राजस्थान की बेहतरीन कहानियां

डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी कहानी के पूरे परिदृश्य से प्रतिनिधि कहानियों का चयन कर उनका हिंदी अनुवाद पाठकों को ‘101 राजस्थानी कहानियां’ नामक पुस्तक में परोसा है। संपादक द्वारा पुस्तक के आरंभ में राजस्थानी कहानी के विधागत विकास को केंद्रित रखते हुए लंबी भूमिका में आद्योपांत तथ्यों के साथ अनेक निकष भी हमारे अध्ययन का आकर्षण है। संग्रह में 101 कहानियों के साथ भूमिका में आलोचना-पक्ष को भी उभारते हुए भारतीय भाषाओं के बीच राजस्थानी कहानी को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने के अनेक द्वार खोलें हैं।
समीक्ष्य ग्रंथ में आधुनिक कहानियों को चयनित और संपादित रूप में प्रस्तुत किया गया है। पांच सौ से अधिक पृष्ठों में 101 कहानियों के हिंदी अनुवाद की इस प्रस्तुति से वैश्विक फलक पर राजस्थानी कहानी की विविधता एवं वैभव का परिचय मिलेगा।
इस संकलन में राजस्थानी कहानी को अपने पैरों पर खड़ा करने वाले यशस्वी कहानीकारों में रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, नानूराम संस्कर्ता, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, विजयदान देथा, करणीदान बारहठ, यादवेंद्र शर्मा आदि की कहानियां शामिल हैं। अनेक कहानियों में केवल 101 कहानीकारों और प्रतिनिधि कहानियों का चयन रेखांकित किए जाने योग्य है। कुंवर रवीन्द्र के सुंदर आवरण से सुसज्जित यह संग्रह निश्चय ही राजस्थानी कहानी में ऐतिहासिक कार्य है।
-देवकिशन राजपुरोहित

——–
101 राजस्थानी कहानियां (कहानी संग्रह) संपादक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
पृष्ठ : 504 ; मूल्य : 1100 रुपये ; संस्करण : 2019
——–

DKR

Advertisements

राजस्थानी मिट्टी की सौंधी महक / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

कहानी सुनना एक बच्चे की इच्छा भर नहीं है, मूल मानवीय-स्वभाव है। कहानी की शुरुआत संभवत: तब से हुई जब आदमी ने बोलना सीखा। लोककथाओं के रूप में एक समृद्ध विरासत विश्व भाषाओं की धरोहर है जिसे हम कहानी के प्रति हजारों सालों से इंसानी प्रेम का प्रमाण मान सकते हैं। इस मामले में राजस्थानी भाषा की संपन्नता सर्वविदित है। राजस्थानी लोक-साहित्य में हजारों लोककथाएं मौजूद हैं, जिनमें परंपरा, इतिहास, भूगोल और धर्म सहित जीवन के तमाम पक्षों का अंकन मिलता है। सदियों से श्रुति परंपरा से लोग के कंठों में रची-बसी ये कथाएं अपने समय-समाज की आकांक्षाओं एवं अवरोधों का प्रमाणिक दस्तावेज है। यह कहना तर्कसंगत नहीं होगा कि राजस्थानी की आधुनिक कहानी का विकास सीधे तौर पर लोककथाओं से हुआ है, मगर आधुनिक कहानी के बीज को पुष्पित-पल्लवित होने के लिए लोककथाओं ने उर्वर जमीन अवश्य तैयार की है। राजस्थानी कहानी का इतिहास मोटे तौर पर सौ साल से ज्यादा पुराना है। राजस्थानी की पहली कहानी का श्रेय शिवचंद्र भरतिया की ‘विश्रांत प्रवासी’ को दिया जाता है। आधुनिक कहानी के विकास के पीछे कमोबेश वही कारण रहे हैं जिनसे विदेशी व देशी साहित्य में शार्ट स्टोरी विधा का विकास हुआ। राजस्थानी कहानी का वर्तमान स्वरूप तो आजादी के बाद उन्नीसवीं सदी के छठे-सातवें दशक में ही बन पाया जब मुरलीधर व्यास व नानूराम संस्कर्ता के कहानी-संग्रह प्रकाश में आए।
विगत छह-सात दशकों की यात्रा के बाद राजस्थानी कहानी जगत आज भरा-पूरा है। प्रदेश के विस्तृत भूभाग में सैकड़ों कहानीकार जग-जीवन के सच को कहानियों में विविध रूपों में ढाल रहे हैं। वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ “101 राजस्थानी कहानियां” कहानी विधा के सामर्थ्य का प्रमाण हैं। पांच सौ से ज्यादा पृष्ठों में 101 कहानियों के हिंदी अनुवाद की यह प्रस्तुति हिंदी जगत को राजस्थानी कहानी की विविधता एवं वैभव से साक्षात करवाती है। भूमिका के रूप में विद्वान संपादक का “राजस्थानी कहानी : कदम-दर-कदम” शीर्षक से शोध-आलेख कहानी की दशा-दिशा जाने के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। राजस्थानी की आधुनिक कहानी-यात्रा के विकास को चार काल-खंडों में वर्गीकृत करते हुए डॉ. दइया ने लिखा है कि कहानी के वैश्विक परिदृश्य में राजस्थानी के अनेक हस्ताक्षरों ने भारतीय कहानी को पोषित किया है। राजस्थानी कहानी भी भारतीय कहानी के विकास में कदम-दर-कदम साथ चल रही है। कहना न होगा, भारतीय कहानी का रूप-रंग भारतवर्ष की क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों से ही निर्मित होता है। राजस्थानी सहित देश की अन्यान्य भाषाओं की कथा-यात्रा को जाने समझे बगैर भारतीय कहानी के संप्रत्यय का सही रूप में आकलन करना संभव नहीं है।
इसमें संदेह नहीं है कि अनुवाद-पुल के माध्यम से भाषाओं के मध्य आवाजाही हो सकती है। अनुवाद असल में दो भाषाओं के मार्फत दो विविधतापूर्ण संस्कृतियों को नजदीक लाकर जोड़ता है। राजस्थानी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां हिंदी के माध्यम से देशभर की हिंदी-पट्टी के करोड़ों पाठकों के साथ अन्य भाषाओं के कहानी प्रेमियों को राजस्थानी कहानी के आस्वादन का अवसर एवं मूल्यांकन दृष्ति प्रदान करती है। वरिष्ठ कवि-संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना का इस संग्रह के आरंभ में अभिमत देखा जा सकता है- “यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थ-गर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी मिट्टी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और साध्य उपक्रम किया है।”
संग्रह में शामिल 101 कहानीकारों में राजस्थानी की भौगोलिक विविधता का समुचित प्रतिनिधित्व हुआ है। ये कहानियां राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि की परिचायक तो है ही, राजकीय सरंक्षण के बिना संघर्षरत भाषा के कलमकारों के जीवट का भी प्रमाण है। किताब के रचनाकारों की सूची देखें तो इसमें राजस्थानी कहानी को अपने पैरों पर खड़ा करने वाले यशस्वी कहानीकारों में यथा नानूराम संस्कर्ता, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, विजयदान देथा, करणीदान बारहठ, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, बैजनाथ पंवार, श्रीलाल नथमल जोशी आदि की कहानियां शामिल हैं, वहीं कहानी को आधुनिकता के मार्ग अग्रसर करने वाले प्रमुख कहानीकारों में सांवर दइया, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मनोहर सिंह राठौड़, रामस्वरूप किसान, बुलाकी शर्मा, मालचंद तिवाड़ी आदि की कहानियां संग्रह में संकलित है। राजस्थानी के समकालीन महत्त्वपूर्ण कहानीकारों में चेतन स्वामी, भरत ओला, सत्यनारायण सोनी, मनोज कुमार स्वामी, प्रमोद कुमार शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’ आदि भी पुस्तक का हिस्सा बने हैं तो महिला कहानीकारों में चूंडावत के अलावा जेबा रशीद, बसंती पंवार, सावित्री चौधरी, आनंद कौर व्यास, सुखदा कछवाहा, रीना मेनारिया की चयनित कहानियां किताब में शामिल की गई हैं।
राजस्थानी कहानी के व्यापक और विस्तृत भवबोध को प्रस्तुत करती संग्रह में अनेक यादगार कहानियां देखी जा सकती है। ऐसा नहीं है कि यह राजस्थानी कहानी को हिंदी में ले जाने का पहला प्रयास हो, इससे पूर्व भी राजस्थानी कहानियों के हिंदी अनुवाद हेतु कतिपय प्रयास हुए हैं मगर एकसाथ शताधिक कहानियों को हिंदी जगत के माध्यम से विश्व साहित्य के समक्ष रखने का यह पहला प्रयास है। निश्चय ही इस ग्रंथ से राजस्थानी कहानी की वैश्विक उपस्थिति दर्ज होगी और सेतु भाषा हिंदी के माध्यम से अनूदित होकर राजस्थानी कहानी देश-दुनिया की अन्य भाषाओं में पहुंचेगी। कहना न होगा यह दुष्कर कार्य योग्य संपादक डॉ. नीरज दइया की कुशलता व समर्पित अनुवादकों के सद्प्रयासों का सुफल है। असल में ऐसे प्रयास अकादमियों व अन्य संसाधनों से युक्त संस्थानों को करने चाहिए, क्योंकि ऐसे कामों में अत्यंत श्रम व अर्थ की आवश्यकता होती है। इस ग्रंथ को पाठकों तक पहुंचाने के लिए के. एल. पचौरी प्रकाशन वाकई बधाई के हकदार हैं जिसने राजस्थानी मिट्टी की महक को हिंदी के माध्यम से देश-दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठाया है। कुंवर रवीन्द्र के सुंदर आवरण से सुसज्जित यह संग्रह निश्चय ही कहानी प्रेमियों के लिए संकलन योग्य उपहार है।
डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
144 लढ़ा निवास, महाजन, बीकानेर
——–
101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102 ; प्रकाशन वर्ष : 2019 ; पृष्ठ : 504 ; मूल्य : 1100/-
——–
SIVIRA

