फेर जद जीसा बरस 1992 में सौ बरस लिया, तद बै चमाळीस अर म्हैं चौबीस बरसां रौ ई हौ। बरस 1993 मांय महाकवि कन्हैयालाल सेठिया आसीस मांय दूहो लिख्यौ- ‘नीरज तू शतदल बणी आ म्हारी आशीष, करूं कामना तू हुई सगळां सूं इक्कीस।’ उमर रा जिता साल म्हैं जीसा भैळै रैयौ, बित्ता सूं बेसी अबै बां बिना निकळग्या। जीसा अर सेठिया जी री भासा पाठकां रै हेत विश्वास सूं ई बचैला।
◆ आप खुद नै आलोचक, अनुवादक, कवि, कहाणीकार, व्यंग्यकार मांय सूं मूळ रूप में खुद नै कांई मानौ?
● मूळ मांय म्हैं खुद नै बस राजस्थानी रौ अेक सिपाही मानूं। राजस्थानी म्हारै रगत रळियौड़ी भासा है अर इण भासा पेटै म्हैं न्यारी-न्यारी विधावां मांय लिख परौ भासा रै पख मांय जीवणौ चावूं। जिण ढाळै मोरियौ नाचौ अर आपरै पगां नै देख’र रौवै, उणी ढाळै न्यारी-न्यारी विधावां मांय म्हारौ सिरजण ई म्हारौ नाच है। इण रंग-रूप अर मीठास साथै लूंठै इतिहास पछै ई राजस्थानी नै संवैधानिक मान्यता कोनी औ म्हारै रोवणै रौ मोटौ कारण है।
◆ अेक लिखारै रै रूप में आप किण सूं प्रभावित हुया हौ?
● सगळा सूं पैली तौ म्हैं म्हारै जीसा सांवर दइया सूं घणौ प्रभावित हुयौ कै बै छौटी ऊमर लिखा’र लाया पण खूब लिख्यौ अर जिकौ लिख्यौ आधुनिक साहित्य मांय घणौ महतावूं मानीजै। बां सूं म्हैं सीख्यौ कै लगौलग लिखण रै साथै-साथै राजस्थानी-हिंदी रै अलावा देसी-विदेसी लेखकां-कवियां नै बांचणां ई जरूरी है। अनुवाद रै मारफत आपां घणा सूं घणा रचनाकारां नै सैंधां कर सकां तौ खुद अनुवाद कर’र आपां भासा रौ करजौ उतारण री प्रेरणा ई बां सूं लेय सकां।

◆ ‘मंडाण’ रौ संपादन करता थकां आप केई युवा लिखारां में ऊरमा भरी, सरावणजोग.! पण उण पछै आप युवा लिखारां नै आगै लावण सारू कांई जतन करिया?
● राजस्थानी रै 55 युवा कवियां री कवितावां नै अेकठ देखण-परखण रौ ‘मंडाण’ अेक जरियौ बण्यौ। इणी ढाळै कहाणी अर दूजी विधावां माथै काम हुयां युवा लिखारां नै विगसाव रा मारग मिलैला। प्रकाशन री अखबायां रै कारण काम नीं हुय सक्या। फेर ई अलोचना पेटै म्हैं युवा लिखरां माथै घणौ काम करियौ अर केई कवियां री रचनावां रौ हिंदी अनुवाद ई करियौ है।

◆ लगौलग लिखणियां अर अनुवाद करणियां में आप सिरैनांव गिणीजौ हौ। अनुवाद अर मूळ लेखन में कित्तौ’क फरक मानौ?
● अनुवाद अर मूळ लेखन रै सवाल माथै म्हनै लोककथावां री दुनिया चेतै आवै। लोककथावां मांय जिण ढाळै परकाया प्रवेस री घणी कथावां मिलै उणी ढाळै लेखन अर अनुवाद परकाया प्रवेस ई हुया करै। आपां देखा कै जियां अभिनय करतौ कोई कलाकार उण चरित्र मांय रम जावै उणी ढाळै सिरजण अर अनुसिरजण मांय लेखक नै रम जावणौ चाइजै। अनुवाद मांय छूट री अेक सींव हुया करै जद कै मूळ लेखन मांय आभौ अणमाप हुवै।

