काची ई आपी दे / नीरज दइया

मोबाइल बज रहा था। मैंने उसे हाथ में लिया तो स्क्रीन पर एक नाम दिखाई दिया- दिलीप भाई। मुझे यह नाम वर्षों तक अजीज रहा, अब भी है। अब देखिए, मन भी कैसा अजीब है। अभी-अभी यहीं मेरे पास था, पूरे होश-ओ-हवास में था। अब इस नाम को देखते ही वह ना जाने कितनी दूर निकल गया। बिना किसी साधन के मेरा मन जिस शहर में पहुंच गया, उसका नाम अहमदाबाद है। याद के किसी कोने से एक के बाद एक यादों की ना जाने कितनी गठरियां यकायक मेरे सामने खुल रही थी। उस एक क्षण में अनेक बातों और यादों में लिपटा अहमदाबाद मेरे सामने ना जाने इतना कैसे खुल गया कि मेरे पूरे मन-आंगन में वह शहर बिखर गया। उसने मुझे ठीक अपने बीच में लाकर खड़ा कर दिया। वह मुझसे सवाल कर रहा था- ‘पहचाना, हम हैं।’ वर्षों बाद दिलीप भाई के नाम को देखकर मैंने कुछ हैरत और हैरानी में अजीब सी खुशी से फोन रिसीव करते हुए कहा- ‘हलो…।’ मेरा संदेह था कि ट्रू कॉलर जो बता रहा है दिलीप भाई वही है या कोई दूसरे।

किसी सिक्के जैसा खनखनाता हुआ एक शब्द उधर से आया- ‘हेलो’ और साथ ही भरपूर उत्साह में दिलीप भाई कह रहे थे- ‘मैं अहमदाबाद थी दिलीप भाई बोल रहा हूं… पहचाना।’ मैं बेहद खुश था। इतने वर्षों बाद फिर से मैं वही आवाज सुन रहा था, जिसके साथ मैंने एक लंबा वक्त गुजारा था। उत्साह के अतिरेक में मैंने कहा- ‘मोटा भाई! क्यों नहीं पहचाना। आपको कोई कैसे भूल सकता है। सुनाएं क्या हाल है। बधु मजा मा छे…।’

‘हां… इधर यहां सब अच्छे से हैं।’ और उन्होंने अपने पूरे परिवार, हमारे मित्रों की जानकारी देते हुए जाहिर है मुझसे पूछा- ‘आप कैसे हैं?’ मैंने भी यहां की कुशलता कही। एक दूसरे की कुशलता के बाद दो मित्रों में घर-परिवार की कुछ चर्चा हुई- ‘मैंने घर बनवा लिया है और आपने बनवाया कि नहीं।’ ‘मिलने का बहुत मन करता है। कभी इधर आएं तो जरूर मिलें।’ यह सब सामान्य-सी बातें थी। अक्सर ऐसे अवसर पर ऐसा ही होता है। पर हमारी इस बातचीत में मैंने एक गोता अतीत में जानबूझ लगाया और उनसे पूछा- ‘मोटा भाई! जानकी मेडम कैसी है?’ इस पर वे जोर से हंसे और कहा- ‘आपको अब भी सब याद है। अरे भाई उस दिन आपने उन्हें जो ‘डोकरी’ कहा, उसके बाद तो हमारा सारा रस-भंग हो गया। जानते हैं आप, वे तो मुझसे भी पहले रिटायर हो गईं थी। पर अब उनकी कोई खबर नहीं, आपका कहा वह शब्द मुझे याद है। आपके उस शब्द को सोचता हूं तो अब भी हंसता हूं। कैसे आपके एक शब्द ने मेरा पूरा ताजमहल उडा दिया था।’ मैंने कहा- ‘मोटा भाई ऐसा मत कहिए। ताजमहल भला मैंने एक शब्द से कैसे उड़ा दिया। मैं तो आपका बेहद अहसानमंद हूं कि आपने बहुत सी बातें समय पर समझा दी वरना मैं शहीद हो जाता।’

