नंद रा छंद (आलोचना)

नंद रा छंद (आलोचना) डॉ. नीरज दइया

नंद भारद्वाज की हथाई (साक्षात्कार)

नंद भारद्वाज की हथाई (साक्षात्कार) संपादक : डॉ. नीरज दइया

अगनसिनान / डॉ. अर्जुन देव चारण / अनुवाद : डॉ. नीरज दइया

चुनौतिओं का काव्य-रूपक
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अर्जुन देव चारण मुझे हर मुलाकात में एक नयी जिज्ञासा, नयी समस्या और नये शब्दान्वेषित उच्चारण की तरह लगते हैं। एक ओर अनुसंधान दूसरी ओर हमारे समय के महान कथाकार विजयदान देथा की तरह प्रयोगशील लगते हैं। वे राजस्थान में पैदा हुए लेकिन शैलाधिराज तनया के जीवन को अपनी कविता का लक्ष्य बनाया। संबंधों की मर्यादा और सभ्यता का तकाजा सब कुछ सती के चरित्र में उजागर हुआ है। लेकिन समस्या महिलामुखी नहीं पुरुषमुखी ज्यादा है। खड़ी बोली हिंदी के अनुरूप राजस्थानी का मिश्रण, कविता के प्रवाह को एक उक्ति वैशिष्ठ्य प्रदान करता है। अपना मूल्यांकन करते हुए राजपुत्री पार्वती कहती है कि- ‘याद रखना था मुझे कि बेटी को विदा करने के बाद/ गरीबों की झोंपड़ियां आंसू बहाती होंगी/ …. किंतु राजमहलों के कठोर कपाट/ काठ बने/ अधिक कठोर हो जाते हैं।’ यहीं नदियों के स्वभाव से बेटियों के स्वभाव की तुलना करते हुए सती कहती है- ‘पहाड़ों से निकली नदियां कभी लौटकर पहाड़ों की तरफ नहीं आतीं…।’

स्त्री का संघर्ष और उसका अपमानित जीवन भगवान कहलाने वाले राम के यहां भी न्याय नहीं पाता है। हर बार स्त्री को ही अग्नि परीक्षा देनी होती है। हर बार उसे ही संवेदनहीन पत्थर की तरह ठुकराया जाता है। जैसे सचमुच वह देह में होते हुए भी विदेह हो।

सती, सीता, अंबा, पद्मनी, मीरा, मारवाड़ की रूठी रानी उमादे (पता नहीं इस काव्य नाटक में अहल्या कैसे छूट गयी? उदयपुर की राजकुमारी कृष्णा तक तो इस में शामिल है। शायद अहल्या की कहानी तो बनती है, भूगोल नहीं बनता, अहल्या कहीं की भी हो सकती है।) सबको तरह-तरह से अग्निस्नान करने पड़े हैं।

इन कव्य रूपकों में अर्जुन देव चारण ने स्त्री के साथ घटित विवशताओं और अन्यायों को आख्यान का विषय बनाया है। इधर हिंदी में कव्य रूपकों का अभाव दिखाई देता है। खासकर धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ के बाद। चारण ने इन थीमों को एक जगह संग्रहीत कर उस अभाव की ओर भी ध्यान दिलाया है। पौराणिक प्रसंगों के वे अच्छे अध्येता और ज्ञाता हैं। दुर्गा देवी को जो ईश्वरीय गरिमा दी गयी है असल में, उस  कथा में भी स्त्री को भोग्या समझने का तिरस्कार भाव शामिल है। लेकिन स्त्री की आत्मिक शक्तियों का पुनरोदय भी दुर्गासप्तशती में दिखायी देता है। मुझे उम्मीद है कि इस जटिल विषय पर भी नाटककार अपनी मति और बैद्धिक गति को आजमायेंगे। नीरज दइया को अच्छे अनुवाद के लिए बधाई।

– लीलाधर जगूड़ी

राजस्थानी मिट्टी की सौंधी महक / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

