राजस्थानी कहानी का वर्तमान

दस कहानी-संग्रहों पर केंद्रित आलोचना-पुस्तक / संपादक : डॉ. नीरज दइया
राजस्थानी कहानी का वर्तमान संपादक- डॉ. नीरज दइया।
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।। मायड़ भाषा के लिए दमदार प्रयास।। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’
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डॉ. नीरज दइया सम्पादित यह ग्रंथ एक तरफ राजस्थानी कहानी लेखकों को प्रोत्साहित करने का बड़ा प्रयास है दूसरी तरफ उन लोगों तक राजस्थानी साहित्य पहुंचाना है जो मानते हैं कि राजस्थानी भाषा नहीं; बोली है।
संपादक ने मायड़ भाषा के प्रति गर्व व्यक्त करते हुए लिखा है – यह भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। राजस्थानी भाषा के रचनाकारों की भावना को संपादक ने वजनदार शब्दों में अभिव्यक्त किया है।
डॉ. दइया ने भाषा के मुद्दे को जोरदार शब्दों में उठाते हुए भारतीय कहानी साहित्य में क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान को पुनर्स्थापित किया है।
आज की राजस्थानी कहानी अन्य भाषाओं की आधुनिक कहानियों से कहीं भी कमतर नहीं है। बात या लोककथा की परिपाटी का जो ठप्पा राजस्थानी कहानी पर लगा हुआ था वह अब उतर चुका है।
उन्होंने सन 1956 से वर्तमान तक के राजस्थानी कहानी-सृजन को चार अध्यायों में बांटते हुए राजस्थानी कहानी के नामचीन कहानीकारों के कहानी-संग्रहों, कहानियों व प्रवृत्तियों को भी समेटने का सराहनीय प्रयास किया है।
राजस्थानी कहानी यात्रा को स्पष्ट करते हुए डॉ. नीरज दइया ने केवल अपने विचार ही नहीं बल्कि अनेक साहित्यकारों यथा- रामेश्वरदयाल श्रीमाली, डॉ. अर्जुनदेव चारण, कुंदन माली, सांवर दइया, गोरधन सिंह शेखावत आदि के उद्धरण भी सम्मिलित करते हुए राजस्थानी कहानी के अतीत और वर्तमान को शानदार तरीके से प्रस्तुत किया है। 10 कहानीकारों की कहानियों पर 10-10 साहित्यकारों द्वारा आलोचना और उसे पुस्तक रूप में संजोने का प्रयास राजस्थानी भाषा के साहित्य में विशेष योगदान है।
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।। पुस्तक स्वयं में एक संदर्भ ग्रंथ ।। अरविन्द सिंह आशिया
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डॉ . नीरज दैया एक अद्भुत दृष्टि रखते है साहित्य सृजन व एवं अवलोकन की । रचा जा रहा है राजस्थानी में मगर विपुल नहीं क्योंकि हमारी भाषा पिछले सात दशकों से प्रतीक्षारत् है अपनी अस्मिता हेतु इसलिए सिर्फ वो लिख रहे है जो जो झूंझार है … शेष ने शायद अपने घोड़े अवसर की छाया में बाँध लिए है ।
लिखने में भी गद्य नहीं के बराबर .. क्योंकि गद्य समय व श्रम दोनों माँगता है । ऐसा नहीं कि कविता लिखना आसान है पर एक दूसरे की पीठ खुजाने वाले अकवि तथाकथित कविता में में इतने अधिक है (डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल सर के मुताबिक़ अकेले जयपुर में पचास हज़ार के क़रीब)कि कविता ही शर्मिन्दा है पर वो पठ्ठे ख़ुद को बेशर्मी से कवि कहते है ।
सो ऐसे मे राजस्थानी कहानी रचन पर यह पुस्तक स्वयं में एक संदर्भ ग्रंथ है । मेरी बधाई देने वाले मित्रों से अनुरोध है कपड़े झटक के रवाना होने के बजाय इसे ख़रीदे व अपनी धरोहर बनाएँ ।
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।। कहानी यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव ।। मदन गोपाल लढ़ा
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वरिष्ठ कवि आलोचक डॉ नीरज दइया द्वारा संपादित “101 राजस्थानी कहानियां” एक ऐसी किताब है जिसे राजस्थानी कहानी यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव कह सकते हैं। निश्चय ही इस किताब के माध्यम से राजस्थानी कहानी की महक हिंदी के विस्तृत आंगन में पहुंचेगी। कहना न होगा, कथ्य और शिल्प की दृष्टि से राजस्थानी कहानी विश्व की किसी भी किसी भी भाषा की कहानियों से कहीं कमतर नहीं है। इस किताब को पढ़ते हुए सहज रूप में इस तथ्य को महसूस किया जा सकता है। यह संग्रह इस बात की भी साख भरता है कि विषय वस्तु की दृष्टि से राजस्थानी कहानी का दायरा ग्रामीण जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि नगरीय और महानगरीय जीवन के साथ साथ तकनीक के इस युग में मानवीय संवेदनाओं का विश्वसनीय अंकन राजस्थानी कहानीकारों ने बखूबी किया है। राजस्थानी की पहली कहानी से लेकर 21वीं सदी के दूसरे दशक तक की कहानियों का जायका आप इस संग्रह के माध्यम से ले सकते हैं। एक सौ वर्षों से अधिक कालखंड को करीब 500 पृष्ठों की इस पुस्तक में समेट कर डॉ नीरज दइया जी ने एक ऐतिहासिक कार्य किया है।
