देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां

DKR RI T K Neeraj Daiya

देवकिशन राजपुरोहित री टाळवीं कहाणियां इक्कीसवीं सदी में आज जद कहाणी केई मुकाम पार करती थकी जिण ठौड़ माथै आय ढूकी है उण में पठनीयता अर कथारस रो तोड़ो देख सकां। इण दौर में लोकभाषा में लिखीजी आं कहाणियां अर खास कर लोककथावां री हर कीं बेसी ई आवणी सुभाविक है। कहाणी परंपरा में कहाणी रो विगसाव भलाई किणी ठौड़ पूग जावो पण उण री जड़ां में लोककथावां रो कथारस पोख्यां ई ओ कथा-बिरछ पांगरैला। नीत-अनीत साम्हीं लोक-आरसी है- चावी लोककथावां। सांवठी संस्कृति अर बातपोसी रो नमूनो आं केई कहाणियां में देख सकां जिण में लोक न्याव अर अदल इंसाफ री बातां में निगै आवै। कहाणीकार देवकिशन राजपुरोहित की कहाणी जातरा नै इण संग्रै रै मारफत अेकठ देख्यां कहाणी विगसाव री बात करण मांय सुभीतो हुवैला।

देवकिशन राजपुरोहित (6 अक्टूबर, 1944) राजस्थानी भाषा, साहित्य अर संस्कृति रा लूंठा हिमायती। राजस्थानी अर हिंदी दोनूं भाषावां में खूब लिख्यो अर अजेस ई लिखण-छपण में पाछ कोनी। पांच कहाणी-संग्रै- ‘वरजूड़ी रो तप’ (1970), ‘दांत कथावां’ (1971), ‘मौसर बंद’ (1989), ‘बटीड़’ (2003) ‘म्हारी कहाणियां’ (2007) रै अलावा विविध विधावां में केई पोथ्यां अर ग्रंथावली ई प्रकाशित। देस-विदेस री केई जातरावां अर पत्रकारिता रो लांबो अनुभव। केई मान-सम्मान अर पुरस्कारां सूं आदरीज्या दाना मिनख।
ई-मेल dkrajp@gmail.com / मो. 7976262808

नीरज दइया (22 सितंबर, 1968) कवि, आलोचक अर संपादक रूप ओळखाण। निर्मल वर्मा रै कथा-साहित्य माथै शोध। केई पोथ्यां राजस्थानी अर हिंदी में प्रकाशित। अनुवाद अर बाल साहित्य खातर प्रांतीय-राष्ट्रीय स्तर माथै सम्मानित चावा-ठावा रचनाकार।
ई-मेल drneerajdaiya@gmail.com / मो. 9461375668

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