Category Archives: सिमरण

बिज्जी जिसा लेखकां नैं काळ कदैई कोनी मार सकै….

VIJAYDAN DETHAआखै देस-विदेस मांय राजस्थानी रै नांव साथै ई जिका नांव आवै वां मांय साहित्य अकादेमी अर पद्मश्री सूं सम्मानित विजयदान देथा ‘बिज्जी’ रो नांव हरावळ। बिज्जी रो जस ओ कै राजस्थान अर राजस्थानी नैं नोबल रै दरवाजै पूगायो। विजयदान देथा री मोटी खासियत कै बां नैं देथा जी नांव सूं संबोधन करण रै अलावा बिना जिकारै रो नांव बिज्जी घणी रुचतो। बिज्जी फगत अेक नांव है जिण रै आगै-लारै कीं लगावण री दरकार कोनी। श्री अर जी रै मोह सूं बिज्जी बरसां पैली मुगत हुयग्या अर बिज्जी नांव री जिकी काया ही उण सूं ई मुगत हुयग्या। बिज्जी आपरै तरै रा निरवाळा लेखक हा जिका रो किणी सूं कोई मुकाबलो कोनी रैयो। बिज्जी राजस्थानी साहित्य पेटै इत्तो जसजोग काम करग्या कै आवण वाळै बगत मांय किणी अेक लेखक सूं उण री बरोबरी ई कोनी हुय सकैला। बां आपरी पूरी जूण ई साहित्य अर सबद मांय होम दी। तारीख रै हिसाब सूं तो विजयदान देथा 1 सितम्बर, 1926 नैं जलमिया अर 10 नवम्बर 2013 नैं सौ बरस लिया, पण साहित्य रै आंगणै बै हजारी उमर लाया। बिज्जी आपां रै बिचाळै सदीव हा अर सदीव रैसी…. अठै ओ लिखणो ठीक रैसी कै बिज्जी जिसा लेखकां नैं काळ कदैई कोनी मार सकै। पहेली फिल्म सूं बिज्जी रो जस नवी पीढी जाणियो। बिज्जी राजस्थानी लेखक रूप आखै जगत मांय बोरूंदा बैठा-बैठा डंको बजायो।
लोक साहित्य पेटै लोक कथावां नैं लिखित रूप ढाळण मांय बिज्जी आपरी आखी ऊरमा लगा दी। बां रो जस बातां री फुलवाड़ी अर कहावत कोस रै मारफत जुगा-जुगा जाणीजैला। बिज्जी आधुनिक गद्य भाषा नैं आपरी ठौड़ जचावण अर जमावण रो मोटो काम बातां री फुलवाड़ी सूं करियो। किणी लेखक रा सबद चेतै आवै जिण मुजब बिज्जी राजस्थानी रा भगवान है। भगवान रो जिको कीं अरथ हुवै उण नैं बिज्जी राजस्थानी साहित्य रै सीगै साकार कर दिखायो। भगवान रो अरथाव कै कीं रचण पेटै हुवै अर बिज्जी कहाणी साहित्य मांय अेक इतिहास रचियो है। बियां आपां रा संस्कार है कै सौ बरस पूगणियै नैं भगवान मानां। किणी नवै लेखक रै हियै आपरै पैली रा लेखकां पेटै घणो माण हुया करै अर उण मान री हद आ ई हुवै कै बो किणी लेखक नैं भगवान मान लेवै। जिका नैं जीवता जीव बिज्जी भगवान कोनी लगता बां रै देवलोक गयां पछै तो आ ओळी खरोखरी स्वीकारी जाय सकै कै बै आपारी काया रै गुण-दोसां सूं मुगत हुयग्या।
बिज्जी री राजस्थानी हिंदी मांय घणी घणी पोथ्यां प्रकाशित हुई। घणै अंजस री बात कै राजकमल प्रकाशन राजस्थानी कहाणी संकलन अलेखूं हिटलर तो नेशनल बुक ट्रस्ट ई विजयदांन देथा री सिर कथावां पोथी प्रकाशित करी। बिज्जी मंच, माइक, सभा-गोष्ठी सूं अळधा रैवणिया लेखक हा, म्हैं जोधपुर रै प्रांतीय कथा समारोह में मिल्यो उण पछै बीकानेर में मुलाकात हुई। बिज्जी हरेक लेखक सूं घणै हेत-अपणायत सूं मिलता। कथाकार मीठेस निरमोही री खिमता कै बै कथा समारोह में बिज्जी नैं बुला’र लाया अर कवि-कहाणीकार मालचंद तिवाड़ी नैं तो बेटै जिसो माण देवणो जग जाहिर है। साहित्य अकादेमी, बिज्जी अर सीपी बन्ना सूं जुड़ी केई केई बातां है जिण सूं आगै री बात कै बिज्जी नैं आपरी आलोचना सहन कोनी ही। नेगचार संपादक नीरज दइया रूप बिज्जी साम्हीं ऊभै हुवण री बात बगत री मांग ही अर बिज्जी नैं माण देवणियो म्हैं लेखक-परिवार नैं ई अकेक घर-घराणो मानूं। राजस्थानी साहित्य रै आंगणै मांय बिज्जी नैं म्हैं दादोसा कैया करतो हो। बै बडेरा हा अर बडेरा ई आपरी रचनावां मांय साच रो पल्लो झलण री सीख सीखावै तो उण नैं कोई कियां बिसरावै। बिज्जी री सिरजण-जातरा नैं घणै मान नमन।