कहाणी जातरा री सांतरी कपड़छांण

Madan Gopal Ladhaमदन गोपाल लढ़ा

हासलपाई बिना जोड़-बाकी को हुवै नीं तो आलोचना में हासलपाई सारू कोई ठौड़ कोनी हुवै। पण भळै ई आलोचना में हासलपाई लगावणै रो काम लगोलग चालतो रैयो है। इण हासलपाई रै पांण ई केई लूंठा बण बैठ्या तो केई गिणती में ई कोनी आया। चावा आलोचक नीरज दइया आपरी नवी पोथी ‘बिना हासलपाई’ री मारफत कहाणी जातरा री कपड़छांण री खरी खेचळ करी है। आ खेचळ इण सारू महताऊ मानी जावैला कै इण पोथी सूं केई अैड़ा कहाणीकारां रा नांव अर बां रो जस उजास में आयो है जका बाबत अजै लग जाबक मून ही।
कैवण री दरकार कोनी कै राजस्थानी कहाणी री जातरा जित्ती लाम्बी अर रंगधारी रैयी है, आलोचना पेटै बित्ती ई सुनेड़ रैयी है। आपां जाणां कै आधुनिक कहाणी री सरुवात १९५६ में हुई जद मुरलीधर व्यास अर नानूराम संस्कर्ता कहाणी रै सीगै जमीन बणावणै रो जसजोग काम करियो। सातवै दसक पछै कहाणी री जातरा डांडी पकड़गी आधुनिकता रा पगोथिया चढतां थकां भारतीय साहित्य रै दीठाव में आपरी ठावी ठौड़ बणाय ली। बीसवीं सदी रै छेहलै दसक तांई पूगतां-पूगतां कहाणी री दुनियां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं सवाई सांवठी हुयगी। इणरै बरक्स आपां जे कहाणी री आलोचना री बात करां तो लाम्बै बगत तांई पोथ्यां री भूमिकावां का फुटकर आलेखां नैं टाळ‘र ठंड ई रैयी। सांचै अरथां में कहाणी आलोचना पेटै पैलो पांवडो डॉ. अर्जुनदेव चारण धर्यो। कहाणी आलोचना माथै केन्द्रित बां री पोथी ‘राजस्थानी कहाणीः परम्परा अर विकास’ १९९८ में आई। चालीस बरसां सूं बेसी जूनी राजस्थानी कहाणी री जातरा री अेकठ फिरोळ रो सुतंतर पोथी रूप ओ पैलो अर उल्लेखजोग प्रयास हो। अैड़ा काम बगतसर अर पूरसल हुवता तो स्यात कहाणी रो दीठाव वैड़ो कोनी हुवतो जैड़ो आज है। आ बात आलोचना विधा साम्हीं अेक सवालियो निसान लगावै। विचारणो पड़ैला कै क्यूं पांच टणका कहाणी संग्रै रै मिस ८५ नेड़ी कहाणियां लिखण वाळा लिखारा नानूराम संस्कर्ता कहाणी जातरा में ‘आउट-साइडर’ ई रैया। क्यूं कृष्ण कुमार कौशिक आ मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ जैड़ा कहाणीकारां री कलम इक्की-दुक्की पोथ्यां सूं आगै कोनी बधी। कन्हैयालाल भाटी, मोहन आलोक आद सबळा कहाणीकार ई सावळ अंवेर नीं हुवणै सूं बगतसर पोथी रूप कोनी छप सक्या। आलोचना किणी नैं रचनाकार तो कोनी बणा सकै पण रचनाकार नैं बधावणै सारू आलोचना री महताऊ भूमिका हुया करै। कहाणी रो इतियास साख भरै कै खरी कूंत नीं हुयां कलम री कोरणी मंदी पड़ता जेज नीं लागै।
कहाणी आलोचना री कूंत करां तो तीन मोटी कमियां पड़तख दीसै- कहाणी रै पाठ री ठौड़ कहाणीकारां रै नांवां माथै ध्यान, हासलपाई लगावणै मतळब बिड़दावणै री बाण अर कूंत सारू अेकल मानदण्ड नीं हुवणो। आं कमियां रै कारण ई आलोचना किणी नैं थरपण अर किणी नै पटकण रो साझन बणगी। ओ अकारण कोनी कै कहाणी आलोचना नीं तो पाठकां रो भरोसो हासल कर पाई अर नीं लिखारां रो। आ पोथी इण छेती नैं पाटण पेटै अेक महताऊ पांवडो मानीज सकै।
इण पोथी में कहाणी आलोचना अर कहाणी री परम्परा नैं अंवेरता दो आलेख है बठैई नवा-जूना पच्चीस कहाणीकारां री कहाणी जातरां री पूरी सुथराई सूं फिरोळ करीजी है। पैलो आलेख ‘कहाणी आलोचना : बिना हासलपाई’ पोथी री भूमिका दांई है जिणमें आलोचक इण विधा पेटै अजैलग हुयोड़ै काम नैं अंवेरतां आपरी दीठ नैं साम्हीं ल्यावै। आपां जाणां कै हरेक आलोचक रा निजू राछ-पानां हुया करै, जकां सूं बो कोई रचना री परख करै। अै औजार ई उणरी समदीठ नैं अंतरदीठ सूं जोड़ै। इण आलेख में आलोचना पोथ्यां अर संपादित कहाणी संकलनां री बात करतां थकां ‘जमारो’, ‘समद अर थार’ जैड़ी संजोरी पोथ्यां रचणिया यादवेन्द्र शर्मा जेड़ै राजस्थानी मनगत रै