◆ अनुवाद सारू आप कोई रचना नै कींकर टाळौ?
● म्हनै लखावै कै जद कोई मूळ रचना अंतस मांय असर करै तद वा अनुसिरजण खातर विवस करै। केई बार भासा री जरूरतां नै देखता ई अनुवाद करीजै पण अनुवादक नै किणी मसीन दांई अनुसिरजण रौ काम नीं करणौ चाइजै। अनुसिरजण मांय तौ मूळ रचनाकार री आतमा जद अनुवादक मांय घुस जावै का कैवां कै आतमा सूं आतमा रमण लागै तद अनुसिरजण सांतरौ रचीजै, अर बौ ई बेजोड़ हुय सकै। म्हैं अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्दकिशोर आचार्य का सुधीर सक्सेना आद रा अनुवाद इणी ढंग-ढाळै करिया है। ‘सबद-नाद’ मांय 24 भारतीय भासावां रै कवियां री कवितावां नै राजस्थानी मांय करियां भारतीय कविता रौ अेक दीठाव सामीं आयौ।

◆ रचना सारू भाषा रौ चयन किण आधार माथै करौ?
● रचना पेटै भासा अर विधा रौ चुनाव लिखण री मनगत सूं हाफी-हाफी हुया करै। केई बार जीव मांय घणी आवै कै इयां लिखलां बियां लिखलां पण सदा लिखीजणौ हाथ री बात कोनी। जे लिखणौ अर भासा-विधा रौ चयन म्हारै हाथ मांय हुवै तौ म्हैं फगत कवितावां ई लिखणी चावूं, पण कवितावां तौ बिनमौसम रै फूल दांई ठाह नीं कद हियै मांय खिलै अर टैमसर उण नै सबदां नीं ढाळूं तौ खिर जावै, फेर बा हाथ नीं आवै। म्हैं किणी री फरमाइस माथै अलोचना ई नीं लिख सकूं, लेखन खातर मनगत हुवणी जरूरी है। इण बात सूं केई मित्र बेराजी ई हुया है।

◆ बरस 2017 रा घणखरा पुरस्कार अर सम्मान आपरै नांव रैया। पुरस्कारां रौ आपरै लेखन में कांई मायनौ मानौ?
● पुरस्कार बस अेक संयोग है। लेखक रै जीवण मांय पुरस्कार सूं उछाव जरूर हुवै पण मूळ लेखन मांय पुरस्कारां सूं गुणवत्ता मांय कीं बधापौ हुवतौ हुवै इसौ म्हैं कोनी मानू। जे हाथ मांय तलवार लिया ई कोई जूझारू जोधा बण जावतौ तो जूनै बगत मांय तलवारां री कमी थोड़ी ही। किणी खातर तलवार तो किणी खातर कलम बणी ही। कलम सूं लिख्योड़ा सगळा लिकलिकोळिया का अखबारां री खबरां साहित्य लेखन रै सीगै नीं आवै। साहित्य पेटै लेखक री जूण खातर घणौ खटणौ पड़ै। सबद-साधना तौ जूण मांय सांस चालै जियां चालै तद फळापै। म्हनै लखावै कै पुरस्कारां अर सम्मानां सूं म्हारी जिम्मेदारी बधगी है, म्हैं म्हारै पाठकां रौ पतियारौ सवायौ राखण रा जतन करतौ रैवूंला।