Bijji pr lekha Neeraj Daiya

रंग राजस्थानी में 11-11-13 नैं प्रकाशित

इण नै देखण नै वै कोनी…..

श्री कन्हैयालाल भाटी (४ जुलाई, १९४२ – १४ जनवरी २०१२)
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untitled“……इचरज तौ इण बात रौ है कै सितर बरसां री उमर रै अड़ै-गड़ै आय लेखक कन्हैयालाल भाटी कहाणियां री पैली पोथी छपाई है जद कै वां री कहाणियां केई बरसां सूं न्यारी न्यारी पत्रिकावां में छपती रैयी है। …… कहाणियां में कठैई जीवण रा राग-रंग है तो कठैई दुख रा दरसाव, कठैई दोगाचींती है तो कठैई आपै रा अंतर विरोध। केई दूजी-चीजां ई है जिंया उदासी, अवसाद अर अणबूझ सपन, मरजादा में पजियोड़ी नारी री अंतस-पीड़ा, चौफेर पसरियोड़ो सरणाटो, अबखायां सूं जूझता मिनखां रो हौसलो, एकलखोरी आदत रो सूगलवाड़ो अर मांयलै घमसाण नै बारै लावण री खेचळ। इण सगळै तांणै-बांणै नैं अंगेजता थका लेखक उण नै अरथावण सारू एक ओपती असरदार, रंजक अर रळकवीं भासा ई काम में ली है। एक इसी भासा जिकी अंतर दीठ री आफळ नै साकार रूप देय सकै।…”
शिक्षा विभाग राजस्थान री मासिक पत्रिका “शिविरा” रा पूर्व-संपादक अर ख्यातनांव कवि श्री भवानीशंकर व्यास “विनोद” आ बात राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर री मासिक पत्रिका “जागती जोत” रै दिसम्बर, 2011 अंक मांय लिखी। ऐ ओळ्यां “कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां” पोथी री परख लिखतां वां लिखी ही, परख नै बांच’र म्हैं मानजोग कन्हैयालाल भाटी नै सीरांथै बैठ’र सुणाई। वै कैंसर सूं जूझ रैया हा अर वां री हालत ठीक कोनी ही। “जागती जोत” रै इणी अंक में वां री छेहली कहाणी अटकळ छपी। वां रो माननो हो कै हरेक कहाणी बांचणियै रै काळजै उतरै जिसी लिखणी चाइजै अर कहाणी-पोथीपरख पेटै घणा राजी हा।
अठै ओ खुलासो करणो लाजमी है कै वां री तकलीफ अणमाप ही पण वै उपन्यास “अणसार” अर “जोगाजोग” रै अनुवाद नै लेय’र चिंता करै हा कै ओ काम किंया पार पड़सी। साहित्य अकादेमी कानी सूं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर रै “जोगजोग” उपन्यास रै अनुवाद नै वै पूरो करियो ही हो अर आ ई बात गुजराती उपन्यासकार वर्षा अडाजला रै “अणसार” बाबत ही। अणसार एक मोटो उपन्यास हो अर उण री प्रेस कॉपी तैयार हुया पछै कन्हैयालालजी भाटी चावतां हा कै ओ उपन्यास राजस्थानी रा लूंठा अनुवाद श्री सत्यनारायण स्वामी नै समरपित करियो जावणो है। आं दोनूं कामां खातर कीं बगत री दरकार ही पण म्हे घर-परिवार रा सगळा मन ही मन में डरै हा कांई ठाह भाग मांय कांई लिख्योड़ो है। वै जीवण अर मरण रै बिचाळै हुयां उपरांत ई घणा ऊरमावान अर जोस सूं पूरमपूर हा। म्हैं वां री तकलीफ मांय इण जूण मांय खुद रो मरण जैड़ी पीड़ सैन करी है। वां री पाटी-पोळी रै बगत दोय बार वां रै कैयै मुजब वां रै पाखती रैय’र जाणियो कै वै बिरला मिनख हा जिण अणथाग दरद रै समंदर में तिरै हा, म्हैं म्हारै जीव रै ऊपरिया कर वा पीड़ परतख देखी अर वो देखणो ई खरोखरो कैवूं कै खुद रै मरण दांई हो। उण सगतीवान लेखक-अनुवादक नै निवण करूं कै अखूट ताकत रै पाण मौत सूं वां घणी जूझ मांडी।