आमतौर पर अनुवाद के अभाव में भारतीय भाषाओं का श्रेष्ठ साहित्य व्यापक परिदृश्य में अनदेखा रह जाता है। राजस्थानी कहानी के मामले में भी यह बात खरी उतरती है। राजस्थानी के अत्यंत प्रतिभावान कहानीकार अनुवाद के अभाव में भारतीय साहित्य के विहंगम परिदृश्य में नोटिस में नहीं आ पाए। यह किताब हिंदी के माध्यम से राजस्थानी कहानी के उज्जवल पक्ष को सामने लाने का श्लाघनीय प्रयास प्रयास है। निश्चय ही मान्यता के लिए जूझती राजस्थानी भाषा के सामर्थ्य व वैभव से दुनिया भर को अवगत करवाने के लिए ऐसे प्रयासों की महती आवश्यकता है। डॉ दइया ने इससे पूर्व भी इस प्रकार के अनेक कार्य किए हैं जिनमें “राजस्थानी कहानी का वर्तमान”, “मंडाण” “सबद नाद” आदि। इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए प्रकाशक, संपादक, अनुवादक व कहानीकार साधुवाद के अधिकारी हैं। उम्मीद है हिंदी पट्टी के पाठकों के साथ लेखक व आलोचक भी राजस्थानी कहानी के रूप रंग को प्रामाणिकता से जानने के लिए इस किताब पर उदारता से स्नेह बरसाएंगे।
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वे जुनून की हद पर काम करने वाले लोगों में से एक है। ऐसे अनेकों काम हैं जो पहली बार उनकी कलम से संभव हुए हैं। राजस्थानी आलोचना की नई जमीन तलाशने का महत्वपूर्ण काम आदरजोग डॉ नीरज दइया ने गत एक दशक में किया है। “राजस्थानी कहानी का वर्तमान” के रूप में नई किताब इस सफर का एक उल्लेखनीय पड़ाव है। हिन्दी भाषा के माध्यम से राजस्थानी कहानी की समालोचना का यह नया प्रयोग वाकई अनूठा है। इस किताब की मार्फ़त राजस्थानी कहानी के रूप रंग की बात दूर तक जाएगी, इसमें संदेह नहीं। गौरतलब है कि आलोच्य पुस्तक में राजस्थानी कहानी की चुनिंदा दस किताबों पर दस-दस टिप्पणियों को प्रस्तुत किया है। भूमिका में संपादक ने राजस्थानीे कहानी की विकास यात्रा व वर्तमान परिदृश्य पर विस्तृत प्रकाश डाला है। कहना न होगा, चर्चा के लिए किताबों का चयन संपादक-आलोचक की पसंद का मसला है। असल में तो यह बीजारोपण है। इस काम को आगे बढाने के लिए खुला मैदान पड़ा है। कल कोई अपनी पसंद की चुनिंदा एक सौ किताबों पर बात करे तो उसका भी स्वागत ही होगा।
बहरहाल इस जरूरी व सार्थक काम के लिए डॉ नीरज दइया को असीम बधाई व लखदाद। किताब प्राप्ति के लिए प्रकाशक से सम्पर्क किया जा सकता है।
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डॉ. दइया संपादित ‘राजस्थानी कहानी का वर्तमान’ 264 पृष्ठों की आलोचनात्मक कृति है। राजस्थानी कहानी साहित्य की खासियत को हिंदी जगत के समक्ष रखने का अनूठा कार्य है यह। इस पुस्तक में राजस्थानी के 10 आधुनिक कहानी संग्रहों पर 10-10 समीक्षाएं शामिल हैं।
-सत्यनारायण सोनी
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‘बारीक बात’ (रामस्वरूप किसान), ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ (बुलाकी शर्मा), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (मधु आचार्य ‘आशावादी’), ‘अगाड़ी’ (राजेन्द्र जोशी), ‘कथा-२’ (अरविन्द सिंह आशिया), ‘मेळौ’ (राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’), ‘मेटहु तात जनक परिताप’ (पूर्ण शर्मा ‘पूरण’), ‘धान कथावां’ (सत्यनारायण सोनी), ‘च्यानण पख’ (मदन गोपाल लढ़ा) व ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ (सतीश छिम्पा) पर केंद्रित कहानी आलोचना-पुस्तक / संपादक : डॉ. नीरज दइया
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101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
प्रकाशन वर्ष : 2019 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-