कहानी सुनना एक बच्चे की इच्छा भर नहीं है, मूल मानवीय-स्वभाव है। कहानी की शुरुआत संभवत: तब से हुई जब आदमी ने बोलना सीखा। लोककथाओं के रूप में एक समृद्ध विरासत विश्व भाषाओं की धरोहर है जिसे हम कहानी के प्रति हजारों सालों से इंसानी प्रेम का प्रमाण मान सकते हैं। इस मामले में राजस्थानी भाषा की संपन्नता सर्वविदित है। राजस्थानी लोक-साहित्य में हजारों लोककथाएं मौजूद हैं, जिनमें परंपरा, इतिहास, भूगोल और धर्म सहित जीवन के तमाम पक्षों का अंकन मिलता है। सदियों से श्रुति परंपरा से लोग के कंठों में रची-बसी ये कथाएं अपने समय-समाज की आकांक्षाओं एवं अवरोधों का प्रमाणिक दस्तावेज है। यह कहना तर्कसंगत नहीं होगा कि राजस्थानी की आधुनिक कहानी का विकास सीधे तौर पर लोककथाओं से हुआ है, मगर आधुनिक कहानी के बीज को पुष्पित-पल्लवित होने के लिए लोककथाओं ने उर्वर जमीन अवश्य तैयार की है। राजस्थानी कहानी का इतिहास मोटे तौर पर सौ साल से ज्यादा पुराना है। राजस्थानी की पहली कहानी का श्रेय शिवचंद्र भरतिया की ‘विश्रांत प्रवासी’ को दिया जाता है। आधुनिक कहानी के विकास के पीछे कमोबेश वही कारण रहे हैं जिनसे विदेशी व देशी साहित्य में शार्ट स्टोरी विधा का विकास हुआ। राजस्थानी कहानी का वर्तमान स्वरूप तो आजादी के बाद उन्नीसवीं सदी के छठे-सातवें दशक में ही बन पाया जब मुरलीधर व्यास व नानूराम संस्कर्ता के कहानी-संग्रह प्रकाश में आए।
विगत छह-सात दशकों की यात्रा के बाद राजस्थानी कहानी जगत आज भरा-पूरा है। प्रदेश के विस्तृत भूभाग में सैकड़ों कहानीकार जग-जीवन के सच को कहानियों में विविध रूपों में ढाल रहे हैं। वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ “101 राजस्थानी कहानियां” कहानी विधा के सामर्थ्य का प्रमाण हैं। पांच सौ से ज्यादा पृष्ठों में 101 कहानियों के हिंदी अनुवाद की यह प्रस्तुति हिंदी जगत को राजस्थानी कहानी की विविधता एवं वैभव से साक्षात करवाती है। भूमिका के रूप में विद्वान संपादक का “राजस्थानी कहानी : कदम-दर-कदम” शीर्षक से शोध-आलेख कहानी की दशा-दिशा जाने के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। राजस्थानी की आधुनिक कहानी-यात्रा के विकास को चार काल-खंडों में वर्गीकृत करते हुए डॉ. दइया ने लिखा है कि कहानी के वैश्विक परिदृश्य में राजस्थानी के अनेक हस्ताक्षरों ने भारतीय कहानी को पोषित किया है। राजस्थानी कहानी भी भारतीय कहानी के विकास में कदम-दर-कदम साथ चल रही है। कहना न होगा, भारतीय कहानी का रूप-रंग भारतवर्ष की क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों से ही निर्मित होता है। राजस्थानी सहित देश की अन्यान्य भाषाओं की कथा-यात्रा को जाने समझे बगैर भारतीय कहानी के संप्रत्यय का सही रूप में आकलन करना संभव नहीं है।
इसमें संदेह नहीं है कि अनुवाद-पुल के माध्यम से भाषाओं के मध्य आवाजाही हो सकती है। अनुवाद असल में दो भाषाओं के मार्फत दो विविधतापूर्ण संस्कृतियों को नजदीक लाकर जोड़ता है। राजस्थानी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां हिंदी के माध्यम से देशभर की हिंदी-पट्टी के करोड़ों पाठकों के साथ अन्य भाषाओं के कहानी प्रेमियों को राजस्थानी कहानी के आस्वादन का अवसर एवं मूल्यांकन दृष्ति प्रदान करती है। वरिष्ठ कवि-संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना का इस संग्रह के आरंभ में अभिमत देखा जा सकता है- “यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थ-गर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी मिट्टी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और साध्य उपक्रम किया है।”