श्री कन्हैयालालजी भाटी म्हारै पिता श्री सांवर दइया रा सगळा सूं गैरा भायला हा। पिताश्री जद संसार छोड़ग्या तद म्हनै घणी हिम्मत देवणियां मांय आदरजोग भाटीजी बाबोसा नै म्हैं म्हारै मन रै घणो नजीक आवतां देख्यो। माइत रै रूप मांय बरसां वां आपरो हाथ राख्यो। म्हनै नौकरी रै सिलसिलै में बारै रैवणो पड़ियो अर वां सूं मेळ-मुलाकात कमती हुयगी। बरस 2011 रै दिसम्बर महीनै रै एक दिन वां रो बुलायो आयो अर म्हैं वां रै घरै पूग्यो तो म्हारै पगां हेठली जमीन जाणै खिसकती लागी। म्हैं ओळमो ई दियो कै म्हनै बीमारी री खबर क्यूं कोनी करी तद वां घणी हिम्मत सूं कैय तो दियो बुढापो है हारी-बेमारी चालती ई रैवै पण उणी दिन जद म्हैं दोनूं घरै एकला बैठा तद वै रोवण लागग्या कै बेटा नीरज बीस दिन होयग्या रोटी कोनी खाई। म्हैं हिम्मत बंधाई कै सब ठीक हो जासी… म्हैं आयग्यो हूं नीं, पण कांई ठीक कोनी होयो। उण बगत पूरी विगत जाण’र भाटी बाबोसा नै म्हैं कैयो कै आं अनुवाद रै कामां सूं तो बेसी जरूरी आपरी कहाणियां री पोथी राजस्थानी में आवणी समझूं… हरख है वां री मंजूरी सूं वो काम बगतसर होयो। उण पोथी रै लोकार्पण री जबरी जुगत बैठी कै “मुक्ति” संस्थान रा भाई श्री राजेंद्र जोशी अर श्री बुलाकी शर्मा कन्हैयालाल भाटी रो सम्मान करण री सोचै हा अर म्हारी बात पछै 27 दिसम्बर, 2011 नै ओ काम होयो। महीनो मळ रो अर वां रो कैवणो नीरज अबार ठीक रैसी कांई? म्हैं कैयो मळ पछै “अणसार” अर “जोगाजोग”। वै “कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां” पोथी नै देख’र जित्ती आसीस दी वां म्हारै अंतस मांय हाल जीवै। उण लोकार्पण अर सम्मान समारोह री जाणै वां रै जीवण मांय कसर बाकी ही कै मळ उतरण रै साथै ही 14 जनवरी 2012 नै साहित्य पेटै पूरी जूण अरपण करणिया लेखक अनुवादक श्री कन्हैयालाल भाटी रामसरण होयग्या। वां रो जलम 4 जुलाई 1942 नै होयो अर “शिविरा”, “नया शिक्षक” मांय बरस 1967 सूं 1996 तांई सहायक संपादक रै रूप मांय उल्लेखजोग काम करियो अर बरस 2000 में सेवानिवृति पछै कैंसर री बीमारी सूं जूझता थकां भी सिरजणरत रैया। वां रै जीवण मांय हिंदी में केई पोथ्यां छपी अर मान सम्मान मिल्या। राजस्थानी पोथी कहाणियां री वै देख सक्या अर आज जद “अणसार” पोथी आपां साम्हीं आई है तो इण नै देखण नै वै कोनी। वां रै नीं रैयां म्हारी बडिया श्रीमती पुष्पादेवी भाटी अर तीन भाई योगेंद्र, प्रदीप अर संदीप भेळै दोय बैनां सुमन, अंजु नैं लखदाद कै बाबोसा श्री कन्हैयालाल भाटी रै काम नैं साम्हीं लावण रा जतन में सैयोग दियो। म्हैं पूरै राजस्थानी साहित्य-परिवार कानी सूं आं रो गुण मानूं। इण पोथी रै भाग में कोनी हो कै आ वां रै रैंवता राजस्थानी में छपै अर वै इण टाणै आपरी बात लिखै सो म्हैं वां कानी सूं “अणसार” री मूळ लेखिका बैन वर्षा अडाजला रो जस मानू कै वां इण री मंजूरी दी अर आप बांचणियां नै अरज करूं कै पोथी बाबत आपरी टीप जरूर लिखजो।
-डॉ. नीरज दइया
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मेरा “मोम का घोड़ा” नहीं रहा…..