सबळै लिखारै नैं हिंदी प्रतिमान वाळा कहाणीकार बतावणै, मनमरजी सूं जुग थरपणै, उपन्यास री ठौड़ नवल कथा सबद बरतणै रै प्रस्ताव, पोथ्यां री विगत बणावणै आद माथै आलोचक जका सवाल उठावै बै पाठक नैं ई सोचणै सारू मजबूर करै। आलोचक-संपादकां री देवळ्यां तो कोनी बणै पण बां री पखापखी पाठकां नैं भटका सकै। इणींज कारण आलोचना कारज नैं खांडै री धार माथै धावणो कैयो जावै। ‘आधुनिक कहाणीः शिल्प आ संवेदना’ सिरैनांव सूं दूजो आलेख इण विधा रै रूप-रंग माथै उजास न्हाखै। नांवी लिखारां रै ‘कोटेशन’ सूं आगै बधतै इण आलेख में ओपतै उदाहरणां सूं कहाणी रै ढंग-ढाळै री कूंत करीजी है।
नृसिंह राजपुरोहित री कहाणी जातरा माथै केन्द्रित आलेख ‘बगत रै सागै : बगत सूं आगै’ बां नै अेक टाळवैं कहाणीकार रै रूप में बखाणै। पैली ओळी मे ई आलोचक रो सफीट मानणो है कै ‘समकालीन भारतीय कहाणी मांय जे राजस्थानी सूं किणी अेक ई टाळवैं कहाणीकार नै सामिल करण री बात हुवै तो म्हारी दीठ सूं नृसिंह राजपुरोहित नै सामिल किया जावणा चाइजै। (पृ. ३१) राजपुरोहित जी री १९५१ सूं सरू हुयोड़ी कहाणी जातरा री पांच कहाणी संग्रै री मारफत फिरोळ कर’र आलेख रै अंत में आलोचक आपरी बात नैं इण भांत पोखै- ‘बिना हासलपाई अठै लिखतां म्हनैं संको कोनी कै आधुनिक कहाणी री सरूवात विजयदान देथा सूं नी कर’र आपां नै नृसिंह राजपुरोहित सूं करणी चाइजै, क्यूंकै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंह राजपुरोहित ई गिणीजैला।’ (पृ. ३६)
पैली पीढी रा कहाणीकार श्रीलाल नथमल जोशी री कहाणियां माथै केन्द्रित आलेख ‘जोशी थांरा पगल्या पूजूं’ में आलोचक लोक रंग, सामाजिक काण-कायदा, विषयगत नवीनता रै सागै आगाऊ सोच अर बोल्डनेस नैं रेखांकित करै। इणींज भांत ‘पाटी पढावती कहाणियां’ सिरैनांव सूं आलेख में अन्नाराम सुदामा री कहाणियां नैं सीख नै पोखणवाळी बतावै। ‘बां जीवैला अर धाड़फाड़ जीवैला’ आलेख में आलोचक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ री कहाणियां में लुगाई जात री ओळखाण बगत परवाण नुंवै ढंग-ढाळै सूं करियोड़ी बतावै। आलोचक री पीड़ है कै ‘आलोचना मांय जठै अेक बाट आपां नै सगळा खातर राखणो चाइजै, बठै तो आपां न्यारा-न्यारा राखां अर जठै आपां नै की तकलीफ हुवै नुंवा बाट सोधण री, बठै काम नै चलतै में सलटावणो चावां।’ इण आलेख में पूरै नैठाव सूं ओपता उदाहरणां सागै आ बात पुखता करीजी है कै चंद्र जी री कहाणियां में लुगाई री ओळखाण फगत देह-राग सूं बंध्योड़ी कोनी, बा बगत मुजब आपरी नवी ओळखाण सारू संभ्योड़ी दीखै। ‘कहाणियां री सळवंटा काढतो कहाणीकार’ आलेख में रामेश्वर दयाल श्रीमाली री कहाणी जातरा बाबत सांगोपांग बात करीजी है तो ‘आदमी रो सींग अर माटी री महक’ सिरैनांव सूं करणीदान बारहठ री कहाणियां री जमीन संभाळीजी है। ‘असवाड़ै-पसवाड़ै रा छोटा-छोटा सुख-दुख’ पोथी रो खास आलेख है जिणमें डॉ. नीरज दइया आधुनिक कहाणी रा हरावळ कहाणीकार सांवर दइया री कहाणी-कला माथै बात करी है। आपां जाणां कै बेटै रै रूप में सांवरजी री दुनियां सूं आलोचक रो निजू जुड़ाव रैयो है। अेक आलोचक री निजर सूं सांवर जी रै कहाणी जगत री आ जातरा जोवण जैड़ी है। इण आलेख में राजस्थानी कहाणी नैं नवी बुणगट, प्रामाणिक जीवण अनुभव, ओपती भाषा अर संवाद शैली सूं राती-माती करणै वाळा सखरा कारीगर सांवर दइया री कहाणी-कला माथै घणी सुथराई सूं विचार करीज्यो है। संवाद कहाणियां रै मिस सांवर जी जको नवो प्रयोग करियो उणनैं ‘कथा रूढ़ि बणावणै बाबत’ ‘माणक’ सारू आम्ही-साम्ही में कन्हैयालाल भाटी रै सवाल रो सांवर जी रो उथळो ‘रिमाइण्ड’ करवा’र आलोचक चोखो काम करियो है।