यहां हमारी बातों में कुछ सूत्र और संकेत हैं। इनमें कुछ कहानियां-किस्से हैं। वर्षों बाद उनसे हुए संवाद से कुछ कहानियां किसी बंद मुट्ठी से मेरे सामने खुल कर बिखर रही थी। सूचना-क्रांति तो अब आई है पर पहले भी हम हमारी स्मृतियों से कहीं के कहीं पहुंच जाते थे। ऐसा लग रहा था कि हम दोनों मित्र अपने अतीत में पहुंच कर आस-पास बैठ कर किसी समय में उतरते जा रहे थे। ‘इतने वर्षों बाद आज आपको मेरी याद कैसे आई, नंबर कैसे मिला मोटा भाई’ ऐसे सवाल भी दोस्ती में होते हैं। बातें करने को बहुत थी और बात कुछ ऐसी खास भी नहीं थी। हुआ यूं कि लॉक-डाउन में घर बैठे-बैठे पुराने दिनों को याद करते-करते उन्हें मेरी याद आई। एक दो पुराने मित्रों से उनकी बात हुई और उन्हें मेरे नंबर मिल गए। कोई काम नहीं था। बस हाय-हेलो करना था। अतीत में दफन अनेक कहानियां हाय-हेलो से चहल कदमी करने लगी।

दिलीप भाई और मेरी अनेक कहानियां हैं। इन सभी कहानियों में से किसी एक को निकालना और आपके सामने रखना कठिन काम है। क्योंकि कहानियां आपस में इतनी उलझी हुई होती हैं कि यह तय कर पाना मुश्किल होता है कि कौनसा सिरा किस कहानी का है और कौनसा किसका। कहानियों के अलग-अलग रंग। किसी धागे या डोर से अनेक कहानियां बंधी हुई होती है। ‘ध्वस्त हुए ताजमहल’ और ‘डोकरी’ की यही कहानी बताता हूं, शायद आपकी रुचि हो। आज से बीस साल पहले मैं और दिलीप भाई अहमदाबाद के किसी विद्यालय में पढ़ाते थे। हमारे बीच उम्र का फासला पिता-पुत्र जितना रहा होगा, किंतु उन्होंने कभी इस फासले को हमारे बीच में नहीं आने दिया। उनकी सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष शेष थे और मेरी नौकरी अभी काफी बाकी थी। ऐसा कहा जा सकता है कि वे मंजे हुए खिलाड़ी थे और मैं नया-नया बच्चा था। हमारे बीच एक बड़ी समानता चाय को लेकर रही। दोनों को चाय पीना बहुत पसंद था। विद्यालय में कैंटीन के नाम पर एक चाय की रेहड़ी थी, जिसने कहीं अपना एक कोना बनाया हुआ था।

मुझसे एक बात दिलीप भाई ने उन्हीं दिनों कही थी। चाय के लिए कभी किसी को मना नहीं करना चाहिए। गुजराती समाज में इस बारे में एक मान्यता भी है कि आपके घर कोई आए और अगर वह आपकी चाय नहीं पीए तो यह समझा जाता है कि वह आगंतुक उससे संबंध रखना नहीं चाहता है, और अगर आगंतुक को हम चाय पेश नहीं करें तो अभिप्राय हम आगंतुक से संबंध रखना नहीं चाहते हैं। खैर चाय का तो मैं रसिया था ही पर यह जानने के बाद मोटा भाई की चाय अस्वीकार करना असंभव हो गया। जब भी वे मिलते तो मैं चाय पीने की बात करता।