MahesgChandr Joshi

किसी भी रचनाकार की लेखन-यात्रा का एक आरंभिक बिंदु होता है, किंतु उसे सरल-सहज रूप में खोजना अथवा स्पष्ट कर पाना बेहद कठिन कार्य है। मेरा तो यहां तक मानना है कि उस बिंदु को ठीक-ठीक ढूंढ पाना लगभग असंभव-सा ही होता है। लेखन-यात्रा के उस आरंभिक बिंदु की तलाश में कुछ बातें की जा सकती हैं। यह स्मृति-आलेख उस बिंदु की तलाश में ऐसा एक प्रयास है कि मैं मेरे साहित्यिक संस्कारों की आरंभिक पुस्तकों में से कथाकार श्री महेशचंद्र जोशी के बाल उपन्यास “मोम का घोड़ा” का स्मरण कर रहा हूं। कुछ किताबें और कुछ लेखक ही होते हैं, जो हम में साहित्यिक संस्कारों का कोई बीजारोपण करते हैं। अगर लेखन जन्मजात प्रवृति है तो निश्चय ही कुछ परिस्थतियां उसके उत्स का कारण बनती हैं।

मेरा सौभाग्य रहा कि मेरा जन्म एक लेखक के घर में हुआ। मेरे पिता स्व. सांवर दइया के जिन अंतरंग मित्रों को मेरा बाल-मन अब तक स्मृति में बसाए हैं उनमें सर्वश्री हरदर्शन सहगल, महेशचंद्र जोशी और गणेश मोदी प्रमुख हैं। उन दिनों की स्मृतियों में मुझे अनादिष्ट कला के पेंटर श्री के. राज द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन चित्रकला शिविरों का स्मरण है। जहां लेखकीय झोला लटकाए मैंने अपने पिता को देखा, उनके साथ के मित्रों में श्री महेशचंद्र जोशी थे जिनकी पुस्तक “मोम का घोड़ा” मुझे उपहार स्वरूप मिली।

मैं कथाकर महेशचंद्र जोशी से अनेक बार मिला और सदैव उनके स्नेह का स्पर्श भीतर तक किया। कुछ लेखकों के विषय में यह सत्य है कि उनको उनके कद के हिसाब से साहित्य की पंक्ति में खड़ा नहीं किया जाता। जोशी जी जैसे कुछ लेखक अपने संकोच के चलते अथवा स्वांत-सुखाय के आस्वाद के रहते भी इस पंक्ति में खड़े हुए होने के बावजूद हिंदी आलोचना द्वारा देखे नहीं गए हैं। जोशी जी की बीस के लगभग कथा-साहित्य की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है और अनेक पुस्तकें अप्रकशित हैं। उनके चर्चित कहानी संग्रहों में प्रमुख है- ‘मेरा घर कहां है’, ‘मुझे भूल जाओ’, ‘तलाश जारी है’ आदि। उपन्यासों में “नशा” उपन्यास की चर्चा हुई है, किंतु बाल उपन्यास “मोम का घोड़ा” पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है।

वरिष्ठ कथाकार श्री महेशचंद्र जोशी 24 मई, 2012 रविवार की रात्री इस संसार को अलविदा कह गए। जोशी जी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे, किंतु वे हमेशा शब्दों की दुनिया में डूबे रहेते थे। उन्होने कहानियां लिखते-पढते हुए कभी अपनी बीमारी को इतनी गंभीरता से नहीं लिया। किसी को क्या पता था कि वे असमय इस तरह अलविदा कह जाएंगे। मैं नौकरी के सिलसिले में बीकानेर से लगातार बाहर रहा और जब अपने घर बीकानेर वापस लौटा हूं तो उनकी कमी भीतर कहीं अखर रही है। मेरा मोम का घोड़ा नहीं रहा। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आते हैं जब जोशी जी हमारे पैतृक आवास जेल रोड साईकिल से आते थे और पापा की बजाय जब भी मुझ से मुलाकात होती तो कहा करते थे- “पापा को कहना कि मोम का घोड़ा आया था।” यह वह दौर रहा होगा जब उनको शक था कि मैं महेशचंद्र जोशी नाम याद नहीं रख सकूंगा अथवा यह उनका अत्यधिक स्नेह रहा होगा जिसके रहते खुद उन्होने अपना नाम मोम का घोड़ा निकाल लिया था।