पोथी परख / मोहन थानवी / दैनिक युगपक्ष 26-03-19

Neeraj Daiyaराजस्थानी कथा-यात्रा को उत्तर आधुनिक मार्ग पर अग्रसर कर रही प्रतिनिधि कहानियों का खजाना / मोहन थानवी
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आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन के साथ-साथ हिंदी-राजस्थानी के मध्य सेतु के रूप में साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त डॉ नीरज दइया का नाम ही उनका परिचय है। डॉ दइया को अब क्षेत्रीय भाषाओं के कथा-साहित्य जगत में संकलन, संपादन और अनुवाद का एक ऐसा कोष देने के लिए पहचाना जाएगा जिसका नाम 101 राजस्थानी कहानियां है। राजस्थानी भाषा साहित्य प्राचीन विपुल निधि के लिए तो अपना कोई सानी नहीं रखता साथ ही तुलनात्मक व विवेचनात्मक दृष्टिकोण से आधुनिक साहित्य के हेतु भी किसी भी क्षेत्रीय भाषा साहित्य से कमतर नहीं है। अब राजस्थानी कहानियों की ऐसी विवेचना में इसे उत्तर आधुनिक साहित्य के प्रति भी निसंकोच किसी से पीछे नहीं, आगे ही कहा जाएगा। ऐसी धारणा व्यक्त करने के कारणों में से एक मुख्य कारण है 101 राजस्थानी कहानियां संग्रह। संग्रह में जहां दशकों पहले लिखी गई और माइलस्टोन सिद्ध हुई कहानियां संकलित हैं, वहीं 21वीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम सौपान के चलते लिखी जा रही कहानियों का प्रतिनिधित्व करती राजस्थानी कथा-यात्रा को उत्तर आधुनिक मार्ग पर अग्रसर कर रही कहानियां शामिल की गई हैं। इस संग्रह की कहानियों का संकलन एवं संपादन डॉ नीरज दइया ने किया है । सभी कहानियां अपने में अनेक विशेषताएं रखती हैं। इस संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि निर्बाध रूप से केवल कहानी को ही प्रस्तुत किया गया है । कहानीकार और कथा-सार या कथा-विषय के प्रति डॉक्टर दइया ने 20 से अधिक पृष्ठीय संपादकीय में अपने पूरे अध्ययन को सार संक्षेप में प्रस्तुत करने का एक नवाचार भी रखा है। हालांकि ऐसा नवाचार पूर्व में संकलित रचनाओं के संग्रहों में किया जा चुका है किंतु यहां नवाचार इस मायने महत्ता रखता है कि डॉ दइया ने अपनी लेखनी के जादूभरे आलेख में भाषाई कहानियों के इतिहास के साथ-साथ विहंगम दृष्टिपात हिंदी की मुख्य धारा के कथा साहित्य पर भी किया है।
संग्रह की कहानियों की शुरुआत ही केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अतुल कनक की “काचू की साइकिल” कहानी से की गई है। अतुल कनक एक लोहनिर्मित और रबड़-टायर चालित साइकिल में प्राण प्रतिष्ठा करने में तो सफल हुए ही हैं साथ ही उसकी संवेदनाओं के ज्वार में भीगी मन की बात को अपनी कलम से कागज पर उकेर लाए हैं। ऐसा ही आलम अतुल कनक की मूल राजस्थानी रचना पर छाया हुआ है। ऐसी ही प्रवृत्ति और मनोरंगों को देखने वाली आंख और श्रवण करते कर्ण छिद्रों से गहरे तक उतार देने वाली दिखने छोटी मगर गंभीर घाव कर देने वाली निशांत की कहानी है – “अखबार की चोरी”। पात्र इस कहानी को स्वयं बता रहा है । वह यात्रा कर रहा है और सहयात्री के पास मौजूद एक अखबार में अपनी फोटो छपी देख कर अखबार के पन्ने को घर ले जाने के लिए छुपा लेता है । सहयात्री अखबार के उसी पन्ने को किसी और खबर के कारण सहेज कर घर ले जाना चाहता है । वह पन्ना ना मिलने पर ढूंढता है । इसी घटना पर पाठक रोचकता से, उत्सुकता से लबरेज हो कहानी को पढ़ रहा है। अंततः पात्र स्वयं यह स्वीकारता है कि अखबार की चोरी करने का उसे पछतावा तो है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती बल्कि पाठकों को एक द्वंद्व से निकलने को मनन मंथन के लिए नई कहानियों को जन्म देती है। संग्रह की सभी 101 कहानियों पर सम्मति प्रकट की जाए तो इस 504 पृष्ठीय संग्रह से अधिक पृष्ठों का एक और ग्रंथ का सृजन हो जाएगा। कहानियों को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को पात्रों का अंतरंग मित्र अनुभूत करता है। पाठक को ऐसा पूरा एक संसार मिलता है जो उसे अपना-सा लगता है। इस संसार की नजीर देती ऐसी कहानियों में राजस्थानी ग्रामीण अंचल को पाठक के समक्ष जीवंत उपस्थित कर देने वाले अन्नाराम सुदामा की कहानी “सूझती दीठ”, भोगे हुए यथार्थ को दृश्य दर दृश्य अनुभूत करवा देने में महारत हासिल कन्हैयालाल भाटी की कहानी “छलावा”, पात्रों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को कथा में सूक्ष्मता से पिरो कर पाठक को मनन-मंथन करने की ओर अग्रसर कर देने वाली रचनाओं के रचयिता चंद्र प्रकाश देवल की कहानी “कोड़ा”, परंपराओं और आधुनिक परिवेश में अंतर को रेखांकित करते अपनी जड़ों से जकड़े रहने का संदेश देने वाले जनकराज पारीक की कहानी “नाम” इत्यादि कहांनियों का संगम है – 101 राजस्थानी कहानियां संग्रह । ओम प्रकाश भाटिया की कहानी “हाथ से निकला सुख” का आरंभ और शीर्षक पाठक को जो आभास देता है उससे ठीक उलट कहानी का विराम-स्थल है, जहां से इस दौर में जीवन की आपाधापी में मां-बाप से दूर जाते बच्चों को रोकने की पुकार सुनाई देती है तो साथ ही अनजान सेवक-चाकरों के प्रति अविश्वास पनपने हेतु घटित घटनाओं की गूंज भी पाठक को सचेत करती है। संग्रह की एक कहानी है, “आसान नहीं है रास्ता”। नंद भारद्वाज ने इस कहानी में अपनी शैली से कई रंग भर दिए हैं। पात्रों की मनोस्थिति को सांकेतिक संवादों से उकेरने की कला को नवांकुरों द्वारा सीखने का प्रयास नंद भारद्वाज की इस कहानी से किया जा सकता है। नजीर देखिए – ‘आपको गांव में आते ही यह बधाई किसने दे दी कि मैं किसी अनचाहे विवाद में उलझ गई हूं’ ।
साथ ही जेबा रशीद, दुलाराम सहारण, देवकिशन राजपुरोहित, देवदास रांकावत, नानूराम संस्कर्ता, बी.एल. माली अशांत, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मंगत बादल, डॉ. मदन केवलिया, मदन गोपाल लढ़ा, मदन सैनी, मालचंद तिवाड़ी, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, राजेश कुमार व्यास, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, रामस्वरूप किसान, विजय दान देथा, श्रीलाल जोशी, श्रीलाल नथमल जोशी, सांवर दइया, सावित्री चौधरी ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनकी कहानियों का जादू सिर पर चढ़कर बोलता है। राजस्थानी की ऐसी 101 कहानियां संकलित कर उनका अनुवाद पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक डॉ नीरज दइया ने उपलब्ध करवाया है । डॉ नीरज दइया का यह सृजन हिंदी-राजस्थानी ही नहीं वरन् तमाम भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य जगत में मील का पत्थर सिद्ध होने जा रहा है। क्योंकि डॉ दइया राज्याश्रित निकायों अथवा पूंजीपतियों के शगल स्वरूप पनपी निजी साहित्यिक संस्थाओं के मुकाबले स्व-इकाई होते हुए भी बेमिसाल नजीर के स्वरूप में इस संकलन के संपादक के रूप में अध्ययन-लेखन-परिश्रम के परिचायक एक कालजयी-सृजन को समकालीन-साहित्यिक जगत के पटल पर प्रतिष्ठित करने में सफलता अर्जित कर चुके हैं। यह सृजन इसलिए भी श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है कि संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष कर रही राजस्थानी भाषा की कहानियों की वृहद निधि में से प्रतिनिधि कहानियों का चयन करना आसान कार्य नहीं है। इस पर और भी अधिक महती कार्य यह कि इस चयनित-संकलित भंडार को अनूदित करने-करवाने का दायित्व भी डॉ. दइया ने बखूबी निर्वहन किया है। डॉ. नीरज दइया को साधुवाद । यह ठीक है कि ये सम्मति मुझ अल्पज्ञानी की है मगर यह भी विश्वास है कि निजी प्रयासों से क्षेत्रीय भाषा कथा-साहित्य जगत में संकलन, संपादन और अनुवाद का ऐसा कोष एकमेव है। मायड़ भाषा मान्यता के संघर्ष को इससे बल मिलेगा।
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पुस्तक एक नजर में-
पुस्तक का नाम : 101 राजस्थानी कहानियां (कहानी-संग्रह) संपादक- डॉ. नीरज दइया ; प्रथम संस्करण : 2019; पृष्ठ : 504 ; मूल्य-1100/-
प्रकाशक :के. एल. पचौरी प्रकाशन, डी-8, इन्द्रापुरी, लोनी, गाजियाबाद