◆ आपनै बाल-साहित्य पेटै साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल्यौ। टाबरां सारू लिखणै सूं लेय ‘बिना हासलपाई’ रै लेखण रा पांवडा बिचाळै, कांई फरक मानौ?
● ‘जादू रो पेन’ री कहाणियां म्हैं घणै बरसां पैली लिखी, पण पोथी रूप आवण मांय खासा टैम लाग्यौ। लेखन अर प्रकासण रौ आपरौ अेक क्रम हुया करै। आ जातरा लगौलग चालती रैवणी चाइजै। म्हैं लगौलग लिखतौ, बांचतौ रैयौ अर साथै-साथै अलोचना-अनुवाद रै काम मांय घणौ बगत दियौ। अलोचना पेटै ‘अलोचना रै आंगणै’ मांय न्यारी न्यारी विधावां पेटै बानगी आलेख हा। दूजै कानी आप देखौ कै कहाणी अलोचना रौ विगतवार श्रीगणेस बरस 1998 मांय कवि-आलोचक-नाटककार डॉ. अर्जुनदेव चारण आपरी पोथी ‘राजस्थानी काहणी रू परंपरा विकास’ सूं करियौ, इण पछै बरसां सूनवाड़ रैयी। म्हैं बरस 2014 मांय 25 कहाणीकारां माथै विगतवार कहाणी-अलोचना री पोथी ‘बिना हासलपाई’ सामीं लायौ। इण दिस अजेस खासा काम हुवणा बाकी है।

◆ आप ‘नेगचार’ जैड़ी सांतरी पत्रिका काढ़ी। फेर नेगचार रौ प्रकाशन बंद क्यूं करणौ पड़्यौ? राजस्थानी में पत्रिकावां अर संपादक रै पेटै कांई चुनौतियां मानौ?
● नेगचार आपरै समै री मांग ही। उण सूं केई बडेरां रा पोत सामीं आया। पत्रिका काढणौ घणौ ओखौ काम मानूं। जिका काढै बां रौ जीव जाणै कै कित्ती-कित्ती अबखायां रैवै। संपादन रौ काम रचनावां नै भैळी कर’र प्रकाशित करणौ नीं हुया करै, उण खातर घणी समझ अर सोचा-विचारी जरूरी हुया करै। दो हाथां सूं आपां चावां कै च्यार काम करां तौ मौटी बात, पण चाळीस काम पोळायां नतीजौ कांई हुवैला! पत्रिका खातर पूरी टीम री दरकार हुया करै। संजोग सज्यौ तो नेगचार का दूजी पत्रिका फेर निकाळसूं। आज रै दिन सगळा सूं लांठी बात पाठकां री संख्या बधावणी मानूं। नुवीं पीढी जे जुड़ी रैसी तो आपाणौ भाग सवायौ आसी।

◆ अेक आलोचक रै रूप में आपरा मापिणा कांई हुवै? किणी पोथी री कूंत करतां आपरौ खास जोर किण माथै रैवै?
● म्हैं किणी बंधै-बधायै वाद अर बण्यै-बण्या सीगा सूं रचनावां री परख करण रै पख में नीं हूं। म्हारौ मानणौ है कै हरेक नुवीं रचना अेक नुवीं खोज हुया करै, इणी खातर अलोचना नै ई निता-नुवां मापिणा खोजणा चाइजै। जूनी अलोचनात्मक दीठ सूं जरूरी कोनी कै हरेक नुवीं रचना पकड़ मांय आय सकै। म्हैं कूंत रै मिस पोथी रौ सार लिखण रै पख मांय कोनी। पोथी सूं मिनख रै मन मांय हुवण वाळै बदळावां री बातां भेळै हरेक पोथी नै परंपरा अर आधुनिकता नै अवदान पेटै देखण रौ म्हैं हिमायती हूं।