विद्यालय की प्रातःकालीन प्रार्थना सभा के बाद चाय की रेहड़ी वाला जोनसन रोजाना दूध ले कर आता था और जाहिर है उसके पहले ग्राहक हम दोनों बनने की फिराक में रहते थे। अब समस्या यह थी कि हम दोनों का पहला पीरियड फ्री नहीं था। जैसे ही बेल बजने का समय होता एक कोने से वे निकलते और दूसरे कोने से मैं निकलता। इसका कारण था कि हमारी एक क्लास के छूटते ही दूसरी क्लास होती थी। हम चाय के दीवाने जरा जल्दी में थोड़ा-सा समय चाय के लिए चुराने के अभ्यस्त हो रहे थे। जल्दी से वहां जाते और चाय नहीं बनी होती तो जल्दबाजी में कहते- ‘काची ई आपी दे….’ मुश्किल से दो-तीन मिनिट में यह काम पूरा जरूर करते। कोई पूछता तो हमारे पास अपना तर्क और जवाब भी था कि लगातार पीरियड होंगे तो क्या कोई पांच-सात मिनिट के लिए पानी पीने या वाश-रूम तक आ-जा नहीं सकता। पढ़ाना भी भला कोई दूध देने जैसा काम है कि दो लीटर में थोड़ा कम दे दिया या कि ज्यादा दे दिया। यह तो एक कला है और हमें चाय पीने की छूट दे दी जाए तो हम तीस-चालीस मिनिट की एक क्लास में हफ्ते भर की पढ़ाई भी करवाने का कौशल रखते हैं।

दो चाय के दीवाने क्राइसिस पीरियड में जैसे-तैसे बिलडिंग के किसी कोने से छिपते-छिपाते चाय पीने जोनसन के यहां पहुंचते थे। रास्ते में प्राथमिक विभाग से गुजरते हुए दिलीप भाई प्रायः यह चाहते थे कि प्रधानाध्यापिका जानकी जी को भी चाय पिलाने के लिए साथ ले लिया जाए। उनकी इस चाहना से अक्सर मुझे लगता कि इससे हमारे तीन-चार मिनिट फालतू जाते हैं। एक दिन बिना उनके मन के भावों को समझे मैंने यूं ही अनजाने में कह दिया- ‘छोडिए उस डोकरी को।’ यह डोकरी शब्द उन्हें चुभ गया कि इससे उनके रस-प्रसंग का सारा रंगभंग हो गया। ऐसे यह बनता हुआ कोई ताजमहल ढह जाने का पाप मेरे सिर मढ़ गया।

डॉ. नीरज दइया

Kahani 12-06-2020-01Kahani 12-06-2020

सौ रुपये का नोट / नीरज दइया

मुझे तीन दिन हो गए, घर से बाहर बिल्कुल बाहर नहीं निकला। गली में भी नहीं। वैसे कुछ पड़ौसी गली में बैठ कर बातें करते हैं पर मेरा विचार है कि जब सबको घर में रहने का कहा गया है तो घर में ही रहना चाहिए। आज मजबूरी में सड़क तक आना पड़ा तो मैं पूरी सावधानी के साथ आया हूं। मास्क लगा कर और जेब में सेनेटाइजर की बोलत लेकर डरते डरते निकला हूं। बेटा बोला भी- पापा आप तो ऐसे डर रहे हो जैसे कोरोना बाहर बैठा आपका ही इंतजार कर रहा है। आप घर में बैठो। बताओ क्या लाना है, मैं ले आता हूं। मैंने कहा- नहीं तुम नहीं। सड़क पर पुलिस वाले होंगे और तुमको देखकर वे पूछताछ करेंगे। कौन हो, क्यों बाहर आए हो, कहां जा रहे हो? मुझे देखकर कुछ नहीं पूछेंगे। लड़का ने मुस्कान बिखेरते हुए पूछा- क्यों? मैंने कहा- मैं मास्क लगा कर जा रहा हूं, तुम नहीं लगाओगे। तुमको लगता है लोग हंसेंगे। और लोगों का क्या, अपनी सुरक्षा अपने हाथ में है। और मैं हाथ में एक छोटा थेला लेकर निकल पड़ा।