 Mohan Thanvi

सोनै री चिड़ी (ओम गोस्वामी)

Sone Ri Chidee Neeraj Daiya
पोथी : सोनै री चिड़ी / मूल : ओम गोस्वामी, डोगरी कहाणी संग्रै / राजस्थानी उल्थाकार : नीरज दइया / प्रकाशन वर्ष : 2019 / पृष्ठ : 192 / मूल्य : 230/- /प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, रवीन्द्र भवन, 35, फीरोजशाह रोड, नई दिल्ली-110001 / आवरण : श्री कुंवर रवीन्द्र
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Om Goswami

ओम गोस्वामी

Sone Ri Chidee Neeraj Daiya

निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध

Nirmal Verma Ke Katha Sahiyta Men Aadunikta Bodh by Dr Neeraj Daiya

निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध / डॉ. नीरज दइया Neeraj Daiya
प्रकाशक- इंडिया नेटबुक, सी-122, सेक्टर 19, नोएडा- 201201
गौतमबुद्ध नगर (एन. सी. आर. दिल्ली) India Netbooks
पृष्ठ : 256 ; प्रथम संस्करण : 2019 ; ISBN : 9788194000457
हार्ड-बाउंड : मूल्य- 550/-
पेपरबैक संस्करण : मूल्य- 250/-
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अन्य जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें- DrSanjeev Kumar
9873561826, 9811373988
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निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध सर्वोपरि है। डॉ. नीरज दइया ने अपने इस शोध प्रबंध में उनके कथा साहित्य- उपन्यासों और कहानियों का गहराई से अध्ययन कर आधुनिकता बोध के परिपेक्ष्य में मौलिक दृष्टि से उनका विवेचन-विश्लेषण किया है। इस शोध ग्रंथ में निर्मल वर्मा की यशस्वी साहित-सृजन यात्रा को बताते हुए उनके कथा साहित्य में आधुनिकता बोध की सम्यक विवेचना की गई है तथा आधुनिकता बोध का स्वरूप, उसके शैल्पिक प्रतिमान आदि पर गहन विश्लेषण होने से यह शोध प्रबंध हिंदी ही नहीं, वैश्विक परिदृश्य में भी उल्लेखनीय है।

बंतळ / डॉ. नीरज दइया सूं डॉ. नमामीशंकर आचार्य

साहित्य अकादेमी नवी दिल्ली सूं सम्मानित कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया सूं हथाई

आलोचना में ‘हासलपाई’ चालै कोनी : डॉ. नीरज दइया

डॉ. नमामीशंकर आचार्य

Neeraj Daiya se batchit Dr Namami Shankar-1
(22 सितम्बर, 1968 नै चावा-ठावा साहित्यकार सांवर दइया रै आंगणै जल्मिया डॉ. नीरज दइया एम.ए. (हिंदी-राजस्थानी), बी.एड. कर’र ‘निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध’ विषय माथै पीएच.डी. करी। राजस्थानी में लघुकथा संग्रै- भोर सूं आथण तांई, काव्य-संग्रै- साख, देसूंटो, पाछो कुण आसी, बाल-कथावां- जादू रो पेन, समालोचना- आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई रै अलावा अनुवाद- कागद अर कैनवास, कागला अर काळो पाणी, सबद नाद, देवां री घाटी, ऊंडै अंधारै कठैई, अजेस ई रातो है अगूण आद प्रकाशित। आप मोहन आलोक, कन्हैयालाल भाटी अर देवकिशन राजपुरोहित री कहाणियां रो संचै-संपादन ई करियो तो राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर खातर युवा कवियां रो कविता संकलन मंडाण रो ई संपादन करियो। हिंदी में ई आपरी केई पोथ्यां छप्योड़ी है। आपनै साहित्य अकादेमी नई दिल्ली रो बाल साहित्य पुरस्कार बरस 2014 में अर ‘बिना हासलपाई’ खातर 2017 रो मुख्य पुरस्कार टाळ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी बीकानेर सूं बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार 2005 समेत केई मान-सम्मान अर पुरस्कार मिल्योड़ा।)
 