महाकवि तुलसीदास जी की भांति वैसे तो मैं अपने उस पाठकीय आस्वाद के विषय में यही कहूंगा कि बिना मोम का घोड़ा उपन्यास पढ़े आप उस आस्वाद का अनुभव कर ही नहीं सकते जो वास्तव में है। रचना का पाठ और उस पाठ का काल विशेष भी उस पाठ के आस्वाद को प्रभावित करते हैं। बाल्यकाल में पढ़ी उस कृति का रोमांचक प्रभाव आज अगर पुनर्पाठ करूं तो संभव है नहीं हो सकेगा। जैसे किसी एक नदी में हम दूसरी बार स्नान नहीं कर सकते उसी प्रकार हर पाठ का आस्बाद समान नहीं होता।

मोम का घोड़ा का कथानक आज तो मुझे किसी लोक आख्यान सा प्रतीत होता है। इसमें राजा-रानी की सीधी सरल बाल मनोवैज्ञानिक आधार लिए रोचक कहाणी चलती है। राजा का पुत्र मोम का घोड़ा लेकर उड़ा और लौट कर नहीं आया, वह विध्न बाधाओं को पार करता एक नई कहानी रचता कथा के अंत में प्रगट होकर सब कुछ सुखांत कर देता है।

मुझे लगता है कि किसी रचना में आलोचना अपने मानकों के आधार पर रचना के साथ अक्सर शुष्क व्यवहार ही करती है, किंतु रचना का मर्म और प्रभाव पाठक ही पकड़ पाता है। मैं मेरे उस बाल्यावस्था के पाठक को कहीं भीतर अब भी संजोए सहेजे हूं कि बाल उपन्यास मोम का घोड़ा का स्मरण अब भी ताजा और स्नेह से सराबोर निजता लिए हुए है। क्या यह किसी कृति की सफलता नहीं है कि उस का स्मरण हमें लंबे समय तक रहे? हिंदी बाल उपन्यास यात्रा की जिन कृतियों को मैं आस्वाद कर सका हूं उन में अब तक मुझे सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में बयान देना का अवसर मिले तो मैं श्री महेशचंद्र जोशी के मोम का घोड़ा को ही याद करना चाहूंगा। इस उपन्यास की सरल सहज भाषा और कथानक में कौतूहल का घटक अब प्रभावशाली प्रतीत होता है। उपन्यास की संवेदना में बालमन डूब सा जाता है। उपन्यास को एक बैठक में पढ़ने का कीर्तिमान तो बनाया ही था साथ ही साथ इसे अनेक बार पढ़ने का आनंद भी मैंने लिया था। राजस्थान के बाल उपन्यासों में निश्चय ही मोम का घोड़ा कालजयी कृति है जो वर्षों तक याद की जाती रहेगी।

MaheshChanndr Joshiकिसी लेखक की निधि उसका परिवार और परिजन होते हैं। यह हर्ष की बात है कि उनकी पुत्री रंगकर्मी मंदाकिनी जोशी निश्चय ही इस शब्द-यात्रा को सहेजने का कार्य करेंगी। मेरी कामना है कि जोशी जी की  अप्रकाशित रचनाएं शीघ्र साहित्य-जगत के समक्ष आए और “मोम का घोड़ा” बाल उपन्यास का पुनर्मुद्रण कोई प्रकाशक कर इसे इक्कीसवीं शताब्दी के बाल पाठकों को सहज सुलभ कराए ।

डॉ. नीरज  दइया

Cover-Mahesh Chandra Joshi

पुण्य-स्मरण : कन्हैयालाल भाटी

मौलिक कहानीकार, बेजोड़ अनुवाद

नीरज दइया

K L Bhatiहमारे भीतर कुछ स्मृतियां इस तरह भीतर रहती हैं कि हम उनसे मुक्त होना चाहे न चाहे, उनका स्मरण करें चाहे न करें किंतु वे जैसे निरंतर हमारा स्मरण करती है। अपने पिता सांवर दइया की स्मृति और उनके अनन्य मित्र कन्हैयालाल भाटी की स्मृति मेरे जीवन का जैसे अभिन्न अंग है। पुत्र और मानस-पुत्र दोनों पदों में लौकिक अंतर चाहे जितना रहे, किंतु एक जगह पर यह अंतर लुप्त हो जाता है और इस विश्वास में जीना बेहद सुखद होता है कि वे हमारा स्मरण कर रहे हैं। अपने पूर्वजों का पुण्य-स्मरण निशंदेह कोई सुखद अहसास नहीं किंतु इस पीड़ा में आनंद अवश्य है….  पीड़ा में आनंद जिसे हो आए मेरी मधुशाला।