संग्रह में शामिल 101 कहानीकारों में राजस्थानी की भौगोलिक विविधता का समुचित प्रतिनिधित्व हुआ है। ये कहानियां राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि की परिचायक तो है ही, राजकीय सरंक्षण के बिना संघर्षरत भाषा के कलमकारों के जीवट का भी प्रमाण है। किताब के रचनाकारों की सूची देखें तो इसमें राजस्थानी कहानी को अपने पैरों पर खड़ा करने वाले यशस्वी कहानीकारों में यथा नानूराम संस्कर्ता, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, विजयदान देथा, करणीदान बारहठ, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, बैजनाथ पंवार, श्रीलाल नथमल जोशी आदि की कहानियां शामिल हैं, वहीं कहानी को आधुनिकता के मार्ग अग्रसर करने वाले प्रमुख कहानीकारों में सांवर दइया, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मनोहर सिंह राठौड़, रामस्वरूप किसान, बुलाकी शर्मा, मालचंद तिवाड़ी आदि की कहानियां संग्रह में संकलित है। राजस्थानी के समकालीन महत्त्वपूर्ण कहानीकारों में चेतन स्वामी, भरत ओला, सत्यनारायण सोनी, मनोज कुमार स्वामी, प्रमोद कुमार शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’ आदि भी पुस्तक का हिस्सा बने हैं तो महिला कहानीकारों में चूंडावत के अलावा जेबा रशीद, बसंती पंवार, सावित्री चौधरी, आनंद कौर व्यास, सुखदा कछवाहा, रीना मेनारिया की चयनित कहानियां किताब में शामिल की गई हैं।
राजस्थानी कहानी के व्यापक और विस्तृत भवबोध को प्रस्तुत करती संग्रह में अनेक यादगार कहानियां देखी जा सकती है। ऐसा नहीं है कि यह राजस्थानी कहानी को हिंदी में ले जाने का पहला प्रयास हो, इससे पूर्व भी राजस्थानी कहानियों के हिंदी अनुवाद हेतु कतिपय प्रयास हुए हैं मगर एकसाथ शताधिक कहानियों को हिंदी जगत के माध्यम से विश्व साहित्य के समक्ष रखने का यह पहला प्रयास है। निश्चय ही इस ग्रंथ से राजस्थानी कहानी की वैश्विक उपस्थिति दर्ज होगी और सेतु भाषा हिंदी के माध्यम से अनूदित होकर राजस्थानी कहानी देश-दुनिया की अन्य भाषाओं में पहुंचेगी। कहना न होगा यह दुष्कर कार्य योग्य संपादक डॉ. नीरज दइया की कुशलता व समर्पित अनुवादकों के सद्प्रयासों का सुफल है। असल में ऐसे प्रयास अकादमियों व अन्य संसाधनों से युक्त संस्थानों को करने चाहिए, क्योंकि ऐसे कामों में अत्यंत श्रम व अर्थ की आवश्यकता होती है। इस ग्रंथ को पाठकों तक पहुंचाने के लिए के. एल. पचौरी प्रकाशन वाकई बधाई के हकदार हैं जिसने राजस्थानी मिट्टी की महक को हिंदी के माध्यम से देश-दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठाया है। कुंवर रवीन्द्र के सुंदर आवरण से सुसज्जित यह संग्रह निश्चय ही कहानी प्रेमियों के लिए संकलन योग्य उपहार है।
डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
144 लढ़ा निवास, महाजन, बीकानेर
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101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102 ; प्रकाशन वर्ष : 2019 ; पृष्ठ : 504 ; मूल्य : 1100/-
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SIVIRA