  • ‘जादू रो पेन’ माथै साहित्य अकादेमी रो बाल साहित्य पुरस्कार मिल्यो अर अबै ‘बिना हासलपाई’ माथै मुख्य पुरस्कार री घोषणा सूं कियां लाग रैयो है?
  • पुरस्कार किण नै आछो नीं लागै। म्हनै चोखो लाग रैयो है पण म्हैं घणै अचूंभै मांय हूं कै ओ इयां कियां हुयो? साहित्य अकादेमी रा भाषा संयोजक डॉ. अर्जुनदेव चारण अर निर्णायकां रो गुण मानूं कै बां बिना किणी आस-उम्मीद रै आ घोषणा कर’र पोथी रो सम्मान करियो। बीकानेर मांय मधु आचार्य ‘आशावादी’ अर बुलाकी शर्मा पछै म्हारै नांव ओ पुरस्कार लिखणो मोटी बात है अर इण बात सूं साफ हुवै कै अकादेमी री निजर फगत पोथी माथै रैया करै।
  • कांई ‘विना हासलपाई’ माथै साहित्य अकादेमी पुरस्कार नै आप एक आलोचकीय दीठ सूं खरो फैसलो मानो?
  • लेखकां मांय घणी बार इयां हुया करै कै कोई पुरस्कार खुद नै मिलै तद बो खरो लखावै अर दूजै नै मिल्यां खोटो। दौड़ मांय दौड़ै तो सगळा ई है पण जीत हरेक री नीं हुय सकै। जियां कै म्हैं आपनै बतायो कै म्हनै घणो अचूंभो हुयो…. इण घोषणा री म्हनै का म्हारै किणी संगी-साथी नै खबर नीं ही। म्हारी आलोचकीय दीठ जे उण नै आप स्वीकारो तो ओ फैसलो फगत इत्तो है कै निर्णयाकां री निजर मांय बरस 2011 सूं 2015 तांई छपी पोथ्यां मांय ‘बिना हासलपाई’ पोथी बां नै सिरै लखावै है। आ पोथी तो पैली ही जिसी ई अबै है, पण अबै देखण-परखण रै नजरियै मांय फरक पड़ैला। बात बस इत्ती है कै जिका पोथी बांची कोनी का सरसरी बांची बै अबै सावळ बांचैला।
  • आपरै जीवण रा बै किसा खिण रैया जिका आपनै साहित्य-रचाव कानी लेयग्या?
  • म्हनै ठाह ई नीं लाग्यो कै कद ओ मारग म्हनै झाल लियो। बाळपणै मांय म्हैं म्हारै जीसा सांवर दइया नै नोखा मांय रावत सारस्वत चलाई जिकी राजस्थानी परीक्षावां करावतां देख्या, तद म्हैं ई बां परीक्षावां मांय बैठ्यो। घर घणी पोथ्यां ही अर जीसा नै लिखतो देख्या करतो हो। एक दिन बाबा छोटूनाथ स्कूल रै प्रार्थना सभा कार्यक्रम मांय राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी रै पुरस्कार मिलण री घोषणा हुई तद म्हनै लखायो कै लेखन घणो लूंठो काम हुया करै। म्हैं बां दिनां कवितावां लिखी, जिकी अबै चेतै कोनी। फेर जद 1985 में जीसा नै ‘एक दुनिया म्हारी’ माथै साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल्यो तद बाबै रा बेटा म्हारा भाई ‘बालराही’ नांव री पत्रिका काढी अर उण मांय म्हारी कविता प्रकाशित करी। फेर तो म्हैं युगपक्ष, मरवण, जागती जोत अर माणक आद केई पत्र-पत्रिकावां मांय छपण लाग्यो अर आकाशवाणी रै युववाणी मांय कविता-कहाणियां ई बांचण लागग्यो हो।
  • आपरी साहित्य-जातरा माथै आपनै किण रो प्रभाव लखावै?
  • जीसा सांवर दइया अर बां रै समकालीन केई लेखकां रो प्रभाव म्हैं मानूं। बाळपणै मांय म्हैं हरदर्शन सहगल अर महेशचंद्र जोशी आद नै जीसा सूं चुन्नीलालजी री होटल माथै मिलता देख्या करतो हो। सहगल साहब नै म्हैं साईकिल साब कैया करतो हो अर बां कोई बाल पोथी ई टाबरपणै मांय म्हनै भेंट करी तो महेशचंद्र जोशी म्हनै ‘मोम का घोड़ा’ उपन्यास बाळपणै मांय म्हनैं अर म्हारै भाई नै नांव लिख’र भेंट करियो हो। म्हारै घर मांय लगैटगै सगळा लेखकां री पोथ्यां ही जिण मांय सूं केई पोथ्यां म्हैं बांची। रूसी साहित्य अर हिंदी साहित्य तो हो ई राजस्थानी साहित्य मांय हरावळ, हेलो, राष्ट्रपूजा, ओळमो आद केई पत्रिकावां अर लेखकां सूं म्हैं साहित्य नै देखण-समझण री कोसीस करी जिकी आजैलग पोळा राखी है।
  • आप लगैटगै सगळी विधावां मांय रचाव करियो पण फेर ई आपरी पिछाण एक आलोचक री रैयी है। इणरो कांई कारण है?
  • पिछाण तो आंख मांय हुया करै। जे आपरी आंख आगूंच म्हनै आलोचक रूप देखणी चावै तो म्हैं आपनै आलोचक रूप ई दिखूंला। बियां म्हैं जित्ती ई विधावां मांय काम करियो है मन सूं करियो है। आलोचक बेसी मानीजण रो कारण स्यात ओ हुय सकै कै इण विधा मांय काम कमती हुयो है।
  • आपरो झुकाव आलोचना कानी बेसी क्यूं रैयो?
  • आलोचना लिखणो हरेक रै बस री बात कोनी हुया करै। आलोचक री आपरी दीठ हुया करै। किणी रचना रो सार बतावणो का गुण गावणा आलोचना नीं मानीजै। आलोचना रै नांव माथै अपाणै अठै खींचताण ई हुवती म्हैं देखी है। म्हनै लखावै कै आलोचना मांय जिकी धीजो अर नेठाव दोनूं कानी हुवणो चाइजै उण री आपां रै अठै कमी रैयी है। आलोचना छाती रो काम है। घणा घमीड़ा सैवणा पड़ै। लेखकां री नाराजगी आलोचकां सूं बेगी हुवै। फेर ई कोई नै तो ऐ काम करणा ई पड़ैला। आप इयां जाणै कै म्हैं आ हिम्मत करी अर अबै साहित्य अकादेमी इण हिम्मत नै बधा रैयी है।