सांवर जी रा समकालीन कहाणीकार भंवरलाल भ्रमर री कहाणियां बाबत ‘अमूजो दरसावती कहाणियां अर सातोतूं सुख’ में आलोचक भ्रमर जी रै कहाणी जगत रो दरसाव तो करावै ई है, संपादन आ आलाचना री बिडरूपतावां नैं ई साम्हीं ल्यावै। ‘गांव री संस्कृति अर संस्कृति रो गांव’ सिरैनांव सूं ग्रामीण संस्कृति रा सबळा चितेरा मनोहर सिंह राठौड़ री कहाणी-कला री परख करीजी है। ‘नामी कवि री नामी कहाणियां’ अर ‘आत्मकथा रा खुणा-खचुणा परसती कहाणियां’ आलेखां में क्रमश: मोहन आलोक अर नंद भारद्वाज री कहाणी जातरा री परख करीजी है। आपां जाणा कै अै दोनूं लिखारा कवि रूप जाणीता रैया है पण आं री सबळी-सांतरी कहाणियां इण विधा रै इतियास नैं दूसर जांचण-पाखण री मांग करै। अनुवाद पेटै जस कमावणियां कन्हैयालाल भाटी अर रामनरेश सोनी री कहाणी कला माथै क्रमश: ‘कहाणियां मांय नुंवी भावधारा रा मंडाण’ अर ‘मानखै रै ऊजळ पख री कहाणियां’ में विचार करीज्यो है। ‘अधूरी कहाणी जातरा रा पूरा अैनाण’ सिरैनांव सूं अशोक जोशी ‘क्रांत’ री कहाणी माथै बात करता दइया लिखै- ‘कहाणी जातरा मांय नुंवा प्रयोग, नाटकीय भाषा अर साव निरवाळी बुणगट रै पाण अषोक जोषी ‘क्रांत’ लूंठै कहाणीकार रै रूप सदा याद करीजैला। (पृ. १२३)
‘अेक बिसरियोड़ै कहाणीकार री बात’ आलेख में अस्सी रै दसक में सांतरी कहाणियां रचणियां मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ री कहाणी-कला री संभाळ हुई है। इणरै सागै अैड़ा केई बीजा कहाणीकारां माथै ई न्यारै-न्यारै आलेखां में चरचा हुई है जका आलोचना रै दीठाव में लारै छूटग्या का लेखन प्रमाणै वाजिब मुकाम नीं मिल्यो। अैड़ा कहाणीकार है- रामपाल सिंह राजपुरोहित, मेहरचंद धामू, अर डॉ. चांदकौर जोशी। ‘अंतस रै साच माथै जोर’ आलेख में बुलाकी शर्मा री कहाणी कला री अंवेर करता आलोचक बां नैं बणता-बदळता संबंध अर संबंधा री थोथ उजागर करणिया कहाणीकार मानै। ‘फुरसत मांय भोळी बातां रो जथारथ’ आलेख में मदन सैनी री कहाणी दीठ री परख करीजी है। ‘सावळ-कावळ स्सो कीं राम जाणै’ सिरैनांव सूं आलेख में नीरज दइया प्रमोद कुमार शर्मा री कहाणियां नैं अरथावै तो ‘न्यारै-न्यारै हेत नै अरथावती कहाणियां’ रै मिस नवनीत पाण्डे री कहाणिया रा रंग ओळखणै री आफळ करीजी है। ‘चौथै थंब माथै चढ’र चहकती कहाणियां’ आलेख में मनोज कुमार स्वामी री सामाजिक चेतना री अंवेर हुयी है तो ‘भाषा अर बुणगट रै सीगै भरोसैमंद कहाणियां’ सिरै नांव सूं पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ रै कहाणी जगत में भाषा बुणगट अर भावगत सिमरधता री ओळखाण करीजी है। ‘दलित कहाणी रो विधिवत श्रीगणेष सिरैनांव सूं छेहलै आलेख में आलोचक नवी पीढी रा कहाणीकार उम्मेद धानियां री कहाणियां में जथारथ अर सांच नैं उल्लेखजोग बतावता लिखै कै ‘आं दोनूं पोथ्यां मांय दलिता रो ग्रामीण जन-जीवन, जातीय अबखायां, जूझ, गरीबी, कुप्रथावां, निरक्षरता, सामाजिक जुड़ाव, जनचेतना, अनुभव-जातरा, रीस अर हूंस रो पूरो लेखो-जोखो किणी दस्तावेज रूप अंवेरती कहाणियां मिलै।’ (पृ. १५७)
राजस्थानी आलोचना में आपां नैं जठै सकारात्मक भाव सांची कैवां तो बिड़दावणै रो भाव प्रमुख रैयो है बठै ई आलोच्य पोथी में खरी अर खारी कैवण री हिम्मत करीजी है। जरूरत फगत इण बात री लखावै कै आपां आलोचना नैं खुल्लै मन सूं स्वीकार करण री बांण घालां।
सार रूप कैयो जा सकै कै कहाणीकार री ठौड़ कहाणी रै पाठ री प्रमुखता, स्वस्थ आलोचनात्म्क दीठ अर आलोचना सारू ओपती भाषा इण पोथी तीन मोटी खासियत है। आलोचना विधा में आपरी पैली पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ सूं दइया जकी सखरी हाजरी मांडी, उण पछै, बिना हासलपाई’ नैं अेक लाम्बी अर अरथाऊ छलांग कैयी जा सकै। कैवण री दरकार कोनी कै इण छलांग सूं पक्कायत ई आलोचना विधा दो फलांग आगै बधी है। इण महताऊ अर जसजोग काम सारू आलोचक अर प्रकाशक नैं घणा-घणा रंग।