जीवन की इस मधुशाला में किसी भी बालक को होश कहां होता है जो मुझे होता। बेहोशी के ऐसे ही किसी आलम में मैंने जाना कि मेरे पिता के मित्र कन्हैयालाल भाटी किसी पोस्टकार्ड में यह स्नेहिल उपालंभ लिखते हैं कि बीकानेर आकर मिले क्यों नहीं और श्रीलाल मोहता को जैन कॉलेज में नौकर मिल गई है। यह समय वह समय था जब मैं मेरे परिवार के साथ नोखा में था और उन्हीं दिनों का स्मरण है कि “धरती कद तांई धूमैली” कहानी संग्रह को राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर का पुरस्कार मिला था। यह वह समय था जब रावत सारस्वत “राजस्थानी” की परीक्षाएं स्कूलों में आयोजित करवाते थे और कन्हैयालाल सेठिया मान्यता की अलख के लिए दोहे लिखा करते थे। उन दिनों हमारे बाबा छोटू नाथ विद्यालय के खेल शिक्षक डेलूजी हमें खेल-कालांश में अन्नाराम “सुदामा” के उपन्यास-अंश और भूमिका आनंद के साथ सुनाया करते थे। उन्हीं दिनों कभी कहीं मैं कन्हैयालाल भाटी से मिला हूं यह याद नहीं।

याद तो कुछ भी नहीं और भूला भी कुछ नहीं, यह दोनों एक साथ संभव है। भीतर सब कुछ है और जब खोजने लगता हूं तो जैसे कुछ नहीं या वह कुछ हाथ लगता है जो यहां आवश्यक नहीं। समय में एक छलांग लगा कर मैं हमारे पास-पास जमीन खरीदने के किस्से, खुद कन्हैयालाल भाटी की बीमारी और बेड रेस्ट, पारिवारिक कार्यों के विभिन्न अवसर। बहन अंजू की बीमारी और जयपुर की स्मृतियों से आगे निकल कर अपने पिता सांवर दइया की दांत की तकलीफ तक पहुंच जाता हूं। इस यात्रा के बीच के काफी किस्से-कहानियां किसी अवसर के लिए बचा कर रख छोड़े है। जीवन के लंबे अंतराल को कुछ वाक्यों या पृष्टों पर उतारना सहज कहां होता है। अंतस भीतर से इतना उलझनों से भरा है कि सारे किस्से एक दूसरे में लिपटे हैं। सब कुछ बाहर आने को बेसब्र। यहां धैर्य के साथ सबदों को संभलना पड़ेगा। पिता के नहीं रहने पर मैंने अपने करीब जिन को पाया उनमें एक नाम कन्हैयालाल भाटी का है। वे मेरे लिए एक मार्गदर्शक और सबसे अधिक मित्रवत भाव से इतने करीब आए कि लगता है उन जैसा इस संसार में कोई नहीं। कोई किसी के समान न तो होता है और न ही होना चाहिए।

शिविरा पत्रिका में रहते हमारी पारिवारिक प्रगाढता बढ़ी और हमने परस्पर एक दूसरे परिवारों को गंभीरता और गहराई से जाना-पहचाना। कहानीकार-अनुवाद कन्हैयालाल भाटी का अवदान राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जितना है वह पूरा पहचाना नहीं गया। यहां मुझे मंगलेश डबराल की कविता संगतकार का स्मरण होता है। भाटी बीकानेर के साहित्य समाज में एक संगतकार के रूप में जीवनकाल में सदैव जिन मुख्य गायकों का साथ देते रहे उनका यह दायित्व बनता है कि उनके अवदान को रेखांकित करें। मौलिक कहानीकार के रूप में उनसे प्रभावित हुआ जा सकता है, वहीं उनके अनुवाद-कर्म से भी बहुत कुछ सीखा-समझा जा सकता है। सबसे अधित प्रभावित तो इस बात से होना चाहिए कि एक साहित्यकार को जीवन में जितना लिखना चाहिए उससे केई गुना उसका अध्ययन होना चाहिए। उनसे हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि भारतीय साहित्य का अधिकाधिक अध्ययन-चिंतन-मनन ही किसी साहित्यिक रचना के लिए खाद-पानी का काम करती है।

कन्हैयालाल भाटी एक आदर्श शिक्षक के रूप में जीवन काल में जितने लोकप्रिय रहे उससे कहीं अधिक उनकी कार्यनिष्ठता शिविरा के संदर्भ कक्ष के प्रभारी के रूप में देखी जा सकती है। कभी कभी मुझे आभास-सा होता है कि वे किसी पुस्तकालय के किसी कक्ष में अखबारों-पत्रिकाओं और पुस्तकों के ढेर में अब भी कुछ पढ़-लिख रहे हैं। किंतु खेद है कि आप और हम दुनिया के भूगोल पर अब उस जगह को कहीं नहीं खोज सकते।

E-mail : neerajdaiya@gmail.com

14-01-2013

एक व्यक्ति नहीं, स्कूल थे निर्मोही व्यास

निर्मोही व्यास (3 फरवरी, 1934- 12 जनवरी, 2013)