  • ‘बिना हासलपाई’ में आप माथै आरोप लागै कै आप आपरा चावा कहाणीकारां नै ई लिया हो?
  • राजस्थानी रा सगळा कहाणीकार म्हारा चावा है। म्हैं आलोचना लिखती वेळा खुद म्हारै जीसा नै ई फगत एक कहाणीकार रूप देखणो-परखणो चावूं तद दूजा री बात तो छोड़ ई दो। ‘बिना हासलपाई’ मांय आधुनिक राजस्थानी कहाणी रै विगसाव नै पच्चीस खास कहाणीकारां रै दाखलै सूं देखण-परखण री कोसीस करीजी है। इण रो ओ अरथाव कोनी कै बाकी रा कहाणीकार चावा कोनी। म्हैं कैवणो चावूं कै आप साधन नै देख रैयो है, जद कै आपनै साध्य नै देखण री जरूरत है।
  • बिना हासलपाई रै आलेखां रा शीर्षक कहाणीकारां री लूंठी रचनावां नै आधार राखता बणावण री बात किण ढाळै सोच मांय आई?
  • ओ कोई आगूंच सोचा-विचारी को काम नीं हो। इण पोथी रो असल रूप मानीता नंद भारद्वाज सूं बंतळ करता साफ हुयो। बां इण पोथी माथै फ्लैप ई लिख्यो। बिना हासलपाई मांय बां कहाणीकारां नै सामिल करण रो जतन बेसी करीज्यो जिणां री चरचा कीं कमती हुई ही। उण बगत म्हारै ध्यान मांय राजस्थानी आलोचना रो बो पख ई रैयो कै जिण रै कारण केई कहाणीकारां रो बगतसर मूल्यांकन कोनी करीज्यो हो। टैमसर आलोचना नीं हुयां लेखन-जातरा तर तर मोळी पड़ती जावै। आलोचना नै टैमसर नवी रचनावां रो वाजिब तोल-मोल अर कूंत करणो चाइजै। आलोचना सूं रचनाकार अर रचना नै पुखता मारग मिलै। हुयै काम अर नवी दीठ री बगतसर गिनार जरूरी है।
  • कांई कारण है कै आज री कहाण्यां बातपोसी अर कथात्मकता सूं अळधी हुवती जाय रैयी है?
  • बातपोसी लोककथावां मांय जिण ढाळै मिलै बो एक जुग हो जिको इतिहास री बात है। कहाणी मांय कथात्मक स्तर माथै प्रयोग हुवतां रैया है। आप भंवरलाल ‘भ्रमर’ री बातां नै देखो जिकी बरसां पैली लिखी पण चरचा मांय ‘उकरास’ रै मारफत आई। जूनी लोककथावां दांई राजा अर मैल-माळिया तो आज री कहाणी मांय कोनी मिलै पण बगत परवाण लोक रो बदळतो रूप आपां देख सकां। हरेक नवी कहाणी आपरी नवी कथात्मकता रै साथै आवणी चाइजै।
  • आपनै बालकथावां री पोथी माथै साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल्यो अर उण पछै कोई बाल साहित्य री रचना कोनी आई, कांई अबै इण पुरस्कार पछै आलोचना लिखणी बंद समझां?
  • बाल कहाणियां म्हैं बरसां पैली लिख्या करतो हो। माणक मांय केई बाल कहाणियां प्रकाशित हुई। ‘जादू रो पैन’ पोथी प्रकाशित हुवण मांय प्रकाशक घणो टैम लियो। मानूं कै बाल साहित्य पेटै काम हुवणो चाइजै अर म्हैं काम करूंला ई पण देखो कद हुवै। किणी री फरमाइस सूं नीं लिख सकूं। म्हनै म्हारै कविता संग्रै ‘साख’ री कविता चेतै आवै- ‘कसमसीजतो-कसमसीजतो सीझ परो / फगत लिखूं कीं ओळ्यां / अर मुगती पाऊं / उमर री पीड़ सूं / काढूं कांटा डील सूं / अर उण पीड़ पाछलै / सुख नै / जद जद भोगूं / लोग कैवै- / लिखी है कविता।’ पुरस्कार पछै आलोचना लिखणी बंद मत समझो, म्हैं बाल साहित्य अर आलोचना दोनूं पेटै घणो कीं करण री मन मांय राखूं।
  • आप आलोचना रो विषय पोथी मांय फगत कहाणियां क्यूं राख्यो, दूजी विधावां ई घणी है नीं?
  • ‘बिना हासलपाई’ सूं पैली जिकी पोथी ‘आलोचन रै आंगणै’ साम्हीं आई उण मांय केई विधावां वाबत काम है। म्हैं आलोचना बरसां सूं मांडतो रैयो अर उण मांय सूं की टाळवां आलेख पैली पोथी मांय हा। म्हारो मानणो है कै हरेक विधा माथै न्यारी न्यारी आलोचना पोथी हुया ई बात बणैला। भेळ-सेळ अठीनै-बठीनै लिख्योड़ा आलेख भेळा कर’र पोथी रूप राखणा बियां तो ठीक है पण उण सूं बेसी मेहतावू काम विधागत करिया ई हुवैला।
  • राजस्थानी कहाणी री अबार री दसा-दिसा बाबत आपरो कांई कैवणो है?
  • आप डॉ. अर्जुनदेव चारण अर म्हारी कहाणी-आलोचना री पोथी बांच’र अबार तांई री कहाणी री दसा-दिसा बाबत कर जाणकारी लेय सको। जे एक ओळी मांय बात कैवणी हुवै तो कैयो जाय सकै कै कहाणी पेटै खासा ढंगसर काम हुयो है।
  • क्यूं आज ई राजस्थानी कहाणी दूजी भारतीय भाषावां साम्हीं टिकती कोनी लखावै?
  • राजस्थानी कहाणी रै टिकण अर नीं टिकण रो आपरो आधार कांई है? जे राजस्थानी कहाणी नै बीजी भारतीय भाषावां री कहाणी सूं आप तुलनात्मक रूप सूं देखोला तो ठाह लागैला कै आपणी कहाणियां खासा दमदार है। इण बात डॉ. कृष्णा जाखड़ री पोथी ‘नापीजतौ आभौ’ ई पुखता करै। आप माणक अर दूजी पत्रिकावां मांय भारतीय भाषावां सूं अनूदित छप्योड़ी कहाणियां देखो-बांचो। राजस्थानी नवी कविता री इणी ढाळै री परख खातर म्हैं ‘सबद-नाद’ पोथी मांय भारतीय कवितावां रो राजस्थानी अनुवाद करियो हो।