(कथेसर जन-जून 2015 में प्रकाशित)  मूल आलेख डाउनलोड़ 

 

होते हुए प्रेम में खलल के दस्तखत

– हरीश बी. शर्मा
डॉ.नीरज दइया को पढऩा इस मायनों में सुकून भरा होता है कि वे आदतन ही प्रचलित मानकों को ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ते हैं और कुछ ऐसा निकाल कर सामने रखते हैं, जो उपेक्षित रहा, अब तक नजरअंदाज किया गया हो। वे किसी को भी सिर्फ इसलिए नहीं मानते कि उनकी अग्रज पीढिय़ों ने गुणगान किया है। किसी को मानने के लिए उनके पास अपने कुछ औजार हैं। उनका अपना लोक है। अग्रज पीढ़ी की हदों को नापने की भी एक अनोखी दृष्टि है और कुछ नया करने के लिए समुचित मेहनत करने की ललक भी। इसीलिए कहा भी जाता है कि नीरज दइया का साहित्यिक-चरित्र है ही ऐसा जो उन्हें अचानक से विवादों के बीच खड़ा कर देता है। इसे बहुत ही सकारात्मक तरीके से समझा जाए तो यह कि उनके लिखे हुए को पढऩा तयशुदा फार्मेट से उबरना है, कुछ नया पाना है।
‘उचटी हुई नींद’ की कविताएं इससे भिन्न नहीं हैं। इस काव्य संग्रह के माध्यम से वे हिंदी में कविताएं लिखते हैं तो यह उनके प्रचलित स्वरूप से भी भिन्न है। राजस्थानी में ही लिखने वाले नीरज दइया का हिंदी कवि रूप इसमें मिलता है तो दूसरी ओर इस बार यहां नीरज दइया आलोचक नहीं है, प्रेम में पगे हैं। हालांकि कहीं-कहीं वे यहां भी कविता क्या होती है के सवाल से मुठभेड़ करते हुए अपने पाठक को यह भी सिखाने की कोशिश करते हैं कि कविता अमुक जगह होती है लेकिन फिर भी यहां नीरज दइया जितने प्रेमिल हैं, पहले नहीं दिखे और इस वजह से यह संग्रह खास बन जाता है।
प्रेम को उन्होंने बहुत सारे फ्रेम दिए हैं और प्रतीकों के माध्यम से उन हादसों पर भी संकेत किया है जो माने तो प्रेम गए लेकिन वास्तव में प्रेम से मिलते-जुलते सहानुभूति, दया इत्यादि थे। यहां कवि का संकेत बहुत ही गहरा है कि प्रेम का रिप्लेसमेंट सिर्फ प्रेम ही है, इसकी आड़ में जितनी बार भी दूसरी चीजें आएंगी समय के साथ खारिज होती जाएंगी, प्रेम के खांचे में सिर्फ प्रेम ही टिक पाएगा।
और वे जब कहते हैं, ‘घटित होता है/ जब-जब प्रेम/पुराना कुछ भी नहीं होता/हर बार होता है नया/’
या के
‘प्रेम के बिना नहीं खिलते फूल/कुछ भी नहीं खिलता बिना प्रेम के।’
तब प्रेम को समझने से अधिक समझाने की कोशिश करते हैं। प्रेम पर एक नए तरीके से नजर फेंकते से नजर आते हैं। वे पूरे संग्रह में प्रेम बहुत कम करते हैं। या तो प्रेम को परिभाषित करते हैं और प्रेम और अप्रेम के बीच भेदों को उजागर करते हैं या होते हुए प्रेम के दृश्य रचते हैं। नीरज दइया का प्रेम को समझने-समझाने का यह सलीका इन्हें प्रेम कवि के रूप में स्थापित तो करता है लेकिन प्रेमी नहीं, बहुत अधिक गहरे देखें तो वे प्रेक्षक हैं। उचटी हुई नींद के शीर्षक की तरह यह कविताएं भी उनकी प्रेम और प्रेम के बीच आने वाले दखल का परिणाम है।
नींद के उचट जाने के बाद होने वाली बेचैनी की बानगी है। वापस नींद नहीं आने तक नींद उड़ाने वालों के नाम जारी किए गए उलाहने हैं। यीधे-सीधे कहूं तो ये कविताएं होते हुए प्रेम में पड़े खलल के दस्तखत हैं, एक दस्तखत देखिये, ‘कभी कुछ लिखा/ कभी कुछ/ जो भी लिखा/ समय का सत्य था/ मैं था वहां/ तुम थी वहां…’
और इसी तरह गीत-2 में वे कहते हैं।
जो बात/ आज तक कही नहीं/ किसी संकोच के रहते/ रहा होगा कोई डर/ बात वही/ कह रही हो आज तुम/ दोस्तों के बीच/ गुनगुनाते हुए गीत/ बात यही/ बहुत पहले/ सुन चुका मैं/ अब भी डरता हूं मैं/ मैंने कभी प्रेम-गीत गाया नहीं।
और प्रेम का समय शीर्षक कविता में
‘जब मैंने किया प्रेम/ वह समय नहीं था/ वह प्रेम था समय से पहले।’
ऐसी बहुत सारी कविताओं के माध्यम से प्रेम के इर्दगिर्द वे खूब सारे रंग रचते हैं और प्रेम को और अधिक खोलते जाते हैं, पारदर्शी बनाने की हद तक खोल देते हैं।
प्रचलित मान्यताओं के चौखटों को तोडऩे वाले गोताखोर नीरज दइया के लिए कविता रूपी औजार नया नहीं है लेकिन वे वस्तुत: गद्य के नजदीक रहे हैं और इस कृति के प्रेम कवि नीरज दइया का यह गद्य-प्रेम इन्हें आखिरी तक आते-आते कविता के खाते में आलेख जोडऩे का नवाचारी बना देते हैं। जो लोग नीरज दइया को जानते हैं, वे अंतिम की तीन आलेख टाइप कविता (गद्य-कविता) पूर्वज, पापड़ और विवश को पढ़ते वक्त इसे उनके किसी अगले सीक्वल की आहट बता सकते हैं। लंबी कविता के कई प्रयोग कर चुके नीरज दइया क्या अपनी उचटी हुई नींद का उपयोग इस तरह की गद्य-कविताओं के रूप में भी करेंगे?
यह सवाल उन्हीं के लिए छोड़ा जाना चाहिए। क्योंकि जब वे ‘पिता’ कविता में कोटगेट पर कविता लिखने नहीं लिखने का सवाल उठाते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है कि इन तीन आलेखों को शामिल ही सवाल उठाने के लिए किया हो। लेकिन इन सभी से अलग नीरज दइया की इन कविताओं से निकलते हुए उनके कभी प्रेमिल रहे होने की जो खबर हाईलाइट होती है, वह उनकी बहुत सारी प्रचलित छवियों को तोड़ती है, नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर करती है।
डा.नीरज दइया जब आलोचना करते हैं तो भले ही उनके पास इतनी मजबूत लॉबी नहीं हो जो उनके लिखे हुए को चर्चा में में लाए लेकिन इन सभी से विचलित हुए बगैर वे पूरी जिम्मेदारी से लिखते हैं, शायद यह सोचकर कि समय की सतह पर जब कभी नीर-क्षीर का युग आएगा, उनके लिखे हुए को भी समझा जाएगा। ठीक उसी तरह, उनकी प्रेम कविताओं का यह संग्रह भी समय से अपने लिए एक दृष्टि की मांग तो करता ही है। मैं कामना करता हूं कि जिस स्तर पर जाकर डॉ.दइया ने प्रेम को समझा है, उसी स्तर के पाठक भी उन्हें मिले। शुभकामनाएं।neerajji samiksha

डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि

भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’

B S Vyas Vinodआलोचना बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए। उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है। मैं इसका हृदय से स्वागत करता हूं।
=====================================
पुस्तक : बिना हासलपाई ; लेखक : डॉ. नीरज दइया ; प्रकाशक : सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर ; संस्करण : 2014 ; पृष्ठ संख्या : 160 ; मूल्य : 240/-
=====================================
(शिविरा : नवम्बर, 2015 से साभार)

22sapta5 Yugpaksh

जूंण दांई फगत दोय ओळी री है कविता

आलोचक नीरज दइया री काव्यगत सोच: कैवणौ है वौ कैय लेवौ, ‘पाछो कुण आसी’
दुलाराम सहारण
Dularamकेई कैवै कै धीरज रै खूटणै रौ औ जुग है। पण ‘म्हैं परखणौ नीं चावूं- आप रौ धीरज, क्यूंकै म्हैं आगूंच जाणूं- आप रौ धीरज है आप मांय…’ पण कैवणिया तौ कैवै ई है कै धीरज तौ नित खूटै। कदास आ साची-सी लागै, क्यूकै आ तौ थे जाणौ ई हौ कै ‘दुनिया भींतां सूं भरीजगी’, अैड़ी थिति में धीरज कैड़ी थिति में है, जिकर री बात कोनीं। अर इणी बिचाळै धीरज परखण री म्हैं कदै-कदास सोच ई लेवूं। पण तद हाथूंहाथ ई मन मांय आ आवै कै धीरज रौ ठाह तौ खुदौखुद बगत आयां लाग जासी, कै पछै जद आप भचीड़ौ खासौ तद ठाह लाग जासी, पण साथै ई बैम हुवै कै जीयाजूंण में केइयां रै ‘भचीड़ौ लागै अर … ठाह ई नीं पड़ै’ तद के करीजै?
म्हैं कवि हूं इणी कारणै इत्ती दोगाचींती में हूं। ब्योपारी कै नेता हुवतौ तौ अजै तांणी आप रौ धीरज कदास रौ ई पितायण लेवतौ। पण कवि तौ कवि ई हुवै। कवि कनै बळ हुवै कविता रौ। थे जांणौ ई हौ कै कवि री ‘कविता रै साथै ग्यान अर थावस तौ हुवै ई हुवै, साथै हुवै आखै रचाव अर बांचणियै मिनख री मनगत।’ अर थे इयां ई जांणौ, आ मनगत बांचनै म्हैं डांफाचूक हुय जावूं। बदळतै बगत नै झीणी-भांत निरखनै तौ और ई डांफाचूक हुय जावूं। क्यूंकै बदळतै बगत में प्रेम रा नवा खांचा घड़ीजै अर औ खरौ साच है कै प्रेम बावळौ कर सकै, ‘प्रेम ई कर सकै- साच साम्हीं हरेक नै आंधौ।’ तद बावळौ अर आंधौ करण रौ औ हथियार म्हैं म्हारी कविता में बरतूं कै नीं बरतूं? धीरज धरूं कै नीं धरूं? आ दिक्कताई है। म्हारी कविता म्हैं कठै सूं सरू करूं, आ ई दिक्कताई है। क्यूंकै मन अबै मन नीं रैया। घर अबै घर नीं। मन मिनख री ओळख हुवै अर ‘घर जीवण खातर हुवै/बेमन जीवणौ/आपरै घर मांय/मरणौ हुवै।’, पण ‘जीसा!/ थे बणायौ/ वौ घर अबै कोनीं/भाई कैवै- घर है।/इसै घर बाबत/म्हैं कांई कैवूं जीसा?’
ओहौ! बत कठै सूं सरू हुयी ही अर कठै खुद रै तांण आय ऊभी हुयगी। थे ई म्हनै कैयसौ कै ‘खुद रौ स्वाद सगळां माथै मती थोप्या करौ।’ पण थे कैवौ भलांई, म्हारै में तौ ‘दाळ में पैलपोत कांकरौ जोवण री कुबाण पड़गी।’ अबै आ कुबांण ‘आलोचक’ में नीं पड़सी तौ किण में पड़सी? म्हैं कवि ई नीं, आलोचक ई हूं। आ तौ थे जांणौ ई हौ। अर पछै थे आ ई जाणता हुयसौ कै म्हारौ अठै धरम बणै कै इण कविता पोथी ओळाव कीं कांम आलोचना रौ ई कर लेवूं। तद ई तौ बात फबसी। पैलां केई सबदां री विगत जांण लेवां- ‘‘पोथी? आलोचना? कविता?’’
अबै थै औ सवाल कर सकौ कै ‘‘केई मोटा-मोटा सबद अेकण साथै कियां? सगळी विगत अेकण साथै ई सूंपसौ के?’’ पण म्हारौ उथळौ ई सुण लेवौ- ‘फूल रै साथै कांटा अर डाळी तौ हुवै ई हुवै।’ पण आ ई समझौ कै वींरै साथै ई ‘हुवै वा आंख, जिकी जोवै रंग अर आखौ सैचन्नण संसार आपां रौ।’
इणी कारणै म्हारी वीं आंख सूं ई 70 जोड़ 16 इयांकै 86 पानां में 57 जोड़ 14 इयांकै 71 कैयीजती कवितावां मारफत थांनै जुग रौ साच दीखायसूं। ध्यांन राखजौ, आंख री बात करी हूं, आंख्यां री नीं!