सड़क पर दो पुलिसकर्मी दिखाई दिए। डंडा लिए हुए थे और दिखते भी रोबदार थे। मैं डरा डरा सुस्त कदमों से परचून की दुकान को देखते उसकी तरफ चलता गया। दो ग्राहक सामान ले रहे थे। मैं दुकान से कुछ दूर खड़ा हो गया। एक ने नाक और मुंह को रुमाल से ढक रखा था तो दूसरे ने शायद अपनी बहन की चुन्नी से पूरे चेहरे को ही बंद कर रखा था। आंखों के आगे काला चश्मा लगाए हुए था। दोनों सामान लेकर हटे तो मैं दुकान की तरफ बढा। दुकानदार ने भी मास्क लगा रखा था। मैंने उसे सामान की पर्ची पकड़ा दी। जिस पर छोटा-मोटा जरूरी सामान लिखा था। उसने मुझसे कहा- थेला दो। मैंने कहा- यहां काउंटर पर सामान रख दो मैं उठा कर डाल लूंगा। वह सामान रखता गया और मैंने एक-एक सामान को बहुत ध्यान से उठा-उठा कर थेले के हवाले कर दिया। वह बोला- एक सौ बाइस। मैंने एक सौ तीस रुपये काउंटर पर रखे और बोला- आठ रुपये की टोफी दे दो। उसने काउंटर पर टोफी रखी और मैंने पहले की भांति सावधानी से उन्हें थेले में डाल लिया। एक आदमी दुकान पर सामान लेने मेरे पास आने लगा तो मैंने उसे संकेत किया कि दूर रहे।

पुलिसवालों ने मुझे कुछ नहीं कहा। दुकान से पांच कदम चला कि पास वाले मंदिर के पुजारी मिल गए। मैंने हाथ जोड़े और नमस्कार कहा। वे बोले- खुश रहो। पर बड़ा अनर्थ हो गया। यह कोरोना क्या हुआ अब तो कोई भक्त मंदिर ही नहीं आता। और पंडितों का कोई कारोबार तो चलता नहीं। दान-दक्षिणा पर ही घर चलता है। मैंने जेब से एक सौ का नोट निकाला और उनकी तरफ बढ़ा दिया। वे बोले- मेरा मतलब यह नहीं था। मैंने संकेत किया इसे रखें और श्रद्धा से उन्हें फिर नमस्कार किया। उन्होंने नोट ले लिया और उनके चेहरे पर एक चमक आ गई, मैंने विचार किया कि पंडित जी सोच रहे हैं- काश! सारे भक्त, मेरे जैसे हो जाएं। उन्होंने फिर कहा- मैंने तो बस यूं ही कहा था। मैंने कहा- रखिए। और हाथ से विदा कहते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ गया। गली में पड़ौस के दो तीन सज्जान खड़े थे और मुझे मास्क लगाए हाथ में थेला लिए देख मुस्कान बिखेरने लगे। एक ने पूछने के लहजे में कहा- सामान ले आए क्या? मैंने सहमति में सिर हिलाया। वे हंसते हुए बोले- ठीक है, ठीक है। लाना ही पड़ता है। ना जाने कोरोना कब पीछा छोड़ेगा।

घर का मेन गेट लड़के ने खोला और प्रवेश द्वारा भी। मैंने थेले को एक कोने में रख दिया कि कोई हाथ नहीं लगाएगा। कल इस सामान को काम लेंगे और खुद साबुन से हाथ धोने लगा। हाथ ऐसे धोए जैसे थोड़ी सी देर बाहर जाने से बहुत मैल हाथों पर चढ गया हो। फिर मास्क उतारा और उसे अपने ऑफिस बैग में रख दिया। बेटा हंस रहा था। मैंने कहा- हंसने की बात नहीं है। सावधानी जरूरी है और अपने पेंट-शर्ट भी बदल लिए। पत्नी से बोला- मेरे कपड़े गर्म पानी से धोना।

वह चाय बना लाई और मैंने उसे बताया कि सड़क पर पंडित जी मिले थे। वह तपाक से बोली- उन्हें कुछ दिया क्या? उसमें भक्तिभाव कुछ अधिक ही है। सारी बात जानकर खुश हुई और बोली- ठीक किया। लड़का बीच में बोला- आप बता तो ऐसे रहे हो जैसे पांच सौ रुपये दे कर आए हो।