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा पेटै आपरा कांई विचार है?
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा अबै आपरै ठावै मुकाम माथै है। उपन्यास री बात करां तद आपां नै ओ ई विचार करणो चाइजै कै राजस्थानी मान्यता अर प्रकाशन रै संकट बिचाळै इण विधा मांय करणो घणो अबखो है। फेर ई लखदाद है उपन्यासकारां री छाती नै बां खासो काम करियो है।
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा आलोचना पेटै आप कांई कर रैया हो?
  • राजस्थानी उपन्यास जातरा पेटै आलोचना पोथी ‘आंगळी-सीध’ बेगी ई आप बांच सकोला।
  • थे आलोचक रूप कथा विधा रै मरम नै ओळखो तद खुद कहाणियां का उपन्यास लेखन क्यूं नीं करियो?
  • किणी साग रो स्वाद बतावणो अर साग बणावणो दोनूं जुदा बातां है। फेर पाक कला दांई लेखन मांय किणी सूत्र का फार्मूला सूं कोई सफल रचना लिखीजती हुवती तो कमी ई किण बात री ही। आपनै बता देवूं कै म्हैं केई कहाणियां ई लिखी अर ‘फफूंदी’ नांव सूं कहाणी माणक मांय बरसां पैली जद म्हैं डूंगर कॉलेज में पढ़तो हो तद छपी। कहाणियां रो संग्रै नीं आयो पण लघुकथा संग्रै छप्यो। म्हैं कहाणी लेखन मांय लगोलग नीं रैय सक्यो। मन री तो बात आ है कै उपन्यास लिखण री ई जीव मांय घणी बार आवै। एक’र लिखणो चालू ई करियो पण कीं पानां पछै बो अटकग्यो।
  • कैयो जावै कै आलोचना रै काम मांय ओळमा बेसी शाबासी कमती मिलै, आपरो कांई मानणो है?
  • आलोचना में ‘हासलपाई’ चालै कोनी। म्हैं किणी रै ओळमै का शावासी री परवाह कोनी करूं। म्हनै जिकी बात ठीक लागै म्हैं उण नै लिखण रो प्रयास करूं। किणी रचना री खोज-खबर लेवतां आलोचना नै ई रचना रूप थापित करण रो म्हैं हिमायती हूं।
  • कांई आपनै नीं लागै कै आपरो आलोचक रूप आपरै कवि रूप नै खायग्यो है?
  • अलोचक हुवण सूं म्हारै कवि रो कवळास जरूर कीं कमती हुयो है। कविता मांय जिकी अबोट दीठ हुया करै उण माथै जांचण-परखण रा सवाल बधग्या है। आलोचक रूप कवि नै खायग्यो आ बात कोनी मानूं पण हां आ कैय सकां कै म्हारै कवि री भावुकता कमती हुयगी।
  • आप मौलिक लेखन साथै अनुवाद ई करता रैवो, इण रो कांई कारण है? इयां तो नीं कै जद मूळ नीं लिखीजै तद अनुवाद करिया करो हो?
  • मूळ लेखन साथै अनुवाद ई जरूरी है। अनुवाद रै पाण आपां दोय भाषावां बिचाळै पुळ बणावां बो लेखन अर दीठ नै मजबूत करै। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना आद नै राजस्थानी मांय लावण सूं म्हारै लेखक-आलोचक नै नवी दीठ मिली। भासा अर भावां री बारीकी नै आपां अनुवाद सूं ई सीख सकां। म्हारै खातर अनुवाद असल मांय अनुसिरजण है, जिण मांय सिरजण पछै रो एक दूजो सिरजण ई सुख देवणियो है। जियां नाटक मांय आपां अभिनय करां ठीक बियां ई अनुसिरजण मांय उण मूळ सिरजण-सुख नै भोगण रो जतन करा।
  • आलोचक रूप आप आपरै अनुवाद मांय सगळा सूं चावी अर मेहतावूं पोथी किसी मानो?
  • आलोचक रूप राजस्थानी मांय म्हैं म्हारै अर बीजा रै सगळै काम नै मेहतावूं मानूं। इण मांय बात उगणीस-इक्कीस री हुय सकै। कोई काम मन सूं करियोड़ो है तो उण नै कमती नीं समझणो चाइजै। फेर ई म्हारो मानणो है कै कविता पेटै ‘सबद-नाद’, ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ अर ‘अजेस ई रातो है अगूंण’ म्हारी महतावूं पोथ्यां है जिण री परख हुवणी चाइजै। डॉ. नंदकिशोर आचार्य अर सुधीर सक्सेना री टाळवीं कवितावां रो अनुसिरजण करियो उण मांय नंदकिशोर जी तो पूरी राजस्थानी जाणै-समझै, छप्यां पैली बां अनुसिरजण नै आंख्यां मांय सूं काढ’र पास कर दियो तद म्हैं समझूं राजस्थानी कविता पेटै बा पोथी मेहतावूं हुयगी है। बाकी पोथ्यां ई कम मेहतावूं कोनी।
  • केई कहाणीकारां री कहाणियां रो संचै-संपादन री योजना कियां बणी?
  • आधुनिक रास्थानी कहाणी विकास जातरा देखता म्हनै लखायो कै कहाणीकार मोहन आलोक रो संग्रै नीं आयां बै फगत कवि रूप ई ओळखीज रैया है, इणी ढाळै कन्हैयालाल भाटी अनुवाद रूप ई जाणीज रैया है। मोहन आलोक री कहाणियां अर पछै कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां पोथ्यां प्रकाशित हुयां आं दोनूं रै बिसर चुक्यै कहाणीकार नै आलोचना चेतै करियो। देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां रो संचै ई लारलै बरस साम्हीं आयो है। भळै ई केई काम करण री जीव मांय है। कैवण नै तो कैय दूं कै ‘सांवर दइया री टाळवीं कहाणियां’ कर रैयो हूं पण कोई काम प्रकाशित हुयां ई उण पेटै चरचा करणी चाइजै। केई बातां मन मांय है, पूरी हुयां देखो।
  • ‘मंडाण’ अर ‘जागती जोत’ रै संपादन रा आपरा अनुभव कांई रैया?