हां, अबै कीं आंख रै चितरांम संू बारै आवां अर कविता रै जोड़ै बात करां तद ‘पैली विचार कर लो/ थे ओळखौ तौ हौ कविता…?’ कोनीं ओळखौ तद पछै पैलांपैल थे देखौ-समझौ कै कविता हुवै के है? आ समझ लेयसौ, तद पछैई म्हैं कविता करसूं। हां तौ समझौ-
‘कविता होवै- सबदां री अनोखी मुलाकात/ है आ आपसरी री बात…।’ पण आ आपसरी री बात कविता में इयां ई बण जावै, आ बात कोनीं, क्यूकै ‘किणी रै कैयां सूं कोनीं लिखीजै कविता…/ … बरसै तौ बरसै अर नीं बरसै…/…बरसां रा बरस कोनीं बरसै…/….किणी री मजाल कै अेक छांट ई बरसा लेवै बिना मरजी…।’ पण आ तौ थे ई जांणौ हौ कै ‘कविता लिखणौ/ किणी पूजा सूं कमती नीं है/ ना ईज किणी रौ/ भोग टाळण सूं कमती है।’,
पण औ ई अेक बीजौ साच है कै ‘ठावी ठौड़ मिलण री जेज है, किणी ओळी मांय मिलतां ई, वाजिब जागा खिलतां ई, बण जावैला कविता…।’ पण औ ई सै सूं लूंठौ तौ औ साच है कै ‘हरेक कविता, कविता कोनीं हुवै!’ औ म्हैं जाणूं। अर आ ई जांणूं कै सबद-सबद जोड़नै ई कविता राचीज सकै। पण सबद-सबद जोड़नै राचीजेड़ी कविता रै ओळै-दोळै म्हैं ‘क्यूं करूं म्हैं हिसाब…,’ क्यूंकै- ‘…अट्टा-सट्टा करीज सकै सबदां रा!’
घणी बात क्यूं करां। क्यूंकै अबै तौ थारै कीं पल्लै पड़ी हुयसी? पड़ी तौ ठीक है, नींतर म्हारी आ बात तौ पल्लै लेय ई लेवौ कै म्हैं कविता क्यूं लिखूं?
म्हारी बात सुणनै आप हांसौ? पण अेकर ‘हंसण री बात नै तौ जावण दां/ पण रोवण री टैम तौ रोवां/ असली रोवणौ, बस,/ इणी खातर, म्हैं लिखूं- कविता।’ पण म्हैं तौ कैवणौ चावूं खरी बात, वा आ है कै ‘कविता हिम्मत देवै।’ अर तद ई कवि कविता लिखै।
आ हीम्मत कियां आवै, कविता रै बख पांण ई तौ। पण औ बख कठैई कुणई सीखावै कोनीं। थे ई जांणौ- ‘कविता कियां लिखीजै?/ इण माथै कोई किताब कोनीं।,/ कविता क्यंू लिखीजै/ इण माथै कोई जवाब कोनीं।’ पण म्हैं तौ इत्तौ जांणूं कै कवि ‘धूड़ माथै कविता’ ई लिख सकै अर धूड़ ई कविता लिख सकै। आ ई क्यूं खुद री बात करूं तौ ‘म्हैं धूड़ हूं/ लिखतौ रैवूं-/ धूड़ माथै कविता।’
अबै म्हारी इण पोथी री कविता कांनी आवौ।
ओहौ! कविता तौ टाळवीं ई है। मतलब गिणती री ई है। पण पछैई म्हैं सोचूं कै इण पोथी रै ओळाव जकौ कैवणौ है वौ तौ अबार कैय ई देवूं। दोय-च्यार ओळी में। खासकर कविता के हुवै अर कविता मांय के हुवै, इण पेटै तौ पक्कायत ई कैय देवूं। ‘आ कुण देखै’ कै वा कविता बणी कै नीं बणी, क्यूंकै औ तौ आकरौ साच है ई- ‘जे मानौ तौ/ हुवै कविता, कविता।’ अर नीं मानौ तौ हुवै फगत कीं सबद। पण कवि सारू तौ ‘कविता हुवण संू बेसी/जरूरी है आपरौ विचार/ कविता नै/कविता गिणनौ।’
पण म्हारौ धरम लिखणौ है। हेलौ करणौ है। अर तद ई ‘म्हैं हेलौ करूं/हेला माथै हेलौ करूं/बारंबार करूं/दिन-रात करूं/मन-आंगणै करूं…।’
क्यूं करूं आ ई सुणौ। इणी कारणै करूं कै ‘कदैई तौ सुणैला थूं!’
मानता रै टोटै भलांई ‘बिना भासा रै/घूमा म्हे उभराणां!’ पण जद सुणैला तद फगत म्हारी मायड़ भासा राजस्थानी में ई सुणैला। अर अै हेला जोर सूं सुणैला क्यूकै म्हे ‘नित कटीजां/मांय रा मांय/दिन—रात चूंटीजां/बट—बटीजै जबान/इण गत रै पाण ई तौ/मांड राख्यौ है— /मरणौ…।’ मरणौ मांडेड़ा रा हेला री विगत तौ थे जांणौ ई हौ। म्हारी कविता री बात अेक पासौ धरौ, पण थे हेलौ सुणौ। ‘कविता सूं पैली जरूरी हुवै भासा री संभाळ’ अर म्हैं तौ अठै इण पोथी रै ओळाव ‘भासा री हेमाणी लियां ऊभौ हूं म्हैं…।’
=======================
Dularam01लेखक परिचै : दुलाराम सहारण 15 सितम्बर 1976 भाडंग (तारानगर) चूरू में जलम। एम. ए. अर एल.एल.बी.। बाळपणै सूं ई साहित्य मांय रुझान। इंटरनेट अर संस्थागत अनेक कामां सूं सांवठी ओळखाण राखणिया सहारण आज मानीजता वकील है। विविध विधावां में लेखन। ‘पीड़’ कहाणी-संग्रै माथै साहित्य अकादेमी रो युवा लेखक पुरस्कार। ‘क्रिकेट रो कोड’ अर ‘जंगळ दरबार’ बाल साहित्य री पोथ्यां छप्योड़ी।
ठिकाणो : प्रयास भवन, ताजूशाह तकिए रै साम्हीं, चूरू
मोबाइल : 9414327734 ई-मेल : drsaharan09@gmail.com