राजस्थानी कहानी का वर्तमान

दस कहानी-संग्रहों पर केंद्रित आलोचना-पुस्तक / संपादक : डॉ. नीरज दइया
राजस्थानी कहानी का वर्तमान संपादक- डॉ. नीरज दइया।
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।। मायड़ भाषा के लिए दमदार प्रयास।। राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफ़िर’
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डॉ. नीरज दइया सम्पादित यह ग्रंथ एक तरफ राजस्थानी कहानी लेखकों को प्रोत्साहित करने का बड़ा प्रयास है दूसरी तरफ उन लोगों तक राजस्थानी साहित्य पहुंचाना है जो मानते हैं कि राजस्थानी भाषा नहीं; बोली है।
संपादक ने मायड़ भाषा के प्रति गर्व व्यक्त करते हुए लिखा है – यह भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। राजस्थानी भाषा के रचनाकारों की भावना को संपादक ने वजनदार शब्दों में अभिव्यक्त किया है।
डॉ. दइया ने भाषा के मुद्दे को जोरदार शब्दों में उठाते हुए भारतीय कहानी साहित्य में क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान को पुनर्स्थापित किया है।
आज की राजस्थानी कहानी अन्य भाषाओं की आधुनिक कहानियों से कहीं भी कमतर नहीं है। बात या लोककथा की परिपाटी का जो ठप्पा राजस्थानी कहानी पर लगा हुआ था वह अब उतर चुका है।
उन्होंने सन 1956 से वर्तमान तक के राजस्थानी कहानी-सृजन को चार अध्यायों में बांटते हुए राजस्थानी कहानी के नामचीन कहानीकारों के कहानी-संग्रहों, कहानियों व प्रवृत्तियों को भी समेटने का सराहनीय प्रयास किया है।
राजस्थानी कहानी यात्रा को स्पष्ट करते हुए डॉ. नीरज दइया ने केवल अपने विचार ही नहीं बल्कि अनेक साहित्यकारों यथा- रामेश्वरदयाल श्रीमाली, डॉ. अर्जुनदेव चारण, कुंदन माली, सांवर दइया, गोरधन सिंह शेखावत आदि के उद्धरण भी सम्मिलित करते हुए राजस्थानी कहानी के अतीत और वर्तमान को शानदार तरीके से प्रस्तुत किया है। 10 कहानीकारों की कहानियों पर 10-10 साहित्यकारों द्वारा आलोचना और उसे पुस्तक रूप में संजोने का प्रयास राजस्थानी भाषा के साहित्य में विशेष योगदान है।
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।। पुस्तक स्वयं में एक संदर्भ ग्रंथ ।। अरविन्द सिंह आशिया
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डॉ . नीरज दैया एक अद्भुत दृष्टि रखते है साहित्य सृजन व एवं अवलोकन की । रचा जा रहा है राजस्थानी में मगर विपुल नहीं क्योंकि हमारी भाषा पिछले सात दशकों से प्रतीक्षारत् है अपनी अस्मिता हेतु इसलिए सिर्फ वो लिख रहे है जो जो झूंझार है … शेष ने शायद अपने घोड़े अवसर की छाया में बाँध लिए है ।
लिखने में भी गद्य नहीं के बराबर .. क्योंकि गद्य समय व श्रम दोनों माँगता है । ऐसा नहीं कि कविता लिखना आसान है पर एक दूसरे की पीठ खुजाने वाले अकवि तथाकथित कविता में में इतने अधिक है (डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल सर के मुताबिक़ अकेले जयपुर में पचास हज़ार के क़रीब)कि कविता ही शर्मिन्दा है पर वो पठ्ठे ख़ुद को बेशर्मी से कवि कहते है ।
सो ऐसे मे राजस्थानी कहानी रचन पर यह पुस्तक स्वयं में एक संदर्भ ग्रंथ है । मेरी बधाई देने वाले मित्रों से अनुरोध है कपड़े झटक के रवाना होने के बजाय इसे ख़रीदे व अपनी धरोहर बनाएँ ।
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।। कहानी यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव ।। मदन गोपाल लढ़ा
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वरिष्ठ कवि आलोचक डॉ नीरज दइया द्वारा संपादित “101 राजस्थानी कहानियां” एक ऐसी किताब है जिसे राजस्थानी कहानी यात्रा का एक उल्लेखनीय पड़ाव कह सकते हैं। निश्चय ही इस किताब के माध्यम से राजस्थानी कहानी की महक हिंदी के विस्तृत आंगन में पहुंचेगी। कहना न होगा, कथ्य और शिल्प की दृष्टि से राजस्थानी कहानी विश्व की किसी भी किसी भी भाषा की कहानियों से कहीं कमतर नहीं है। इस किताब को पढ़ते हुए सहज रूप में इस तथ्य को महसूस किया जा सकता है। यह संग्रह इस बात की भी साख भरता है कि विषय वस्तु की दृष्टि से राजस्थानी कहानी का दायरा ग्रामीण जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि नगरीय और महानगरीय जीवन के साथ साथ तकनीक के इस युग में मानवीय संवेदनाओं का विश्वसनीय अंकन राजस्थानी कहानीकारों ने बखूबी किया है। राजस्थानी की पहली कहानी से लेकर 21वीं सदी के दूसरे दशक तक की कहानियों का जायका आप इस संग्रह के माध्यम से ले सकते हैं। एक सौ वर्षों से अधिक कालखंड को करीब 500 पृष्ठों की इस पुस्तक में समेट कर डॉ नीरज दइया जी ने एक ऐतिहासिक कार्य किया है।