  • ‘मंडाण’ रै मारफत राजस्थानी मांय पैली बार 55 युवा कवियां री कवितावां री ओळख करीजी। अकादमी नै घणा घणा रंग कै बा म्हनै ओ मौको दियो। जागती जोत रो ई लगैटगै साल खंड संपादन करियो अर म्हारो मानणो है कै संपादन रो काम घणो बगत मांगै। फगत आयोड़ी रचनावां नै भेळी कर’र छापण नै देवणो संपादन नीं हुवै। संपादक री जिम्मेदारी केई केई मोरचा माथै हुवणी चाइजै।
  • आप एक पत्रिका ई काढ़ी- ‘नेगचार’। बा बंद क्यूं हुयगी?
  • ‘नेगचार’ पत्रिका रा तीन अंक निकाळ्या हा। फेर राज री नौकरी मांय अठी-उठी हुयग्यो। पत्रिका निकाळण रा पुखता साधन अर टीम हुयां ई ओ काम पार पड़ै।
  • राजस्थानी मांय नवा लिखारा कमती देखण नै मिलै का कैवा कै युवा वर्ग साहित्य सूं अळगा हुवतो जाय रैयो है? इणरो कारण आप कांई मानो?
  • मोटो कारण रोजगार सूं राजस्थानी जुड़्योड़ी कोनी। भाषा अर साहित्य मिनख नै संस्कार देवै अर आज रै दिन युवावां री चावना संस्कार सूं बेसी कार नै लेय’र देख सकां। जिण दिन राजस्थानी पेट रै सावाल नै परोटैला उणी दिन सूं युवा वर्ग इण दिस ध्यान देवैला। लोक सेवा आयोग मांय राजस्थानी नै कणाई लगावै अर कणाई हटावै। राजस्थान री जनता नै आपरी भाषा साहित्य अर संस्कृति पेटै ऊभो हुवणो पड़सी। राजस्थानी मांय घर फूंक तमासा देखणा पड़ै इण अबखै बगत आ जातरा अठै तांई पूगी अर आगै चालती जाय रैयी है आ घणी मोटी बात है।
  • राजस्थानी मानता री बात माथै कांई फगत राजनेता ई दोसी है?
  • राजनेता ई तो आपां मांय सूं ई बण्या है। बां मांय इच्छा सगती हुयां ओ काम कणाई हुय जावतो। फेर राजनेता तो फगत निमित है, असल दोस आपणै अठै री जनता रो है। राजस्थानी रो मुद्दो जन आंदोलन बणयो है, पण हाल इण दिस भळै चेतना हुयां ई ओ काम पार पड़ैला।
  • मानता खातर साहित्यकार अर आप कांई कर रैयो हो?
  • मानता खातर एक तरीको मरणो मांडणो हुवै तो दूजो तरीको आपरै ढंग सूं साहित्य रो विगसाव ई हुया करै। साहित्यकार जनता नै जगावण रो काम कर रैया है। म्हैं राजस्थानी साहित्य मांय इण ढाळै रो काम करणो चावूं कै आपां सगळा रो काम ई बोलण लाग जावै। थोथी बातां मांय सार कोनी हुया करै। अंत पंत काम ई बोलैला। मानता री माळा फेरियां ई जे मानता मिलती हुवती तो कदैई मिल जावती। राजस्थानी आपां खातर आत्मा रो सवाल है।
  • अकादमी मांय अध्यक्ष अर दूजा पद खाली हुवण सूं काम-काज बंद सो है। इण सारू आपां नै कांई करणो चाइजै?
  • कला, साहित्य अर संस्कृति नै सरकार प्राथमिकता मांय लेवै तो इण ढाळै री समस्यावां कोनी आवै। आपां फगत इण पेटै सामूहिक रूप सूं आपां री मांग राख सकां। दूजो तरीको ओ है कै आपां खुद आपां रै समाज नै इत्तो सक्षम बणावां कै बो कला, साहित्य अर संस्कृति रै कामां नै बधावण मांय सैयोग करै।
  • बीकानेर मांय विश्वविद्यालय तो खुल्यो पण अजेस राजस्थानी विभाग नीं खुलियो, इण पेटै आप कांई कैवोला?
  • राजस्थान मांय बीकानेर-जोधपुर साहित्य रा गढ मानीजै। बीकानेर विश्वविद्यालय मांय राजस्थानी विभाग खुलणो ई चाइजै। आपां रै अठै रा संगठन अर आपां सगळा मिल’र इण मांग नै पुखता ढंग सूं राखालां तो म्हनै पतियारो है कै ओ काम बेगो ई हुवैला।
  • राजस्थानी विभाग मांय साहित्य अर शोध रा काम हुवैला फेर ई आ सून कियां है?
  • हरेक काम रो आपरो एक तरीको हुवै। कोई काम चायै बो सरकारी हुवो का गौर सरकारी उण नै ढंग रै लोगां रो सैयोग मिल्यां बेगो हुय जावै। साहित्य अर शोध रो घणो मेहतावू काम असल में मानता मिल्या कीं गति पकड़ैला। आपां नै इण अबखै बगत मांय एकठ रैवणो है। राजस्थानी रो कोई काम किणी रै रोक्या अबै रुक नीं सकैला।
  • आप खुद नै राजस्थानी लेखक मानो का हिंदी लेखक? आपनै घणो मान-सम्मान राजस्थानी मांय मिल्यो, फेर हिंदी में क्यूं लिखो?
  • म्हैं खुद नै राजस्थानी लेखक मानण मांय गुमेज करूं। हिंदी मांय लिखणो म्हारो अपराध कोनी। राजभाषा हिंदी रो म्हैं सम्मान करूं अर अबार हिंदी म्हारै रोजगार री भासा है।
  • लेखन मांय आपरी आगै री कांई-कांई योजनावां है?
  • ख्याली पुलाव दांई योजनावां तो घणी है। बस आप ओ भरोसो राखो कै म्हैं योजनावां नै बगत परवाण पूरी करूंला। म्हारी योजना है म्हारी योजनावां नै पूरी कर सकूं।

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डॉ. नीरज दइया, सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर (राज.) 334003 मो. 9461375668
डॉ. नमामीशंकर आचार्य, कोटगेट रै मांय, जोसीवाड़ो, बीकानेर (राज.) 334001 मो. 9829321692

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