समाज का अक्स : च्यानण पख

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा का राजस्थानी कहानी संग्रह
Coverराजस्थानी भाषा के युवा कहानीकार मदनगोपाल लढ़ा के प्रथम कहानी-संकलन “च्यानण पख” में वर्तमान समय और समाज के अक्स को प्रस्तुत करती सत्रह कहानियां संकलित है। डायरी शैली में लिखी शीर्षक-कहानी “च्यानण पख” यानी शुक्ल-पक्ष एक ऐसी लड़की की कहानी है जो समय के साथ समझवान होती जैसे स्त्री-विमर्श को नई राह प्रदान करती है। कहानी अपनी शैल्पिक नवीनता के साथ-साथ अति-आत्मियता व निजता से लबरेज भाषा-शैली के कारण जैसे सम्मोहन का जादू बिखेरती पंक्ति-दर-पंक्ति आगे बढ़ती हुई अपने पाठकों को बांधने में सक्षम है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह पाठ अपनी आधुनिकता, परिवेशगत नवीनता के कारण भी ध्यानाकर्षित करता है, और इसे अत्याधुनिक तकनीकों से सज्जित स्वतंत्रता के मार्ग अग्रसर होती स्वाभिमानी नवयुवतियों के बौद्धिक-विकास और विश्वास के रूप में भी पढ़ा-देखा जा सकता है।

मदन गोपाल लढ़ा की इन कहानियों में राजस्थानी जन-जीवन के उन छोटे-छोटे पक्षों को प्रमाणिकता से उभारने का प्रयास किया गया है, जिन से हम रोजमर्रा की दिनचर्या में अपने घर-परिवार और आस-पास के जीवन में सामना करते हैं। यहां कहानीकार का एक रचनाकर के रूप में लेखकीय-संत्रास है तो वहीं सामाजिक अंधविश्वासों और रूढियों के प्रति टूटता मोह भी। घर, परिवार और समाज के अनेकानेक छोटे-बड़े घटना-प्रसंगों को कहानीकार के रूप में सुनाने के स्थान पर उन अनुभवों को भाषा से संजीवनी प्रदान कर जीवित करने का कौशल प्रभावित करता है। सभी स्थितियों में कहानीकार प्रश्नाकुलता के साथ बिना कोई हल सुझाए अपने अनुभव और चिंतन को जस-का-तस प्रस्तुत करने की निसंग्ता-निश्चलता का भाव अर्जित करने में सफल रहा है।

संग्रह की कुछ कहानियों में नवीन प्रयोग भी किए गए हैं। यहां कहानी में उपशीर्षकों के अंतर्गत कोलाज द्वारा रची कहानियों में “आरती प्रियदर्शिनी री गली” और “उदासी रो कोई रंग कोनी हुवै” विशेष उल्लेखनीन है। कहानियों में प्रस्तुत अनुभवजन्य घटनाक्रम के अतिरिक्त लेखकीय कौशल यह भी है कि जिस किसी घटना-प्रसंग को कहानीकार ने लिया है वह अपनी चित्रात्मक-बिम्बात्मक भाषा द्वारा मर्मस्पर्शी बन पड़ा है। इन कहानियों में विभिन्न कला माध्यमों यथा- चित्रकला, संगीत आदि से जुड़ी स्थानीयता और सर्वकालिकता भी उल्लेखनीय है। आकर्षक आवरण और सुंदर मुद्रण से सज्जित इस पुस्तक द्वारा समकालीन राजस्थानी युवा कहानी जैसे अपने शुक्ल-पक्ष में प्रवेश कर रही है।

– नीरज दइयाDr.+Madan+Ladha+Book