◆ अेक सम्पादक अर प्रकाशक रै रूप में आप राजस्थानी साहित्य रै छपणै अर बिकणै पेटै केड़ा अनुभव हासल करिया?
● म्हैं तौ मूढै रौ मांग्यौड़ौ हूं, किणी सूं कीं कोनी कैय सकूं। दुष्यंत कुमार रै सबदां मांय कैवां तौ ‘न हो कमीज़ तो पावों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब है इस सफ़र के लिए’। बिना कीं कैया कोई पोथी कियां खरीदै। बाजार रा आपरा मोल-भाव अर मनगत हुया करै। म्हैं ओ खेल नीं जाण सक्यौ सौ संपादक अर प्रकाशक रौ काम ताबै कोनी आयौ।

◆ आपरी पैली पोथी लघुकथा री ही। पण लारलै केई बरसां में नुवी लघुकथावां बांचणै सारू निगै नीं आई। क्यूं?
● लघुकथावां री पैली पोथी पेटै ई चोट हुयगी। ‘भोर सूं आथण तांई’ पोथी छपी जिण री ई आपरी कथा है। नुवी लघुकथावां कीं लिखी अर कीं लिखणी ई चावूं, पण म्हारै फगत चावण सूं कीं नीं हुवै। रामजी सुवां दिन देसी अर जे लघुकथवां पोथी जित्ती लिखीजी तौ जरूर पोथी काढसूं।

◆ ‘बिना हासलपाई’ में पच्चीस कहाणीकार सामल हुया है, आं रौ चयन किण विध करीज्यौ?
● अलोचना मांय चयन किणी सरकारी नौकरी दांई फारम भरा’र तौ हुय कोनी सकै। आधुनिक कहाणी रै विकास पेटै जिका कहाणीकारां री चरचा कमती रैयी का फेर जिका माथै ध्यान नीं देय सक्या उणां नै लेवण साथै खास-खास सगळा कहाणीकारां नै म्हैं लेवण रा जतन करिया। जिका छूटग्या का जिका नै छोड़ दिया उण पेटै पोथी मांय दोय आलेख है। म्हारौ मानणौ है कै अलोचना रुसणा-मनावणा री गिनार कोनी करै। फेर छब्बीस नंबर सूं लेय’र आगै जित्ता रै ई कहाणीकार है बां माथै बगत आया काम करूंला। लिखण मांय गिणती कोनी राखूं, हुय सकै आपरै साठ नंबर माथै जिकौ कहाणीकार हौ उण माथै म्हैं लिख दियौ हुवै।

◆ चावा कवि, कहाणीकार सांवर दइया जी रै लाडेसर सूं, चावा कवि, आलोचक नीरज दइया रै नांव री ओळखाण री जातरा रा खास पड़ाव कांई मानौ?
● जीसा रै नांव री ओळखाण तौ आखी जूण साथै रैवैला। बां बरस 1992 में सौ बरस लिया। तद म्हैं बां रै अणछप्यै साहित्य नै सामीं लावण पेटै लगैटगै पांच बरसां काम करियौ। ‘नेगचार’ पत्रिका ई निकाळी। नेगचार प्रकाशन सूं पोथ्यां ई छापी। बां रै रैवतां म्हारी फगत अेक पोथी लघुकथावां री छपी ही अर कविता संग्रै 1997 में ‘साख’ लगैटगै सगळा काम करियां पछै आयौ। पोथ्यां री गिणती करां तौ बां थकां जिकी गिणती अेक सूं चालू करी बा अबै तीस नैड़ै पूग रैयी है। केई पुरस्कारां, मान-सम्मान पछै ई म्हैं मानूं कै म्हारी साची ओळखाण तौ राजस्थानी री संवैधानिक मान्यता सूं ई हुवैला।