निर्मोही व्यास (3.2.1934- 12.1.2013)

पहली ही पंक्ति में यह स्पष्ट कर दूं कि मैं इस समय कुछ भी लिखने की मनःस्थिति में नहीं हूं। मेरे जैसे अनेक साथी वरिष्ठ नाटकार निर्मोही व्यास के नहीं रहने पर गहरे अवसाद में डूबें हैं। वे हिंदी और राजस्थानी के नाटककार, कहानीकार होने के साथ-साथ ताजिंदगी जिस भांति रंगमंच से सपरिवार जुड़े रहे वैसा जुड़ना-जोड़ना केवल उनको ही आता था। वे एक व्यक्ति नहीं, स्कूल थे। जयकिसन व्यास उनका मूल नाम था और उनका जन्म 3 फरवरी, 1934 को हुआ। संगीत में जिस प्रकार अलग अलग घराने जाने-पहचाने जाते हैं वैसे ही अनुराग कला केंद्र भी रंगमंच के क्षेत्र में एक बड़े घराने के रूप में जाना जाता रहा है।

निर्मोही व्यास के कलाकार, निर्देशक आदि के रंगमंचीय रूप को समय के पृष्ठों ने सहेज कर रख लिया है। कोई ओडियो-वीडियो रिकार्डिंग, क्लिप या हमारी स्मृतियां ही अब उस समय का साक्षात्कार करा सकेंगी किंतु व्यास द्वारा रचित कृतियां उन्हें जानने-समझने का अवसर देती रहेंगी। “सांवतो” राजस्थानी नाटक और उनकी कहानियों के अनुवाद को लेकर मैं करीब बीस वर्ष पहले उनके संपर्क में आया। निर्मोही व्यास का मेरे लिए स्नेह शायद इस रूप में भी रहा कि मैं अपने पिता सांवर दइया के अवसान के बाद लुटा-पिटा साहित्य-संसार में सक्रिय हो रहा था और वे अपनी उम्र, अनुभव-वरिष्ठा सब को भुलाकर मुझसे सदा आत्मीय मित्र की भांति मिलते। यह एक ऐसा मित्र था जिसकी मित्रताभरी आंखों में मुझे कभी-कभी अपने पिता की आंखें दिखाई देती। किसी भी अवसर-मुलाकात पर यह अहसास नहीं कराया कि मैं बड़ा नाटकार हूं, यह उनकी महानता थी।

जिला साक्षरता समिति में मुझे रूपेश व्यास के साथ काम करने का अवसर मिला और मित्र कुलदीप जनसेवी, दयानंद शर्मा के साथ रहते हुए अनेक अवसरों पर निर्मोही व्यास के सृजन पर बातचीत होती रहती थी। उन सभी दिनों के विभिन्न चित्र आज भी जैसे भीतर अपना आलोक बिखेर रहें हैं। नाटक के बदलते स्वरूप और प्रयोग के नाम पर मंच पर की जाने वाली सस्ती लोकप्रियता और संस्कारों के विरूद्ध हरकते उनको रुचती नहीं थी। नाटक पर जैसे वे मुझे परामर्श अथवा अपनी दृष्टि सौंपते कि आजकल यह संवादों में द्विअर्थीयता आ रही है वह गरिमामय नहीं है। आत्मीय जनों के बीच खुलकर बात करना उनका स्वभाव रहा। अब भीखो ढोली, ओळमो के प्रख्यात नाटकार की अन्य प्रमुख कृतियां प्रणवीर पाबूजी, अनामिका, कथा एक रंगकर्मी की, एक अधूरा नाटक आदि सदा हमारे साथ हैं।

निर्मोही व्यास के नाटकों का मंचन राजस्थान और राजस्थान से बाहर भी कई स्थानों पर हुआ। उनको राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने “सांवतो” के लिए वर्ष 1994-95 का शिवचंद भरतिया गद्य पुरस्कार प्रदान किया तब उनके साथ कविता संग्रह “हुवै रंग हजार” के लिए निधनोपरांत सांवर दइया को गणेशीलाल व्यास उस्ताद पद्य पुरस्कार प्रदान किया गया। “अनामिका” को राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने वर्ष 1995-96 का नाटक विधा के लिए देवीलाल पुरस्कार से भी सम्मानित किया। बाद में दोनों अकादमियों से विशिष्ट सम्मान मिला, वहीं वर्ष 1992 में पूरे बीकानेर शहर ने उनका नागरिक अभिनंदन किया और “नाट्य शेखर” लोकमान से उनको विभूषित किया। उस समय हुआ कवि-सम्मेलन आज भी स्मृति में जिंदा है। निर्मोही व्यास ने अनुराग कला केंद्र के माध्यम से रंगकर्म की जो अलख जगाई उसका कोई शानी नहीं। 