गली में कुछ हलचल हुई तो लड़का बाहर की तरफ देखने गया और भीतर आकार बोला- सब्जी वाली गाड़ी आई है। सब्जी लेनी है क्या? पत्नी के ‘हां’ कहने पर वह बोला- बताओ क्या-क्या और कितनी-कितनी लानी है। मैंने उससे कहा- तुम रहने दो। मैं लेकर आ जाऊंगा। वह फिर बोला- क्या गली में जरा सा निकलने में भी मास्क लगा कर बाहर जाओगे। लोग हंसेंगे। वह नाराज होने लगा। मैंने कहा- लोगों के हंसने या रोने से हमें क्या? हम हमारा काम कर रहे हैं और मास्क लगाना जरूरी है। पत्नी से पूछा- सब्जी घर में कितनी और क्या-क्या है? वह बोली- सब खत्म हो गई। जो कुछ मिले ले आओ। दो-तीन दिन के लिए साथ ही ले आना। आलू, प्याज, टमाटर और मिर्च तो चाहिए ही चाहिए। कोई हरी सब्बजी हो तो देखना। मैंने जल्दी से मास्क लगाया और बाहर निकल आया। जेब में पर्श से रुपये रख लिए थे। गाड़ी के पास पहुंचा तब वह जाने वाली ही थी। मैंने आवाज लगाई- भैया, जरा रुकना। गाड़ी रुक गई। आलू, प्याज, टमाटर, मिर्च, तोरू, भिंडी, करेला जो ठीक लगा और जो ठीक दिखा सभी ले लिए। उसने एक बड़ी थेली में सामान डाल दिया तो मैंने कहा कितने हुए? पांच सौ का नोट उसकी टोकरी में रख दिया। छुट्टे हो जाएंगे। उसने एक सौ पचास रुपये वापस दिए। मुझे आश्चर्य हुआ कि साढ़े तीन सौ रुपये की सब्जी हो गई। मैंने कहा- भैया, भाव ठीक लगाए हैं क्या? वह बोला- जी साहब। मंडी में ही सब्जी महंगी है और पास वाली मंडी तो बंद है। हम तो बाहर वाली से लाएं है। आपके वैसे होते तो तीन सौ पचपन है, पर पचास काटे हैं।

मैंने बहस नहीं की और ना ही फिर कुछ पूछा। थेली के नीचे हाथ लगाया और घर में गोली की तरफ सप से आ गया। सोचा पड़ौसी देख कर सोचेंगे- इतनी सब्जी। और घर में जैसे पहले थेला रखा था उसके पास ही सब्जी को रख दिया। कहना जरूरी नहीं था, फिर भी बोला- बहुत मंहगी है सब्जियां। हाथ धोने की कसरत फिर से करने लगा। दरवाजा बजा। मैंने लड़के से कहा- देख कौन है? उसने देखा और बोला- पता नहीं कौन है? मैंने कहा- बाहर जाकर पूछ तो सही। कोई दरवाजा बजा रहा है और तुम अंदर से देख रहो हो। वह बाहर गया तब आवाज आई- सब्जी अभी साहब लाए थे क्या? उसने बोला- हां। मैंने हाथ धो लिए थे और देखा बेटा सौ का नोट और पर्ची लेकर आया था। वह बोला- आप सौ रुपये अधिक देकर आ गए थे। हिसाब भी सही नहीं किया क्या? मैं क्या कहता, बस चुप रहा और जरा सी मुस्कान बिखेर दी होंठों पर। पत्नी पास ही बैठी थी। वह बोली- बाहर कोरोना बैठा था इसलिए तेरे पापा जल्दी में आ गए बिना ठीक से हिसाब किए। मैंने कहा- यह पर्ची और सौ का नोट उधर एक तरफ रख दे और हाथ ठीक से धो ले। बेटा बोला- सच्ची।

डॉ. नीरज दइया

Rajasthani Patrika 23-04-2020