◆ अेक आलोचक माथै पखापखी रौ आरोप नुवादी बात कोनी। आप रै आलोचक साम्ही अेड़ै सवाल रौ कांई पड़ूतर हुवैला?
● म्हारी अलोचना सूं सहमति-असहमति राखणौ आपरौ अधिकार है। इण पेटै फगत इत्तौ कैय सकूं कै म्हैं बिना हासलपाई म्हारी बात करण रै पख मांय हूं। जियां कै जे म्हारा जीसा अर कहाणीकार सांवर दइया री कहाणियां माथै लिखण रौ मन करूं तौ बां री सगळी अपणायत अर संबंधां नै बिसराय, बां नै फगत अेक कहाणीकार रूप मांय ई देखूं। म्हारौ आलोचक म्हनै औ हक कोनी देवै कै बां नै प्रेमचंद का गुलेरी रै बरौबर साबित करण री अणचाइजती खेचळ करूं। बै जियां है, जिसा है म्हैं खुद री दीठ सूं बां नै जियां परख सक्यौ उणी ढाळै लिख्यौ है। दाखलै रूप बतावूं बां री कहाणियां पेटै प्रयोग रै नांव माथै विषयगत अर शैलीगत रूढ़ता नै म्हैं खासियत भेळै कमजोरी ई मानी है। इणी ढाळै संपादित कहाणी-संग्रै ‘उकरास’ री अलोचना में बां जिकी कहाणीकारां री उमर सूं विगत बाणाई उण पेटै लिख्यौ कै कहाणीकारां री रचनात्मकता अर कहाणी-लेखन ग्राफ नै विगत रौ आधार बणावणौ हौ। परंपरा सूं आधुनिकता की अेक जातरा नै विगतवार म्हैं देख-परख’र रचनाकारां री विगत पेटै ‘बिना हासलपाई’ मांय जतन करियौ है।

◆ आपरी ‘आंगळी-सीध’ बीजां री आंगळी सीध सूं न्यारी कींकर है?
● आंगळी सीध राजस्थानी उपन्यासां माथै किताब है जिकी केई बरसां सूं चाल रैयी है। म्हारौ मानणौ है कै उपन्यास रौ कैनवास घणौ मोटौ हुवै अर अलोचना फगत कीं आंगळी सीध ई कैय सकै। किणी रचना मांय आलोचक रै रूप मांय म्हैं पाठकां अर लेखकां वास्तै आंगळी सीध ई कर सकूं, हुय सकै कै म्हैं खुद जे म्हारी ई आंगळी सीध करियौड़ी बातां माथै चालणौ चावूं तौ नीं चाल सकूं, पण बात जिकी है सौ तौ कैयां ई सरै। म्हारै कौठै हुवै जिसी ई म्हैं होठै राखण रौ हिमायती हूं, इयां कोनी कै थूक गिटतौ पेट मांयली बातां पेट मांय ई पचा लेवूं। अलोचना तौ ताकड़ी दांई हुवणी चाइजै, जिण मांय काण राख्या खरौ तोल नीं हुय सकै।

◆ आप भाषा री मानता संघर्ष रा भागीदार हौ.! राजस्थानी री संवैधानिक मानता सारू आपरी दीठ सूं कांई जतन जरूरी है?
● मानता तौ आज नीं तौ काल मिलणी ई है। म्हारी दीठ सूं आपां नै सावळ राजस्थानी सीखणी ई चाइजै। भासा री केई-केई बातां सूं आपां अणजाण रैसां तौ आ हेमाणी धूड़ हुय जावैला। जियां बात करां कै ल अर ळ मांय फरक है। दाखलौ- बल अर वळ सामीं है। इणी ढाळै राजस्थानी नै आगै बढ़वण वाळा नै कुण समझावै कै बढ़ावण री ठौड़ मालकां बधावाण री जरूरत है। भासा री मानता नीं हुवण सूं आपां आपां री जड़ा सूं कटाता जाय रैया हां। राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति री विरासत नै आगै री पीढियां तांई सावळ नीं पूग्यां घणौ बिगाड़ौ हुय जावैला।