आमतौर पर अनुवाद के अभाव में भारतीय भाषाओं का श्रेष्ठ साहित्य व्यापक परिदृश्य में अनदेखा रह जाता है। राजस्थानी कहानी के मामले में भी यह बात खरी उतरती है। राजस्थानी के अत्यंत प्रतिभावान कहानीकार अनुवाद के अभाव में भारतीय साहित्य के विहंगम परिदृश्य में नोटिस में नहीं आ पाए। यह किताब हिंदी के माध्यम से राजस्थानी कहानी के उज्जवल पक्ष को सामने लाने का श्लाघनीय प्रयास प्रयास है। निश्चय ही मान्यता के लिए जूझती राजस्थानी भाषा के सामर्थ्य व वैभव से दुनिया भर को अवगत करवाने के लिए ऐसे प्रयासों की महती आवश्यकता है। डॉ दइया ने इससे पूर्व भी इस प्रकार के अनेक कार्य किए हैं जिनमें “राजस्थानी कहानी का वर्तमान”, “मंडाण” “सबद नाद” आदि। इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए प्रकाशक, संपादक, अनुवादक व कहानीकार साधुवाद के अधिकारी हैं। उम्मीद है हिंदी पट्टी के पाठकों के साथ लेखक व आलोचक भी राजस्थानी कहानी के रूप रंग को प्रामाणिकता से जानने के लिए इस किताब पर उदारता से स्नेह बरसाएंगे।
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वे जुनून की हद पर काम करने वाले लोगों में से एक है। ऐसे अनेकों काम हैं जो पहली बार उनकी कलम से संभव हुए हैं। राजस्थानी आलोचना की नई जमीन तलाशने का महत्वपूर्ण काम आदरजोग डॉ नीरज दइया ने गत एक दशक में किया है। “राजस्थानी कहानी का वर्तमान” के रूप में नई किताब इस सफर का एक उल्लेखनीय पड़ाव है। हिन्दी भाषा के माध्यम से राजस्थानी कहानी की समालोचना का यह नया प्रयोग वाकई अनूठा है। इस किताब की मार्फ़त राजस्थानी कहानी के रूप रंग की बात दूर तक जाएगी, इसमें संदेह नहीं। गौरतलब है कि आलोच्य पुस्तक में राजस्थानी कहानी की चुनिंदा दस किताबों पर दस-दस टिप्पणियों को प्रस्तुत किया है। भूमिका में संपादक ने राजस्थानीे कहानी की विकास यात्रा व वर्तमान परिदृश्य पर विस्तृत प्रकाश डाला है। कहना न होगा, चर्चा के लिए किताबों का चयन संपादक-आलोचक की पसंद का मसला है। असल में तो यह बीजारोपण है। इस काम को आगे बढाने के लिए खुला मैदान पड़ा है। कल कोई अपनी पसंद की चुनिंदा एक सौ किताबों पर बात करे तो उसका भी स्वागत ही होगा।
बहरहाल इस जरूरी व सार्थक काम के लिए डॉ नीरज दइया को असीम बधाई व लखदाद। किताब प्राप्ति के लिए प्रकाशक से सम्पर्क किया जा सकता है।
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डॉ. दइया संपादित ‘राजस्थानी कहानी का वर्तमान’ 264 पृष्ठों की आलोचनात्मक कृति है। राजस्थानी कहानी साहित्य की खासियत को हिंदी जगत के समक्ष रखने का अनूठा कार्य है यह। इस पुस्तक में राजस्थानी के 10 आधुनिक कहानी संग्रहों पर 10-10 समीक्षाएं शामिल हैं।
-सत्यनारायण सोनी
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‘बारीक बात’ (रामस्वरूप किसान), ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ (बुलाकी शर्मा), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (मधु आचार्य ‘आशावादी’), ‘अगाड़ी’ (राजेन्द्र जोशी), ‘कथा-२’ (अरविन्द सिंह आशिया), ‘मेळौ’ (राजेन्द्र शर्मा ‘मुसाफिर’), ‘मेटहु तात जनक परिताप’ (पूर्ण शर्मा ‘पूरण’), ‘धान कथावां’ (सत्यनारायण सोनी), ‘च्यानण पख’ (मदन गोपाल लढ़ा) व ‘वान्य अर दूजी कहाणियां’ (सतीश छिम्पा) पर केंद्रित कहानी आलोचना-पुस्तक / संपादक : डॉ. नीरज दइया
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101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
प्रकाशन वर्ष : 2019 / पृष्ठ : 504 / मूल्य : 1100/-