nirmohi vyasमैं फिर से पहली पंक्ति पर लौटता हूं। निर्मोहीजी व्यास से उनके अंतिम दिनों में मैं नहीं मिल सका। मिल लूंगा यही सोचता रहा कि बीमार है, किंतु किसी भी समय मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि समय बीतता जा रहा है। कोई ऐसी कल्पना ही क्यों करेगा? इस नहीं मिलने ने मेरे भीतर डर, निराशा, हताशा और थोड़ा अलगाव-सा व्याप्त कर दिया है। मैं स्वयं से प्रतिप्रश्न करता हूं कि अगर मैं मिल लेता तो क्या स्थितियां बदल जाती? जो हुआ है उसे हम या कोई भी स्थगित करने की किसी भूमिका में नहीं था? होनी और अनहोनी के बीच कोई कुछ नहीं कर सकता। अगर माने कि यह होना ही था तो इसके होने पर अब भी यकीन करने का मन क्यों नहीं। यकीन बेशक मन नहीं कर रहा किंतु जिस शव-यात्रा के शोक से मन अब भी भारी है उससे मुक्ति संभव नहीं। असंतोष और अवसाद यह भी है कि व्यासजी मेरे हिस्से की जो कुछ बातें मुझे से मिलने पर कहते या कह सकते थे और जिन्हें मैं सुनता, अब यह केवल एक सपना है।

रंगमंच के संस्कारों से सम्मपन पूरे परिवार और अनुराग कला केंद्र के साथियों में जो अपनत्व रहा है, वह बेमिसाल है। निर्मोही व्यास ने जिस रंग-अनुराग को स्वरूप प्रदान किया अथवा कहें कि जिस रंग-अनुराग की गंगा को अपने रंग-संस्कारों के साथ प्रवाहित किया वह अविकल सदा प्रवाहित होती रहेगी। इस गंगा को अपनी गरिमा देने वाले उनके अनुज देवकिसनजी, पुत्र सुधेश, पुत्री राजस्थली, विनीता, भतीजे कमल अनुरागी, सुनील, विक्रम, संजय, विशाल, भतीजी निकिता, पौत्र तपन, निखिल, शुभम, गौरव, पौत्री कनुप्रिया, अंकिता, अर्पिता और सृष्टि जैसे अनेक शक्तिशाली जीवट नाम हैं। बीकानेर के रंगकर्म को अपना संपूर्ण परिवार समर्पित करने वाले व्यास एक बिरले सृजनधर्मी के रूप में सदैव याद किए जाते रहेंगे और उनका सृजन-कार्य आने वाले समाज के लिए सदा प्रेरक रहेगा।

अपने साहित्यिक-संसार में हम अपनों के लिए क्या कर सकते हैं या करते है? इस आधुनिक होते फेसबुकिया रचनाकार-पाठक-समाज में अपने अग्रज, समव्यस्क और अनुज सब को “मित्र” की संज्ञा दे रहे हैं। लिंग-भेद और आयु-विभेद को गौण करता हुआ हमारा आधुनिक समाज जिस “मित्रता” के रंग में आज रंगा है, उस पर यहां लिखना विषयांतर नहीं होगा कि ताजिंदगी निर्मोही व्यास जिंदाजिल इंसान के रूप में जिस मित्रता को छोटो-बड़ों पर नौछावर करते रहे वह रेखांकित की जानी चाहिए। अपने समय के कला-जगत से जुड़े समाज को जिस मित्र-भाव के बंधनों से निर्मोहीजी ने बंधना आरंभ किया था वह बहुत विरल और अनुपम अनुभव है।

नाटक-लेखन और मंचन के लिए बीकानेर के जिस नाम को पूरे देश में जाना-पहचाना गया वह नाम और व्यवहार में जरा भी समानता नहीं रखता- नाम निर्मोही और स्वभाव से अनुपम-अनुरागी। यह कितना सुखद अहसास है कि वे जीवनभर सादगी के साथ एक मिशन को लेकर जिंदादिल बने रहे। अब याद करें हम उनका ऐनक लगा चेहरा, कंधे का लेखकीय-झोला और साइकिल। यह रूप-चित्र कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। हर दिल अजीज और सब को पूरे मान-सम्मान-प्रेम से मीठी झिड़की देते वे सब दिलों में गहरे बसे हैं। मुझे लगता है कि मेरे स्मृति-लोक में उठ कर जैसे अभी-अभी बाहर आए हैं और मुझसे पूछ रहे हैं- नीरज! कियां…. मिलण नै क्यूं कोनी आयो?… अब आप ही बता दे मैं इसका क्या जबाब दूं?

डॉ. नीरज दइया