◆ साहित्यकार री हैसियत सूं राजस्थानी साहित्य नै आम लोगां तांई पूगावण सारू आप कांई जतन जरूरी समझौ?
● राजस्थानी खातर आपां नै जिता मौरचा संभाळ सकां संभाळणा चाइजै। राजस्थानी साहित्य नै हिंदी अर अंग्रेजी मांय अलोचना रै मारफत राजस्थान री सीवां सूं बारै निकाळां, तद ई आपां नै आपां रौ वाजिब हक आपां नै मिलैला। जनता भेळै जन-चेतना पेटै साहित्यकार ई काम कर रैया है, उण नै घणै उछाव सूं नुंवी पीढ़ी नै जोड़ता थका चालू राखणौ है। कोई काम हियै उकळै जद ई पूरौ हुवै। सगळा नै भासा-साहित्य पेटै आपौ- आप री जिम्मेदारी समझणी चाइजै।
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० राजूराम बिजारणियां
(साहित्य अकादेमी के युवा पुरस्कार से सम्मानित)
लक्ष्मी फोटौ स्टेट, लूनकरनसर (बीकानेर)
e-mail : rrbijarnia@gmail.com
Blog : raj bijarnia.blogspot.com
9414449939
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डॉ. नीरज दइया : परिचै
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कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक अर संपादक रै रूप में ओळखाण।
जलम : 22 सितम्बर, 1968 रतनगढ़ (चूरू) राजस्थान
जीसा : श्री सांवर दइया (चावा-ठावा राजस्थानी कवि-कहाणीकार)
भणाई : बी.एससी., एम.ए.(हिंदी साहित्य, राजस्थानी साहित्य), बी.एड., नेट, स्लेट, पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक पाठ्यक्रम (स्वर्ण पदक) “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर पीएच.डी.(2007)
प्रकाशित साहित्य
मौलिक पोथ्यां –
• भोर सूं आथण तांई (लघुकथा संग्रह) 1989 मुन्ना प्रकाशन, बीकानेर
• साख (कविता संग्रह) 1997 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• देसूंटो (लांबी कविता) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• आलोचना रै आंगणै (आलोचनात्मक निबंध) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• जादू रो पेन (बाल साहित्य) 2012 शशि प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
• उचटी हुई नींद (हिंदी कविता संग्रह) 2013 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• बिना हासलपाई (आधुनिक कहाणी आलोचना) 2014 सर्जना, बीकानेर
• पाछो कुण आसी (कविता संग्रह) 2015 सर्जना, बीकानेर
• मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• पंच काका के जेबी-बच्चे (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) 2017 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
अनूदित पोथ्यां –
• कागद अर कैनवास (अमृता प्रीतम री पंजाबी काव्य-कृति रौ अनुवाद) 2000 नेगचार प्रकाशन, बीकानेर
• कागला अर काळो पाणी (निर्मल वर्मा रै हिंदी कहाणी संग्रह रौ अनुवाद) 2002 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ग-गीत (मोहन आलोक रै कविता संग्रै रौ हिंदी अनुवाद) 2004 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• सबद नाद (भारतीय भाषाओं री कवितावां) 2012 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवां री घाटी (भोलाभाई पटेल रै गुजराती यात्रा-वृत रौ अनुवाद) 2013 साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• ऊंडै अंधारै कठैई (डॉ. नन्दकिशोर आचार्य री चयनित कवितावां) 2016 सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर
• अजेस ई रातो है अगूण (सुधीर सक्सेना री चयनित कविताबां रौ राजस्थानी अनुवाद) 2016 लोकमित्र, दिल्ली
संपादित पोथ्यां –
• राजस्थानी कहानी का वर्तमान (आलोचना) डॉ. नीरज दइया, 2018 अनंग प्रकाशन, दिल्ली
• मंडाण (युवा कविता) संपादक : नीरज दइया 2012 राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
• मोहन आलोक री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2010 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2011 बोधि प्रकाशन, जयपुर
• देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां (संचै : नीरज दइया) 2017 राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर
• राजस्थानी कहानी का वर्तमान (आलोचना, संपादन) डॉ. नीरज दइया, अनंग प्रकाशन, दिल्ली 2018
• नेशनल बिब्लियोग्राफी ऑफ इंडियन लिटरेचर (राजस्थानी : 1981-2000) साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
• आधुनिक लघुकथाएं (संपादन) प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरु मार्ग, बीकानेर- 334003
• नेगचार (तीन अंक)
• बिणजारो (बरस 2000)
• “जागती जोत” राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी री पत्रिका (सितम्बर,02 सूं सितम्बर,03 तांई)
• राजस्थानी पद्य संग्रह (कक्षा- 12 खातर) माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर सूं प्रकाशित।
• अपरंच (सं. पारस अरोड़ा) बीकाने-अंक संपादित
• कविता कोश (राजस्थानी-विभाग) रा सहायक सम्पादक 12 मार्च 2008 सूं सक्रिय।
सम्मान अर पुरस्कार
• साहित्य अकादेमी मुख्य पुरस्कार 2017
• साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार 2014
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर सूं भत्तमाल जोशी पुरस्कार
• राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर सूं “बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार”
• नगर विकास निगम सूं “पीथळ पुरस्कार” ।
• नगर निगम बीकानेर सूं 2014 में सम्मान
• अखिल भारतीय पीपा क्षत्रिय महासभा युवा प्रकोष्ठ बीकानेर द्वारा सम्मान- 2014
• सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर सूं तैस्सितोरी अवार्ड- 2015
• रोटरी क्लब, बीकानेर द्वारा “खींव राज मुन्नीलाल सोनी” पुरस्कार-2016
• कालू बीकानेर द्वारा नानूराम संस्कर्ता राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• कांकरोली उदयपुर द्वारा मनोहर मेवाड़ राजस्थानी साहित्य सम्मान-2016
• फ्रेंड्स एकता संस्थान बीकानेर द्वारा साहित्य सम्मान-2016
• दैनिक भास्कर बीकानेर द्वारा शिक्षक सम्मान- 2016
• सृजन साहित्य संस्थान, श्रीगंगानगर द्वारा सुरजाराम जालीवाला सृजन पुरस्कार-2017
• राजस्थानी रत्नाकर, दिल्ली द्वारा श्री दीपचंद जैन साहित्य पुरस्कार’- 2017
• ओम पुरोहित ‘कागद’ फाउण्डेशन हनुमानगढ़ द्वारा कागद सम्मान- 2017
• साहित्य कला एवं संस्कृति संस्थान नाथद्वारा द्वारा हल्दीघाटी में साहित्य रत्न सम्मान- 2017
• जिला लोक शिक्षा समिति, बीकानेर द्वारा साक्षरता दिवस पर सम्मान- 2017
• मावली प्रसाद श्रीवास्तव सम्मान 2017 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन द्वारा
• अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन द्वारा सीताराम रूंगटा सीताराम रूंगटा राजस्थानी साहित्य पुरस्कार- 2017
• KVS Regional Incentive Award, 2017
• गौरीशंकर कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा पुरस्कार- 2017
• डॉ. नारायणसिंह भाटी अनुवाद सम्मान 2018
अन्य-
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर री राजस्थानी पाठ्यक्रम विषय-समिति रा पूर्व-संयोजक।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर री कार्यकारणी अर सामान्य सभा रा सदस्य।
“कविता कोश” राजस्थानी विभाग सहायक-संपादक।
समन्वयक : राजस्थानी भाषा साहित्य संस्कृति विभाग, हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली

अबार : केंद्रीय विद्यालय, क्रमांक- एक, बीकानेर में पी.जी.टी. (हिंदी) रै पद माथै सेवारत।
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संपर्क : डॉ. नीरज दइया, सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर (राज.) 334003
E-mail : drneerajdaiya@gmail.com Mob.9461375668

गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) अनुवाद : नीरज दइया

Gavad Hindi Tr by Neeraj Daiya

गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) राजस्थानी से हिंदी अनुवाद : नीरज दइया
प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ; 2018 ; 150/-
ISBN : 9788126053780